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Wednesday, July 11, 2012

वर्ण व्यवस्था सनातनी समाज की धुरी है



वर्ण व्यवस्था सनातनी समाज की धुरी है .और धर्म की रक्षा हेतु कस्ट सभी वर्णों ने सहा है 

लेकिंग मुगलों ,अंग्रेजो ,और राजनेताओ ने वर्णों को जातिओं में विभक्त कर लोगो को एक दुसरे से लड़वाने का का काम किया जिससे उनको राज करने में सफलता हासिल हो और जनता के ऊपर वो अत्याचार करते रहे और उनके खिलाफ बगावत के स्वर बुलंद ना हो 
अब देखिये तो सही 



1.ब्रामण ने जिस सनातनी समाज को बचाने के लिए ज्ञान रक्षा का प्रण लिया और घर घर मांग कर भोजन किया हो और कोण जानता है जब भिक्षा देने वाले ने उसे ठोकर मारकर भगा दिया हो . आप बताइए क्या इससे ज्यादा अपमानजनक कुछ और है 



2.शत्रियो ने सनातनी रास्त्र की सीमओं की रक्षा के लिए प्रतिज्ञा की और जीवन भर सीमओं पर युद्ध किया हो और कोण जाने कब युद्ध मैदानों में पड़े हुए उनके सरिरो को चील कोए ने नोच नोच कर खाया हो आप बताइए क्या इससे बड़ी दुर्गति कोई हो सकती है 



3.जिस वैश्य ने सनातनी रास्त्र के अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए व्यापर हेतु पुरे विश्व में दर दर भटका हो और कोण मानेगा इस बात को की कब आततायिओं ने उनकी गर्देने काट कर उनसे धन छीन लिया हो .और ये भी कोण जाने कब उनकी नाव तूफ़ान में फंस कर समुद्र की समाधि ले ली और उनकी चिता को अग्नि भी नसीब ना हुई हो .आप बताइए क्या इससे बड़ा और दुःख हो सकता है 



4.पुरे रास्ट्र की उदर पूर्ति के लिए जिसने अपने खून पसीने से धरती माँ को सींचा हो उसे ही शुद्र कहते हैं .कोन जानता है कब उसकी फसल प्रकति ने बरबाद कर दी हो और उसको दो वक्त की रोटी के लिए घर घर जाकर काम करना पड़ा हो .आप ही बताइए क्या इससे बड़ा और कोई कस्ट हो सकता है 



लेकिन सब वर्णों ने कई प्रकार की परेशानियों का सामान करते हुए सनातनी समाज की रक्षा की .क्योंकी यही वो समाज था जहाँ घरो में ताले नहीं लगाने पड़ते थे ,क्योंकी यही वो समाज था जहाँ महिलाओ से बलात्कार नहीं होते थे ,क्योंकी यही वो समाज था जहाँ अकाल मृत्यु नहीं होती थे .क्योंकी यही वो समाज था जहाँ वेश्यां मनोरंजन के नाम पर स्टेजो पर नंगी नहीं नाचा करती थी .क्योंकी यही वो समाज जहाँ कभी ज्ञान का मोल नहीं लिया जाता था 

क्योंकी बाते तो और भी पर अब यही समाप्त  करते हैं .



हा एक और बात अपने नाम के पीछे खान लगाने वाले अब सनातनियों को समाज की परिभाषा सिखा रहे हैं .भारत में कभी भी घर पर शोच जाने की परम्परा नहीं रही .वेदों में घर के बहार शोच करना लिखा हुआ है .मुस्लिम कबालियो और अंग्रेजो ने ये प्रथा भारत में शुरू की थी .तो फिर कैसे सनातनी समाज को घर में शोच के नाम पर हो रहे है भेदभाव के लिए दोषी ठहराया जा सकता है .
 



साभार : फेसबुक