स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर जी का संक्षिप्त जीवन परिचय
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Saturday, February 25, 2012
ऐसे थे वीर हुतात्मा महान् सावरकर
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर जी का संक्षिप्त जीवन परिचय
Friday, February 24, 2012
थाईलैंड में भी है एक अयोध्या
BY : SHRI SHANTA KUMAR
SABHAR : PANJAB KESRI
Tuesday, February 21, 2012
हमें मरना स्वीकार है, पर इस्लाम नहीं
वीर बालक
जोरावर सिंह और फतेह सिंह ने कहा था-
हमें मरना स्वीकार है, पर इस्लाम नहीं
घटना औरंगजेब के शासनकाल की है। उसने सिखों के नौवें गुरु तेगबहादुर को मार डालने के उद्देश्य से दिल्ली बुलवाया था।
दिल्ली जाने से पहले गुरु तेगबहादुर ने अपने पुत्र गोविंद सिंह को बुलाकर कहा, "बेटा, आज से तुम ही सिखों के गुरु हो। तुम अपने प्राण देकर भी धर्म की रक्षा करना। लो, बाबा हरगोविंद सिंह की यह तलवार पकड़ो।"
तलवार पर अंकित था- "सिर दिया शेर (धर्म) न दिया"। वास्तव में गुरु तेगबहादुर ने अपना सिर कटा दिया, पर अपना धर्म नहीं छोड़ा।
गुरु गोविंद सिंह के चार पुत्र थे। चारों ने धर्म की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उन्होंने न तो अपने परिवार की आन तोड़ी और न ही अपनी शान में बट्टा लगने दिया।
गुरु गोविंद सिंह की दो पत्नियां थीं- सुंदरी देवी और ज्योति देवी। सुंदरी से अजीत सिंह और ज्योति से जुझार, जोरावर और फतेह सिंह का जन्म हुआ था।
कहा जाता है कि एक बार मुगल सेना ने गुरु गोविंद सिंह को घेर लिया। वह उस समय अपने परिवार सहित चमकौर दुर्ग में थे। किसी प्रकार उन्होंने अपनी माता गूजरी और दो छोटे बालकों- जोरावर व फतेह सिंह को बाहर भिजवा दिया।
कई दिनों तक युद्ध होता रहा। अंत में जब रसद और युद्ध-सामग्री कम होती गई और विजय की आशा भी समाप्त होती गई तो सबने बाहर निकलकर शत्रुओं को मारते हुए वीरगति पाने का निश्चय किया। उसी समय दोनों बड़े बेटे-अजीत और जुझार सिंह गुरु गोविंद सिंह के पास आए। वे बहुत भूखे-प्यासे थे।
गुरु गोविंद सिंह ने उनसे कहा, "जाओ, दुश्मनों के खून से अपनी भूख-प्यास बुझाओ।"
दोनों किशोर बालक अपने पिता की आज्ञा मानकर किले से बाहर निकले और शत्रुओं को मारते-काटते वीरगति को प्राप्त हुए। उधर माता गूजरी देवी और दोनों छोटे बालक मुगलों की पकड़ में आ गए। उन्हें बंदी बनाकर सरहिंद के सूबेदार वजीर खां के सामने पेश किया गया। दोनों बालकों के चेहरे पर भय का कोई चिह्न न था।
बालकों का भोला चेहरा देखकर सूबेदार को तरस आ गया। वह बोला, "मासूम बच्चो, अगर तुम मुस्लिम मजहब को स्वीकार कर लो तो तुम्हारी जान बच सकती है।"
बालकों ने सूबेदार को टके-सा जवाब दे दिया, "हम इस्लाम को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। हमें अपना हिन्दू धर्म प्राणों से भी प्यारा है।"
सूबेदार ने बालकों को लालच देकर फुसलाना चाहा, "मेरी बात मान लो तो तुम्हें दौलत मिलेगी। हम तुम्हारी शादी हूर की परियों से करा देंगे।"
वे बालक अपनी बात से जरा भी नहीं डिगे। उन्होंने साफ-साफ कह दिया, "हम स्वर्ग के बदले भी अपना धर्म नहीं छोड़ सकते। हमारा धर्म अमर है।"
यह सुनकर वजीर खां ने जल्लादों को हुक्म दिया, "इन्हें दीवार में जिंदा चिनवा दो।"
जब बालक दीवार में छाती तक चिन गए तब एक बार फिर वजीर खां ने कहा, "बच्चो, अभी भी समय है। बेकार ही जान मत गंवाओ। मेरी बात मान लो।"
"हमें मरना स्वीकार है, इस्लाम नहीं", बच्चों ने एक स्वर में कहा।
कहते हैं जब दीवार में छोटा भाई फतेह सिंह गले तक चिन गया तो बड़े भाई जोरावर सिंह की आंखों में आंसू आ गए। यह देखकर छोटे भाई ने पूछा, "भैया, क्या मौत से डरते हो? तुम रो क्यों रहे हो? क्या तुम्हें पिता की आज्ञा याद नहीं?"
"नहीं भैया, मैं मौत से नहीं डरता। मुझे तो दुख इस बात का है कि मैं पहले पैदा हुआ, पर यह दीवार तुम्हें पहले ढक लेगी। तुम्हें पहले स्वर्ग मिलेगा।"
दोनों बालकों ने हिन्दू धर्म की जयजयकार की और हमेशा के लिए आंखें बंद कर लीं।
SAABHAR : PANCHJANYA
हरिद्वार का बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर
हरिद्वार का बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर
जहां शिव प्रकट हुए थे
दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ में अपने पिता द्वारा माता सती अपने पति भगवान शिव का अपमान देखकर आहत हो उठीं। आवेश व क्रोधवश उन्होंने यज्ञकुंड में कूदकर अपने शरीर का त्याग कर दिया। इस घटनाक्रम के कई वर्ष उपरांत माता सती ने पर्वतराज हिमालय के घर उनकी पुत्री के रूप में दुबारा जन्म लिया। अपने इस जन्म में भी वे भगवान भोलेनाथ को पति रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। अत: मां पार्वती ने तप द्वारा प्रभु को प्रसन्न करने का निर्णय लिया। कहा जाता है कि वर्षों घोर तपस्या करने के पश्चात् शिव शंकर माता पार्वती से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर माता को दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। तब माता गौरी ने भगवान को स्वयं के पति के रूप में पाने का वरदान प्राप्त किया।
जिस स्थान पर माता पार्वती ने भोले बाबा को प्राप्त करने के लिए तप किया, वह स्थान गौरी कुंड कहलाया। इसके पास ही जिस जगह महादेव ने प्रकट होकर पार्वती जी को दर्शन दिए वह बिल्वकेश्वर महादेव के नाम से स्थापित हो गया। चूंकि भगवान शंकर बिल्व वृक्ष के नीचे प्रकट हए थे, वे बिल्वकेश्वर के नाम से विख्यात हुए। यह संपूर्ण क्षेत्र आज भी बिल्व पर्वत के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह पावन स्थान हरिद्वार की पुण्यभूमि पर विराजमान है। हरिद्वार आने वाले अधिकांश श्रद्धालु इस पावन तीर्थ की महिमा से अनभिज्ञ रह जाते हैं, जबकि हर की पैड़ी से यह स्थान मात्र 4 किमी.की दूरी पर है।
स्कंद पुराण में इस तीर्थ का वर्णन प्राप्त होता है। स्कंद जी ने देवर्षि नारद को बिल्वकेश्वर की महिमा तथा पवित्रता के बारे में बताया। स्कंद पुराण में ही माता पार्वती द्वारा 3000 वर्ष तक यहां तप करने व भगवान शंकर के प्रकट होने का वर्णन मिलता है। यहां स्थित गौरी कुंड में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। इस तीर्थ का महात्म्य श्रवण करने से दुर्लभ पुण्य की प्राप्ति होती है। स्कंद पुराण में ही लिखा है कि बिल्व पर्वत के ऊपर एक शिव धारा बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य शिव तुल्य हो जाता है। इसी के दक्षिण भाग में अश्वतर नामक महानाग के निवास करने की बात कही गई है। यह नाग शिव स्वरूप माना जाता है तथा कई प्रकार के रूप बदलता रहता है। वाम भाग में एक पाषाण गुफा है, यहां पर एक सिद्ध योगी तप करते हैं। इस धर्मात्मा मुनि का नाम ऋचिक बताया गया है।
स्कंद पुराण में ही आगे कहा गया है कि श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को इस पर्वत क्षेत्र में एक महान व दिव्य ज्योति के दर्शन होते हैं। यह ज्योति साक्षात् शिव-पार्वती स्वरूप मानी जाती है। इस प्रकार श्रावण मास में बिल्वकेश्वर महादेव की आराधना करने से शंकर भगवान प्रसन्न होते हैं। विशाल पर्वत व जंगल के मध्य विराजमान यह तीर्थ आज भी बेहद आकर्षक प्रतीत होता है। श्रावण मास में तो कांवड़िये यहां गंगा जल लाकर महादेव का अभिषेक करते हैं। हरिद्वार के दक्षिण पश्चिम भाग में विद्यमान इस मंदिर में सड़क मार्ग द्वारा किसी भी वाहन द्वारा पहुंचा जा सकता है। हरियाली से युक्त यहां का वातावरण बहुत मनमोहक है। हाथी सहित कई जंगली जानवर यहां स्वछंद विचरण करते हैं। जिस बिल्व वृक्ष के नीचे भगवान प्रकट हुए थे, वह लुप्त हो चुका है। उसके स्थान पर एक नीम का वृक्ष खड़ा है। इसी के नीचे शिवलिंग व शिव परिवार स्थापित है, जिनके दर्शन से ही मन को असीम शांति का अनुभव प्राप्त होता है। थोड़ी दूरी पर ही गौरी कुंड है, जहां स्नान का विशेष महत्व है। माता गंगा के पावन तट पर भगवान भोलेनाथ का यह धाम एक वरदान के समान प्रतीत होता है।
