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Sunday, February 12, 2012

हिंदू धर्म में अश्लीलता का भ्रामक प्रचार का प्रतिउत्तर -------



भारतवर्ष आज धर्मांतरण के रोग की प्रमुख आश्रय स्थली बन चुका है | चीन और उसके पार वाले देश इस विषाणु के लिए अप्रवेश्य हैं | और बाकी दुनिया में, भारतवर्ष के पश्चिम में जितना धर्मांतरण हो सकता था – हो चुका है – अब तो बस वहां एक शाखा ( ईसाईयत) से दूसरी शाखा ( इस्लाम) को लपकना और उनकी छोटी-छोटी उपशाखाओं को पकड़ कर झूलने का ही खेल बचा है |



परंतु भारत में हिन्दू और गैर हिन्दू जनसंख्या का अच्छा खासा मिश्रण मौजूद है जो अल्लाह या यीशु के मिशन को आगे ले जाने के लिये बड़ी संख्या में संभावित अनुयायी, बड़ी संख्या में दलाल और समर्थक आधार को पेश करता है | जैसे भारतवर्ष इतिहास के महापुरुषों को जन्म देने के लिए प्रसिद्ध है वैसे यहां की भूमि दगाबाजों को पैदा करने और पालने में भी उतनी ही उर्वरक है – जो आत्मघात में ही गौरव समझते हैं | इस बात का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि एक राष्ट्रीय शर्म के प्रतीक (बाबरी मस्जिद) – जिसे एक समलैंगिक, बच्चों के यौन शोषण की विकृति से ग्रस्त, कत्ले आम में माहिर और नशे की लत के आदी बाबर ने खड़ा किया था – के विध्वंस की घटना को देश में गौरव का प्रसंग मानने की बजाए उसे एक बड़ी समस्या बना दिया गया है ! जिसके पास किसी प्रकार का नियंत्रण ही नहीं ऐसे अत्यंत निर्बल नेतृत्व ने यह बिलकुल सरल कर दिया है कि अन्य कोई अज़मल कसाब या अफ़ज़ल आराम से अपनी इच्छा और ज़रुरत अनुसार अपने लोग, पैसे, आर डी एक्स ला कर हिन्दुओं की संख्या को आसानी से कम कर सकें|



अनेक कारण दिए जा सकते हैं लेकिन यह इस लेख का प्रयोजन नहीं है| संक्षेप में, भारतवर्ष किसी भी विदेशी मत के फ़लने-फूलने के लिए पोषक वातावरण मुहैया कराता है| धर्मांतरण ने अब एक चतुर खेल की शक्ल अख्तियार कर ली है | एक ही मतप्रसार के लिए अनेक प्रकार के उपायों का प्रचुर दाव – पेचों के साथ उपयोग किया जा रहा है | व्यापक स्तर पर धर्मांतरण करने के लिए जो हिन्दुओं को सिर्फ इस्लाम में शामिल करना चाहते हैं या जो चाहते हैं कि हिन्दू बाइबल को ही गले लगायें, उनकी प्रमुख कूट चाल है – हिन्दुत्व को दुनिया के समक्ष सर्वाधिक अश्लील धर्म के रूप में प्रस्तुत करना | वैसे यह इनके मत प्रसार का कोई नवीनतम उपाय भी नहीं है परंतु आज के संदर्भ में यह हथकंडा कई कारणों से महत्वपूर्ण हो जाता है जिसकी चर्चा यहां स्थानाभाव की वजह से करना प्रासंगिक नहीं होगा |



यह बहुत ही हास्यास्पद है कि बाइबल या कुरान और हदीसों के आशिक, हिंदुत्व पर अश्लीलता से भरे होने का आरोप लगाते हैं | क्योंकि अंतिम अक्षर तक सर्वाधिक अश्लील किताबों की फ़हरिस्त में इन किताबों ( बाइबल, कुरान+ हदीस) ने चरम स्थान हासिल कर रखा है|



jesusallah.wordpress.com और बहुत सी अन्य साइट्स पर आप इससे संबंधित अनगिनत लेख पाएंगे| किन्तु ये धर्मांतरण के विषाणु इतने बेशर्म हैं कि आम जनता का छलावा करके पतित करने की प्रवृत्ति से उनकी आंखें तनिक भी झपकती नहीं हैं – तभी तो वे लोग अधिक से अधिक जनता को किसी भी तरीके से खींचते हैं ताकि उनको जन्नत में ज्यादा से ज्यादा ऐशो- आराम और हूरें मिलें|



पर आज यह बेहद गंभीर मसला बन चुका है| भारी संख्या में अपने सत्य धर्म से अनजान हिन्दू, आतंरिक और बाहरी चालबाजियों का शिकार बन रहें हैं और अंततः इस अपप्रचार में फंस कर भ्रान्तिवश अपने धर्म से नफ़रत करना शुरू कर देते हैं | उनके लिए हिंदुत्व का मतलब – राधा-कृष्ण के अश्लील प्रणय दृश्य, शिवलिंग के रूप में पुरुष जननेंद्रिय की पूजा, शिव का मोहिनी पर रीझना, विष्णु और शिव द्वारा स्त्रियों का सतीत्व नष्ट करना, ब्रह्मा का अपनी पुत्री सरस्वती पर आसक्त होना इत्यादि, इत्यादि से ज्यादा और कुछ नहीं रह जाता |



हमारी जानकारी में ऐसे कई पत्रक (pamphlets) भारतभर में वितरित किए जा रहे हैं और उन में हिन्दुओं से अपील की जा रही है कि वे सच्चे ईश्वर और सच्ची मुक्ति को पाने के लिए विदेशी मज़हबों को अपनाएं | बहुत से हिन्दू अपनी बुनियाद से घृणा भी करने लगे हैं और जो हिंदुत्व के चाहनेवाले हैं, वे निश्चित नहीं कर पाते हैं कि कैसे इन कहानियों का स्पष्टीकरण दिया जाए और अपने धर्म को बचाया जाए| छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी कम्युनिस्ट इस को हवा देने में लगे हुए हैं|



इस लेख का प्रयोजन इन सभी आरोपों को सही परिपेक्ष्य में रखना और सभी धर्मप्रेमियों के हाथ में ऐसी कसौटी प्रदान करना है, जिससे वे न केवल सत्य का रक्षण ही कर सकें बल्कि इस मिथ्या प्रचार पर तमाचा भी जड़ सकें |



१. अश्लीलता के प्रत्येक आरोप पर विचार करने से पहले यह तय किया जाना जरूरी है कि क्या ये धर्म की परिधि में आता भी है ? हिंदुत्व में धर्म की अवधारणा, कुरान और बाइबल की अंध विश्वासों की व्यवस्था से पूर्णतः भिन्न है | हिंदुत्व के सभी वर्गों में स्वीकृत की गई, धर्म की सार्वभौमिक व्याख्या, मनुस्मृति (६। ९२) में प्रतिपादित धर्म के ११ लक्षण हैं – अहिंसा, धृति (धैर्य), क्षमा, इन्द्रिय-निग्रह, अस्तेय (चोरी न करना), शौच (शुद्धि), आत्म- संयम, धी: (बुद्धि), अक्रोध, सत्य, और विद्या प्राप्ति |



Vedic Religion in Brief में इन्हें विस्तार से समझाया गया है | जो इन ११ लक्षणों का उल्लंघन करे या इनको दूषित करे वह हिंदुत्व या हिन्दू धर्म नहीं है |



२. धर्म की दूसरी कसौटी हैं वेद| सभी हिन्दू ग्रंथ सुस्पष्ट और असंदिग्धता से वेदों को अंतिम प्रमाण मानते हैं | अतः कुछ भी और सबकुछ जो वेदों के विपरीत है, धर्म नहीं है |



मूलतः ऊपर बताई गई दोनों कसौटियां, अपने आप में एक ही हैं किन्तु थोड़े से अलग अभिगम से |



३.योगदर्शन में यही कसौटी थोड़ी सी भिन्नता से यम और नियमों के रूप में प्रस्तुत की गई है -



यम – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य (आत्म-संयम और शालीनता), अपरिग्रह (अनावश्यक संग्रह न करना)|



नियम - शौच (शुद्धि), संतोष, तप (उत्तम कर्तव्य के लिए तीव्र और कठोर प्रयत्न), स्वाध्याय या आत्म- निरिक्षण,ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण)|



४. हिंदुत्व के प्रत्येक वर्ग द्वारा अपनाई गई, इन आधारभूत कसौटियों को स्पष्ट करने के बाद, हम इन आक्षेपों का जवाब बड़ी ही आसानी से दे सकते हैं क्योंकि अब हमारा दृष्टिकोण बिलकुल साफ़ है – हम उनका प्रतिवाद नहीं करते बल्कि उन्हें सिरे से नकारते हैं|

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प्रश्न -----.सिक्युलर (sickular) या धर्मांतरण के लिए सक्रिय लोगों द्वारा हमारे ग्रंथों में असभ्य कथाओं का जो आरोप लगाया जाता है – इस पर आप क्या कहेंगे ?



उत्तर ---

१. हिन्दू धर्म के मूलाधार वेदों में – इन में से एक भी कथा नहीं दिखायी देती |



२. अधिकांश कथाएं पुराणों, रामायण या महाभारत में पाई जाती हैं और वेदों के अलावा हिन्दू धर्म में दूसरा कोई भी ग्रंथ ईश्वर कृत नहीं माना जाता है| इसके अतिरिक्त, यह सभी ग्रंथ (पुराण,रामायण और महाभारत) प्रक्षेपण से अछूते भी नहीं रहे| पिछले हज़ार वर्षों की विदेशी दासता में भ्रष्ट मर्गियों द्वारा, जिनका एक मात्र उद्देश्य इस देश की सांस्कृतिक बुनियाद को ध्वस्त करना ही था – इन ग्रंथों में मिलावट की गई है | अतः इन ग्रंथों के वेदानुकूल अंश को ही प्रमाणित माना जा सकता है |शेष भाग प्रक्षेपण मात्र है, जो अस्वीकार किया जाना चाहिए और जो यथार्थ में हिन्दुओं के आचरण में नकारा जा चुका है |



प्रश्न -----. क्या आप स्पष्ट करेंगे कि आप कैसे इन ग्रंथों को प्रक्षिप्त मानते हैं ?



उत्तर --- इसके बहुत से प्रमाण हैं |



१.भविष्य पुराण में अकबर,विक्टोरिया, मुहम्मद, ईसा आदि की कहानियां पाई जाती हैं | इसके श्लोकों में सन्डे, मंडे आदि का प्रयोग भी किया गया है | हालाँकि, मुद्रण कला (छपाई) के प्रचलित होने पर १९ वें सदी के आखिर में यह कहानियां लिखी जानी थम सकी | इस से साफ़ ज़ाहिर है कि १९ वें सदी के अंत तक इस में श्लोक जोड़े जाते रहे |



२.गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित रामायण और महाभारत में जो श्लोक स्पष्टत: प्रकरण से बाहर (संदर्भहीन) हैं, उन्हें प्रक्षिप्त के तौर पर चिन्हित किया गया है |



३.आश्चर्यजनक रूप से महाभारत २६५। ९४ के शांतिपर्व में भी यह दावा आता है कि कपटी लोगों द्वारा वैदिक धर्म को कलंकित करने के लिए मदिरा, मांस- भक्षण,अश्लीलता इत्यादि के श्लोक मिलाये गये हैं |



४. गरुड़ पुराण ब्रह्म कांड १। ५९ कहता है कि वैदिक धर्म को असभ्य दिखाने के लिए महाभारत दूषित किया गया है | इत्यादि ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं |



५. इन ग्रंथों के सतही अवलोकन से भी यह पता लग जाता है कि किस भारी मात्रा में मिलावट की गई है और इन कहानियों का मतलब गलत अनुवादों से बदल दिया गया है ताकि यह छलावे से धर्मांतरण के विषाणुओं और उनके वाहकों के अनुकूल हो सके |



प्रश्न -----. आप यह दावा कैसे करते हैं कि ये पुस्तकें हमारे धर्म का अंग नहीं हैं ?



उत्तर --- मैंने ऐसा नहीं कहा कि यह पुस्तकें हमारे धर्म का हिस्सा नहीं हैं, मेरा कहना है कि वे हमारे धर्म का भाग वहीं तक हैं जहां तक वे वेदों से एकमत हैं |



इसका प्रमाण समाज में देखा जा सकता है-



१.कोई भी नए असंपादित पुराणों को महत्त्व नहीं देता (सिवाय कुछ लोगों के जिन्हें हिन्दू धर्म से कोई सरोकार नहीं है वरन् वे सिर्फ अपना अधिपत्य जमाना चाहते हैं – झूठी जन्मगत जाति व्यवस्था के बल पर. वास्तव में यह लोग धर्मांतरण के वायरस के सबसे बड़े मिले हुए साझीदार हैं – जो धर्म को अन्दर से ख़त्म करते हैं | ) हिन्दू जनसाधारण या उनके नेता भी सारे पुराणों का तो नाम तक नहीं जानते | पुराण आदि के सम्पूर्ण संस्करण भी आसानी से प्राप्य नहीं हैं |



२. इन पुस्तकों के संक्षिप्त या कुछ चुने हुए अंश ही जनसाधारण में उपलब्ध हैं | इसलिए बहुत से हिन्दू रामायण मांगने पर रामचरितमानस ला कर देंगे, महाभारत के लिए पूछने पर गीता मिलेगी और पुराणों की बजाए इन की नैतिक कथाओं का संकलन मिल सकता है | यह दर्शाता है कि हिन्दू इन पुस्तकों को वहीं तक ही स्वीकार करते हैं जहां तक वे उन्हें वेदानुकूल पाते हैं |



वे लोग अज्ञानता में गलतियाँ कर सकते हैं लेकिन लक्ष्य हमेशा वैदिक धर्म के दायरे में रहकर उपदेश देना और अनुसरण करना ही है |



प्रश्न -----. अगर हिन्दू इन असभ्य कथाओं को अस्वीकार करते हैं, तो फ़िर राधा – कृष्ण और शिव लिंग को पूजते क्यों हैं ?



उत्तर --- नहीं, हिन्दू इन प्रतीकों को उस रूप में नहीं पूजते जैसे अर्थ यह धर्मांतरण के वायरस फ़ैला रहे हैं|



१. हिन्दू मूलतः ही इतने सीधे हैं कि वे आसानी से अन्यों पर भरोसा कर लेते हैं और इसीलिए विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा सदियों तक छले जाते रहे | उनकी सहज वृत्ति ही किसी पर भी विश्वास करने की है | ठेठ जाकिर की किस्म के मुस्लिमों के विपरीत जो कुरान और रसूल और अरब की आदिम परम्पराओं का पालन कोई जब तक न करे, उस पर अविश्वास ही करने के लिए प्रशिक्षित हैं, एक भोला हिन्दू अन्य व्यक्ति पर महज़ इसलिए विश्वास रखता है क्योंकि वह मनुष्य है| यह विश्वसनीयता का भाव होना एक महान सामर्थ्य तो है पर साथ ही में यह एक बहुत बड़ी कमजोरी भी है खासकर, जब आप ऐसे इलाकों में रहते हों जहां डेंगू और मलेरिया फैलानेवाले बहुत अधिक मच्छर मंडरा रहें हों|



२.हिन्दुत्व की सीधी प्रकृति के कारण हिन्दू परंपरागत रूप से कोई बहुत समालोचक नहीं हैं | एक अवधि के दौरान हर कहीं से अच्छाई की तलाश में वे विभिन्न पूजा पद्धतियों को अपनाते गये और उन्हें अपने अनुसार ढ़ालते गये| लेकिन इस प्रक्रिया में उन्हें इस बात का आभास भी नहीं हुआ कि वे अपने मूल स्रोत से विमुख होकर बहुत दूर भटक गये हैं जहां धर्मांतरण का वायरस उनको निगलने के लिए तत्पर है|



३. राधा का अर्थ है सफ़लता | यजुर्वेद के प्रथम अध्याय का पांचवा मंत्र, ईश्वर से सत्य को स्वीकारने तथा असत्य को त्यागने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ रहने में सफ़लता की कामना करता है | कृष्ण अपनी जिंदगी में इन दृढ़ संकल्पों और संयम का मूर्तिमान आदर्श थे | पश्चात किसी ने किसी समय में इस राधा (सफ़लता) को मूर्ति में ढाल लिया | उसका आशय ठीक होगा परंतु उसी प्रक्रिया में ईश्वर पूजा के मूलभूत आधार से हम भटक गये, तुरंत बाद में अतिरंजित कल्पनाओं को छूट दे गई और राधा को स्त्री के रूप में गढ़ लिया, यह प्रवृत्ति निरंतर जारी रही तो कृष्ण के बारे में अपनी पत्नी के अलावा अन्य स्त्री के साथ व्यभिचार चित्रित करनेवाली कहानियां गढ़ ली गयीं और यह खेल चालू रहा| इस कालक्रम में आई विकृति से पूर्णत गाफ़िल सरल हिन्दू राधा-कृष्ण की पूजा आज भी उसी पवित्र भावना से ज़ारी रखे हुए हैं | यदि, आप किसी हिन्दू से राधा के उल्लेखवाला धर्म ग्रंथ पूछेंगे तो उसके पास कोई जवाब नहीं होगा, शायद ही कोई हिन्दू जानता भी हो| महाभारत या हरिवंश या भागवत या किसी भी अन्य प्रमाणिक ग्रंथ में राधा की कोई चर्चा नहीं है| अतः सभी व्यवहारिक मामलों में हिन्दुओं द्वारा राधा पर झूठी कहानियों और झूठी पुस्तकों को मान्यता नहीं दी गई है|



एक हिन्दू के लिए राधा पवित्रता का प्रतिक है, भले ही वह नहीं जानता क्यों और कैसे ? यदि हिन्दुओं के मन में राधा - कृष्ण के संबंधों के प्रति कोई अशालीन भाव होता वह राधा के भक्तों के जीवन में झलकना चाहिए था परंतु कृष्ण के उपासक तो एक पत्नीव्रती, बहुधा ब्रह्मचारी रहनेवाले होते हैं जो सहसा अपने से विपरीत लिंग के लोगों में घुलते-मिलते भी नहीं हैं|



अतः सभी व्यावहारिक मामलों में हिन्दू राधा – कृष्ण पर सभी झूठी कथाओं और झूठी पुस्तकों को नामंजूर करते हैं|



४.शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक | दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई, बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं | हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है इसलिए दीपक की प्रतिमा का निर्माण किया गया ताकि एकाग्र ध्यान लग सके | लेकिन कुछ विकृत दिमागों ने इस में जननागों की कल्पना कर ली और झूठी कुत्सित कहानियां बना ली और इस पीछे के रहस्य से अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं द्वारा इस प्रतिमा का पूजन पवित्रता के प्रतिक के रूप में करना शुरू कर दिया गया|



एक हिन्दू को क्यों और कैसे यह जानने में कोई रूचि नहीं है | वह सिर्फ चीज़ों को ऊपर से देख कर स्वीकारता है और हर कहीं से अच्छाई को पाने का प्रयास करता रहता है| किसी हिन्दू ने शिव पुराण या शिव लिंग से संबंधित अन्य पुस्तकें पढ़ी भी नहीं हैं| वे शिवालय में सिर्फ अपनी पवित्र भावनाएं ईश चरणों में अर्पित करने जाते हैं| अतः सभी व्यावहारिक मामलों में हिन्दुओं द्वारा शिव लिंग के बारे में सभी झूठी कथाओं और झूठी पुस्तकों को अस्वीकार किया गया है|



५.हिन्दू लोग अपने धर्म का मर्म यही मानते हैं कि एक ही सत्य का साक्षात्कार अलग-अलग तरीकों से किया जा सकता है | अतः वे हर किसी को विद्वान समझ बैठते हैं, उसके पीछे चलने लगते हैं और भ्रम में रहते हैं कि वे भलाई के मार्ग पर हैं | लिहाज़ा कुछ हिन्दू अजमेर शरीफ़ की दरगाह पर चादर चढ़ाने के लिए दौड़े जाते हैं – जो पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ़ -मुहम्मद गौरी का साथ देनेवाले गद्दार की मज़ार है | शिवाजी के हाथों मारे गये -कुख्यात लुटेरे और बलात्कारी अफ़ज़ल खान की कब्र पर भी हिन्दू माथा टेकते नज़र आएंगे | हिन्दुओं की हर किसी में अच्छाई ही देखने की मूलभूत प्रवृति जो उनको उपासना की हर एक पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित करती है – आज उसके विनाश का कारण बन गयी है|



जिस तरह आप यदि स्वास्थ के नियमों का पालन, पथ्यापथ्य, औषध इत्यादि का ध्यान नहीं रखेंगे तो आप नयी दिल्ली जैसी जगह पर डेंगू से नही बच सकते | उसी तरह, हमारे वेदों के मूलभूत विचारों को अगर हम ने पकड़ कर नहीं रखा, कोई सशक्त उपाय नहीं किया एवं चौकन्ने नहीं हुए तो बहुत आसानी से हिन्दू समाज भी संक्रमित हो जाएगा|



संक्षेप में, हिन्दू सिर्फ अच्छाई को ही पूजते हैं | वे इस अच्छाई को पूजा के हर स्वरुप में तलाशते हैं | वे इसके पीछे की कहानियों की परवाह नहीं करते इस प्रकार की पूजाओं की उत्पत्ति कैसे हुई और उनके पीछे क्या षड्यंत्र है , इस बारे में भी नहीं विचारते और अच्छाई ढूंढते रहते हैं|



इसलिए यद्यपि हिन्दुओं को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए किन्तु यह भी सच्ची बात है कि हिन्दू धर्म के सिद्धांतों या व्यवहारों में ऐसी कथाएं और पुस्तकें समाहित नहीं हैं|



प्रश्न -----. ब्रह्मा का अपनी कन्या पर आसक्त होना और शिव का मोहिनी के पीछे भागना इत्यादि कथाओं के बारे में आप क्या कहेंगे ?



उ. इसका उत्तर भी वही है जो पहले था कि ये कथाएं हिन्दुत्व का हिस्सा नहीं हैं | ये वेदों में कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती और वस्तुतः वेदों में इस स्वरुप की कोई भी कथा नहीं है | इस्लाम और ईसाईयत के विपरीत हिन्दू धर्म में इन कथाओं के लिए कोई स्थान है ही नहीं | हिन्दू धर्म पूर्णतः सिद्धांतों और आदर्श संकल्पनाओं पर आधारित है | कथाएँ समय -समय बदलती रहती हैं, वो परिवर्तित की जा सकती हैं, उन में जोड़-तोड़ की जा सकती है, उन्हें दूषित किया जा सकता है, वे विस्मृत हो सकती हैं या उनमें कुछ भी किया जा सकता है | परंतु धर्म सनातन है अर्थात् शाश्वत है -जो पहले भी एक ही था और आगे भी वही होगा|



प्रश्न -----. तो क्या आप का मतलब है कि राम, कृष्ण, विष्णु इत्यादि से हिन्दू धर्म नहीं बनता ?



उत्तर --- राम, कृष्ण विष्णु, शंकर, ब्रह्मा इत्यादि हिन्दू धर्म नहीं हैं बल्कि वे तो वैदिक धर्म के अनुयायी थे | वे हमारे आदर्श और अनुकरणीय हैं | हम उन्हें चाहते हैं क्योंकि उन्होंने महान उदाहरण प्रस्तुत किए जिनका अनुशीलन किया जाना चाहिए | उन्होंने वेदों को अपने आचरण में उतारा था और जनसमुदाय को प्रेरित करने के लिए और सही दिशा में चलाने के लिए ऐसे महा पुरुषों की आवश्यकता रहती है | परंतु, जैसा ऊपर बताया जा चुका है कि धर्म शाश्वत है – अब से अरबों वर्ष बाद हो सकता है कि किन्ही दूसरे आदर्शों का अनुसरण किया जा रहा होगा | राम या कृष्ण के जन्म से पूर्व के आदर्श कोई और होंगे और राम या कृष्ण को कोई जानता भी न होगा, पर धर्म तब भी था | यह शाश्वत वैदिक धर्म ही हिंदुत्व है और क्योंकि राम, कृष्ण और विष्णु ने इसका पालन पूर्णता से किया – वे हमारी संस्कृति, प्रेरणा, विचारों और संकल्पों का अनिवार्य अंग हैं |



प्रश्न -----. आप चतुर हैं, मैं समझ रहा था कि आप अश्लील कथाओं का विश्लेषण करेंगे और उनके अश्लील नहीं होने की सफाई पेश करेंगे | लेकिन आप तो इसे हिंदुत्व का हिस्सा मानने से ही इंकार कर रहें हैं |



उत्तर - मैं केवल सत्यनिष्ठ हूं | और हिंदुत्व इस्लाम की तरह नहीं है कि जहां कुरान में मुहम्मद के जीवन की व्यक्तिगत घटनाओं का वर्णन किया गया है और उसे न्यायसंगत भी ठहराया गया है | कुरान और हदीसों में इन पर कहानियां भरी हुई हैं कि आयशा जब बच्ची थी तभी मुहम्मद ने उससे शादी क्यों की, क्यों उस ने अपनी पुत्र-वधू से शादी की इच्छा ज़ाहिर की और वास्तव में बिना शादी किए ही सम्बन्ध रखे (दावा किया कि शादी आसमान में हो गई है !) क्यों पैगम्बरों के लिए सामान्य मुस्लिमों से ज्यादा शादियां कर सकने का ख़ास प्रावधान है, वगैरा, वगैरा —|



यह कहानियां संसार के अंत तक यह बताने के लिए प्रस्तुत नहीं रहेंगी कि किसने अल्लाह की आखिरी किताब उतारी और न ही वे कोई बहुत उम्दा उदाहरण ही पेश करती हैं लेकिन (किन्तु) इन आयतों को मुहम्मद का चरित्र बचाने के वास्ते गलत करार देकर नकारने के बजाए धर्मांध मुसलमानों ने इन भद्दी आयतों को मुहम्मद के चरित्र को बेहतर और उम्दा बनाने की प्रक्रिया का भाग बताकर सही दिखाने की कोशिश की है |



इसी प्रकार ईसाई हैं, जो ये मानने के बजाए कि बाइबल में मनघडंत कहानियां भरी हुई हैं – ईसा मसीह को संसार का एकमात्र तारणहार बताते हैं |



हिंदुत्व की आधारशिला बहुत दृढ़ है और ऐसी क्षुद्र कहानियों से वह लडखडाई नहीं जा सकती | जिन बनावटी कथाओं को हम पहले ही नकार चुके हैं, उन्हें प्रस्तुत करना आपके कपट को प्रकट कर रहा है | दिखाएँ कि, Vedic Religion in brief और What is Vedic Religion में क्या गलती है ?



आप कुछ भी गलत नहीं दिखा सकते और इसीलिए हमारा दावा है कि वैदिक धर्म या हिंदुत्व ही एकमात्र स्वीकार किए जाने योग्य धर्म है |



इस सब के बावजूद, झूठी कुरान और छद्म बाइबल के असभ्य पाठों के प्रत्येक अक्षर का समर्थन करनेवालों द्वारा शाश्वत सनातन वैदिक हिन्दू धर्म पर उंगली उठाने की धृष्टता किए जाना घोर खेद का विषय है |



प्रश्न ---. वेदों में अभद्र वर्णन होने के बारे में आप क्या कहेंगे ?



उत्तर - .एक भी वेद मंत्र ऐसा दिखाएँ जिसमें भद्दापन हो या चारों वेदों में से एक भी अश्लील प्रसंग निकल कर दिखा दें | ग्रिफिथ या मैक्स मूलर के अनुवादों पर मत जाइए – वे मूलतः धर्मांतरण के विषाणु ही थे | शब्दों के अर्थ सहित किसी भी वेद मंत्र को अशिष्ट क्यों माना जाए ? – इसका कारण बताएं | अब तक एक भी ऐसा मंत्र कोई नहीं दिखा सका | ज्यादा से ज्यादा, लोग सिर्फ़ कुछ नष्ट बुद्धियों के उलजुलूल अनुवादों की नक़ल उतार कर रख देते हैं, यह जाने बिना ही कि वे इस तरह के बेतुके अर्थों पर पहुंचे कैसे ?



सभी की स्पष्टता के लिए – चारों वेदों में किसी प्रकार की अभद्रता, अवैज्ञानिकता या अतार्किकता का लवलेश भी नहीं है|



प्रश्न ---. हिन्दू पुराणों में से उत्सवों का पालन करते हैं और पुराणों में यह अशालीन कथाएं हैं, फ़िर हिंदुत्व को इन कथाओं से अलग कैसे मानेंगे ?



उत्तर - यह तर्क व्यर्थ है क्योंकि उत्सव धर्म से प्रेरित सामाजिक क्रिया कलाप है – अपने आप में धर्म नहीं है | उत्सव और उनकी विधियाँ भारत में दो-दो किलोमीटर के फ़ासले पर बदलती जाती हैं – इस वैविध्य को जहां तक वेदानुकूल है – उत्साहित किया गया है | हिन्दू लोग त्यौहारों को सामाजिक प्रसंग की तरह लेते हैं ताकि अपने आदर्शों के प्रति सम्मान प्रकट कर सकें और अच्छाई के प्रति कृतसंकल्प हो सकें | त्यौहारों को मनाने का स्वरुप हमेशा समय, स्थान और समाज के अनुसार बदलता रहता है | समय-समय पर स्वरुप बिगड़ भी जाता है पर इसका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं, जो हमेशा शाश्वत बना रहता है | किसी भी उत्सव में इन अश्लील कहानियों का पाठ नहीं किया जाता बल्कि अपनी श्रद्धा और वचन बद्धता को प्रदर्शित करने के लिए इन दिनों संयम का पालन किया जाता है |



प्रश्न ---. तब फ़िर ये कथाएं आपकी संस्कृति का हिस्सा क्यों हैं ?



उत्तर - किसने कहा कि यह कहानियां हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं ?जन्मना ब्राह्मण धार्मिक ग्रंथों के सबसे नजदीक हैं | अगर ये हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग होती,तो यह कैसे कहा जा सकता है कि -



१.ब्राह्मण समाज (इस लेख में ब्राह्मण से मेरा आशय जन्मना ब्राह्मण से है| ) मात्र भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में सर्वाधिक एक पत्नीव्रती समाज है |



२. कई ब्राह्मण ब्रह्मचर्य और आत्म- संयम का पालन उस स्तर तक करते हैं जिसे अरबी मानसिकता वाले शायद अस्वाभाविक मानें |



३. किसी ब्राह्मण ने कभी काशी या मथुरा में ऐसा कोई यज्ञ संयोजित नहीं किया – जिसमें हिंसा, असभ्यता या अश्लीलता समाविष्ट हो |



४.जैसा कि इन गलत कथाओं में प्रचलित किया गया है, कोई भी ब्राह्मण इस तरह रखैल नहीं रखता या व्यभिचारी नहीं है |



इन कथाओं को संस्कृति का हिस्सा बनाने के बदले इन से उपेक्षा बरती गई है, इन्हें अस्वीकार किया गया है या वैदिक धर्म की परिधि ( जो लेख के पहले तीन बिन्दुओं में वर्णित हैं | ) में इनका अलंकारिक अर्थ लिया गया है |



प्रश्न ---. बहुत से नकली गुरुओं के सेक्स – स्कैंडल ( अनैतिक आचरण ) में फंसे होने की खबरें आती रहती हैं ?



उत्तर - अगर इस तरह की अनर्गल बातें हिन्दू धर्म का हिस्सा होती, तो इसे ” स्कैंडल” (कलंकपूर्ण कृत्य) कहा ही नहीं जाता | किसी पाखंडी गुरु की ऐसी करतूतें सामने आते ही, अन्य किसी भी अपराधी की तरह ही समाज में उसका कड़ा निषेध किया जाता है | और यदि हिन्दू धर्म में किसी भी तरह की लम्पटता का कोई स्थान होता तो यह खबर सुर्ख़ियों में आती ही नहीं बल्कि यह तो समाज में व्याप्त एक सामान्य बात होती ! मिसाल के तौर पर इरान जैसे देश में किसी इमाम के मुता या अस्थायी विवाह कर लेने को कोई चर्चा का विषय नहीं बनाता क्योंकि वहां मुता अनिवार्यतः समाज का हिस्सा है |



जिस तरह यह नहीं कहा जा सकता कि इस्लाम औरतों के बिकिनी शो को जायज़ ठहराता है चूँकि एक अरब महिला ने मिस अमेरिका का ख़िताब हासिल कर लिया है, उसी तरह किसी झूठे गुरु के कारनामों से हिन्दू धर्म का कोई वास्ता नहीं है | इसके विपरीत, उसके दुष्कृत्यों के लिए उसे निन्दित किए जाने की वास्तविकता से यह प्रकट होता है कि इस तरह के विकारों का हिन्दू धर्म में कोई स्थान नहीं है |



प्रश्न ---. मुस्लिम भी उन सब का अनुसरण नहीं करते, जिनको आप अपनी साइट पर नाम धरते रहते हैं, फ़िर यह दोहरा मापदंड क्यों ?



उत्तर - कृपया हमारे लेखों को ज़रा ध्यानपूर्वक पढ़िए | सामान्यतः हमने कभी भी सम्पूर्ण मुस्लिम समाज या मुहम्मद को निन्दित नहीं किया | हम तो सिर्फ़ नई कुरान और हदीसों को दोषी मानते हैं और उन कठमुल्लाओं या उन्मादियों को निंदनीय मानता हैं, जो इन किताबों (नई कुरान और हदीसों ) के प्रत्येक शब्द को बिलकुल सही और अंतिम मानते हैं | अगर ये धर्म जुनूनी यह मान लें कि कुरान या हदीस की वह सभी आयतें जो आपत्तिजनक हैं ( अश्लील, मुहम्मद को कलंकित करने वाली, कामुकता के लिए गुलामी को ज़ायज ठहरानेवाली, जिस लड़की से शारीरिक सम्बन्ध रहा हो उसकी माँ से भी शादी की इजाजत, गैर – मुस्लिमों के लिए दोज़ख की व्यवस्था, महिलाओं की बुद्धि को आधा ही आंकना, स्त्रियों को बांदी रख लेने पर कोई पाबन्दी न होना, इत्यादि, इत्यादि –) इस्लाम का हिस्सा नहीं हैं और उन्हें ख़ारिज कर देना चाहिए, तो हमें इस्लाम पर बिलकुल कोई आपत्ति नहीं होगी बल्कि हदीसों और कुरान की अनुचित आयतों को निकल देने पर इस्लाम वैदिक धर्म की ही शाखा बन जाएगा |



प्रश्न ---. आपका सिद्धांत विचित्र है, हिन्दू जो भी करें आप उसका समर्थन कर रहे हैं और फ़िर भी उन सभी कथाओं को अस्वीकार कर रहें हैं जो हिन्दुओं के आचरण का आधार हैं ?



उत्तर - १.हिन्दुओं के द्वारा कुछ भी किए जाने को मैंने कभी उचित नहीं ठहराया | हिन्दुओं की कार्य प्रणाली में भी छिद्र हैं अन्यथा कैसे ये बर्बर विदेशी पंथ भारतवर्ष में सेंध लगा पाते? वास्तविक हिन्दू धर्म जो वेदों पर आधारित है ( वैदिक धर्म ) और जिसे हम आज अज्ञानतावश अपनाये बैठे हैं – इन दोनों में निश्चित तौर पर अंतर है |



२.पर यह फर्क हिन्दू धर्म के नहीं बल्कि उसके अनुगामियों के दोष इंगित करता है | मैं जाकिर नाइक से एक बिंदु पर सहमत हूं कि ‘ कार की परख उसके चालक से नहीं, उसके इंजिन से की जानी चाहिए | इसी तरह, हिन्दुत्व का मूल्यांकन वेदों से और उसके मूलभूत सिद्धांतों से किया जाना चाहिए ना कि गलत अनुगामियों से या मिथ्या कथाओं से – जो बाद में गढ़ ली गईं |



३.यह सही है कि आज के प्रचलित स्वरुप में हिन्दू प्रथाओं में ( सामान्यतः ) कई खामियां हैं, जैसे-



- जन्मगत जाति व्यवस्था का होना जो समाज को खंडित कर रही है |



- अपने मूलाधार वेदों और वैदिक धर्म की अवहेलना करना
BY DEEP NAYAN SINGH

Friday, February 10, 2012

अपराजेय अयोध्या : अयोध्या एक यात्रा


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अयोध्या अपने शाब्दिक अर्थ के अनुसार यह अपराजित है.. यह नगर अपने २२०० वर्षों के इतिहास मे अनेकों युद्धों व संघर्षो का प्रत्यक्ष दर्शी रहा है, अयोध्या को राजा मनु द्वारा निर्मित किया गया और यह श्री राम जी का जन्मस्थल है। इसका उल्लेख प्राचीन संस्कृत ग्रंथों जिसमे रामायण व महाभारत सम्मिलित हैं, में आता है। वाल्मिकि रामायण के एक श्लोक मे इसका वर्णन निम्न प्रकार है।

कोसलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान्। निविष्ट सरयूतीरे प्रभूत-धन-धान्यवान् ॥१-५-५॥
अयोध्या नाम नगरी तत्रऽऽसीत् लोकविश्रुता। मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् ॥१-५-६॥
— श्रीमद्वाल्मीकीरामायणे बालकाण्डे पञ्चमोऽध्यायः

श्री ग्रिफैत्स जो 19 शताब्दी के आख़िर मे बनारस कॉलेज के मुख्य अध्यापक रहे... उन्होने रामायण मे अयोध्या के वर्णन को बड़ी सुंदरता से इस प्रकार अनुवादित किया, उनके शब्दों के अनुसार - " उस नगरी के विशाल एवं सुनियोजित रास्ते और उसके दोनो ओर से निकली पानी की नहरें जिस से राजपथ पर लगे पेड़ तरो ताज़ा रहें और अपने फूलो की महक को फैलाते रहें। एक कतार से लगे हुए और सतल भूमि पर बने बड़े बड़े राजमहल हैं, अनेक मंदिर एवं बड़ी बड़ी कमानें, हवा मे लहराता विशाल राज ध्वज, लहलहाते आम के बगीचे, फलों और फूलों से लदे पेड़, मुंडेर पर कतार से लगे फहराते ध्वजों के इर्द गिर्द और हर द्वार पर धनुष लिए तैनात रक्षक हैं। "


कौशल राज्य के नरेश राजा दशरथ राजा मनु के ५६ वंशज माने जाते हैं, उनकी ३ पत्नियां थी, कौशल्या, सुमीत्रा व कैकेयी, ऐसा माना जाता है श्री राम का जन्म कौशल्या मंदिर मे हुआ था, अतः उसे ही राम जन्म स्थल कहा जाता है. ब्रह्मांड पुराण में अयोध्या को हिंदुओं ६ पवित्र नगरियों से भी अधिक पवित्र माना गया है। जिसका उल्लेख इस पुराण मे इस प्रकार किया गया है -

अयोध्य मथुरा माया, काशी कांचि अवंतिका, एताः पुण्यतमाः प्रोक्ताः पुरीणाम उत्तमोत्तमाः

महर्षि व्यास ने श्री राम कथा का वर्णन उनके द्वारा रचित महाभारत के वनोपाख्यान खंड मे किया है, अयोध्या सदियों से अयोध्या वासियों द्वारा बारंबार निर्मित की गयी है, यह अयोध्या वासियोम की जिजीविषा ही है कि वह इस नगर को अनेकानेक बार पुनर्रचित कर चुके हैं। अलक्षेंद्र (सिकंदर) के लगभग २०० वर्ष बाद, मौर्य शासन काल के दौरान जब बौद्ध धर्म अपनी चरम सीमा पर था, एक ग्रीक राजा मेनंदार अयोध्या पर आक्रमण करनी की नीयत से आया, उसने बुद्ध धर्म द्वारा प्रभावित होने का ढोंग कर बौद्ध भिक्षु होने का कपट किया और अयोध्या पर धोखे से आक्रमण किया एवं इस आक्रमण मे जन्मस्थल मंदिर ध्वस्त हुआ, किंतु सिर्फ़ 3 महीने मे शुंग वंशिय राजा द्युमतमतसेन द्वारा मेनंदार पराजित किया गया और अयोध्या को स्वतंत्र कराया गया।

जन्म स्थान मंदिर की पुनर्रचना राजा विक्रमादित्य ने की, इतिहास मे 6 विक्रमादित्यो का उल्लेख आता है, इस बात पर इतिहासविद एक मत नही है कि किस विक्रमादित्य ने मंदिर का निर्माण किया। कुछ के अनुसार वो विक्रमादित्य जिसने शको को सन ५६ ई.पू. मे पराजित किया और जिसके नाम से शक संवत चलता है, तो कुछ कहते हैं स्कंदगुप्त जो स्वयं को विक्रमादित्य कहलाता था, उसने 5 वी शताब्दी के अंत मे मंदिर निर्माण किया। पी. करनेगी की किताब " ए हिस्टॉरिकल स्कैच ऑफ फ़ैज़ाबाद " मे कही बात साधारणतया सर्वमान्य है। उसमे वो कहते हैं, विक्रमादित्य के पुरातन शहर ढूँढने का मुख्य सूत्र यह है कि जहाँ सरयू बहती है और भगवान शंकर का रूप नागेश्वर नाथ मंदिर जहाँ है। ये भी माना जाता है की विक्रमादित्या ने करीब ३६० मंदिर अयोध्या मे बनवाए और इसके बाद हिंदुओं द्वारा श्री राम की पूजा निरंतर चलती रही.. इसकी पुष्टि नासिक स्थित सातवाहन राजा द्वारा बनाई पुरातन गुफा के शिला लेख मे मिलती है, बहुचर्चित संस्कृत नाटककार भास ने भगवान राम को अर्चना अवतार मे जोड़ा है।

नमो भगवते त्रैलोक्यकारणाय नारायणाय
ब्रह्मा ते ह्रदयं जगतत्र्यपते रुद्रश्च कोपस्तव
नेत्र चंद्रविकाकरौ सुरपते जिव्हा च ते भारती
सब्रह्मेन्द्रमरुद्रणं त्रिभुवनं सृष्टं त्वयैव प्रभो
सीतेयं जलसम्भवालयरता विश्णुर्भवान ग्रह्यताम

श्री राम को विष्णु अवतार मे पूजा जाने की परंपरा है, जिसका प्रमाण पुरानी दस्तकारी एवं शिला लेखों मे मिलते हैं। चौथी शताब्दी के रामटेक मंदिर की दस्तकारी, सन ४२३ ए.डी. का कंधार का शिलालेख, सन ५३३ ए.डी. का बादामी का चालुक्य शिलालेख, आठवीं शताब्दी (ए.डी) का मामल्लापुरम का शिलालेख, ११वीं शताब्दी में जोधपुर के नज़दीक बना अंबा माता मंदिर, ११४५ ए.डी. का रेवा जिले के मुकुंदपुर में बना राम मंदिर, ११६८ ए.डी. का हँसी शिलालेख, रायपुर जिले के राजीम मे बना राजीव लोचन मंदिर इनमे से कुछ हैं।

१२ शताब्दी में अयोध्या मे पांच मंदिर थे, गौप्रहार घाट का गुप्तारी, स्वर्गद्वार घाट का चंद्राहरी, चक्रतीर्थ घाट का विष्णुहरी, स्वर्गद्वार घाट का धर्महरी, और जन्मभूमि स्थान पर विष्णु मंदिर, इसके बाद जब महमूद ग़ज़नवी ने भारत पर आक्रमण किया तो उसने सोमनाथ को लूटा और वापस चला गया. किंतु उसका भतीजा सालार मसूद अयोध्या की ओर बढ़ा, १४ जून १०३३ को मसूद अयोध्या से ४० किलोमीटर दूर बहराइच पहुँचा, यहाँ सुहैल देव के नेतृत्व मे सेना एकत्र हुई और मसूद पर आक्रमण किया दिया, जिसमे मसूद की सेना परास्त हुई, और मसूद मारा गया. मसूद के चरित्रकार अब्दुल रहमान चिश्ती मिरात ए मसूदी मे कहते हैं,

" मौत का सामना है, फिराक़ सूरी नज़दीक है, हिंदुओं ने जमाव किया है, इनका लश्कर बे-इंतेहाँ है. नेपाल से पहाड़ों के नीचे घाघरा तक फौज मुखालिफ़ का पड़ाव है। मसूद की मौत के बाद अजमेर से मुज़फ्फर ख़ान तुरंत आया, पर वो भी मारा गया... अरब ईरान के हर घर का चिराग बुझा है। "

मसूद को मारकर पासी राजा सुहैल देव ने एक तालाब में फेंक दिया था फिरोज शाह तुगलक को जब इस बात का पता चला तो उसने मसूद को गाजी की उपाधि दी और बहराइच अपने आदमी भेज कर उस तालाब को मिटटी से पटवा दिया और वहाँ मसूद की कब्र बनवा दी और वहाँ कुछ फकीर बैठा दिये और वहाँ यह अफवाह फैला दी कि यहाँ हर मुराद पूरी होती है और अब वहाँ सालना उर्स लगता है और शर्मनाक बात यह है कि.

जो मूर्ख हिन्दू उस दरगाह पर जाकर अभी भी स्वास्थ्य और शारीरिक तकलीफ़ों सम्बन्धी तथा अन्य दुआएं मांगते हैं उनकी खिल्ली स्वयं “तुलसीदास” भी उड़ा चुके हैं। चूंकि मुगल शासनकाल होने के कारण तुलसीदास ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिखा है, लेकिन फ़िर भी बहराइच में जारी इस “भेड़िया धसान” (भेड़चाल) के बारे में वे अपनी “दोहावली” में कहते हैं –.

लही आँखि कब आँधरे, बाँझ पूत कब ल्याइ ।.
कब कोढ़ी काया लही, जग बहराइच जाइ॥.

अर्थात “पता नहीं कब किस अंधे को आँख मिली, पता नहीं कब किसी बाँझ को पुत्र हुआ, पता नहीं कब किसी कोढ़ी की काया निखरी, लेकिन फ़िर भी लोग बहराइच क्यों जाते हैं.
और कभी किसी को गाजी बाबा ने संतान दे भी दी होगी तो वह वह क्या उसके जैसे नहीं होगी जो ओसामा को ओसामा जी कहता है.

स्रोत सुरेश चिपलूनकर जी.


Published: Monday, Dec 05,2011, 23:18 IST

Source: IBTL



Wednesday, February 8, 2012

हिन्दू धर्म का १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं


हिन्दू धर्म का १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं। भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे, और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे। एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत ही था।

भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने "हिन्दुस्थान" नाम दिया था जिसका अपभ्रंश "हिन्दुस्तान" है। "बृहस्पति आगम" के अनुसार:

हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥

अर्थात, हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।

"हिन्दू" शब्द "सिन्धु" से बना माना जाता है। संस्कृत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं - पहला, सिन्धु नदी जो मानसरोवर के पास से निकल कर लद्दाख़ और पाकिस्तान से बहती हुई समुद्र मे मिलती है, दूसरा - कोई समुद्र या जलराशि। ऋग्वेद की नदीस्तुति के अनुसार वे सात नदियाँ थीं : सिन्धु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), शुतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुषिणी (रावी) और अस्किनी (चेनाब)। एक अन्य विचार के अनुसार हिमालय के प्रथम अक्षर "हि" एवं इन्दु का अन्तिम अक्षर "न्दु", इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना "हिन्दु" और यह भूभाग हिन्दुस्थान कहलाया। हिन्दू शब्द उस समय धर्म की बजाय राष्ट्रीयता के रुप में प्रयुक्त होता था। चूँकि उस समय भारत में केवल वैदिक धर्म को ही मानने वाले लोग थे, बल्कि तब तक अन्य किसी धर्म का उदय नहीं हुआ था इसलिये "हिन्दू" शब्द सभी भारतीयों के लिये प्रयुक्त होता था। भारत में केवल वैदिक धर्मावलम्बियों (हिन्दुओं) के बसने के कारण कालान्तर में विदेशियों ने इस शब्द को धर्म के सन्दर्भ में प्रयोग करना शुरु कर दिया।

आम तौर पर हिन्दू शब्द को अनेक विश्लेषकों द्वारा विदेशियों द्वारा दिया गया शब्द माना जाता है। इस धारणा के अनुसारहिन्दू एक फ़ारसी शब्द है। हिन्दू धर्म को सनातन धर्म या वैदिक धर्म भी कहा जाता है। ऋग्वेद में सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है - वो भूमि जहाँ आर्य सबसे पहले बसे थे। भाषाविदों के अनुसार हिन्द आर्य भाषाओं की "स्" ध्वनि (संस्कृत का व्यंजन "स्") ईरानी भाषाओं की "ह्" ध्वनि में बदल जाती है। इसलिये सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) मे जाकर हफ्त हिन्दु मे परिवर्तित हो गया (अवेस्ता: वेन्दीदाद, फ़र्गर्द 1.18)। इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दु नाम दिया। जब अरब से मुस्लिम हमलावर भारत में आए, तो उन्होने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया।

इन दोनों सिद्धान्तों में से पहले वाले प्राचीन काल में नामकरण को इस आधार पर सही माना जा सकता है कि "बृहस्पति आगम" सहित अन्य आगम ईरानी या अरबी सभ्यताओं से बहुत प्राचीन काल में लिखा जा चुके थे। अतः उसमें "हिन्दुस्थान" का उल्लेख होने से स्पष्ट है कि हिन्दू (या हिन्दुस्थान) नाम प्राचीन ऋषियों द्वारा दिया गया था न कि अरबों/ईरानियों द्वारा। यह नाम बाद में अरबों/ईरानियों द्वारा प्रयुक्त होने लगा।

हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।

एक अन्य श्लोक में कहा गया है

ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:

गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।

ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है।

चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू' शब्द इन्दु' जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु' को इन्तु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिन्दु' कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही 'हिन्दू' शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है।

“ सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन। परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥

यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः। एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥ द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।

”
—वेद व्यास, भीष्म पर्व, महाभारत

अर्थात

हे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश(खरगोश) दिखायी देता है। अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से बहुत समानता दिखाता है।


एक खरगोश 

और दो पत्तो का चित्र


चित्र को उल्टा करने पर बना पृथ्वी का मानचित्र


उपरोक्त मानचित्र ग्लोब में

उपरोक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के उपरोक्त श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था-

समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है। इसमें सात कुलपर्वत हैं: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र ।

यहां के भाग

भारतवर्ष के नौ भाग हैं: इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व और वारुण, तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नवां है।

विस्तार

यह द्वीप उत्तर से दक्षिण तक सहस्र योजन है। इसके पूर्वी भाग में किरात और पश्चिमी भाग में यवन बसे हुए हैं।

मुख्य नदियां

चारों वर्णों के लोग मध्य में रहते हैं। शतद्रू और चंद्रभागा आदि नदियां हिमालय से, वेद और स्मृति आदि पारियात्र से, नर्मदा और सुरसा आदि विंध्याचल से, तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्ष्यगिरि से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, सह्य पर्वत से; कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचल से, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरि से तथा ऋषिकुल्या एवंकुमारी आदि नदियां शुक्तिमान पर्वत से निकलीं हैं। इनकी और सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

यहां के वासी

इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, मध्याअदि देशों के; पूर्व देश और कामरूप के; पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दक्षिणात्य लोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्र निवासी; सौवीर, सन्धव, हूण; शाल्व, कोशल देश के निवासी तथा मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। भारतवर्ष में ही चारों युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। इस जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।

जम्बू द्वीप(जम्मू नहीं): इरान से लेकर सिंगापुर तक आर्यावर्त कहलाने वाला भाग हिन्दू विवाह मन्त्रों में आज भी है|

दंगो में हिन्दू औरत का बलात्कार अपराध नहीं माना जायेगा .........!!!



सोनिया गाँधी के “निजी मनोरंजन क्लब” यानी नेशनल एडवायज़री काउंसिल (NAC) द्वारा सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक का मसौदा तैयार किया गया है जिसके प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं-

1) कानून-व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का है, लेकिन इस बिल के अनुसार यदि केन्द्र को “महसूस” होता है तो वह साम्प्रदायिक दंगों की तीव्रता के अनुसार राज्य सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप कर सकता है और उसे बर्खास्त कर सकता है…

(इसका मोटा अर्थ यह है कि यदि 100-200 कांग्रेसी अथवा 100-50 जेहादी तत्व किसी राज्य में दंगा फ़ैला दें तो राज्य सरकार की बर्खास्तगी आसानी से की जा सकेगी)…

2) इस प्रस्तावित विधेयक के अनुसार दंगा हमेशा “बहुसंख्यकों” द्वारा ही फ़ैलाया जाता है, जबकि “अल्पसंख्यक” हमेशा हिंसा का लक्ष्य होते हैं…

3) यदि दंगों के दौरान किसी “अल्पसंख्यक” महिला से बलात्कार होता है तो इस बिल में कड़े प्रावधान हैं, जबकि “बहुसंख्यक” वर्ग की महिला का बलात्कार होने की दशा में इस कानून में कुछ नहीं है…

4) किसी विशेष समुदाय (यानी अल्पसंख्यकों) के खिलाफ़ “घृणा अभियान” चलाना भी दण्डनीय अपराध है (फ़ेसबुक, ट्वीट और ब्लॉग भी शामिल)…

5) “अल्पसंख्यक समुदाय” के किसी सदस्य को इस कानून के तहत सजा नहीं दी जा सकती यदि उसने बहुसंख्यक समुदाय के व्यक्ति के खिलाफ़ दंगा अपराध किया है (क्योंकि कानून में पहले ही मान लिया गया है कि सिर्फ़ “बहुसंख्यक समुदाय” ही हिंसक और आक्रामक होता है, जबकि अल्पसंख्यक तो अपनी आत्मरक्षा कर रहा है)…

इस विधेयक के तमाम बिन्दुओं का ड्राफ़्ट तैयार किया है, सोनिया गाँधी की “किचन कैबिनेट” के सुपर-सेकुलर सदस्यों एवं अण्णा को कठपुतली बनाकर नचाने वाले IAS व NGO गैंग के टट्टुओं ने… इस बिल की ड्राफ़्टिंग कमेटी के सदस्यों के नाम पढ़कर ही आप समझ जाएंगे कि यह बिल “क्यों”, “किसलिये” और “किसको लक्ष्य बनाकर” तैयार किया गया है…। “माननीय”(?) सदस्यों के नाम इस प्रकार हैं – हर्ष मंदर, अरुणा रॉय, तीस्ता सीतलवाड, राम पुनियानी, जॉन दयाल, शबनम हाशमी, सैयद शहाबुद्दीन… यानी सब के सब एक नम्बर के “छँटे हुए” सेकुलर… । “वे” तो सिद्ध कर ही देंगे कि “बहुसंख्यक समुदाय” ही हमलावर होता है और बलात्कारी भी…

अब यह विधेयक संसद में रखा जाएगा, फ़िर स्थायी समिति के पास जाएगा, तथा अगले लोकसभा चुनाव के ठीक पहले इसे पास किया जाएगा, ताकि मुस्लिम वोटों की फ़सल काटी जा सके तथा भाजपा की राज्य सरकारों पर बर्खास्तगी की तलवार टांगी जा सके…। यह बिल लोकसभा में पास हो ही जाएगा, क्योंकि भाजपा(शायद) के अलावा कोई और पार्टी इसका विरोध नहीं करेगी…। जो बन पड़े उखाड़ लो…

By...................Suresh Chiplunkar

जागो हिन्दू......................... जागो.............................. !


एकजुट होकर लड़ो..... वरना मिटा दिए जाओगे................ !!
लड़कियों और इश्क-मुश्क का चक्कर छोड़ कर ये बातें जानिए ... क्योंकि ये बातें हर हिन्दू को जाननी बेहद जरुरी है....... तभी आप अपने अस्तित्व की रक्षा कर पाओगे ....!!

1985
में अलकायदा की स्थापना के बाद भारत समेत सारे भारत में मुस्लिम जिहाद के एक नये दौर की शुरूआत हुई ।

1986
में कश्मीर में जिहादियों द्वारा हिन्दुओं पर एक तरफा हमले शुरू किए गए । जिहादियों ने "एक को मारो, एक का बलात्कार करो और सैंकड़ों को भगाओ" की नीति अपनाई । मुस्लिमों ने "मस्जिदों से लाउडस्पीकरों द्वारा" जिहाद का प्रचार प्रसार किया । "उर्दू प्रेस के द्वारा भी" जिहाद का प्रचार प्रसार किया गया । जिहाद शुरू होते ही हिन्दुओं के पड़ोसी मुसलमान ही उनके शत्रुबन गए । मुसलमानों ने संगठित होकर हिन्दुओं को निशाना बनाना शुरू किया ।
जिहादियों की भीड़ इकट्ठी होकर हिन्दुओं के घर में जाती., उन पर हर तरह के जुल्म करने के बाद उनको दूध पीते बच्चों सहित हलाल कर देती जबकि समाचार दिया जाता पाकिस्तानी आतंकवादियों ने ये सब कर दिया । लेकिन सच्चाई यह थी कि हिन्दुओं को हलाल करने वाले उनके पड़ोसी मुसलमान ही होते थे। जो हिन्दुओं को कत्ल करने के बाद अपने-अपने घरों में रहते थे ।

कश्मीर के अधिकतर पुलिसकर्मी व महबूबामुक्ती जैसे नेता इस्लाम के नाम पर इन जिहादियों का हर तरह से सहयोग करते थे अभी भी कर रहे हैं । कई बार तो बाप व भाईयों के हाथ-पैर बांध कर उनके परिवार की "औरतों की इज्जत लूटकर" उसकेफोटो खींच कर बाप और भाईयों को ये सब करते हुए दिखाया जाता था । बाद में ये तसवीरें हिन्दुओं के घरों के सामने चिपका दी जाती थी । परिणाम जो भी हिन्दू इन तस्वीरों को देखता वही अपने परिवार की औरतों की इज्जत की रक्षा की खातिर भाग खड़ा होता क्योंकि उसके पास रास्ता भी क्या था सिवाय हथियारउठाने या भागने के । हिन्दुओं ने हथियार उठाने के बजाए भागना बेहतर समझा । क्योंकि अगर वो हथियार उठाते तो ये सेकुलर नेता उन्हें अल्पसंख्यकों या मुसलमानों का शत्रु बताकर जेल में डाल देते अथवा फांसी पर लटका देते ।
मुझे बहुत कोफ़्त होती है कि ... इन धर्मनिर्पेक्षता की बात करने वालों पर.... जो हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों के बारे में देश-दुनिया को जागरूक करने वालों को "आतंकवादी कहते हैं", "साम्प्रदायिक कहते हैं" और इन सब जुल्मों-सितम को राजनीति बताते है । ये सब दुष्प्रचार सिर्फ जिहादी ही नहीं बल्कि जिहादियों के साथ-साथ इनके ठेकेदार धर्म निरपेक्षता के पर्दे में छुपे ये राक्षस भी करते हैं जो अपनों का खून बहता देखकर भी अपनी आत्मा की आवाज नहीं सुनते । न केवल इन जिहादी आतंकवादियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ते हैं अपितु सरकार भी बनाते हैं और सत्ता में आने के बाद जिहादियों के परिवारों का जिम्मा उठाते हैं । उनको हर तरह की मदद की जिम्मेवारी लेते हैं जिहादी आतंकवादियों के परिवारों को आर्थिक सहायता देते हैं । हिन्दुओं को अपने घरों से भागने पर मजबूर करते हैं । जिहादियों के विरूद्ध "सेना द्वारा कार्यवाही" शुरू होने पर जिहादियों के "मानवाधिकारों का रोना" रोते हैंमतलब हर हाल में जिहादियों का साथ देते हैं ।

जरा आप खुद ही सोचो कि जो गुलाम नबी आजाद माननीय न्यायालय से ""फांसी की सजा प्राप्त अफजल"" को निर्दोष कहता है क्या वो हिन्दुओं द्वारा मार गिराए गए जिहादी को आतंकवादीमान सकता है ??????????जागो हिन्दू.........................जागो.............................. !एकजुट होकर लड़ो..... वरना मिटा दिए जाओगे................ !!
जय महाकाल...!!!