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Monday, August 13, 2012

नेहरु की सत्ता लिप्सा - परिणाम विभाजन





मैने कल्‍पना तक नही की थी कि ऐसा होगा मै जीते जी पाकिस्तान देख सकूँगा।‘’ ये शब्‍द पाकिस्‍तान की मॉंग करने वाले जिन्ना के है,
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यहाँ जिन्ना या मुस्लिम लीक को पाकिस्‍तान का निर्माता कहना बेमानी होगा क्‍योकि पाकिस्‍तान का निर्माता

और कोई नही नेहरू और काग्रेस का कमजोर नेतृत्‍व था।

तत्कालीन काग्रेस नेतृत्‍व थक चुका था यह बात नेहरू द्वारा 1960 में लेओनार्ड मोस्ले के साथ बात के दौरान हुई थी।
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नेहरू कहते है – ‘ सच्‍चाई यह है कि हम थक चुके थे और आयु भी अधिक हो चुकी थी। हम में से कुछ ही लोग फिर कारावास में जानेक बात कर सकते थे और यदि हम अखण्‍ड भारत पर डटे रहते जैसा कि हम चाहते थे तो स्‍पष्ट है कि हमें कारागार जाना ही पड़ता। हमने देखा कि बॅटवारे की आग भड़क रही है और सुना कि प्रतिदिन मार काट हो रही है। बॅटवारे की योजना ने एक मार्ग निकालना जिसे हमने स्वीकार कर लिया।‘
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नेहरू के ये वाक्‍य कांग्रेस की कमजोरी तथा उनकी सत्‍ता लोलुपता का बयां कर रहे थे, क्‍योकि काग्रेस चाह‍ती थी किसी प्रकार से स्वतंत्रता लेना चाहती थी चाहे वह विभाजन से ही क्‍यो न हो।
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काग्रेस की कमजोरी के सम्‍बन्‍ध में श्री न.वि. गडगिल कहते है- देश की मुख्य राजनैतिक शक्ति भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस थी, उसके नेता बूढे हो चुके थे, थक चुके थे। वे रस्सी को इतना अधिक नही खीचना चाहते थे कि वह टूट जाये और किये घरे पर पानी फिर जाये।
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श्री गडगिल का उक्‍त कथन काग्रेस की आजादी की लड़ाई के काले अध्‍याय की ओर हमें ले जाती है।

काग्रेस और काग्रेंसी खास कर नेहरू अपनी महत्‍वाकांक्षाओं की नैया पर इतना बोझ लाद चुके थे कि अपनी नैया को बचाने के लिये पाकिस्‍तान की मॉंग स्‍वीकार कर लिया।
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नेहरू की महत्वकांक्षाओ के सामने गांधी जी भी टूट चुके थे, मैने कई बार गांधी जी को विभाजन के लिये दोषी ठहराया है और आज भी ठहराता हूँ, गांधी जी भारत विभाजन रोक सकते थे, इसके लिये गांधी जी को अपने जीवन का सबसे बड़ा बलिदान करना पड़ता, हो सकता है कि उनके प्राण चले जाते किन्‍तु गांधी के बल पर भारत टूटने से बच सकता था ये प्राण लेने वाला कोई गोड़से काग्रेसी ही होता।

गांधी जी को भारत विभाजन के प्रस्‍ताव पर बहुत दर्द था वे दर्द के साथ कहते है- ‘मै भारत विभाजन का विरोधी हूँ किन्‍तु हमारे नेताओं ने इसे स्‍वीकार कर लिया है,

और अब हमें भी इसे स्‍वीकार कर लेना चाहिये। मै इस स्थिति मे नही हूँ कि वर्तमान काग्रेंस के नेतृत्‍व को बदल सकूँ,

यदि मेरे पास समय होता तो क्‍या मै इसका विरोध नही करता ?

मेरे पास नया नेतृत्‍व देने के लिये विकल्‍प ही नही था कि मै कह सकूँ कि यह लीजिए यह रहा वैकल्पिक नेतृत्‍व। ऐसे विकल्‍प के निर्माण का मेरे पास समय नही हर गया, इसलिये मुझे इस नेतृत्‍व के फैसले को कड़वी औषधि की भाति पीना ही होगा, आज मेरे में ऐसी शक्ति नही, अन्‍यथा मै अकेला ही विद्रोह कर देता।‘ भले गांधी जी उक्‍त बात करते समय नेताजी सुभाष का नाम लिये हो किन्‍तु निश्‍चित रूप से नेहरू के पंगु विकल्‍प के रूप से गांधी जी नेताजी को जरूर याद किये होगे।निश्चित रूप से गांधी जी को अपने नेतृत्‍व चयन पर कष्‍ट हुआ होगा।
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गांधी जी की नेतृत्‍व चयन की भूल और नेहरू की महत्‍वकांक्षाओं का परिणाम था कि आज विभाजित भारत हम देख रहे है,
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आज 18 करोड़ मुस्‍लमान रह रहे है आज से 60 साल पहले 4-5 करोड़ मुसलमान भी रह सकते थे। काग्रेस सत्‍ता भोगी नेतृत्‍व का ही परिणाम हमारे समाने है।

तत्कालीन समय में अग्रेजो का भारत छोड़ना अपरिहार्य हो गया था किन्‍तु वास्‍तव में विभाजन अपरिहार्य नही था।
 

साभार : हिंदुत्व सिंघनाद 

Sunday, August 12, 2012

आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्यति


स्थानीय पर्यावरण के संतुलन का संरक्षण करते करते ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धान्त पर चलना ही हिन्दू धर्म है। प्राकृतिक जीवन जीना ही नैचुरोपैथी कहलाता है जो हिन्दू धर्म के साथ संलगित है। अतः चिकित्सा विज्ञान भारत का प्राचीनतम ज्ञान है। पृथ्वी पर सभी जीवों, पर्वतों, वनस्पतियों, खनिजों तथा औषधियों की सागर से उत्पत्ति ऐक प्रमाणित सत्य है। आयुर्वेद ग्रंथ को दिव्य चिकित्सक धनवन्तरी सागर मंथन के फलस्वरूप पृथ्वी पर लाये थे। उन्हों ने आयुर्वेद ग्रंथ प्रजापति को सौंप दिया था ताकि उस के ज्ञान को जनहित के लिये क्रियाशील किया जा सके। अनादि काल से ही भारत की राजकीय व्यवस्था प्रजा के स्वास्थ, पर्यावरण की रक्षा तथा जन सुविधाओ के प्रति कृत संकल्प रही है। 
भारतीय चिकित्सा पद्धति का उदय अथर्व वेद से हुआ, जहां रोगों के लक्षण और औषधियों की सूची के साथ उन के उपयोग भी उल्लेख किये गये हैं। आयुर्वेद ग्रंथ अथर्व वेद का ही उप वेद है जो दीर्घ आयु के संदर्भ में पूर्ण ज्ञान दर्शक है। ऋषि पतंजली कृत योगसूत्र स्वस्थ जीवन के लिये जीवन यापन पद्धति का ग्रंथ है जिस में उचित आहार, विचार तथा व्यवहार पर ज़ोर दिया गया है। इस के अतिरिक्त पुराणों उपनिष्दों तथा दर्शन शास्त्रों में भी आहार, व्यवहार तथा उपचार सम्बन्धी मौलिक जानकारी दी गयी है।
रोग जाँच प्रणाली
प्राचीन ग्रंथो के अनुसार मानव शरीर में तीन दोष पहचाने गये हैं जिन्हें वात, पित, और कफ़ कहते हैं। स्वास्थ इन तीनों के उचित अनुपात पर निर्भर करता है। जब भी इन तीनों का आपसी संतुलन बिगड जाता है तो शरीर रोग ग्रस्त हो जाता है। रोग के लक्षणों को पहचान कर संतुलन का आँकलन किया जाता है और उपचार की क्रिया आरम्भ होती है। जीवन शैली को भी तीन श्रेणियों में रखा गया है जिसे सात्विक, राजसिक तथा तामसिक जीवन शैली की संज्ञा दी गयी है। आज के वैज्ञानिक तथा चिकित्सक दोनों ही इस वैदिक तथ्य को स्वीकार करते हैं कि जीवन शैली ही मानव को स्वस्थ अथवा अस्वस्थ बनाती है। आज कल इसे ‘लाईफ़ स्टाईल डिसीज़ ’ कहा जाता है। 
रोगों के उपचार के लिये कई प्रकार की जडी-बूटियों तथा वनस्पतियों का वर्णन अथर्व वेद तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में किया गया है। अथर्व वेदानुसार जल में सभी औषधियां समाई हुई हैं और आज भी लगभग सभी औषधियाँ जल के साथ तरल रूप में ही प्रयोग करी जाती हैं।
शल्य चिकित्सा
भले ही यह आस्था की बातें हैं परन्तु गणेश के मानवी शरीर पर हाथी का सिर, वराह अवतार के मानवी शरीर पर जंगली सुअर का सिर, नरसिहं अवतार के मानवी शरीर पर सिहं का सिर साक्षी हैं कि अंग प्रत्यारोपण के लिये भारत के चिकित्सकों को वैचारिक प्रेरणा तो आदि काल से ही मिल चुकी थी। गौतम ऋषि दूारा शापित इन्द्र को सामान्य करने के लिये बकरे के अण्डकोष भी लगाये गये थे। उल्लेख है कि भगवान शिव ने प्रजापति दक्ष के धड पर प्रतीक स्वरूप बकरे का सिर लगा कर उसे जीवन दान दे दिया था।
वास्तव में पराचीन भारतीय चिकित्सिक भी उपचार में अत्यन्त अनुभवी तथा अविष्कारक थे। वह रुग्ण अंगों को काट कर दूसरे अंगों का प्रत्यारोपण कर सकते थे, गर्म तेल और कप आकार की पट्टी से रक्त स्त्राव को रोक सकते थे। उन्हों ने कई प्रकार के शल्य यन्त्रों का निर्माण भी किया था तथा शिक्षार्थियों को सिखाने के लिये लाक्ष या मोम को किसी पट पर फैला कर शल्य क्रिया का अभ्यास करवाया जाता था। इस के अतिरिक्त सब्ज़ियों  तथा मृत पशुओं पर भी शल्य चिकित्सा के लिये प्रयोगात्मिक अभ्यास करवाये जाते थे। भारतीय शल्य चिकित्सा चीन, श्रीलंका तथा  दक्षिण पूर्व ऐशिया के दूीपों में भी फैल गयी थी।
शरीरिक ज्ञान
अंग विज्ञान चिकित्सा विज्ञान का आरम्भ है। ईसा से छटी शताब्दी पूर्व ही भारतीय चिकित्सकों नें स्नायु तन्त्र आदि का पूर्ण ज्ञान उल्लेख कर दिया था। उन्हें पाचन प्रणाली, उस के विभिन्न पाचक द्रव्यों तथा भोजन के दूारा पौष्टिक तत्वों और रक्त के निर्माण की पूर्ण जानकारी थी।
ऋषि पिपलाद कृत ‘गर्भ-उपनिष्द’ के अनुसार मानव शरीर में 180 जोड, 107 मर्मस्थल, 109 स्नायुतन्त्र, और 707 नाडियाँ, 360 हड्डियाँ, 500 मज्जा (मैरो) तथा 4.5 करोड सेल होते हैं। हृदय का वजन 8 तोला, जिव्हा का 12 तोला और यकृत (लिवर) का भार ऐक सेर होता है। स्पष्ट किया गया है कि यह मर्यादायें सभी मानवों में ऐक समान नहीं होतीं क्यों कि सभी मानवों की भोजन ग्रहण करने और मल-मूत्र त्यागने की मात्रा भी ऐक समान नहीं होती। 
ईसा से पाँच सौ वर्ष पूर्व भारतीय चिकित्सकों ने संतान नियोजन का वैज्ञानिक ज्ञान उल्लेख कर दिया था। उन के मतानुसार मासिक स्त्राव के प्रथम बारह दिनों में गर्भ नहीं ठहरता। गर्भ-उपनिष्द में गर्भ तथा भ्रूण विकास सम्बन्धी जो समय तालिका दी गयी है वह आधुनिक चिकित्सा ज्ञान के अनुकूल है। कई प्रकार के आहार और उपचार जन्म से पूर्व लिंग परिवर्तन सें सक्षम बताये गये हैं। ऐक अन्य ‘त्रिशिख-ब्राह्मणोपनिष्द’ में तो शरीरिक मृत्यु समय के लक्षण भी आलेखित किये गये हैं जैसे कि प्राकृतिक मुत्यु काल से पूर्व संवेदनायें शरीर से समाप्त होने लगती है। ऐक वर्ष पूर्व – पैरों के तलवों तथा हाथ पाँव के अंगूठों से, छः मास पूर्व – हाथ की कलाईयों तथा पाँव के टखनों से, एक मास पूर्व – हाथ की कोहनियों से, एक पखवाडा पूर्व – आँखों से संवेदनायें नष्ट हो जाती हैं। स्वाभाविक मृत्यु से दस दिन पूर्व – भूख पूर्णत्या नष्ट हो जाती है, पाँच दिन पूर्व – नेत्र ज्योति में जूगनु की चमक जितनी क्षमता रह जाती है, तीन दिवस पूर्व – अपनी ही नासिका की नोक दिखाई नहीं पडती और दो दिवस पूर्व – आँखों के सामने ज्योति दिखाई देनी बन्द हो जाती है। कोई चिकित्सक चाहे तो उपरोक्त आलेखों की सत्यता को आज भी आँकडे इकठ्ठे कर के परख सकता है।
जडी बूटी उपचार 
भारत में कई प्रकार के धातु तथा उन के मिश्रण, रसायन और वर्क आदि भी औषधि के तौर पर प्रयोग किये जाते थे। भारतीय चिकित्सा का ज्ञान मध्यकाल में अरब वासियों के माध्यम से योरूप गया। कीकर बबूल की गोंद लगभग दो हजार वर्ष से घरेलू उपचार की भाँति कई रोगों के निवार्ण में प्रयोग की जाती रही है। गुगल का प्रयोग ईसा से 600 वर्ष पूर्व मोटापा, गंठिया, तथा अन्य रोगों का उपचार रहा है। पुर्तगालियों ने भी कई भारतीय उपचार अपनाये जिन में त्वचा के घावों को भरने और उन्हें ठंडा रखने के लिये घावों पर हल्दी का लेप करना मुख्य था। चूलमोगरा की छाल, हरिद्रा तथा पृश्निपर्णीः कुष्ट रोग का पूर्ण निवारण करने में सक्षम हैं। भृंगशिराः (क्षयरोग), रोहणिवनस्पति (घाव भरने के लिये), कैथ (वीर्य वृद्धि के लिये) तथा पिप्पली क्षिप्त वात रोग निवारण के साथ सभी रोगों को नष्ट कर के प्राणों को स्थिर रखने में समर्थ औषधि है। भारत के प्राचीन उपचार आज भी सफलता के कारण पाश्चात्य चिकित्सकों के मन में भारतीय चिकित्सा पद्धति के प्रति ईर्षा का कारण बने हुये हैं।  
हिपनोटिजम की उत्पति
हिपनोटिजम की उत्पति भी भारत में ही हुयी थी। हिन्दू अपने रोगियों को मन्दिरों मे भी ले जाते थे जहाँ विशवास के माध्यम से वह रोग निवृत होते थे। आज कल इसी पद्धति को फेथ-हीलिंग कहा जाता है। बौध भिक्षु इस पद्धति को भारत से चीन और जापान आदि देशों में ले कर गये थे।
प्राचीन भारत के चिकित्साल्य
इतिहासकार विन्संट स्मिथ के मतानुसार योरूप में अस्पतालों का निर्माण दसवीं शताब्दी में हुआ किन्तु सर्व प्रथम भारतीयों नें जन साधारण के लिये चिकित्साल्यों का निर्माण किया था जो राजकीय सहायता और धनिकों के निजि संरक्षण से चलाये जाते थे। रोगियों की सेवा सर्वोत्तम सेवा समझी जाती थी। चीनी पर्यटक फाह्यान के पाटलीपु्त्र के उल्लेख के अनुसार – वहाँ कई निर्धन रोगी अपने उपचार के लिये आते थे जिन को चिकित्सक ध्यान पूर्वक देखते थे तथा उन के भोजन तथा औषधि की देख भाल करी जाती थी। वह निरोग होने पर ही विसर्जित किये जाते थे। 
स्वास्थ तथा चिकित्सा के सामाजिक नियम  
भारतीय समाज में पौरुष की परीक्षा विवाह से पूर्व अनिवार्य थी। मनु समृति में तपेदिक, मिर्गी, कुष्टरोग, तथा तथा सगोत्र से विवाह सम्बन्ध वर्जित किया गया है। 
छुआछुत का प्रचलन भी स्वास्थ के कारणों से जुडा है। अदृष्य रोगाणु रोग का कारण है यह धारणा भारतीयों में योरूप वासियों से बहुत काल पूर्व ही विकसित थी। आधुनिक मेडिकल विज्ञान जिसे ‘जर्म थियोरी’ कहता है वह शताब्दियों पूर्व ही मनु तथा सुश्रुत के विधानों में प्रमाणिक्ता पा चुकी थी। इसीलिये हिन्दू धर्म के सभी विधानों सें शरीर, मन, भोजन तथा स्थल की सफाई को विशेष महत्व दिया गया है।
मनुसमृति में सार्वजनिक स्थानों को गन्दा करने वालों के प्रति मानवीय भावना रखते हुये केवल चेतावनी दे कर छोड देने का विधान है परन्तु मनु महाराज ने अयोग्य झोला छाप चिकित्सकों को दण्ड देने का विधान भी इस प्रकार उल्लेखित कर दिया थाः-
       आपद्गतो़तवा वृद्धा गर्भिणी बाल एव वा।
       परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः।।
       चिकित्सकानां सर्वेषां मिथ्या प्रचरतां दमः।
       अमानुषेषु प्रथमो मानषेषु तु मध्यमः।। (मनु स्मृति 9- 283-284)
जो किसी प्रकार के रोग आदि आपत्तियों में फंसा हो, अथवा वृद्धा, गर्भिणी स्त्री, बालक, यदि रास्ते में मल आदि का उत्सर्ग करें तो वह दण्डनीय नहीं हैं। उन को केवल प्रतारण मात्र कर के उन से मलादि को रास्ते से साफ करा दें, यही शास्त्रीय व्यवस्था है। वैद्यक शास्त्र के बिना अध्यन किये झूठे वैद्य हो कर विचरने वालों को, जो पशुओं की चिकित्सा में अयोग्य हों उन्हें प्रथम साहस, मनुष्यों के चिकित्सा में अयोग्य हों तो मध्यम साहस का दण्ड दें। 
भारत में पशु चिकित्सा
सम्राट अशोक ने जन साधरण के अतिरिक्त पशु पक्षियों के उपचार के लिये भी चिकित्साल्यों का प्रावधान किया था। पशु पक्षियों के उपचार की राजकीय व्यवस्था करी गयी थी जिस के फलस्वरूप भारत में पशु उपचार मानव उपचार की तरह ऐक स्वतन्त्र प्रणाली की तरह विकसित हुआ। पशु चिकित्सा के लिये प्रथक चिकित्साल्य और विशेषज्ञ थे। अश्वों तथा हाथियों के उपचार से सम्बन्धित कई मौलिक ग्रंथ उपलब्ध हैं -  
  • विष्णु धर्महोत्रः महापुराण में पशुओं के उपचार में दी जाने वाली प्राचीनतम औषधियों का वर्णन है।
  • पाल्कयामुनि रचित हस्तार्युर् वेद का उल्लेख यूनानी राजदूत मैगस्थनीज़ ने भी किया है और लिखा है कि विशेष उपचार से हाथियों की आयु भी बढायी जाती थी।
  • शालिहोत्रः उच्च कोटि के अश्वों की प्रजनन व्यव्स्था के विशेषज्ञ थे।
  • अश्व वैद्य ग्रंथ के रचिता हिप्पित्रेय जुदुदत्ता नें गऊओं के उपचार के बारे में विस्तरित  विवरण दिये हैं।
पाश्चात्य संसार के महान यूनानी दार्शनिक अरस्तु का काल ईसा से लगभग 350 वर्ष पूर्व का है। किन्तु भारत की उच्च चिकित्सा पद्धति की तुलना में उन के मतानुसार पक्षियों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था। ऐक वह जिन में रक्तप्रणाली थी तथा दुसरे पक्षी रक्तहीन माने गये थे। क्या वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा सम्भव हो सकता है। इस की तुलना मनुस्मृति में समस्त पशु पक्षियों का उन के जन्म के आधार पर, शरीरिक अंगों के अनुसार तथा उन की प्रकृति के अनुसार विस्तरित ढंग से वर्गीकरण कर के जीवन श्रंखला लिखी गयी है। इस के अतिरिक्त वाल्मीकि रामायण में भी समस्त प्राणियों की परिवार श्रंखला उल्लेख की गयी है।
भारतीय ऋषियों तथा विशेषज्ञ्यों के प्राणी वर्गीकरण को केवल इसी आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि उन का वर्गीकरण पाश्चात्य  विशेषज्ञो के परिभाषिक शब्दों के अनुकूल नहीं है। भारतीय वर्गीकरण पूर्णत्या मौलिक तथा वैज्ञानिक है तथा हर प्रकार के संशय का निवारण करने में सक्षम है।
वर्तमान युग में भी स्वामी रामदेव प्राचीन भारतीय योग एवम चिकित्सा पद्धति का डंका विश्व पटल पर बजवा चुके हैं किन्तु व्यवसायिक स्वार्थों के कारण पाश्चात्य विशेषज्ञ्य और कुछ स्वार्थी भारतीय चिकित्सक उन का विरोध करने में जुटे हैं। भारतीय चिकित्सा पद्धति का पुर्नोदय चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में ऐक शुभ संकेत है।
साभार : चाँद शर्मा

Friday, August 10, 2012

केंद्र सरकार का हिन्दुओ के साथ अन्याय

* हिन्दुओ की जनसँख्या का प्रतिशत कम करने के लिए मुसलमानों को चार चार शादी करने का अधिकार, जबकि उच्चतम न्यायालय कई बार देश के सभी नागरिको के लिए सामान नागरिक संहिता बनाने का आदेश दे चुका हैं.

* शिक्षा संस्थाओं में हिन्दुओ को धार्मिक शिक्षा देने पर  पाबंदी, किन्तु गैर हिन्दुओ को स्वतंत्रता. इसकी व्यवस्था भारत के संविधान की धारा २०, २९ और तीस में कर दी गयी हैं. इतना ही नहीं सोनिया गांधी की सरकार तो इस्लामी शिक्षा एवं कट्टरवाद को बढ़ावा देने के लिए अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पांच शाखाए खोल रही हैं. इसके अतिरिक्त इस्लामी मदरसों को अत्याधिक धन आवंटन भारत सरकार द्वारा किया जा रहा हैं.

* गैर हिन्दुओ के लिए अल्पसंख्यक आयोग, जो अनेक  संवेदनशील मामलो पर हिंदू विरोधी, और अल्पसंख्यको के प्रति पक्षपात करता हुआ अनेक प्रकार से काम करता हैं.

* भारत में हिन्दुओ को नकारते हुए मुसलमानों की आर्थिक शक्ति को अधिक बढाने के लिए सरकारी खजाना लुटाया जा रहा हैं. हर चीज में छूट दी जा रही हैं. ३ प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण दिया जा रहा हैं. जोकि कभी वापिस नहीं होगा. इस प्रकार गैर हिन्दुओ के मुकाबले में हिंदू उद्योग और व्यवसाय में पिछड रहे हैं. गैर हिन्दुओ को आर्थिक  सहायता और उन्नति के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और वित्त निगम का निर्माण किया गया हैं.

* सोनिया सरकार द्वारा केवल गैर हिन्दुओ के हित साधने के लिए एक अलग अल्पसंख्यक  मंत्रालय भी बना दिया गया हैं. जिसमे मुख्य रूप से मुसलमानों को आर्थिक  सहायता देने के लिए योजनाये बनायी गयी हैं.

* दक्षिण भारत के सभी विशाल हिंदू मंदिरों का प्रबंधन सरकार द्वारा अपने हाथ में लिया ज चुका हैं. और इन मंदिरों की आय का आधे से अधिक धन ईसाई, और मुस्लिम संस्थाओं में बांटा जा रहा हैं.

* भारत सरकार द्वारा मुसलमानों को हज यात्रा के लिए करोडो रूपये सरकारी कोष से दिए जाते हैं.जबकि संसार का कोई भी अन्य देश यंहा तक की सउदी अरब और पाकिस्तान भी हज यात्रा के लिए धन नहीं देता हैं. भारत में ये हिंदू करदाता पर एक दंड हैं.

* अल्पसंख्यक मंत्रालय व प्रधानमन्त्री की १५ सूत्री योजनाओं के द्वारा ईसाई व मुस्लिम आदि के बच्चो को अरबो रूपये छात्रवृत्ति दी जाती हैं. किन्तु हिंदू बच्चो को अधिक अंक लाने पर भी उससे वंचित रखा जाता हैं. 

* केंद्र सरकार ने अपने एक फैसले में यह निर्णय  लिया हैं की मुस्लिम क्षेत्रो में केवल मुस्लिम सिपाही व दरोगा तैनात होगे.

यह सब इस लिए हो रहा हैं की हिंदू अपने ऊपर हो रहे अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते हैं. जबकि भारत सरकार को जो कर प्राप्त हो रहा हैं वह ९९ प्रतिशत हिन्दुओ के द्वारा ही दिया जा रहा हैं.

धन्यवाद, वन्देमातरम

साभार : पांचजन्य, डा. कैलाशचंद्र 

मॉरीशस में 'राम-राम'


भारत से सैकड़ों किलोमीटर दूर अफ्रीका महाद्वीप के किसी देश में यदि लोग आपसे 'राम-राम' या 'ॐ नम: शिवाय' कहकर अभिवादन करें तो आपको कैसा लगेगा? अपनी पहली यात्रा में मॉरीशस आकर कभी लगा ही नहीं कि मैं भारत से बहुत दूर आ गया हूं। वही भारतीय वेशभूषा, वही खान-पान, वही रीति-व्यवहार, वही पूजा-पद्धति, वही मंदिर और धर्म के प्रति वही अगाध आस्था।




भौगोलिक दृष्टि से हमसे बहुत दूर, लेकिन भावनात्मक लिहाज से बेहद निकट। मॉरीशस के सर शिवसागर रामगुलाम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने के बाद ही भारत तथा हिंदुत्व के प्रति सहज अपनत्व के दर्शन होने लगते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कुछ साल पहले कितनी सटीक टिप्पणी की थी कि हिंद महासागर भारत और मॉरीशस को अलग नहीं करता, उन्हें जोड़ता है।

सच कहा जाए तो इस भावनात्मक संबंध की मिसाल आपको दिल्ली से रवाना होते ही मिल जाती है। विमान में अपने आसपास देखने पर हाथों में लंबे-लंबे चूड़े पहने नवविवाहिता युवतियों को देखना दूसरे देशों के यात्रियों के लिए कौतूहल का विषय हो जाता है। भारत में मॉरीशस को एक रूमानी, खूबसूरत और 'अपने से' देश के रूप में अच्छा प्रचार मिला है जिसने उसे नवविवाहित जोड़ों की नंबर एक पसंद बना दिया है। सुंदर समुद्रतट, एकांत, हरियाली, सुहाना मौसम और सीधे-सरल लोग इन प्रेमी जोड़ों को निराश नहीं करते। मॉरीशस में भारतीय भोजन खूब मिलता है, फिर भले ही आपको उत्तर भारतीय भोजन पसंद हो या दक्षिण भारतीय।

हालांकि मॉरीशस के अधिकांश मार्गों, आवासीय कालोनियों, गांवों आदि के नाम फ्रेंच भाषा में हैं, लेकिन यदा-कदा हिंदी नाम भी सुनाई दे जाते हैं, जैसे- अप्रवासी घाट, गंगा तलाब, शिवसागर मन्दिर आदि-आदि। लोग आपसी बातचीत में क्रियोल भाषा का प्रयोग करते हैं जो फ्रेंच, अफ्रीकी, भोजपुरी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के शब्दों का अनोखा मिश्रण है। लेकिन भारतीय मूल के अधिकांश लोग हिंदी समझते हैं। मॉरीशस आकर कुछ-ऐसा लगा, जैसे दक्षिण भारत के किसी स्थान पर हैं जहां लोग हिंदी बोल भले ही न रहे हों, समझ सब रहे हैं। हालांकि यह स्थिति अब थोड़ी-थोड़ी बदलने लगी है और अपनी जड़ों से जुड़ने की चाह में लोग हिंदी सीख रहे हैं। इन लोगों के लिए भारत से आने वाला हर पर्यटक अपने निजी अतिथि जैसा है। वे कोशिश करते हैं कि उनके माध्यम से भारत को जितना जान सकें, जान लें। अनजान लोगों के बीच अचानक बह उठने वाली अपनेपन की यह धारा पहले-पहले एक सुखद आश्चर्य जैसी प्रतीत होती है लेकिन कुछ समय बाद अहसास होता है कि हिंदी, हिंदू, हिन्दुस्थान के प्रति मॉरीशस के समाज का लगाव कोई कृत्रिम या दिखावटी नहीं है। वह एक स्वाभाविक प्रकृति है, उन लोगों की जिन्होंने अपने पुरखों के मूल राष्ट्र और उनकी महान संस्कृति के बारे में सुना और पढ़ा तो बहुत है, किंतु उसे प्रत्यक्ष अनुभव करने का सौभाग्य नहीं पा सके। वे इस टूटी हुई कड़ी को जोड़ने की भावुकतापूर्ण कोशिश करते हुए प्रतीत होते हैं। इसलिए मॉरीशस की यात्रा भारतीयों के लिए एक भावनात्मक तीर्थयात्रा जैसी बन जाती है।

दिल्ली से लगभग डेढ़ गुना आकार का छोटा सा और बेहद खूबसूरत मॉरीशस हिंद महासागर के सुदूर पश्चिमी छोर पर दक्षिण अफ्रीका और मेडागास्कर जैसे देशों के पड़ोस में हमारी संस्कृति का अद्भुत केंद्र बन कर उभर रहा है। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों द्वारा भारत से मॉरीशस ले जाए गए कुलियों ने, जिन्हें बहुधा गिरमिटिया मजदूर कहकर संबोधित किया जाता है, अत्यंत विषम सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक परिस्थितियों के बावजूद अपनी हिंदू पहचान और अपनी सांस्कृतिक विरासत को विलुप्त नहीं होने दिया। उनके बाद की पीढ़ियों ने, जिनका आज मॉरीशस की राजनीति और समाज में दबदबा है, अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को और प्रगाढ़ बनाया है।

मॉरीशस की जनसंख्या में लगभग 52 प्रतिशत हिन्दू हैं। अफ्रीका महाद्वीप में सबसे ज्यादा। जाहिर है, स्थानीय राजनीति, समाज और संस्कृति पर उनकी प्रधानता होगी ही। मॉरीशस में धार्मिक आस्था के स्तर पर एक किस्म का नवजागरण चल रहा है, जिसके पीछे कई हिंदू संगठनों की दशकों की मेहनत छिपी है। इन संगठनों में हिंदू स्वयंसेवक संघ, हिंदू महासभा, विश्व हिंदू परिषद, मॉरीशस सनातन धर्म मंदिर संघ, मॉरीशस आर्य सभा, आर्य समाज, सनातन धर्म प्रचारिणी सभा, मॉरीशस तमिल मंदिर संघ, मॉरीशस आंध्र सभा, मॉरीशस मराठी मंडली संघ आदि का जिक्र खास तौर पर होता है। हिंदू स्वयंसेवक संघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मॉरीशस चौप्टर के रूप में संघ की विचारधारा तथा काम को आगे बढ़ाने में जुटा है। मॉरीशस में चिन्मय मिशन, माता अमृतानंदमयी आश्रम, रामकृष्ण मिशन, इस्कान और ब्रह्माकुमारी आश्रम आदि की भी शाखाएं हैं जिन्होंने यहां के सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित किया है।

मॉरीशस को अंग्रेजों की पराधीनता से मुक्ति 1968 में मिली थी। इससे पहले वहां मिशनरियों के हाथों आर्थिक दृष्टि से जर्जर हिंदुओं के मतांतरण की प्रक्रिया जोरों से चल रही थी। आजादी के बाद हिंदू समाज के बीच इसकी व्यापक प्रतिक्रिया शुरू हुई और उसने जनजीवन के विभिन्न क्षेत्रों में एकजुट होने की जरूरत महसूस की।
भारतवंशी संगठनों की ही कोशिशों का परिणाम है यहां मंदिरों की संख्या का बढ़ना तथा हिंदू धार्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा उत्सवों में लोगों की भागीदारी का बढ़ना। महाशिवरात्रि मॉरीशस का सबसे बड़ा त्योहार है जब नौ दिन तक यहां का सारा वातावरण शिवमय हो जाता है। इसे भारत के अतिरिक्त शेष विश्व में हिंदुओं का सबसे बड़ा धार्मिक संगम माना जाता है। इस मौके पर हिंदू ही नहीं बल्कि गैर-हिंदू तथा मॉरीशस के लोग ही नहीं बल्कि आसपास के कई देशों से हिंदू इकट्ठे होते हैं। गणेश चतुर्थी, दीपावली और कवाड़ी जैसे पर्व भी बड़े उत्साह के साथ मनाए जाते हैं और तब ऐसा लगता है कि भारत से दूर इस छोटे भारत की बड़ी आबादी अपने पितृराष्ट्र के साथ धार्मिक तथा आध्यात्मिक स्तर पर एकाकार हो गई है।

मुझे मॉरीशस के प्रसिद्ध गंगा तालाब के दर्शन करने का अवसर मिला जो महाशिवरात्रि महोत्सव का केंद्रीय स्थल है। गंगा तालाब जाने से पहले मार्ग में खुले आसमान के नीचे 108 फुट ऊंची मंगल महादेव की विशाल, भव्य और दिव्य मूर्ति के दर्शन होते हैं। यह वड़ोदरा की सुरसागर झील में स्थापित शिव प्रतिमा की सटीक प्रतीत  है।  मॉरीशस में गंगा तालाब का दर्जा लगभग वही है जो भारत में पवित्र गंगा नदी का है। गंगा तलाब में भगवान शिव मंदिर के साथ-साथ और भी कई मंदिर हैं। इसके पवित्र जल में शिवजी, हनुमान जी, गणेश जी, मां दुर्गा आदि की प्रतिमाएं भी          स्थापित हैं।

संयोगवश, मॉरीशस के हिंदुओं में शैवों की संख्या सर्वाधिक है। यही वजह है कि यहां शिवजी के मन्दिरों की बहुतायत है। मॉरीशस के उत्तरी भाग में स्थित महेश्वरनाथ मन्दिर जो ट्रायोलेट शिवाला के नाम से भी चर्चित है, भी गंगा तालाब से कम प्रसिद्ध नहीं है। वास्तव में यह मंदिर दो सदियों से मॉरीशस में हिंदू पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक है।

पूर्वी मॉरीशस में एक मनोरम द्वीप पर अत्यंत दर्शनीय सागर शिव मंदिर है। चारों तरफ से आती समुद्री लहरों और समुद्री हवाओं के बीच फहराता हुआ सागर शिव मंदिर का ध्वज मानो उद्घोष कर रहा हो कि मॉरीशस में भारतीयता और अध्यात्म की कीर्ति पताका हमेशा ऊंची रहेगी। मॉरीशस के मंदिरों की एक खास बात है। भले ही मंदिर का प्रधान देवता कोई भी हो, दर्जनों दूसरे देवताओं की मूर्तियां भी रहेंगी। ऐसा इसलिए ताकि हर आस्था के व्यक्ति को अपने आराध्य के दर्शन हो जाएं। वैसे यहां के भारतवंशियों के घरों में भी मंदिर होना अनिवार्य है और ये मंदिर हैं हनुमान जी के।

इसी प्रकार उत्तर भारतीय पृष्ठभूमि वाले हिंदुओं के संगठन, मंदिर आदि हिंदी के साथ जुड़ाव महसूस करते हैं। करीब तीन सौ हिंदीभाषी मंदिरों का एक अलग संगठन भी है, जिसका नाम है- सनातन धर्म मंदिर संगठन। कई मंदिरों में हिंदी की प्राथमिक कक्षाएं लगती हैं जिनमें नन्हें बच्चों को हिंदी अक्षरज्ञान कराया जाता है। हिंदी से जुड़े कई साहित्यिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक आयोजन भी यहां होते हैं। हिंदी भाषियों के लिए सामुदायिक गतिविधियों का केंद्र बन रहे ये मंदिर धार्मिक दायित्व निभाने के साथ-साथ भाषाओं के प्रसार को भी अपना उद्देश्य मानकर चलते हैं। हालांकि अमरीका, कनाडा, इंग्लैंड आदि देशों में भी मंदिर भारतीयों की सांस्कृतिक और भाषायी गतिविधियों के केंद्र बन रहे हैं, लेकिन मॉरीशस के मंदिर जिस सुनियोजित ढंग से भाषा शिक्षण से जुड़े हैं, उसका प्रत्यक्ष अनुभव करना बहुत सुखद लगा।

इस बीच, मॉरीशस में तमिल मंदिरों (कोविल) की संख्या तेजी से बढ़ी है। हिंदी भाषियों की ही तरह तमिल भाषी लोगों के मंदिरों का संगठन भी आ गया है।

साभार : बालेंदु शर्मा दाधीच, पांचजन्य 

Wednesday, August 8, 2012

सभी भारतीय एक पुरखों की संतान विज्ञान ने भी आर्य-द्रविड़ के भेद को नकारा



सदियों से भारतीय इतिहास पर छायी आर्य आक्रमण सम्बन्धी झूठ की चादर को विज्ञान की खोज ने एक झटके में ही तार-तार कर
दिया है।

विज्ञान की आंखों ने जो देखा है उसके अनुसार तो सच यह है कि आर्य आक्रमण नाम की चीज न तो भारतीय इतिहास के किसी कालखण्ड में घटित हुई और ना ही आर्य तथा द्रविड़ नामक दो पृथक मानव नस्लों का अस्तित्व ही कभी धरती पर रहा है।

इतिहास और विज्ञान के मेल के आधार पर हुआ यह क्रांतिकारी जैव-रासायनिक डीनएनए गुणसूत्र आधारित अनुसंधान फिनलैण्ड के तारतू विश्वविद्यालय, एस्टोनिया में हाल ही में सम्पन्न हुआ है।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉं. कीवीसील्ड के निर्देशन में एस्टोनिया स्थित एस्टोनियन बायोसेंटर, तारतू विश्वविद्यालय के शोधछात्र ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने अनुसंधान में यह सिध्द किया है कि सारे भारतवासी जीन अर्थात गुणसूत्रों के आधार पर एक ही पूर्वजों की संतानें हैं, आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्रों के आधार पर नहीं मिलता है, और तो और जो अनुवांशिक गुणसूत्र भारतवासियों में पाए जाते हैं वे डीएनए गुणसूत्र दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं पाए गए।

शोधकार्य में अखण्ड भारत अर्थात वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और नेपाल की जनसंख्या में विद्यमान लगभग सभी जातियों, उपजातियों, जनजातियों के लगभग 13000 नमूनों के परीक्षण-परिणामों का इस्तेमाल किया गया। इनके नमूनों के परीक्षण से प्राप्त परिणामों की तुलना मध्य एशिया, यूरोप और चीन-जापान आदि देशों में रहने वाली मानव नस्लों के गुणसूत्रों से की गई।

इस तुलना में पाया गया कि सभी भारतीय चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाले हैं, 99 प्रतिशत समान पूर्वजों की संतानें हैं। भारतीयों के पूर्वजों का डीएन गुणसूत्र यूरोप, मध्य एशिया और चीन-जापान आदि देशों की नस्लों से बिल्कुल अलग है और इस अन्तर को स्पष्ट पहचाना जा सकता है ।

जेनेटिक हिस्ट्री ऑफ साउथ एशिया

ज्ञानेश्वर चौबे को जिस बिन्दु पर शोध के लिए पीएच.डी. उपाधि स्वीकृत की गई है उसका शीर्षक है- 'डेमॉग्राफिक हिस्ट्री ऑफ साउथ एशिया: द प्रिवेलिंग जेनेटिक कांटिनिटी फ्रॉम प्रीहिस्टोरिक टाइम्स' अर्थात 'दक्षिण एशिया का जनसांख्यिक इतिहास: पूर्वऐतिहासिक काल से लेकर अब तक की अनुवांशिकी निरंतरता'। संपूर्ण शोध की उपकल्पना ज्ञानेश्वर के मन में उस समय जागी जब वह हैदराबाद स्थित 'सेन्टर फॉर सेल्यूलर एंड मोलेक्यूलर बायोलॉजी' अर्थात सीसीएमबी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के ख्यातलब्ध भारतीय जैव वैज्ञानिक डॉ. लालजी सिंह और डॉ के. थंगराज के अन्तर्गत परास्नातक बाद की एक शोधपरियोजना में जुटे थे।

ज्ञानेश्वर के मन में विचार आया कि जब डीएनए जांच के द्वारा किसी बच्चे के माता-पिता के बारे में सच्चाई का पता लगाया जा सकता है तो फिर भारतीय सभ्यता के पूर्वज कौन थे, इसका भी ठीक-ठीक पता लगाया जा सकता है। बस फिर क्या था, उनके मन में इस शोधकार्य को कर डालने की जिद पैदा हो गई। ज्ञानेश्वर बताते हैं-बचपन से मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि हमारे पूर्वज कौन थे? बचपन में जो पाठ पढे़, उससे तो भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी कि क्या हम आक्रमणकारियों की संतान हैं? दूसरे एक मानवोचित उत्सुकता भी रही। आखिर प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी तो यह जानने की उत्सुकता पैदा होती ही है कि उसके परदादा-परदादी कौन थे, कहां से आए थे,उनका मूलस्थान कहां है और इतिहास के बीते हजारों वर्षों में उनके पुरखों ने प्रकृति की मार कैसे सही, कैसे उनका अस्तित्व अब तक बना रहा है? ज्ञानेश्वर के अनुसार, पिछले एक दशक में मानव जेनेटिक्स और जीनोमिक्स के अध्ययन में जो प्रगति हुई है उससे यह संभव हो गया है कि हम इस बात का पता लगा लें कि मानव जाति में किसी विशेष नस्ल का उद्भव कहां हुआ, वह उद्विकास प्रक्रिया में दुनिया के किन-किन स्थानों से गुजरी, कहां-कहां रही और उनके मूल पुरखे कौन रहे हैं?

उनके अनुसार- माता और पिता दोनों के डीएनए में ही उनके पुरखों का इतिहास भी समाया हुआ रहता है। हम जितनी गहराई से उनके डीएनए संरचना का अध्ययन करेंगे, हम यह पता कर लेंगे कि उनके मूल जनक कौन थे? और तो और इसके द्वारा पचासों हजार साल पुराना अपने पुरखों का इतिहास भी खोजा जा सकता है।

कैंब्रिज के डॉ. कीवीसील्ड ने किया शोध निर्देशन

हैदराबाद की प्रयोगशाला में शोध करते समय उनका संपर्क दुनिया के महान जैव वैज्ञानिक प्रोफेसर कीवीसील्ड के साथ आया। प्रो. कीवीसील्ड संसार में मानव नस्लों की वैज्ञानिक ऐतिहासिकता और उनकी बसावट पर कार्य करने वाले उच्चकोटि के वैज्ञानिक माने जाते हैं। इस नई सदी के प्रारंभ में ही प्रोफेसर कीवीसील्ड ने अपने अध्ययन में पाया था कि दक्षिण एशिया की जनसांख्यिक संरचना अपने जातीय एवं जनजातीय स्वरूप में न केवल विशिष्ट है वरन् वह शेष दुनिया से स्पष्टत: भिन्न है। संप्रति प्रोफेसर डॉ. कीवीसील्ड कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बायोसेंटर का निर्देशन कर रहे हैं।

प्रोफेसर डॉ. कीवीसील्ड की प्रेरणा से ज्ञानेश्वर चौबे ने एस्टोनियन बायोसेंटर में सन् 2005 में अपना शोधकार्य प्रारंभ किया। और देखते ही देखते जीवविज्ञान सम्बंधी अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध जर्नल्स में उनके दर्जनों से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हो गए। इसमें से अनेक शोध पत्र जहां उन्होंने अपने गुरूदेव प्रोफेसर कीवीसील्ड के साथ लिखे वहीं कई अन्य शोधपत्र अपने उन साथी वैज्ञानिकों के साथ संयुक्त रूप से लिखे जो इसी विषय से मिलते-जुलते अन्य मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

अपने अनुसंधान के द्वारा ज्ञानेश्वर ने इसके पूर्व हुए उन शोधकार्यों को भी गलत सिद्ध किया है जिनमें यह कहा गया है कि आर्य और द्रविड़ दो भिन्न मानव नस्लें हैं और आर्य दक्षिण एशिया अर्थात् भारत में कहीं बाहर से आए। उनके अनुसार, 'पूर्व के शोधकार्यों में एक तो बहुत ही सीमित मात्रा में नमूने लिए गए थे, दूसरे उन नमूनों की कोशिकीय संरचना और जीनोम इतिहास का अध्ययन 'लो-रीजोलूशन' अर्थात न्यून-आवर्धन पर किया गया। इसके विपरीत हमने अपने अध्ययन में व्यापक मात्रा में नमूनों का प्रयोग किया और 'हाई-रीजोलूशन' अर्थात उच्च आवर्धन पर उन नमूनों पर प्रयोगशाला में परीक्षण किया तो हमें भिन्न परिणाम प्राप्त हुए।'

माइटोकांड्रियल डीएनए में छुपा है पुरखों का इतिहास ज्ञानेश्वर द्वारा किए गए शोध में माइटोकांड्रियल डीएनए और वाई क्रोमासोम्स और उनसे जुड़े हेप्लोग्रुप के गहन अध्ययन द्वारा सारे निष्कर्ष प्राप्त किए गए हैं। उल्लेखनीय है कि माइटोकांड्रिया मानव की प्रत्येक कोशिका में पाया जाता है। जीन अर्थात मानव गुणसूत्र के निर्माण में भी इसकी प्रमुख भूमिका रहती है। प्रत्येक मानव जीन अर्थात गुणसूत्र के दो हिस्से रहते हैं। पहला न्यूक्लियर जीनोम और दूसरा माइटोकांड्रियल जीनोम। माइटोकांड्रियल जीनोम गुणसूत्र का वह तत्व है जो किसी कालखण्ड में किसी मानव नस्ल में होने वाले उत्परिवर्तन को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है और वह इस उत्परिर्तन को आने वाली पीढ़ियों में सुरक्षित भी रखता है।

इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि माइटोकांड्रियल डीएनए वह तत्व है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक माता के पक्ष की सूचनाएं अपने साथ हूबहू स्थानांतरित करता है। यहां यह समझना जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति की प्रत्येक कोशिका में उसकी माता और उनसे जुड़ी पूर्व की हजारों पीढ़ियों के माइटोकांड्रियल डीएनए सुरक्षित रहते हैं।

इसी प्रकार वाई क्रोमोसोम्स पिता से जुड़ी सूचना को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित करते हैं। वाई क्रोमोसोम्स प्रत्येक कोशिका के केंद्र में रहता है और किसी भी व्यक्ति में उसके पूर्व के सभी पुरूष पूर्वजों के वाई क्रोमोसोम्स सुरक्षित रहते हैं। इतिहास के किसी मोड़ पर किसी व्यक्ति की नस्ल में कब और किस पीढ़ी में उत्परिवर्तन हुआ, इस बात का पता प्रत्येक व्यक्ति की कोशिका में स्थित वाई क्रोमोसोम्स और माइटोकांड्रियल डीएनए के अध्ययन से आसानी से लगाया जा सकता है। यह बात किसी समूह और समुदाय के संदर्भ में भी लागू होती है।

एक वंशवृक्ष से जुड़े हैं सभी भारतीय ज्ञानेश्वर ने अपने अनुसंधान को दक्षिण एशिया में रहने वाले विभिन्न धर्मों-जातियों की जनसांख्यिकी संरचना पर केंद्रित किया। शोध में पाया गया है कि तमिलनाडु की सभी जातियों-जनजातियों, केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश जिन्हें पूर्व में कथित द्रविड़ नस्ल से प्रभावित माना गया है, की समस्त जातियों के डीनएन गुणसूत्र तथा उत्तर भारतीय जातियों-जनजातियों के डीएनए का उत्पत्ति-आधार गुणसूत्र एकसमान है।

उत्तर भारत में पाये जाने वाले कोल, कंजर, दुसाध, धरकार, चमार, थारू, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के डीएनए का मूल स्रोत दक्षिण भारत में पाई जाने वाली जातियों के मूल स्रोत से कहीं से भी अलग नहीं हैं। इसी के साथ जो गुणसूत्र उपरोक्त जातियों में पाए गए हैं वहीं गुणसूत्र मकरानी, सिंधी, बलोच, पठान, ब्राहुई, बुरूषो और हजारा आदि पाकिस्तान में पाये जाने वाले समूहों के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं।



साभार : राकेश उपाध्याय, गौरी राय, फेसबुक