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Thursday, April 16, 2026

विश्व में एक या दो नहीं 13 हिन्दू राष्ट्र है, जानिये कौन कौन है यह हिन्दू राष्ट्र ?

विश्व में एक या दो नहीं 13 हिन्दू राष्ट्र है, जानिये कौन कौन है यह हिन्दू राष्ट्र ?

जब लोग कहते हैं कि विश्व में केवल एक ही हिन्दू देश है तो यह पूरी तरह गलत है यह बात केवल वे ही कह सकते हैं जो हिन्दू की परिभाषा को नहीं जानते । इसके लिए सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि हिन्दू की परिभाषा क्या है ।

हिन्दुत्व की जड़ें किसी एक पैगम्बर पर टिकी न होकर सत्य, अहिंसा सहिष्णुता, ब्रह्मचर्य , करूणा पर टिकी हैं । हिन्दू विधि के अनुसार हिन्दू की यह परिभाषा नकारात्मक है कि जो ईसाई मुसलमान व यहूदी नहीं है वे सब हिन्दू है। इसमें आर्यसमाजी, सनातनी, जैन सिख बौद्ध इत्यादि सभी लोग आ जाते हैं । एवं भारतीय मूल के सभी सम्प्रदाय पुर्नजन्म में विश्वास करते हैं और मानते हैं कि व्यक्ति के कर्मों के आधार पर ही उसे अगला जन्म मिलता है ।

तुलसीदास जी ने लिखा है परहित सरिस धरम नहीं भाई । पर पीड़ा सम नहीं अधमाई । अर्थात दूसरों को दुख देना सबसे बड़ा अधर्म है एवं दूसरों को सुख देना सबसे बड़ा धर्म है । यही हिन्दू की भी परिभाषा है । कोई व्यक्ति किसी भी भगवान को मानते हुए, एवं न मानते हुए हिन्दू बना रह सकता है । हिन्दू की परिभाषा को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता । यही कारण है कि भारत में हिन्दू की परिभाषा में सिख बौद्ध जैन आर्यसमाजी सनातनी इत्यादि आते हैं ।

हिन्दू की संताने यदि इनमें से कोई भी अन्य पंथ अपना भी लेती हैं तो उसमें कोई बुराई नहीं समझी जाती एवं इनमें रोटी बेटी का व्यवहार सामान्य माना जाता है । एवं एक दूसरे के धार्मिक स्थलों को लेकर कोई झगड़ा अथवा द्वेष की भावना नहीं है । सभी पंथ एक दूसरे के पूजा स्थलों पर आदर के साथ जाते हैं । जैसे स्वर्ण मंदिर में सामान्य हिन्दू भी बड़ी संख्या में जाते हैं तो जैन मंदिरों में भी हिन्दुओं को बड़ी आसानी से देखा जा सकता है ।
जब गुरू तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितो के बलात धर्म परिवर्तन के विरूद्ध अपना बलिदान दिया तो गुरू गोविन्द सिंह ने इसे तिलक व जनेउ के लिए उन्होंने बलिदान दिया इस प्रकार कहा । इसी प्रकार हिन्दुओं ने भगवान बुद्ध को अपना 9वां अवतार मानकर अपना भगवान मान लिया है । एवं भगवान बुद्ध की ध्यान विधि विपश्यना को करने वाले अधिकतम लोग आज हिन्दू ही हैं एवं बुद्ध की शरण लेने के बाद भी अपने अपने घरों में आकर अपने हिन्दू रीतिरिवाजों को मानते हैं । इस प्रकार भारत में फैले हुए पंथों को किसी भी प्रकार से विभक्त नहीं किया जा सकता एवं सभी मिलकर अहिंसा करूणा मैत्री सद्भावना ब्रह्मचर्य को ही पुष्ट करते हैं ।

इसी कारण कोई व्यक्ति चाहे वह राम को माने या कृष्ण को बुद्ध को या महावीर को अथवा गोविन्द सिंह को परंतु यदि अहिंसा, करूणा मैत्री सद्भावना ब्रह्मचर्य, पुर्नजन्म, अस्तेय, सत्य को मानता है तो हिन्दू ही है । इसी कारण जब पूरे विश्व में 13 देश हिन्दू देशों की श्रेणी में आएगें । इनमें वे सब देश है जहाँ बौद्ध पंथ है । भगवान बुद्ध द्वारा अन्य किसी पंथ को नहीं चलाया गया उनके द्वारा कहे गए समस्त साहित्य में कहीं भी बौद्ध शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है । उन्होंने सदैव इस धर्म कहा ।

भगवान बुद्ध ने किसी भी नए सम्प्रदाय को नहीं चलाया उन्होनें केवल मनुष्य के अंदर श्रेष्ठ गुणों को लाने उन्हें पुष्ट करने के लिए ध्यान की पुरातन विधि विपश्यना दी जो भारत की ध्यान विधियों में से एक है जो उनसे पहले सम्यक सम्बुद्ध भगवान दीपंकर ने भी हजारों वर्ष पूर्व विश्व को दी थी । एवं भगवान दीपंकर से भी पूर्व न जाने कितने सम्यंक सम्बुद्धों द्वारा यही ध्यान की विधि विपश्यना सारे संसार को समय समय पर दी गयी ( एसा स्वयं भगवान बुद्ध द्वारा कहा गया है ।

भगवान बुद्ध ने कोई नया पंथ नहीं चलाया वरन् उन्होंने मानवीय गुणों को अपने अंदर बढ़ाने के लिए अनार्य से आर्य बनने के लिए ध्यान की विधि विपश्यना दी जिससे करते हुए कोई भी अपने पुराने पंथ को मानते हुए रह सकता है । परंतु विधि के लुप्त होने के बाद विपश्यना करने वाले लोगों के वंशजो ने अपना नया पंथ बना लिया । परतुं यह बात विशेष है कि इस ध्यान की विधि के कारण ही भारतीय संस्कृति का फैलाव विश्व के 21 से भी अधिक देशों में हो गया एवं ११ देशों में बौद्धों की जनसंख्या अधिकता में हैं ।

हिन्दुत्व व बौद्ध मत में समानताएं –

१- दोनों ही कर्म में पूरी तरह विश्वास रखते हैं । दोनों ही मानते हैं कि अपने ही कर्मों के आधार पर मनुष्य को अगला जन्म मिलता है ।

2- दोनों पुर्नजन्म में विश्वास रखते हैं ।

3- दोनों में ही सभी जीवधारियों के प्रति करूणा व अहिंसा के लिए कहा गया है ।

4- दोनों में विभिन्न प्रकार के स्वर्ग व नरक को बताया गया है ।

5- दोनों ही भारतीय हैं भगवान बुद्ध ने भी एक हिन्दू सूर्यवंशी राजा के यहां पर जन्म लिया था इनके वंशज शाक्य कहलाते थे । स्वयं भगवान बुद्ध ने तिपिटक में कहा है कि उनका ही पूर्व जन्म राम के रूप में हुआ था । 

6- दोनों में ही सन्यास को महत्व दिया गया है । सन्यास लेकर साधना करन को वरीयता प्रदान की गयी है ।

7- बुद्ध धर्म में तृष्णा को सभी दुखों का मूल माना है । चार आर्य सत्य माने गए हैं ।

– संसार में दुख है

– दुख का कारण है

– कारण है तृष्णा

– तृष्णा से मुक्ति का उपाय है आर्य अष्टांगिक मार्ग । अर्थात वह मार्ग जो अनार्य को आर्य बना दे ।

इससे हिन्दुओं को भी कोई वैचारिक मतभेद नहीं है ।

8- दोनों में ही मोक्ष ( निर्वाण )को अंतिम लक्ष्य माना गया है एवं मोक्ष प्राप्त करने के लिए पुरूषार्थ करने को श्रेष्ठ माना गया है ।

दोनों ही पंथों का सूक्ष्मता के साथ तुलना करने के पश्चात यह निष्कर्ष बड़ी ही आसानी से निकलता है कि दोनों के मूल में अहिंसा, करूणा, ब्रह्मचर्य एवं सत्य है । दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता । और हिन्दओं का केवल एक देश नहीं बल्कि 13 देश हैं ।

इस प्रकार हम देखते हैं विश्व की कुल जनसंख्या में भारतीय मूल के धर्मों की संख्या 30 प्रतिशत है जो मुस्लिम से बहुत ज्यादा है । एवं हिन्दुओं की कुल जनसंख्या बौद्धों को जोड़कर 170 करोड़ है। है जो मुसलमानों से कुछ ही कम है । व हिन्दुओं के 13 देश थाईलैण्ड, कम्बोडिया म्यांमार, भूटान, श्रीलंका, तिब्बत, लाओस वियतनाम, जापान, मकाउ, ताईवान नेपाल व भारत हैं । इसी कारण जब लोग कहते हैं कि विश्व में केवल एक ही हिन्दू देश है तो यह पूरी तरह गलत है यह बात केवल वे ही कह सकते हैं जो हिन्दू की परिभाषा को नहीं जानते हैं ।

Wednesday, May 28, 2025

इस्लाम से पहले 100% सनातन धर्मी था अफगानिस्तान, हर जगह थी केवल सनातन धर्म की पताका

इस्लाम से पहले 100% सनातन धर्मी था अफगानिस्तान, हर जगह थी केवल सनातन धर्म की पताका



आज अफगानिस्तान और इस्लाम एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं, इसमें शक नहीं लेकिन यह भी सत्य है कि वह देश जितने समय से इस्लामी है, उससे कई गुना समय तक वह गैर-इस्लामी रह चुका है| इस्लाम तो अभी एक हजार साल पहले ही अफगानिस्तान पहुँचा, उसके कई हजार साल पहले तक वह आर्यों, बौद्घों और हिन्दुओं का देश रहा है|

धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी, महान संस्कृत वैयाकरण आचार्य पाणिनी और गुरू गोरखनाथ पठान ही थे| जब पहली बार मैंने अफगान लड़कों के नाम कनिष्क और हुविष्क तथा लड़कियों के नाम वेदा और अवेस्ता सुने तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ| अफगानिस्तान की सबसे बड़ी होटलों की श्रृंखला का नाम ‘आर्याना‘ था और हवाई कम्पनी भी ‘आर्याना‘ के नाम से जानी जाती थी| भारत के पंजाबियों, राजपूतों और अग्रवालों के गोत्र्-नाम अब भी अनेक पठान कबीलों में ज्यों के त्यों मिल जाते हैं|

मंगल, स्थानकजई, कक्कर, सीकरी, सूरी, बहल, बामी, उष्ट्राना, खरोटी आदि गोत्र् पठानों के नामों के साथ जुड़े देखकर कौन चकित नहीं रह जाएगा ? ग़ज़नी और गर्देज़ के बीच एक गाँव के हिन्दू से जब मैंने पूछा कि आपके पूर्वज भारत से अफगानिस्तान कब आए तो उसने तमककर कहा ‘जबसे अफगानिस्तान ज़मीन पर आया|’ इस अफगान हिन्दू की बोली न पश्तो थी, न फारसी, न पंजाबी| वह शायद ब्राहुई थी, जो वर्तमान अफगानिस्तान की सबसे पुरानी भाषा है और वेदों की भाषा के भी बहुत निकट है|

छठी शताब्दि के वराहमिहिर के ग्रन्थ ‘वृहत्र संहिता‘ में पहली बार ‘अवगाण‘ शब्द का प्रयोग हुआ है| इसके पहले तीसरी शताब्दि के एक ईरानी शिलालेख में ‘अबगान‘ शब्द का उल्लेख माना जाता है| फ्रांसीसी विद्वान साँ-मार्टिन के अनुसार अफगान शब्द संस्कृत के ‘अश्वक‘ या ‘अशक‘ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है-अश्वारोही या घुड़सवार ! संस्कृत साहित्य में अफगानिस्तान के लिए ‘अश्वकायन‘ (घुड़सवारों का मार्ग) शब्द भी मिलता है| वैसे अफगानिस्तान नाम का विशेष-प्रचलन अहमद शाह दुर्रानी के शासन-काल (1747-1773) में ही हुआ| इसके पूर्व अफगानिस्तान को आर्याना, आर्यानुम्र वीजू, पख्तिया, खुरासान, पश्तूनख्वाह और रोह आदि नामों से पुकारा जाता था|

पारसी मत के प्रवर्त्तक जरथ्रुष्ट द्वारा रचित ग्रन्थ ‘जिन्दावेस्ता‘ में इस भूखण्ड को ऐरीन-वीजो या आर्यानुम्र वीजो कहा गया है| अफगान इतिहासकार फज़ले रबी पझवक के अनुसार ये शब्द संस्कृत के आर्यावर्त्त या आर्या-वर्ष से मिलते-जुलते हैं| उनकी राय में आर्य का मतलब होता है-श्रेष्ठ या सम्मानीय और पश्तो भाषा में वर्ष का मतलब होता है–चर भूमि ! अर्थात्र आर्यानुम्र वीज़ो का मतलब है–आर्यों की भूमि !

प्रसिद्घ अफगान इतिहासकार मोहम्मद अली और प्रो0 पझवक का यह दावा है कि ऋग्वेद की रचना वर्तमान भारत की सीमाओं में नहीं, बल्कि आर्योंके आदि देश में हुई, जिसे आज सारी दुनिया अफगानिस्तान के नाम से जानती है| कुछ पश्चिमी विद्वानों ने यह सिद्घ करने की कोशिश की है कि अफगान लोग यहूदियों की सन्तान हैं और मुस्लिम इतिहासकारों का कहना है कि अरब देशों से आकर वे इस इलाके में बस गए| लेकिन प्राचीन ग्रन्थों में मिलनेवाले अन्तर्साक्ष्यों तथा शिलालेखों, मूर्तियों, सिक्कों, खंडहरों, बर्तनों और आभूषणों आदि के बाहिर्साक्ष्य के आधार पर अकाट्रय रूप से माना जा सकता है कि अफगान लोग मध्य एशिया के मूल निवासी हैं| वे अरब भूमि, यूरोप या उत्तरी ध्रुव से आए हुए लोग नहीं हैं|

हाँ, इतिहास में हुए फेर-बदल तथा उथल-पुथल के दौरान जिसे हम आज अफगानिस्तान कहते हैं, उस क्षेत्र् की सीमाएँ या संज्ञाएँ हजार-पाँच सौ मील दाएँ-बाएँ और ऊपर-नीचे होती रही हैं तथा दुनिया के इस चौराहे से गुजरनेवाले आक्रान्ताओं, व्यापारियों, धर्मप्रचारकों तथा यात्र्ियों के वंशज स्थानीय लोगों में घुलते-मिलते रहे हैं|
विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में पख्तून लोगों और अफगान नदियों का उल्लेख है| दाशराज्ञ-युद्घ में ‘पख्तुओं‘ का उल्लेख पुरू कबीले के सहयोगियों के रूप में हुआ है| जिन नदियों को आजकल हम आमू, काबुल, कुर्रम, रंगा, गोमल, हरिरूद आदि नामों से जानते हैं, उन्हें प्राचीन भारतीय लोग क्रमश: वक्षु, कुभा, कु्रम, रसा, गोमती, हर्यू या सर्यू के नाम से जानते थे| जिन स्थानों के नाम आजकल काबुल, कन्धार, बल्ख, वाखान, बगराम, पामीर, बदख्शाँ, पेशावर, स्वात, चारसद्दा आदि हैं,

उन्हें संस्कृत और प्राकृत-पालि साहित्य में क्रमश: कुभा या कुहका, गन्धार, बाल्हीक, वोक्काण, कपिशा, मेरू, कम्बोज, पुरुषपुर, सुवास्तु, पुष्कलावती आदि के नाम से जाना जाता था| हेलमंद नदी का नाम अवेस्ता के हायतुमन्त शब्द से निकला है, जो संस्कृत के ‘सतुमन्त‘ का अपभ्रन्श है| इसी प्रकार प्रसिद्घ पठान कबीले ‘मोहमंद‘ को पाणिनी ने ‘मधुमन्त‘ और अफरीदी को ‘आप्रीता:‘ कहकर पुकारा है| महाभारत में गान्धारी के देश के अनेक सन्दर्भ मिलते हैं| हस्तिनापुर के राजा संवरण पर जब सुदास ने आक्रमण्पा किया तो संवरण की सहायता के लिए जो ‘पस्थ‘ लोग पश्चिम से आए, वे पठान ही थे|

छान्दोग्य उपनिषद्र, मार्कण्डेय पुराण, ब्राह्मण ग्रन्थों तथा बौद्घ साहित्य में अफगानिस्तान के इतने अधिक और विविध सन्दर्भ उपलब्ध हैं कि उन्हें पढ़कर लगता है कि अफगानिस्तान तो भारत ही है, अपने पूर्वजों का ही देश है| यदि अफगानिस्तान को अपने स्मृति-पटल से हटा दिया जाए तो भारत का सांस्कृतिक-इतिहास लिखना असम्भव है| लगभग डेढ़ करोड़ निवासियों के इस भू-वेष्टित देश में हिन्दुकुश पर्वत का वही महत्व है जो भारत में हिमालय का है या मिस्र में नील नदी का है ! इब्न वतूता का कहना है कि इस पर्वत को हिन्दुकुश इसलिए कहते हैं कि हिन्दुस्तान से लाए जानेवाले गुलाम लड़के और लड़कियाँ इस क्षेत्र् में भयानक ठंड के कारण मर जाते थे| हिन्दुकुश अर्थात्र हिन्दुओं को मारनेवाला !
 
लेकिन अफगान विद्वान फज़ले रबी पझवक की मान्यता है कि यदि हिन्दुकुश शब्द का अर्थ प्राचीन बख्तरी भाषा तथा पश्तो के आधार पर किया जाए तो हिन्दुकुश का मतलब होगा–नदियों का उद्रगम ! बख्तरी भाषा में स को ह कहने का रिवाज है| अत: सिन्धु से हिन्दू बन गया| सिन्धू का मतलब होता है–नदी ! वास्तव में हिन्दुकुश पर्वत से, जो कि हिमालय की एक पश्चिमी शाखा है, अफगानिस्तान को कई महत्वपूर्ण नदियों का उद्रगम और सिंचन होता है| वक्षु, काबुल, हरीरूद और हेलमंद आदि नदियों का पिता हिन्दुकुश ही है| वर्षा की कमी के कारण जब अफगानिस्तान की नदियाँ सूखने लगती हैं तो हिन्दुकुश का बर्फ पिघल-पिघलकर उनकी प्यास बुझाता है|
 
ऋग्वेद और ‘जिन्दावस्ता‘ दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रन्थ माने जाते हैं| दोनों की रचना अफगानिस्तान में हुई, ऐसा बहुत-से यूरोपीय विद्वान भी मानते हैं| उन्होंने अनेक तर्क और प्रमाण भी दिए हैं| अवेस्ता के रचनाकार महर्षि जरथ्रुष्ट का जन्म उत्तरी अफगानिस्तान में बल्ख के आस-पास हुआ और वहीं रहकर उन्होंने पारसी धर्म का प्रचलन किया, जो लगभग एक हजार साल तक ईरान का राष्ट्रीय धर्म बना रहा| वेदों और अवेस्ता की भाषा ही एक जैसी नहीं है बल्कि उनके देवताओं के नाम मित्र्, इन्द्र, वरुण–आदि भी एक-जैसे हैं|
 
देवासुर संग्रामों के वर्णन भी दोनों में मिलते हैं| अब से लगभग 2500 साल पहले ईरानी राजाओं–देरियस और सायरस– ने अफगान क्षेत्र् पर अपना अधिकार जमा लिया था| देरियस के शिलालेख में खुद को ऐर्य ऐर्यपुत्र् (आर्य आर्यपुत्र्) कहता है| हिन्दुकुश के उत्तरी क्षेत्र् को उन्होंने बेक्टि्रया तथा दक्षिणी क्षेत्र् को गान्धार कहा| दो सौ साल बाद यूनानी विजेता सिकन्दर इस क्षेत्र् में घुस आया| सिकन्दर के सेनापतियों ने इस क्षेत्र् पर लगभग दो सौ साल तक अपना वर्चस्व बनाए रखा| उन्होंने अपना साम्राज्य मध्य एशिया और पंजाब के आगे तक फैलाया|
 
आज भी अनेक अफगानों को देखते ही आप तुरन्त समझ सकते हैं कि वे यूनानियों की तरह क्यों लगते हैं| आमू दरिया और कोकचा नदी के किनारे बसे गाँव ‘आया खानुम‘ की खुदाई में अभी कुछ वर्ष पहले ही ग्रीक साम्राज्य के वैभव के प्रचुर प्रमाण मिले हैं|
 
ईसा के तीन सौ साल पहले जब अफगानिस्तान में यूनानी साम्राज्य दनदना रहा था, भारत में मौर्य साम्राज्य-चन्द्रगुप्त, बिन्दुसार और अशोक-का उदय हो चुका था| अशोक ने बौद्घ धर्म को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक फैला दिया| बौद्घ धर्म चीन, जापान और कोरिया समुद्र के रास्तांे नहीं गया बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया के थल-मार्गों से होकर गया| पालि-साहित्य में नग्नजित्र और पुक्कुसाति नामक दो अफगान राजाओं का उल्लेख भी आता है, जो गान्धार के स्वामी थे और बिन्दुसार के समकालीन थे|
 
गन्धार राज्य की राजधानी तक्षशिला थी, जिसके स्नातकों में जीवक जैसे वैद्य और कोसलराज प्रसेनजित जैसे राजकुमार भी थे| चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस के बीच हुई सन्धि के कारण अनेक अफगान और बलूच क्षेत्र् बौद्घ प्रभाव में पहले ही आ चुके थे| ये सब क्षेत्र् और इनके अलावा मध्य एशिया का लम्बा-चौड़ा भू-भाग ईसा की पहली सदी में जिन राजाओं के वर्चस्व में आया, वे भी बौद्घ ही थे|
 
कुषाण साम्राज्य के इन राजाओं–कनिष्क, हुविष्क, वासुदेव–आदि ने सम्पूर्ण अफगानिस्तान को तो बुद्घ का अनुनायी बनाया ही, बौद्घ धर्म को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचा दिया| चीनी इतिहासकारों ने लिखा है कि सन्र 383 से लेकर 810 तक अनेक बौद्घ ग्रन्थों का चीनी अनुवाद अफगान बौद्घ भिक्षुओं ने ही किया था| बौद्घ धर्म की ‘महायान‘ शाखा का प्रारम्भ अफगानिस्तान में ही हुआ| विश्व प्रसिद्घ गांधार-कला का परिपाक कुषाण-काल में ही हुआ| आजकल हम जिस बगराम हवाई अड्डे का नाम बहुत सुनते हैं,
 
वह कभी कुषाणों की राजधानी था| उसका नाम था, कपीसी| पुले-खुमरी से 16 कि0मी0 उत्तर में सुर्ख कोतल नामक जगह में कनिष्क-काल के भव्य खण्डहर अब भी देखे जा सकते हैं| इन्हें ‘कुहना मस्जिद‘ के नाम से जाना जाता है| पेशावर और लाहौर के संग्रहालयों में इस काल की विलक्षण कलाकृतियाँ अब भी सुरक्षित हैं|
 
अफगानिस्तान के बामियान, जलालाबाद, बगराम, काबुल, बल्ख आदि स्थानों में अनेक मूर्तियों, स्तूपों, संघारामों, विश्वविद्यालयों और मंदिरों के अवशेष मिलते हैं| काबुल के आसामाई मन्दिर को दो हजार साल पुराना बताया जाता है| आसामाई पहाड़ पर खड़ी पत्थर की दीवार को ‘हिन्दुशाहों‘ द्वारा निर्मित परकोटे के रूप में देखा जाता है| काबुल का संग्रहालय बौद्घ अवशेषों का खज़ाना रहा है|
 
अफगान अतीत की इस धरोहर को पहले मुजाहिदीन और अब तालिबान ने लगभग नष्ट कर दिया है| बामियान की सबसे ऊँची और विश्व-प्रसिद्घ बुद्घ प्रतिमाओं को भी उन्होंने नि:शेष कर दिया है| फाह्रयान और ह्नेन सांग ने अपने यात्र-वृतान्तों में इन महान प्रतिमाओं, अफगानों की बुद्घ-भक्ति और बौद्घ धर्म केन्द्रों का अत्यन्त श्रद्घापूर्वक चित्र्ण किया है| अब उनके खण्डहर भी स्मृति के विषय हो गए हैं|
 
जलालाबाद के पास अवस्थित हद्दा में मिट्टी की दो हजार साल पुरानी जीवन्त मूर्तियाँ चीन में सियान के मिट्टी के सिपाहियों जैसी थीं याने उनकी गणना विश्व के आश्चर्यों में की जा सकती थी| वे भी मुजाहिदीन हमलों में नष्ट हो चुकी हैं| बुतपरस्ती का विरोध करने के नाम पर गुमराह इस्लामवादी तत्वों ने अपने बाप-दादों के स्मृति-चिन्ह भी मिटा दिए|
 
इस्लाम के नौ सौ साल के हमलों के बावजूद अफगानिस्तान का एक इलाका 100 साल पहले तक अपनी प्राचीन सभ्यता को सुरक्षित रख पाया था| उसका नाम है, काफिरिस्तान| यह स्थान पाकिस्तान की सीमा पर स्थित चित्रल के निकट है| तैमूर लंग, बाबर तथा अन्य बादशाहों के हमलों का इन ‘काफिरों‘ ने सदा डटकर मुकाबला किया और अपना धर्म-परिवर्तन नहीं होने दिया| अफगानिस्तान की कुणार और पंजशीर घाटी के पास रहनेवाले ये पर्वतीय लोग जो भाषा बोलते हैं, उसके शब्द ज्यों के त्यों वेदों की संस्कृत में पाए जाते हैं|
 
ये इन्द्र, मित्र्, वरुण, गविष, सिंह, निर्मालनी आदि देवी-देवताओं की पूजा करते थे| इनके देवताओं की काष्ठ प्रतिमाएँ मैंने स्वयं काबुल संग्रहालय में देखी हैं| चग सराय नामक स्थान पर हजार-बारह सौ साल पुराने एक हिन्दू मन्दिर के खण्डहर भी मिले हैं| सन्र 1896 में अमीर अब्दुर रहमान ने इन काफिरों को तलवार के जोर पर मुसलमान बना लिया| कुछ पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है कि ये काफिर लोग हिन्दुओं की तरह चोटी रखते थे और हवि आदि भी देते थे| अमीर अब्दुर रहमान को डर था कि बि्रटिश शासन की मदद से इन लोगों को कहीं ईसाई न बना लिया जाए|
 
अफगानिस्तान में इस्लाम के आगमन के पहले अनेक हिन्दू राजाओं का भी राज रहा| ऐसा नहीं है कि ये राजा काशी, पाटलिपुत्र्, अयोध्या आदि से कन्धार या काबुल गए थे| ये एकदम स्थानीय अफगान या पठान या आर्यवंशीय राजा थे| इनके राजवंश को ‘हिन्दूशाही‘ के नाम से ही जाना जाता है| यह नाम उस समय के अरब इतिहासकारों ने ही दिया था| सन्र 843 में कल्लार नामक राजा ने हिन्दूशाही की स्थापना की| तत्कालीन सिक्कों से पता चलता है कि कल्लार के पहले भी रूतविल या रणथल, स्पालपति और लगतुरमान नामक हिन्दू या बौद्घ राजाओं का गांधार प्रदेश में राज था| ये राजा जाति से तुर्क थे
 
लेकिन इनके ज़माने की शिव, दुर्गा और कार्तिकेय की मूतियाँ भी उपलब्ध हुई हैं| ये स्वयं को कनिष्क का वंशज भी मानते थे| अल-बेरूनी के अनुसार हिन्दूशाही राजाओं में कुछ तुर्क और कुछ हिन्दू थे| हिन्दू राजाओं को ‘काबुलशाह‘ या ‘महाराज धर्मपति‘ कहा जाता था| इन राजाओं में कल्लार, सामन्तदेव, भीम, अष्टपाल, जयपाल, आनन्दपाल, त्रिलोचनपाल, भीमपाल आदि उल्लेखनीय हैं| इन राजाओं ने लगभग साढ़े तीन सौ साल तक अरब आततायियों और लुटेरों को जबर्दस्त टक्कर दी और उन्हें सिंधु नदी पार करके भारत में नहीं घुसने दिया| लेकिन 1019 में महमूद गज़नी से त्रिलोचनपाल की हार के साथ अफगानिस्तान का इतिहास पलटा खा गया| फिर भी अफगानिस्तान को मुसलमान बनने में पैगम्बर मुहम्मद के बाद लगभग चार सौ साल लग गए|
 
यह आश्चर्य की बात है कि इन हारते हुए ‘हिन्दूशाही‘ राजाओं के बारे में अरबी और फारसी इतिहासकारों ने तारीफ के पुल बाँधे हुए हैं| अल-बेरूनी और अल-उतबी ने लिखा है कि हिन्दूशाहियों के राज में मुसलमान, यहूदी और बौद्घ लोग मिल-जुलकर रहते थे| उनमें भेदभाव नहीं किया जाता था| शिक्षा, कला, व्यापार अत्यधिक उन्नत थे| इन राजाओं ने सोने के सिक्के तक चलाए| हिन्दूशाहों के सिक्के इतने अच्छे होते थे कि सन्र 908 में बगदाद के अब्बासी खलीफा अल-मुक्तदीर ने वैसे ही देवनागरी सिक्कों पर अपना नाम अरबी में खुदवाकर नए सिक्के जारी करवा दिए| मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हिन्दूशाही की लूट का माल जब गज़नी में प्रदर्शित किया गया तो पड़ौसी मुल्कों के राजदूतों की आँखे फटी की फटी रह गइंर्| भीमनगर (नगरकोट) से लूट गए माल को गज़नी तक लाने के लिए ऊँटों की कमी पड़ गई|
 
अल-बेरूनी ने राजा आनन्दपाल के बड़प्पन का जि़क्र करते हुए लिख है कि महमूद गज़नी से सम्बन्ध खराब होने के बावजूद, जब तुर्कों ने उस पर हमला किया, तो आनन्दपाल ने महमूद की सहायता के लिए उसे पत्र् लिखा था| ‘हिन्दूशाही‘ राजवंश के राजा ‘आर्याना‘ के बाहर के सुल्तानों को इस क्षेत्र् में घुसने नहीं देना चाहते थे| इसीलिए उन्होंने महमूद गज़नी ही नहीं, अन्य स्थानीय हिन्दू और अ-हिन्दू शासकों से गठबन्धन करने की कोशिश की लेकिन महमूद गज़नी को सत्ता और लूटपाट के अलावा इस्लाम का नशा भी सवार था| इसीलिए वह जीते हुए क्षेत्रें के मंदिरों, शिक्षा केन्द्रों, मण्डियों और भवनों को नष्ट करता जाता था
 
और स्थानीय लोगों को जबरन मुसलमान बनाता जाता था| यह बात अल-बेरूनी, अल-उतबी, अल-मसूदी और अल-मकदीसी जैसे मुस्लिम इतिहासकारों ने भी लिखी है| समकालीन इतिहासकार अल-बेरूनी ने तो यहाँ तक लिखा है कि जीते हुए क्षेत्रें के लोगों के साथ किए गए कठोर बर्ताव और सुल्तानों की विध्वंसात्मक नीतियों के कारण यह क्षेत्र् (अफगानिस्तान) विद्वानों, व्यापारियों, योद्घाओं और राजकुमारों के रहने लायक नहीं रह गया है| “यही कारण है कि जो-जो क्षेत्र् हमने जीते हैं,
 
वहाँ-वहाँ से हिन्दू विद्याएँ इतनी दूर–कश्मीर, बनारस तथा अन्य स्थानों–पर भाग खड़ी हुई कि हमारी पहुँच के बाहर हो गई हैं|” क्या खल्की-परचमी, मुजाहिदीन और तालिबान हुकूमतों के दौरान पिछले 23 साल में एक-तिहाई अफगानिस्तान खाली नहीं हो गया ? क्या अफगानिस्तान के श्रेष्ठ विद्वान, उत्तम कलाकार, निपुण वैज्ञानिक, कुशल राजनीतिज्ञ, भद्रलोक के ज्यादातर सदस्य उस देश को छोड़कर अमेरिका, यूरोप और भारत में नहीं बस गए हैं ? क्या अभागे अफगानिस्तान के इतिहास का चक्र उलटा घूमता हुआ
 
एक हजार साल पीछे नहीं चला गया है ? क्या हम आज वही भयावह दृश्य नहीं देख रहे हैं, जो अफगानिस्तान ने एक हजार साल पहले देखा था ?

Tuesday, May 27, 2025

हल्दीघाटी हो या पलासी, जातियों में छुपे हैं हार के कारण

हल्दीघाटी हो या पलासी, जातियों में छुपे हैं हार के कारण

हाल में कुछ इतिहासकारों ने बहादुरी का झंडा उठा लिया है। वे कह रहे हैं कि राणा प्रताप अकबर से हारे नहीं थे। उनके मुताबिक हल्दीघाटी की लड़ाई के इतिहास को गलत रूप में पेश किया गया है। बाबर ने 1526 में लगभग 15 हजार की सेना के साथ पानीपत का युद्ध लड़ा और जीता। यहां से मुगल साम्राज्य की शुरुआत मानी जाती है। हल्दीघाटी का युद्ध बाबर के पोते अकबर और महाराणा प्रताप की फौजों के बीच हुआ था। इसी युद्ध के नतीजे को लेकर विवाद खड़ा किया गया है। जो लोग कह रहे हैं कि इस मामले में इतिहास को गलत रूप से पेश किया गया है, वे या तो कोई वितंडा खड़ा कर चर्चा में आना चाहते हैं या शायद उनका कोई और अजेंडा हो।

अजेंडा तो यह होना चाहिए कि इतिहास में जो अप्रिय घटनाएं हुईं, वे किन परिस्थितियों में हुईं और यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि अब ऐसा न हो। सोचने की बात यह है कि अगर हमारा समाज जाति के आधार पर न बंटा होता तो क्या ऐसी घटनाएं होतीं? रॉबर्ट क्लाइव ने मात्र 3 हजार सैनिकों के दम पर पलासी का युद्ध जीत लिया। कैसे जीता, क्यों जीता, विश्लेषण तो इसका किया जाना चाहिए। कौन जीता, इस पर बवाल करने का क्या फायदा? इतिहास का लेखा-जोखा हम इसलिए रखते हैं कि उससे कुछ सीख सकें। यह केवल पठन-पाठन के लिए ही नहीं, गलतियों को सुधारने, सीखने और भविष्य की तैयारी के लिए भी होता है।


जिस देश में सारे मौसम हों, उपजाऊ जमीन हो, इतना पुराना इतिहास और संस्कृति हो, वह आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में पीछे क्यों है? जापान का उदाहरण सामने है, जहां लगभग 80 प्रतिशत जमीन कंकरीली-पथरीली है, जो भूकंप और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए अभिशप्त है। वह इतना आगे कैसे निकल गया? इतिहासकारों को इस परिप्रेक्ष्य में अतीत को देखना चाहिए। तथाकथित वामपंथी इतिहासकार भी आर्थिक विश्लेषण तक ही सीमित रह गए, जबकि पराजय का कारण मूलतः सामाजिक रहा है।

रॉबर्ट क्लाइव।

क्लाइव जब अपनी छोटी सी फौज लेकर कोलकाता के समुद्री तट से मुर्शिदाबाद की तरफ अग्रसर हो रहा था तो उसके मन में यह भय बैठा हुआ था कि अगर रास्ते में मिले लाखों लोगों ने पत्थर भी उठा लिया तो वे चटनी हो जाएंगे। इतिहासकार इतने तक में सिमट गए कि सिराजुद्दौला की सेना बड़ी होते हुए भी पराजित हुई, क्योंकि मीर जाफर ने धोखा दे दिया। इतिहास की हर पराजय के पीछे उन्होंने कुछ न कुछ कारण ढूंढे हैं। कभी हाथी धोखा दे गए, कभी औजार अनुपयोगी थे, कभी सेनापति बिक गया। क्लाइव जिस रास्ते से गुजरा, वहां मौजूद हजारों-लाखों लोग तमाशबीन बने रहे। अगर वे बंगाली या भारतीय होते तो पहले तो कोई हमला करने की सोचता ही नहीं। और अगर ऐसा दुस्साहस कर भी लेता तो उसका भुर्ता बन गया होता।

बात यह थी कि रास्ते में जो लोग मिले वे नाई, धोबी, कुम्हार, सूद, चंडाल, बढ़ई, मोची, हेला, मुखर्जी, बनर्जी, चटर्जी आदि थे। नाई बाल काटने में लगा था, धोबी कपड़ा धोने में। सभी जातियों को अपने व्यावसायिक धर्म निभाने थे। ऐसे में बंगाल और देश उनका है, यह भावना उनमें कौन पैदा करता? ऐसे में क्लाइव या ईस्ट इंडिया कंपनी को जीतने और राज करने में सबसे ज्यादा मदद हमारी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था ने ही तो की! आश्चर्य होता है कि आज भी इतिहासकार राजा-रानी तक ही सिमटे हुए हैं। युद्ध भी उन्हीं को लेकर होता है, हार-जीत की बात भी उनकी ही होती है।

60 और 70 के दशक के बाद आर्थिक दृष्टिकोण से शोध होना शुरू हुआ, लेकिन निशाना हम तब भी चूकते रहे। एक बार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एक बड़ा सेमिनार आयोजित किया गया था, जिसमें विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्षों और पदाधिकारियों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। मशहूर इतिहासकार प्रफेसर इरफान हबीब वहां मौजूद थे और वक्ता के रूप में मैं भी वहां था। छात्रों-नौजवानों से मैंने सवाल किया कि क्या विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र पर लिखी ऐसी एक भी किताब है, जो हमारे वास्तविक जीवन को समाहित करती हो? उससे 3 दिन पहले मुजफ्फरनगर जाना हुआ था और चर्चा के दौरान जानकारी मिली थी कि मुसलमानों में भी ऐसी कई जातियां हैं, जैसे रांगड़, झोझा, त्यागी मुसलमान आदि, जो एक-दूसरे में शादी-ब्याह नहीं करते।

डायर को सरोपा

इतिहास को दुरुस्त करने की आवश्यकता तो है, पर यह तब तक नहीं हो सकता जब तक उसे सामाजिक और धार्मिक पृष्ठभूमि में न देखा जाए। जालियांवाला बाग कांड का हत्यारा जनरल डायर को माना जाता है, लेकिन क्या इतिहासकारों ने इसकी जांच-पड़ताल की कि स्वर्णमंदिर में उसे सरोपा क्यों भेंट किया गया? सभी बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं के पीछे जलवायु खराब होने से लेकर फूट और षड्यंत्र तक तमाम वजहें गिनाई गईं, लेकिन जो मूल कारण है, उस पर हमेशा परदा पड़ा रहा है।

जब सभी एक साथ रह नहीं सकते और एक बड़ी आबादी को छूने तक से परहेज करते हों, तो क्या बाहरी हमलावरों को रोका जा सकता है? एक तरफ लोग गोरों के साथ उठना-बैठना, खाना-पीना करते रहे, उन्हें गले लगाते रहे, दूसरी तरफ दलितों, पिछड़ों और महिलाओं के साथ भेदभाव करते रहे। इतिहास बदला जाए तो इस उद्देश्य से कि अतीत की गलतियों से सीख कर हम भविष्य सुधारें। अतीत में जो हुआ, उसे बदलने की कोशिश निरर्थक ही कहलाएगी।

लेखक: उदित राज

Wednesday, December 14, 2022

AKARSH GOYAL A GREAT TRAVELLER AND MOUNTENIAR - आकर्ष गोयल एक महान पर्वतारोही

AKARSH GOYAL A GREAT TRAVELLER AND MOUNTENIAR - आकर्ष गोयल एक महान पर्वतारोही

पंजाब में बठिंडा के आकर्ष गोयल ने पूर्वी नेपाल के हिमालय श्रृंखला स्थित अमा डबलाम और आइलैंड पीक/इमजा त्से नामक दो ऊंची चोटियों को फतेह किया है।इस कीर्तिमान के साथ वह ऐसा करने वाले पहले पंजाबी युवक बन गए हैं।आकर्ष पंजाब के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अभियान के दौरान दो चोटियों पर चढ़ाई पूरी की हो।




आकर्ष गोयल ने माउंट अमा डबलाम में 6812 मीटर और 22350 फीट की सीधी चढ़ाई 29 अक्टूबर 2022 को पूरी की।जबकि आइलैंड पीक/इमजा त्से में 6160 मीटर और 20210 फीट की चढ़ाई 21 अक्टूबर 2022 को पूरी की।

आकर्ष गोयल ने इस अभियान को चुनौतीपूर्वक बताते हुए कहा कि अमा डबलाम तकनीकी तौर पर काफी कठिन पर्वत है।उन्होंने कहा कि पंजाब से इस चोटी को फतेह करने वाले वह पहले व्यक्ति हैं।चढ़ाई के दौरान उनके साथ 7 लोग और 5 शेरपा गाइड की टीम थी।अभियान को काठमांडू से शुरू कर इसे पूरा करने में 1 महीने का समय लगा।आकर्ष ने दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति से कामयाबी हासिल करना बताया।

आकर्ष गोयल ने इस अभियान से पहले उन्होंने 3 महीने की कठिन ट्रेनिंग की।इस टारगेट को हासिल करने से पहले अच्छा कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस, सहनशक्ति व ताकत हासिल करना जरूरी है। इसके लिए उन्होंने रूटीन में रनिंग, साइकिलिंग, क्रॉसफिट, रेसिस्टेंस और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की।जिम्नासियो(फेज 3 बठिंडा) के हैरी धनोइया ने ट्रेनिंग ली।इस दौरान एक कस्टम वर्क आउट प्लान बनाकर अलग-अलग हार्ट रेट जोन में ट्रेनिंग की।
आकर्ष गोयल ने बताया कि बेस कैंप तक पहुंचने से पहले हमने 8-10 दिनों तक ट्रैकिंग कर लगभग 100 किमी. की कठिन दूरी तय की।कैंप 1 से कैंप 2 तक का मार्ग तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण मार्ग था।पर्वतारोही मार्ग के इस हिस्से को 4.11 से 5.7-5.10 के बीच कहीं भी ग्रेड देते हैं।इसकी तुलना रॉक क्लाइम्बिंग ग्रेड से की जाती है और सभी गियर और उपकरण के साथ भारी बैग पैक रखना पड़ते हैं।कैंप 3 में पहुंचने से पहले लगातार ऊपर जाना था।इस बिंदु तक पर्वतारोही रात में 5-6 घंटे पहले ही चढ़ाई कर चुके थे।

आकर्ष ने पिरामिड के ठीक नीचे पहुंच कर शिखर डबलाम ढलान के ऊपर स्थित है।शिखर पर पहुंचने से पहले बेहद कठिन रास्ता था।उन्होंने रात 11 बजे चढ़ाई शुरू कर पूरी रात हेड लाइट का इस्तेमाल किया।फिर सुबह 10:30 बजे शिखर पर पहुंचे।अमा डबलाम का शिखर चौड़ा है।दिन साफ था और वह माउंट देख सकते थे।

शिखर पर तापमान 25 डिग्री से 35 डिग्री के आसपास और हवाएं 60 किलोमीटर प्रति घंटा तक चल रही थी।गर्माहट के लिए विशेष डाउन सूट और मोजे व दस्तानों के अलावा ताजा बर्फ पिघला कर पानी का बंदोबस्त किया।आकर्ष ने कहा कि वह भारत और पंजाब को गौरवान्वित करने के लिए भविष्य के अभियानों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।DC बठिंडा सौकत अहमद परे ने आकर्ष गोयल को बधाई देते हुए उन्हें हर संभव सहयोग का भरोसा दिया।

आकर्ष गोयल जी के हौसले को नमन।संपूर्ण सेठ समाज को आप पर गर्व है।भगवान श्री नृसिंह महाराज की कृपा आपके ऊपर हमेशा बनी रहे।

Wednesday, December 7, 2022

चुनाव चुनाव चुनाव......बार बार चुनाव...

 चुनाव चुनाव चुनाव......बार बार चुनाव...


इस हमारे प्यारे देश में शायद ही कोई सा वर्ष ऐसा जाता होगा जब चुनाव ना होते हो. किसी ना किसी राज्य में आचार संहिता लगी रहती हैं. सरकारे, अफसर शाही, पार्टिया, नेता लोग, मिडिया इसी में लगा रहता हैं. कभी कही लोकसभा, राज्यसभा, कही विधान सभा, विधान परिषद् , नगर निगम, नगर पालिका, ग्राम पंचायत जिला पंचायत के चुनाव चलते रहते हैं. ऐसा लगता हैं हमारा देश चुनावो का देश बन के रह गया हैं. इसके कारण से देश में विकास कार्य ठप्प पड़े रहते हैं. फ़ालतू का पैसा खर्चा होता हैं. मोदी जी ने तो एक चुनाव एक देश की परिकल्पना प्रस्तुत की थी, लेकिन हमारे विपक्ष के लोगो ने स्वार्थ वश इस परिकल्पना को नकार दिया. इसमें विपक्ष के अपने स्वार्थ हैं. उनके द्वारा इससे देश में लोगो को जाति पाति, सम्प्रदाय में बांटने में आसानी होती हैं. इस तुच्छ सोच से बचना होगा. पुरे देश में राष्ट्रपति, लोकसभा, विधानसभा के चुनाव एक साथ पांच वर्ष में होने चाहिए. यदि किसी विधायक या सांसद की मृत्यु हो जाए तो उसके स्थान पर दुसरे स्थान पर रहे व्यक्ति को निर्वाचित घोषित करना चाहिए. लोक सभा व विधान सभा ५ वर्ष के लिए निर्वाचित घोषित होनी चाहिए. उससे पहले किसी भी स्थान पर चुनाव ना हो. इसी तरह से नगरपालिका, निगम, व पंचायतो के चुनाव होने चाहिए. इस तरह से देश के पैसे के बचत भी होगी और सरकारी अधिकारी व नेता लोग देस के विकास में ध्यान देंगे. वन्देमातरम, धन्यवाद, राष्ट्रवादी प्रवीण गुप्ता

Thursday, November 4, 2021

'राम वन गमन' पथ


'राम वन गमन' पथ

ऐसे संवरेगा 'राम वन गमन' पथ:जिन रास्तों से गुजरकर प्रभु राम लंका पहुंचे थे, उसका अधिकांश हिस्सा मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में; यहां अब बदल रही है तस्वीर

अयोध्या से श्रीलंका तक की 14 साल की यात्रा में लगभग 248 ऐसे प्रमुख स्थल हैं, जहां भगवान श्रीराम ने या तो विश्राम किया या फिर उनसे उनका कोई रिश्ता जुड़ा है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव छत्तीसगढ़ है। 14 साल के वनवास के 10 साल यहीं गुजरे। हर राज्य अपने हिसाब से राम वन गमन पथ को विकसित कर रहे हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी काम चल रहा है। पढ़िए राम वन गमन पथ से जुड़ी पूरी यात्रा।
































Sunday, March 28, 2021

महाभारत और रामायण काल्पनिक नहीं, बल्कि इन महाग्रंथो के अस्तित्व के पुख्ता प्रमाण हैं मौजूद


महाभारत और रामायण काल्पनिक नहीं, बल्कि इन महाग्रंथो के अस्तित्व के पुख्ता प्रमाण हैं मौजूद

27 सितंबर, 1931 को लाहौर के अखबार ‘द पीपल’ में एक लेख प्रकाशित हुआ. लेख का नाम था, 'मैं नास्तिक क्यों हूं'. जेल में रहते हुए इसे लिखने वाले व्यक्ति अमर क्रांतिकारी भगत सिंह थे. अपने इस लेख के माध्यम से उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किए थे. मॉर्डन युग में भी भगत सिंह का ये लेख प्रासंगिक बना हुआ है.

भगत सिंह की तरह ही आज भी देश के कई तर्कशील युवा अक्सर हिंदू धर्म के महान ग्रंथों की सामयिक जटिलताओं के चलते इसे पूरी तरह से अपना नहीं पाते हैं. दूरदर्शन पर अक्सर महाभारत और रामायण जैसे कार्यक्रमों को देखकर लगता था कि अगर ये ऐतिहासिक पात्र काल्पनिक नहीं हैं, तो युद्ध का समय, इनके रहने और जीने का समय हज़ारों सालों में कैसे बंट सकता है.
 
भगत सिंह की तरह ही लेनिन, मार्क्स जैसी कई बड़ी हस्तियों ने एक कदम आगे बढ़ते हुए ईश्वर में अपनी निष्ठा ख़त्म की, कई लोग दर्शनशास्त्र की तरफ़ भी मुड़े. कुछ आस्तिकों ने दर्शन शास्त्र को मनुष्य की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होने वाला परिदृश्य बताया.

लेकिन कई आस्तिक और फिलॉसॉफ़र भी महाभारत और उसके समय-काल से जुड़े अनुत्तरित सवालों के जवाब देने में सक्षम नहीं थे. ज़ाहिर है, रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथ इतिहास न होकर, पौराणिक और देव कथाओं में तब्दील होने शुरु हो चुके थे.
भारत के प्राचीन ग्रंथ, सत्य या मिथ्या?

आईआईटी मुंबई से पास आउट इतिहासकार सुनील शेरॉन की महाभारत के समय काल को लेकर बेहद दिलचस्प राय है. उनकी एक थ्योरी के अनुसार, महाभारत को गैरज़रूरी तरीके से जटिल बनाया गया है. महाभारत में इस्तेमाल हुए संस्कृत श्लोकों के द्वारा इन महान ग्रंथों के रहस्य को सुलझाया जा सकता है.
 
सुनील के मुताबिक, भारत में वैदिक गुरुओं की मौजूदगी का कारण भारत का कर्म भूमि होना था. भारत एक ऐसी जगह है, जहां करोड़ों देवी-देवताओं को पूजा जाता है. यहां सनातन धर्म का ज़बरदस्त प्रभाव था. ये एक ऐसी आध्यात्मिक और रहस्यमयी भूमि थी, जहां कर्मों के आधार पर इंसान की मोक्ष की दिशा तय होती है. वहीं दुनिया के बाकी देश भोग भूमि हैं, जहां इंसान भोग-विलास में मशगूल होकर अपनी ज़िन्दगी दिशाहीन तरीके से व्यतीत कर देता था.
  Source: Deviantart

महाभारत और रामायण के दौर में दुनिया के इन बाकी देशों के बारे में उल्लेख नहीं होने का कारण इनका भोग-भूमि होना है. कोई भी संस्कृति और सभ्यता, जो सनातन धर्म के फ्रेमवर्क और शिक्षाओं से बाहर थी, उसे महत्वपूर्ण नहीं समझा जाता था. इसलिए उनके अस्तित्व पर अधिक चर्चाएं नहीं मिलती. वहीं सनातन धर्म के मुताबिक, मनुष्य का अंतिम उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है और भारत के ग्रंथों, पुराणों से लेकर प्राचीन साहित्य तक इस बात की कहीं न कहीं पुष्टि करते हैं.
 
महाभारत के समयकाल की सही अवधि

पिछले 2500 सालों से ज़्यादातर लोग, महाभारत और रामायण दौर को बयां करते संस्कृत श्लोकों को लेकर एक चूक करते आए हैं. 'देखन में छोटी लगे घाव करे गंभीर' जैसी कहावत की तर्ज पर ही इस गलती के गहरे असर को समझा जा सकता है.
दरअसल जिन संस्कृत श्लोकों में महाभारत और रामायण काल के युगों का उल्लेख हुआ है, उनमें इस्तेमाल होने वाले अंकों को अब तक ग़लत तरीके से समझा जा रहा था.
Source: Quora

मसलन अगर हम महाभारत के इस गद्य पर गौर फरमाएं, तो समझ आएगा कि दश वर्ष सहस्त्राणि को पारंपरिक तौर पर 10,000 साल माना जाता है, जिस पर सुनकर ही सहज विश्वास नहीं होता. हालांकि अगर यहां सहस्त्राणि की असल संख्या यानि 10 साल (सहस्त्राणि=10) इस्तेमाल की जाए और शतानी की संख्या को 1 (शताणी=1) साल माना जाए तो पुराणों के ये श्लोक कुछ इस प्रकार होंगे.
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।
त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते।
तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः।
सहस्रमेकं वर्षाणां ततः कलियुगं स्मृतम्।
एतत्सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम्।
इस बदलाव के अनुसार,

40 (4*10) साल कृति युग है. वहीं 30 साल त्रेता युग, 20 साल द्वापर युग और 10 साल कलियुग को कहा गया है. वहीं 1000 साल (120 साल की एक साइकिल) को ब्रहमा डे के तौर पर माना जाएगा. ये सभी संधि के बिना इस्तेमाल किए गए है. यानि इन अंकों में 20 प्रतिशत जोड़ देने के बाद इनकी संख्या क्रमश: 48 साल, 36 साल, 24 साल और 12 साल होगी.
 
इन संख्याओं के सामने आने के बाद महाभारत से जुड़े ज़्यादातर संस्कृत श्लोकों में उल्लेख किया गया समय, अब विश्वास लायक था.
Source: Quora

इस विश्लेषण से न केवल युगों और महायुगों के चक्र-काल का सही अंदाज़ा लगाया जा सकता है, बल्कि भारत के प्राचीन इतिहास की जटिलताओं को भी आसानी से समझा जा सकता है. इससे साबित होता है कि समय की उत्पत्ति (7th मन्वन्तर) 4174 BCE में हुई.
4174 BC से लेकर 3000 BCE भगवानों औऱ देवी देवताओं का दौर था, 3000 BCE में पूरी दुनिया को बाढ़ के प्रकोप ने काफ़ी नुकसान पहुंचाया. 3000 BCE से 1299 BCE तक 59 पीढ़ियां धरती पर अपना समय व्यतीत कर चुकी थी. भगवान श्री राम इस कड़ी में 60वीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.
  Source: Chainimage

3000BCE के बाद ही दुनिया में आबादी ने दूर-दराज के क्षेत्रों में बसना शुरु किया. कुछ लोगों को भारत से निकाल दिया गया और कुछ ऐसे भी थे जिन्हें बाहरी दुनिया में दिलचस्पी थी. इसके तहत ही भारत से अलग होकर मिडल ईस्ट अस्तित्व में आया. मिडिल ईस्ट से निकल यूरोप का निर्माण हुआ.

 
Source: nisachar.deviantart

जहां तक महाभारत के Scientific प्रमाण की बात थी, तो इससे जुड़ा सबसे बड़ा पुरातात्विक प्रमाण प्रोफ़ेसर बी. बी. लाल ने खोज निकाला था. वे भारत सरकार के पौरातात्विक विभाग में काम करते हैं. उन्होंने 1951 में हस्तिनापुर लोकेशन की खुदाई कर एक ऐसे Flooding Zone का पता लगाया था, जिसे 700 BCE का बताया जा रहा है. Source: Quora


पुराणों में भी हस्तिनापुर में आई बाढ़ के प्रकोप का है. पुराणों मे कहा गया है कि परिक्शित की चार पुश्तों गुज़रने के बाद इस बात का ज़िक्र किया गया है. गौरतलब है कि परिक्शित युधिष्ठिर के पोते थे. इससे साफ़ है कि हस्तिनापुर में आई भयानक बाढ़ से पहले के 130-150 सालों का दौर, महाभारत युद्ध का दौर था.

 

महाभारत के युद्ध की व्याख्या को कई लोगों ने गैरज़रूरी तरीके से जटिल बनाया है. इसके मुताबिक, महाभारत का युद्ध 3000-5000 BCE के बीच लड़ा गया था जो कि अविश्वसनीय है.. दरअसल इसके पीछे महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट (499 AD) का दिमाग था. आर्यभट्ट ने ही महायुग के असली समय यानि 120 सालों को एक ऐसे आंकड़ें में बदल दिया था, जिस पर विश्वास करना आसान नहीं था. Source: youthconnect

Inspired from: mcremo

आर्यभट्ट ने 120 सालों के महायुग की अवधि को अपने आकलनों के द्वारा 4,32,0000 साल बताया, जिसे सुनने पर ही विश्वास करना मुश्किल था. आर्यभट्ट के इस विचार की उस ज़माने में सशक्त मौजूदगी थी. लोगों के दिमाग में ये बात घर कर चुकी थी. ज़ाहिर है, कई तर्कशील और लॉजिकल लोग इस तथ्य को अपनाने से इंकार करने लगे और भारत का जीता जागता इतिहास, माइथोलॉजी में तब्दील होकर रह गया.

प्रोफ़ेसर बी. बी. लाल के पुरातात्विक प्रमाणों और महाभारत के Double Eclipse Pair से ये आसानी से समझा जा सकता है कि महाभारत का युद्ध 827 BCE में हुआ था. सभी ग्रहों की स्थितियां जो महाभारत में दर्शाई गई थी, भी इस साल की पुष्टि करती हैं


इसी के आधार पर कहा जा सकता है कि श्री राम का जन्म 1331 BCE में हुआ था और वे 1299 BCE में अयोध्या के राजा बने थे वहीं महाभारत का युद्ध 827 BCE में लड़ा गया था.
प्रोफ़ेसर बी. बी. लाल और सुनील शेरॉन की प्रेजेंटेशन से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

  Source: 
सुनील अपनी इस थ्योरी को लेकर काफ़ी आश्वस्त हैं और देखना दिलचस्प होगा कि इस पर बाकी इतिहासकारों की क्या प्रतिक्रिया होती है.

SABHAR: gazabpost.com/The-reality-of-mahabharata-and-ramayana

HEMU VIKRAMADITYA - अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य ,जो थे शौर्य और बलिदान का पर्याय

HEMU VIKRAMADITYA - अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य ,जो थे शौर्य और बलिदान का पर्याय


भारतीय इतिहास शौर्य गाथाओ से सराबोर है | इन शौर्य गाथाओ के अदम्य साहस और वीरता की गाथाये आज भी प्रेरक मिसाल बनी हुयी है | ऐसे में रणबांकुरो में अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (Samrat HemChandra Vikramaditya) , जिन्हें हेमू (Hemu) के नाम से भी जाना जाता है , का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है | एक साधारण व्यापारी से विक्रमादित्य की पदवी तक का सफरनामा उनके अद्भुद साहस ,कुशाग्र बुद्धि एवं प्रेरक रणकौशल का प्रमाण है |

हेमचन्द्र विक्रमादित्य (Samrat HemChandra Vikramaditya) का जन्म आश्विन शुक्ल दशमी विक्रमी संवत 1556 (1501 ईस्वी ) में राजस्थान के अलवर जिले के अंतर्गत माछेरी नामक गाँव के एक समृद्ध धूसर भार्गव वैश्य बनिया परिवार में हुआ था | हेमू के पिता राय पूरनदास संत प्रवृति के नेक इन्सान थे | बाद में उन्होंने हरियाणा के रेवाड़ी स्तिथ क़ुतुब पुर नामक क्षेत्र में रिहायश कर यहा व्यापार शूरू किया | वह मुख्यत: तोप और बंदूक में प्रयोग किय जाने वाले पोटेशियम नाइट्रेट (शोरा) का व्यापार करते थे |

हेमू (Hemu) ने अपनी शिक्षा में संस्कृत एवं हिंदी के अलावा फारसी ,अरबी और गणित का अध्ययन भी किया था | शरीर सौष्ठव एवं कुश्ती के शौक़ीन हेमू को धर्म एवं संस्कृति विरासत में मिली थी | वल्लभ सम्प्रदाय से जुड़े उनके पिता वर्तमान पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र सहित प्राय: विभिन्न हिन्दू धार्मिक स्थलों का दौरा करते थे |

हेमू (Hemu) ने अपना सैनिक जीवन शेरशाह सुरी के दरबार से शुरू किया | शेरशाह के पुत्र इस्लाम शाह के दरबार में हेमू अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे | 1548 में शेरशाह सुरी की मृत्यु के बाद इस्लाम शाह ने उत्तरी भारत का राज सम्भाला | उन्होंने हेमू के प्र्शाश्कीय कौशल ,बुद्धि ,बल और प्रतिभा को पहचान कर उन्हें निजी सलाहकार मनोनीत किया | वे हेमू से ना केवल व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में सलाह लेते थे बल्कि प्रशाश्नीय कार्यो और राजनितिक कार्यो में भी उनसे विमर्श करते थे |

यही कारण था कि उन्हें बाजार अधीक्षक जैसी महत्पूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गयी और बाद में उन्हें दरोगा-ए-चौकी जैसे अति महत्वपूर्ण पद से सुशोभित किया गया जिस पर वह इस्लाम शाह की मृत्यु (30 अक्टूबर 1553) तक रहे | नागरिक एवं सैन्य मामलो के मंत्री तक निरंतर पदोन्नति पाने वाले हेमू को इस्लाम शाह ने भतीजे और उत्र्रधिकारी आदिल शाह सुरी ने “विक्रमादित्य” की उपाधि प्रदान की क्योंकि उनके लिए कई लड़ाईयां लड़कर हेमू ने हुमायु के शाशनकाल में भी उसके लिए कुछ क्षेत्र सुरक्षित रखा | उत्तराधिकारियों के झगड़े की वजह से बिखरते राजवंश को कमजोर शाशक आदिल शाह के लिए हेमू ही आशा की एक किरण ,एक मजबूत स्तम्भ बना |

मध्ययुगीन भारतीय इतिहास में हेमू (Hemu) एकमात्र हिन्दू था जिसने दिल्ली पर राज किया | मुगल सम्राट हुमायु की अचानक मृत्यु हेमू के लिए एक देवप्रदत संयोग था | उसने ग्वालियर से अपनी सेना एकत्रित कर दिल्ली की ओर कुच किया | मुगल जनरल इस्कन्दर उजबेक खान आगरा ,इटावा ,कालपी और बयाना खाली कर दिल्ली में मुगल जनरल मिर्जातरगी बेज से जा मिला | हेमचन्द्र ने दिल्ली के निकट तुगलकाबाद में 7 अक्टूबर 1556 को मुगल सेना के छक्के छुडाये |

दिल्ली से भागकर मुगल सेना सरहिंद में एकत्रित हो गयी | हेमू (Hemu) ने दिल्ली की राजगद्दी पप्राप्त की और महाराजा विक्रमादित्य के रूप में अपना राजतिलक करवाया किन्तु पानीपत के युद्ध में उनकी पराजय निसंदेह एक दुर्घटना थी | अनेक इतिहासकारों ने लिखा है कि यदि हेमू युद्ध में विजयी होता तो आज भारत का इतिहास कुछ अलग ही होता | एक युद्ध में हेमू की आँख में लगे तीर ने युद्ध में पासा ही पलट दिया | हेमू की सेना अपने सेनानायक को न पाकर ह्तौत्साहित होकर बिखर गयी |

दुसरी ओर मुगल सेना में नई जान आ गयी और देखते ही देखते युद्ध का नक्शा ही बदल गया | बैरम खा के लिए यह घटना अप्रत्याक्षित थी | युद्ध में विजय के अलावा अपने बड़े शत्रु को अपने कब्जे में देखना उसके लिए असम्भव सी बात थी | बैरम खा ने अकबर से प्रार्थना की कि वे हेमू का वध करके गाजी की पदवी का हकदार बने | हेमू को मरनासन्न स्थिथि में देखकर अकबर ने इसका विरोध किया लेकिन बैरम खा ने आनन फानन में अचेत हेमू का सिर धड से अलग कर दिया |

हेमू (Hemu) की हत्या के बाद जहा उनके सिर को अफ़घान विद्रोहियों के हौसले पस्त करने के लिए काबुल भिजवाया गया , वही स्थानीय विद्रोह को कुचलने के उद्देश्य से उनके धड़ को दिल्ल्ली के पुराने किले के दरवाजे पर लटकाया गया | इतना ही नही ,हेमू वंश पर अत्याचार का कहर ढाया गया | उनके 80 वर्षीय संत पिता को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए बाध्य किया गया किन्तु उनके पिता ने जब साफ़ शब्दों में कह दिया कि मैंने पुरे 80 साल जिस धर्म के अनुसार ईश्वर की प्रार्थना की अब मौत के डर से क्या सांध्यकाल में अपना धर्म बदल लू ? उसके बाद पीर मोहम्मद के वार से उनके शरीर के टुकड़े कर दिए गये |

बैरम खा हेमू और उनके पिता तथा परिवार पर किये गये अत्याचारों से संतुष्ट नही था इसलिए उनके समस्त वंशधरो को अलवर ,रेवाड़ी ,कानोड़ , नारनौल से चुन चुन कर बंदी बनवाया गे | हेमू के विश्वासपात्र अफ्ग्गान अधिकारियों एवं सेवको को भी नही बक्शा गया | अपनी फतेह के जश्न में उसने सभी धूसर भार्गव और सैनिको के कटे हुए सिरों से एक विशाल मीनार बनवाई | हेमू के प्रेरक जीवन पर आधारित अनेक पुस्तको में उन्हें अदम्य साहस एवं वीरता का पर्याय बताया गया है | इतिहासकारों एवं लेखको ने अंतिम हिन्दू सम्राट के साथ पानीपत के मैदान में हुयी दुर्घटना को भाग्य की विडम्बना करार देते हुए एक सच्चा राष्ट्रभक्त बताया है |

संभाजी से थर्राते थे मुगल

संभाजी से थर्राते थे मुगल




हिन्दुस्थान में हिंदवी स्वराज एवं हिन्दू पातशाही की गौरवपूर्ण स्थापना करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन को यदि चार पंक्तियों में संजोया जाए तो यही कहा जाएगा कि:

'देश धरम पर मिटने वाला, शेर शिवा का छावा था।
महा पराक्रमी परम प्रतापी, एक ही शंभू राजा था।।'

संभाजी महाराज का जीवन एवं उनकी वीरता ऐसी थी कि उनका नाम लेते ही औरंगजेब के साथ तमाम मुगल सेना थर्राने लगती थी। संभाजी के घोड़े की टाप सुनते ही मुगल सैनिकों के हाथों से अस्त्र-शस्त्र छूटकर गिरने लगते थे। यही कारण था कि छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद भी संभाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज को अक्षुण्ण रखा था। वैसे शूरता-वीरता के साथ निडरता का वरदान भी संभाजी को अपने पिता शिवाजी महाराज से मानों विरासत में प्राप्त हुआ था। राजपूत वीर राजा जयसिंह के कहने पर, उन पर भरोसा रखते हुए जब छत्रपति शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा पहंुचे थे तो दूरदृष्टि रखते हुए वे अपने पुत्र संभाजी को भी साथ लेकर पहंुचे थे। कपट के चलते औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया था और दोनों पिता-पुत्र को तहखाने में बंद कर दिया। फिर भी शिवाजी ने कूटनीति के चलते औरंगजेब से अपनी रिहाई करवा ली, उस समय संभाजी अपने पिता के साथ रिहाई के साक्षी बने थे।

संभाजी महाराज का औरंगजेब की छल-कपट की नीति से बचपन में जो वास्ता पड़ा, दुर्भाग्यवश वह जीवन के अंत तक बना रहा और यही इतिहास बन गया। छत्रपति शिवाजी की रक्षा नीति के अनुसार उनके राज्य का किला जीतने की लड़ाई लड़ने के लिए मुगलों को कम से कम एक वर्ष तक अवश्य जूझना पड़ता। औरंगजेब जानता था कि इस हिसाब से तो सभी किले जीतने में 360 वर्ष लग जाएंगे। शिवाजी के बाद संभाजी महाराज की वीरता भी औंरगजेब के लिए अत्यधिक अचरज का कारण बनी रही। उन्होंने अपने पिता की जुझारु एवं दूरदर्शी रक्षा नीति को चार-चांद लगाने का कार्य उस समय कर दिखाया कि जब उनका रामसेज का किला औरंगजेब को लगातार पांच वर्षों तक टक्कर देता रहा।
 
इसके अलावा संभाजी महाराज ने औरंगजेब के कब्जे वाले औरंगाबाद से लेकर विदर्भ तक सभी सूबों से लगान वसूलने की शुरुआत कर दी जिससे औरंगजेब इस कदर बौखला गया कि संभाजी महाराज से मुकाबला करने के लिए वह स्वयं दक्खन पहंुच गया।

उसने संभाजी महाराज से मुकाबला करने के लिए अपने पुत्र शाहजादे आजम को तय किया। आजम ने कोल्हापुर संभाग में संभाजी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उनकी तरफ से आजम का मुकाबला करने के लिए सेनापति हमीबीर राव मोहिते को भेजा गया। उन्होंने आजम की सेना को बुरी तरह से परास्त कर दिया औरंगजेब को स्वीकार करना पड़ा कि मुगलांे पर विजय पाना तो दूर, उन्हें परास्त करने के लिए प्रभावी नीति चुनौती है। युद्ध में हार का मुंह देखने पर औरंगजेब इतना हताश हो गया कि बारह हजार घुड़सवारों से अपने साम्राज्य की रक्षा करने का दावा उसे खारिज करना पड़ा। संभाजी महाराज पर नियंत्रण के लिए उसने तीन लाख घुड़सवार और चार लाख पैदल सैनिकों की फौज लगा दी। लेकिन वीर मराठों और गुरिल्ला युद्ध के कारण मुगल सेना हर बार विफल होती गई।

औरंगजेब के मन में व्याप्त भय का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब बीजापुर के कुछ चुनिंदा मौलवी औरंगजेब के पास इस्लाम और मजहबी पैगाम के आधार पर सुलह करने पहंुचे तो उसने स्पष्ट कर दिया कि वह कुरान के आधार पर बीजापुर के आदिलशाह से कभी भी सुलह कर सकता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी चिंता दक्खिन में संभाजी महाराज हैं जिनका वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा था।औरंगजेब ने बार-बार पराजय के बाद भी संभाजी से महाराज से युद्ध जारी रखा। इसी दौरान कोंकण संभाग के संगमेश्वर के निकट संभाजी महाराज के 400 सैनिकों को मुकर्रबखान के 3000 सैनिकों ने घेर लिया और उनके बीच भीषण युद्ध छिड़ गया।
इस युद्ध के बाद राजधानी रायगढ़ में जाने के इरादे से संभाजी महाराज अपने जांबाज सैनिकों को लेकर बड़ी संख्या में मुगल सेना पर टूट पड़े। मुगल सेना द्वारा घेरे जाने पर भी संभाजी महाराज ने बड़ी वीरता के साथ उनका घेरा तोड़कर निकलने में सफल रहे। इसके बाद उन्हांेने रायगढ़ जाने की बजाय निकट इलाके में ही ठहरने का निर्णय लिया। मुकर्रबखान इसी सोच और हताशा में था कि संभाजी इस बार भी उनकी पकड़ से निकलकर रायगढ़ पहंुचने में सफल हो गए, लेकिन इसी दौरान बड़ी गड़बड़ हो गई कि एक मुखबिर ने मुुगलों को सूचित कर दिया कि संभाजी रायगढ़ की बजाय एक हवेली में ठहरे हुए हैं। यह बात आग की तरह औरंगजेब और उसके पुत्रों तक पहंुच गई कि संभाजी एक हवेली में ठहरे हुए हैं। जो कार्य औरंगजेब और उसकी शक्तिशाली सेना नहीं कर सकी, वह कार्य एक मुखबिर ने कर दिया।

इसके बाद भारी संख्या में सैनिकों के साथ मुगल सेना ने हवेली की ओर कूच कर उसे चारों तरफ से घेर लिया। संभाजी को हिरासत में ले लिया गया, 15 फरवरी, 1689 का यह काला दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज है। संभाजी की अचानक हुई गिरफ्तारी को लेकर औरंगजेब और पूरी मुगलिया सेना हैरान थी। संभाजी का भय इतना ज्यादा था कि पकड़े जाने के बाद भी उन्हें लोहे की जंजीरों से बांधा गया। बेडि़यों में जकड़ कर ही उन्हें औरंगजेब के पास ले जाया गया। इससे पूर्व उन्हें ऊंट की सवारी कराकर काफी प्रताडि़त किया गया।

संभाजी महाराज को जब 'दिवान-ए-खास' में औरंगजेब के सामने पेश किया गया तो उस समय भी वे अडि़ग थे और उनके चेहरे पर किसी प्रकार के भय का भाव तक नहीं था। उन्हें जब औरंगजेब को झुक कर सलाम करने के लिए कहा गया तो उन्होंने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया और उसे निडरता के साथ घूरते रहे। संभाजी के ऐसा करने पर औरंगजेब स्वयं सिंहासन से उतर कर उनके समक्ष पहंुच गया। इस पर संभाजी के साथ कैद कवि कलश ने कहा-'हे राजन, तुव तप तेज निहार के तखत त्यजो अवरंग।'

यह सुनकर औरंगजेब ने तुरंत कवि की जिह्वा (जीभ) काटने का आदेश दे दिया। साथ ही उसने संभाजी को प्रलोभन दिया कि यदि वे इस्लाम कबूल कर लें तो उन्हें छोड़ दिया जाएगा और उनके सभी गुनाह माफ कर दिए जाएंगे। संभाजी महाराज द्वारा सभी प्रलोभन ठुकराने से क्रोधित होकर औरंगजेब ने उनकी आंखों में गरम सलाखें डाल कर उनकी आंखें निकलवा दीं। फिर भी संभाजी अपनी धर्मनिष्ठा पर अडि़ग रहे और उन्होंने किसी भी सूरत में हिन्दू धर्म त्याग कर इस्लाम को कबूल करना स्वीकार नहीं किया।
 
इस घटना के बाद से ही संभाजी ने अन्न-जल का त्याग कर दिया। उसके बाद सतारा जिले के तुलापुर में भीमा-इन्द्रायनी नदी के किनारे संभाजी महाराज को लाकर उन्हें लगातार प्रताडि़त किया जाता रहा और बार-बार उन पर इस्लाम कबूल करने का दबाव डाला जाने लगा। आखिर में उनके नहीं मानने पर संभाजी का वध करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए 11 मार्च, 1689 का दिन तय किया गया क्योंकि उसके ठीक दूसरे दिन हिन्दू वर्ष प्रतिपदा थी। औरंगजेब चाहता था कि संभाजी महाराज की मृत्यु के कारण हिन्दू जनता वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर शोक मनाये।

उसी दिन सुबह दस बजे संभाजी महाराज और कवि को एक साथ गांव की चौपाल पर ले जाया गया। पहले कवि कलश की गर्दन काटी गई। उसके बाद संभाजी के हाथ-पांव तोड़े गए, उनकी गर्दन काट कर उसे पूरे बाजार में जुलूस की तरह निकाला गया।

एक बात तो स्पष्ट है कि जो कार्य औरंगजेब और उसकी सेना आठ वर्षों में नहीं कर सके, वह कार्य एक भेदिये ने कर दिखाया। औरंगजेब ने छल से संभाजी महाराज का वध तो कर दिया, लेकिन वह चाहकर भी उन्हें पराजित नहीं कर सका। संभाजी ने अपने प्राणों का बलिदान कर हिन्दू धर्म की रक्षा की और अपने साहस व धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने औरंगजेब को सदा के लिए पराजित कर दिया।

तुलापुर स्थित संभाजी महाराज की समाधि आज भी उनकी जीत और अहंकारी व कपटी औरंगजेब की हार को बयान करती है। इसका कवि योगेश ने इस प्रकार अपने शब्दों में वर्णन किया है:

'देश धरम पर मिटने वाला
शेर शिवा का छावा था।
महा पराक्रमी परम प्रतापी
एक ही शंभू राजा था।।
तेजपुंज तेजस्वी आंखें
निकल गयीं पर झुका नहीं।
दृष्टि गयी पर राष्ट्रोन्नति का
दिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं।।
दोनों पैर कटे शंभू के
ध्येय मार्ग से हटा नहीं।
हाथ कटे तो क्या हुआ
सत्कर्म कभी तो छूटा नहीं।।
जिह्वा कटी खून बहाया
धरम का सौदा किया नहीं।
शिवाजी का ही बेटा था वह
गलत राह पर चला नहीं।।
वर्ष तीन सौ बीत गये अब
शंभू के बलिदान को।
कौन जीता कौन हारा
पूछ लो संसार को।।
मातृभूमि के चरण कमल पर
जीवन पुष्प चढ़ाया था।
है राजा दुनिया में कोई
जैसा शंभू राजा था।।' -द. वा. आंबुलकर

Saturday, March 27, 2021

महाभारत में वर्णित ये पेंतीस नगर आज भी मौजूद हैं!

महाभारत में वर्णित ये पेंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

भारत देश महाभारतकाल में कई बड़े जनपदों में बंटा हुआ था। हम महाभारत में वर्णित जिन 35 राज्यों और शहरों के बारे में जिक्र करने जा रहे हैं, वे आज भी मौजूद हैं। आप भी देखिए।

1. गांधार,,,आज के कंधार को कभी गांधार के रूप में जाना जाता था। यह देश पाकिस्तान के रावलपिन्डी से लेकर सुदूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी वहां के राजा सुबल की पुत्री थीं। गांधारी के भाई शकुनी दुर्योधन के मामा थे।

2. तक्षशिला,,,तक्षशिला गांधार देश की राजधानी थी। इसे वर्तमान में रावलपिन्डी कहा जाता है। तक्षशिला को ज्ञान और शिक्षा की नगरी भी कहा गया है।

3. केकय प्रदेश,,, जम्मू-कश्मीर के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में केकय प्रदेश के रूप में है। केकय प्रदेश के राजा जयसेन का विवाह वसुदेव की बहन राधादेवी के साथ हुआ था। उनका पुत्र विन्द जरासंध, दुर्योधन का मित्र था। महाभारत के युद्ध में विन्द ने कौरवों का साथ दिया था।

4. मद्र देश,,,केकय प्रदेश से ही सटा हुआ मद्र देश का आशय जम्मू-कश्मीर से ही है। एतरेय ब्राह्मण के मुताबिक, हिमालय के नजदीक होने की वजह से मद्र देश को उत्तर कुरू भी कहा जाता था। महाभारत काल में मद्र देश के राजा शल्य थे, जिनकी बहन माद्री का विवाह राजा पाण्डु से हुआ था। नकुल और सहदेव माद्री के पुत्र थे।

5. उज्जनक,,,आज के नैनीताल का जिक्र महाभारत में उज्जनक के रूप में किया गया है। गुरु द्रोणचार्य यहां पांडवों और कौरवों की अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देते थे। कुन्ती पुत्र भीम ने गुरु द्रोण के आदेश पर यहां एक शिवलिंग की स्थापना की थी। यही वजह है कि इस क्षेत्र को भीमशंकर के नाम से भी जाना जाता है। यहां भगवान शिव का एक विशाल मंदिर है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह शिवलिंग 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है।

6. शिवि देश,,,महाभारत काल में दक्षिण पंजाब को शिवि देश कहा जाता था। महाभारत में महाराज उशीनर का जिक्र है, जिनके पौत्र शैव्य थे। शैव्य की पुत्री देविका का विवाह युधिष्ठिर से हुआ था। शैव्य एक महान धनुर्धारी थे और उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों का साथ दिया था।

7. वाणगंगा,,,कुरुक्षेत्र से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वाणगंगा। कहा जाता है कि महाभारत की भीषण लड़ाई में घायल पितामह भीष्म को यहां सर-सैय्या पर लिटाया गया था। कथा के मुताबिक, भीष्ण ने प्यास लगने पर जब पानी की मांग की तो अर्जुन ने अपने वाणों से धरती पर प्रहार किया और गंगा की धारा फूट पड़ी। यही वजह है कि इस स्थान को वाणगंगा कहा जाता है।

8. कुरुक्षेत्र,,,हरियाणा के अम्बाला इलाके को कुरुक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। यहां महाभारत की प्रसिद्ध लड़ाई हुई थी। यही नहीं, आदिकाल में ब्रह्माजी ने यहां यज्ञ का आयोजन किया था। इस स्थान पर एक ब्रह्म सरोवर या ब्रह्मकुंड भी है। श्रीमद् भागवत में लिखा हुआ है कि महाभारत के युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने यदुवंश के अन्य सदस्यों के साथ इस सरोवर में स्नान किया था।

9. हस्तिनापुर,,,महाभारत में उल्लिखित हस्तिनापुर का इलाका मेरठ के आसपास है। यह स्थान चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी थी। सही मायने में महाभारत युद्ध की पटकथा यहीं लिखी गई थी। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने हस्तिनापुर को अपने राज्य की राजधानी बनाया।

10. वर्नावत,,,यह स्थान भी उत्तर प्रदेश के मेरठ के नजदीक ही माना जाता है। वर्णावत में पांडवों को छल से मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह का निर्माण करवाया था। यह स्थान गंगा नदी के किनारे है। महाभारत की कथा के मुताबिक, इस ऐतिहासिक युद्ध को टालने के लिए पांडवों ने जिन पांच गांवों की मांग रखी थी, उनमें एक वर्णावत भी था। आज भी यहां एक छोटा सा गांव है, जिसका नाम वर्णावा है।

11. पांचाल प्रदेश,,,हिमालय की तराई का इलाका पांचाल प्रदेश के रूप में उल्लिखित है। पांचाल के राजा द्रुपद थे, जिनकी पुत्री द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। द्रौपदी को पांचाली के नाम से भी जाना जाता है।

12. इन्द्रप्रस्थ,,,मौजूदा समय में दक्षिण दिल्ली के इस इलाके का वर्णन महाभारत में इन्द्रप्रस्थ के रूप में है। कथा के मुताबिक, इस स्थान पर एक वियावान जंगल था, जिसका नाम खांडव-वन था। पांडवों ने विश्वकर्मा की मदद से यहां अपनी राजधानी बनाई थी। इन्द्रप्रस्थ नामक छोटा सा कस्बा आज भी मौजूद है।

13. वृन्दावन,,,यह स्थान मथुरा से करीब 10 किलोमीटर दूर है। वृन्दावन को भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं के लिए जाना जाता है। यहां का बांके-बिहारी मंदिर प्रसिद्ध है।

14. गोकुल,,यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह स्थान भी मथुरा से करीब 8 किलोमीटर दूर है। कंस से रक्षा के लिए कृष्ण के पिता वसुदेव ने उन्हें अपने मित्र नंदराय के घर गोकुल में छोड़ दिया था। कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम गोकुल में साथ-साथ पले-बढ़े थे।

15. बरसाना,,,यह स्थान भी उत्तर प्रदेश में है। यहां की चार पहाड़ियां के बारे में कहा जाता है कि ये ब्रह्मा के चार मुख हैं।

16. मथुरा,,,यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह प्रसिद्ध शहर हिन्दू धर्म के लिए अनुयायियों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। यहां राजा कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यहीं पर श्रीकृष्ण ने बाद में कंस की हत्या की थी। बाद में कृष्ण के पौत्र वृजनाथ को मथुरा की राजगद्दी दी गई।

17. अंग देश,,,वर्तमान में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के इलाके का उल्लेख महाभारत में अंगदेश के रूप में है। दुर्योधन ने कर्ण को इस देश का राजा घोषित किया था। मान्यताओं के मुताबिक, जरासंध ने अंग देश दुर्योधन को उपहारस्वरूप भेंट किया था। इस स्थान को शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है।

18. कौशाम्बी,,,कौशाम्बी वत्स देश की राजधानी थी। वर्तमान में इलाहाबाद के नजदीक इस नगर के लोगों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था। बाद में कुरुवंशियों ने कौशाम्बी पर अपना अधिकार कर लिया। परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया।

19. काशी,,,महाभारत काल में काशी को शिक्षा का गढ़ माना जाता था। महाभारत की कथा के मुताबिक, पितामह भीष्म काशी नरेश की पुत्रियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका को जीत कर ले गए थे ताकि उनका विवाह विचित्रवीर्य से कर सकें। अम्बा के प्रेम संबंध राजा शल्य के साथ थे, इसलिए उसने विचित्रवीर्य से विवाह से इन्कार कर दिया। अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ कर दिया गया। विचित्रवीर्य के अम्बा और अम्बालिका से दो पुत्र धृतराष्ट्र और पान्डु हुए। बाद में धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहलाए और पान्डु के पांडव।

20. एकचक्रनगरी,,,,वर्तमान कालखंड में बिहार का आरा जिला महाभारत काल में एकचक्रनगरी के रूप में जाना जाता था। लाक्षागृह की साजिश से बचने के बाद पांडव काफी समय तक एकचक्रनगरी में रहे थे। इस स्थान पर भीम ने बकासुर नामक एक राक्षक का अन्त किया था। महाभारत युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया था, उस समय बकासुर के पुत्र ने भीषक ने उनका घोड़ा पकड कर रख लिया था। बाद में वह अर्जुन के हाथों मारा गया।

21. मगध,,,दक्षिण बिहार में मौजूद मगध जरासंध की राजधानी थी। जरासंध की दो पुत्रियां अस्ती और प्राप्ति का विवाह कंस से हुआ था। जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तब वह अनायास ही जरासंध के दुश्मन बन बैठे। जरासंध ने मथुरा पर कई बार हमला किया। बाद में एक मल्लयुद्ध के दौरान भीम ने जरासंध का अंत किया। महाभारत के युद्ध में मगध की जनता ने पांडवों का समर्थन किया था।

22. पुन्डरू देश,,,मौजूदा समय में बिहार के इस स्थान पर राजा पोन्ड्रक का राज था। पोन्ड्रक जरासंध का मित्र था और उसे लगता था कि वह कृष्ण है। उसने न केवल कृष्ण का वेश धारण किया था, बल्कि उसे वासुदेव और पुरुषोत्तम कहलवाना पसन्द था। द्रौपदी के स्वयंवर में वह भी मौजूद था। कृष्ण से उसकी दुश्मनी जगजाहिर थी। द्वारका पर एक हमले के दौरान वह भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया।

23. प्रागज्योतिषपुर,,,गुवाहाटी का उल्लेख महाभारत में प्रागज्योतिषपुर के रूप में किया गया है। महाभारत काल में यहां नरकासुर का राज था, जिसने 16 हजार लड़कियों को बन्दी बना रखा था। बाद में श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया और सभी 16 हजार लड़कियों को वहां से छुड़ाकर द्वारका लाए। उन्होंने सभी से विवाह किया। मान्यता है कि यहां के प्रसिद्ध कामख्या देवी मंदिर को नरकासुर ने बनवाया था।

24. कामख्या,,,गुवाहाटी से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कामख्या एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। भागवत पुराण के मुताबिक, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर बदहवाश इधर-उधर भाग रहे थे, तभी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के कई टुकड़े कर दिए। इसका आशय यह था कि भगवान शिव को सती के मृत शरीर के भार से मुक्ति मिल जाए। सती के अंगों के 51 टुकड़े जगह-जगह गिरे और बाद में ये स्थान शक्तिपीठ बने। कामख्या भी उन्हीं शक्तिपीठों में से एक है।

25. मणिपुर,,,नगालैन्ड, असम, मिजोरम और वर्मा से घिरा हुआ मणिपुर महाभारत काल से भी पुराना है। मणिपुर के राजा चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। इस विवाह से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम था बभ्रुवाहन। राजा चित्रवाहन की मृत्यु के बाद बभ्रुवाहन को यहां का राजपाट दिया गया। बभ्रुवाहन ने युधिष्ठिर द्वारा आयोजित किए गए राजसूय यज्ञ में भाग लिया था।

26. सिन्धु देश,,,सिन्धु देश का तात्पर्य प्राचीन सिन्धु सभ्यता से है। यह स्थान न केवल अपनी कला और साहित्य के लिए विख्यात था, बल्कि वाणिज्य और व्यापार में भी यह अग्रणी था। यहां के राजा जयद्रथ का विवाह धृतराष्ट्र की पुत्री दुःश्शाला के साथ हुआ था। महाभारत के युद्ध में जयद्रथ ने कौरवों का साथ दिया था और चक्रव्युह के दौरान अभिमन्यू की मौत में उसकी बड़ी भूमिका थी।

27. मत्स्य देश,,,राजस्थान के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में मत्स्य देश के रूप में है। इसकी राजधानी थी विराटनगरी। अज्ञातवास के दौरान पांडव वेश बदल कर राजा विराट के सेवक बन कर रहे थे। यहां राजा विराट के सेनापति और साले कीचक ने द्रौपदी पर बुरी नजर डाली थी। बाद में भीम ने उसकी हत्या कर दी। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यू का विवाह राजा विराट की पुत्री उत्तरा के साथ हुआ था।

28. मुचकुन्द तीर्थ,,,यह स्थान धौलपुर, राजस्थान में है। मथुरा पर जीत हासिल करने के बाद कालयावन ने भगवान श्रीकृष्ण का पीछा किया तो उन्होंने खुद को एक गुफा में छुपा लिया। उस गुफा में मुचकुन्द सो रहे थे, उन पर कृष्ण ने अपना पीताम्बर डाल दिया। कृष्ण का पीछा करते हुए कालयावन भी उसी गुफा में आ पहुंचा। मुचकुन्द को कृष्ण समझकर उसने उन्हें जगा दिया। जैसे ही मुचकुन्द ने आंख खोला तो कालयावन जलकर भस्म हो गया। मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब पांडव हिमालय की तरफ चले गए और कृष्ण गोलोक निवासी हो गए, तब कलयुग ने पहली बार यहां अपने पग रखे थे।

29. पाटन,,,महाभारत की कथा के मुताबिक, गुजरात का पाटन द्वापर युग में एक प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र था। पाटन के नजदीक ही भीम ने हिडिम्ब नामक राक्षस का संहार किया था और उसकी बहन हिडिम्बा से विवाह किया। हिडिम्बा ने बाद में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम था घटोत्कच्छ। घटोत्कच्छ और उनके पुत्र बर्बरीक की कहानी महाभारत में विस्तार से दी गई है।

30. द्वारका,,,माना जाता है कि गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित यह स्थान कालान्तर में समुन्दर में समा गया। कथाओं के मुताबिक, जरासंध के बार-बार के हमलों से यदुवंशियों को बचाने के लिए कृष्ण मथुरा से अपनी राजधानी स्थानांतरित कर द्वारका ले गए।

31. प्रभाष,,,गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण का निवास-स्थान रहा है। महाभारत कथा के मुताबिक, यहां भगवान श्रीकृष्ण पैर के अंगूठे में तीर लगने की वजह से घायल हो गए थे। उनके गोलोकवासी होने के बाद द्वारका नगरी समुन्दर में डूब गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि समुन्दर के सतह पर द्वारका नगरी के अवेशष मिले हैं।

32. अवन्तिका,,मध्यप्रदेश के उज्जैन का उल्लेख महाभारत में अवन्तिका के रूप में मिलता है। यहां ऋषि सांदपनी का आश्रम था। अवन्तिका को देश के सात प्रमुख पवित्र नगरों में एक माना जाता है। यहां भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में एक महाकाल लिंग स्थापित है।

33. चेदी,,,वर्तमान में ग्वालियर क्षेत्र को महाभारत काल में चेदी देश के रूप में जाना जाता था। गंगा व नर्मदा के मध्य स्थित चेदी महाभारत काल के संपन्न नगरों में एक था। इस राज्य पर श्रीकृष्ण के फुफेरे भाई शिशुपाल का राज था। शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, लेकिन श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचा लिया।

इस घटना की वजह से शिशुपाल और श्रीकृष्ण के बीच संबंध खराब हो गए। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समय चेदी नरेश शिशुपाल को भी आमंत्रित किया गया था। शिशुपाल ने यहां कृष्ण को बुरा-भला कहा, तो कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया। महाभरत की कथा के मुताबिक, दुश्मनी की बात सामने आने पर श्रीकृष्ण की बुआ उनसे शिशुपाल को अभयदान देने की गुजारिश की थी। इस पर श्रीकृष्ण ने बुआ से कहा था कि वह शिशुपाल के 100 अपराधों को माफ कर दें, लेकिन 101वीं गलती पर माफ नहीं करेंगे।

34. सोणितपुर,,,मध्यप्रदेश के इटारसी को महाभारत काल में सोणितपुर के नाम से जाना जाता था। सोणितपुर पर वाणासुर का राज था। वाणासुर की पुत्री उषा का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के साथ सम्पन्न हुआ था। यह स्थान हिन्दुओं के लिए एक पवित्र तीर्थ है।

35. विदर्भ,,,महाभारतकाल में विदर्भ क्षेत्र पर जरासंध के मित्र राजा भीष्मक का शासन था। रुक्मिणी भीष्मक की पुत्री थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचाया था। यही वजह थी कि भीष्मक उन्हें अपना शत्रु मानने लगे। जब पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ किया था, तब भीष्मक ने उनका घोड़ा रोक लिया था। सहदेव ने भीष्मक को युद्ध में हरा दिया

साभार : S. N. VYAS