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Saturday, March 27, 2021

महाभारत में वर्णित ये पेंतीस नगर आज भी मौजूद हैं!

महाभारत में वर्णित ये पेंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

भारत देश महाभारतकाल में कई बड़े जनपदों में बंटा हुआ था। हम महाभारत में वर्णित जिन 35 राज्यों और शहरों के बारे में जिक्र करने जा रहे हैं, वे आज भी मौजूद हैं। आप भी देखिए।

1. गांधार,,,आज के कंधार को कभी गांधार के रूप में जाना जाता था। यह देश पाकिस्तान के रावलपिन्डी से लेकर सुदूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी वहां के राजा सुबल की पुत्री थीं। गांधारी के भाई शकुनी दुर्योधन के मामा थे।

2. तक्षशिला,,,तक्षशिला गांधार देश की राजधानी थी। इसे वर्तमान में रावलपिन्डी कहा जाता है। तक्षशिला को ज्ञान और शिक्षा की नगरी भी कहा गया है।

3. केकय प्रदेश,,, जम्मू-कश्मीर के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में केकय प्रदेश के रूप में है। केकय प्रदेश के राजा जयसेन का विवाह वसुदेव की बहन राधादेवी के साथ हुआ था। उनका पुत्र विन्द जरासंध, दुर्योधन का मित्र था। महाभारत के युद्ध में विन्द ने कौरवों का साथ दिया था।

4. मद्र देश,,,केकय प्रदेश से ही सटा हुआ मद्र देश का आशय जम्मू-कश्मीर से ही है। एतरेय ब्राह्मण के मुताबिक, हिमालय के नजदीक होने की वजह से मद्र देश को उत्तर कुरू भी कहा जाता था। महाभारत काल में मद्र देश के राजा शल्य थे, जिनकी बहन माद्री का विवाह राजा पाण्डु से हुआ था। नकुल और सहदेव माद्री के पुत्र थे।

5. उज्जनक,,,आज के नैनीताल का जिक्र महाभारत में उज्जनक के रूप में किया गया है। गुरु द्रोणचार्य यहां पांडवों और कौरवों की अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देते थे। कुन्ती पुत्र भीम ने गुरु द्रोण के आदेश पर यहां एक शिवलिंग की स्थापना की थी। यही वजह है कि इस क्षेत्र को भीमशंकर के नाम से भी जाना जाता है। यहां भगवान शिव का एक विशाल मंदिर है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह शिवलिंग 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है।

6. शिवि देश,,,महाभारत काल में दक्षिण पंजाब को शिवि देश कहा जाता था। महाभारत में महाराज उशीनर का जिक्र है, जिनके पौत्र शैव्य थे। शैव्य की पुत्री देविका का विवाह युधिष्ठिर से हुआ था। शैव्य एक महान धनुर्धारी थे और उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों का साथ दिया था।

7. वाणगंगा,,,कुरुक्षेत्र से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वाणगंगा। कहा जाता है कि महाभारत की भीषण लड़ाई में घायल पितामह भीष्म को यहां सर-सैय्या पर लिटाया गया था। कथा के मुताबिक, भीष्ण ने प्यास लगने पर जब पानी की मांग की तो अर्जुन ने अपने वाणों से धरती पर प्रहार किया और गंगा की धारा फूट पड़ी। यही वजह है कि इस स्थान को वाणगंगा कहा जाता है।

8. कुरुक्षेत्र,,,हरियाणा के अम्बाला इलाके को कुरुक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। यहां महाभारत की प्रसिद्ध लड़ाई हुई थी। यही नहीं, आदिकाल में ब्रह्माजी ने यहां यज्ञ का आयोजन किया था। इस स्थान पर एक ब्रह्म सरोवर या ब्रह्मकुंड भी है। श्रीमद् भागवत में लिखा हुआ है कि महाभारत के युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने यदुवंश के अन्य सदस्यों के साथ इस सरोवर में स्नान किया था।

9. हस्तिनापुर,,,महाभारत में उल्लिखित हस्तिनापुर का इलाका मेरठ के आसपास है। यह स्थान चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी थी। सही मायने में महाभारत युद्ध की पटकथा यहीं लिखी गई थी। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने हस्तिनापुर को अपने राज्य की राजधानी बनाया।

10. वर्नावत,,,यह स्थान भी उत्तर प्रदेश के मेरठ के नजदीक ही माना जाता है। वर्णावत में पांडवों को छल से मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह का निर्माण करवाया था। यह स्थान गंगा नदी के किनारे है। महाभारत की कथा के मुताबिक, इस ऐतिहासिक युद्ध को टालने के लिए पांडवों ने जिन पांच गांवों की मांग रखी थी, उनमें एक वर्णावत भी था। आज भी यहां एक छोटा सा गांव है, जिसका नाम वर्णावा है।

11. पांचाल प्रदेश,,,हिमालय की तराई का इलाका पांचाल प्रदेश के रूप में उल्लिखित है। पांचाल के राजा द्रुपद थे, जिनकी पुत्री द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। द्रौपदी को पांचाली के नाम से भी जाना जाता है।

12. इन्द्रप्रस्थ,,,मौजूदा समय में दक्षिण दिल्ली के इस इलाके का वर्णन महाभारत में इन्द्रप्रस्थ के रूप में है। कथा के मुताबिक, इस स्थान पर एक वियावान जंगल था, जिसका नाम खांडव-वन था। पांडवों ने विश्वकर्मा की मदद से यहां अपनी राजधानी बनाई थी। इन्द्रप्रस्थ नामक छोटा सा कस्बा आज भी मौजूद है।

13. वृन्दावन,,,यह स्थान मथुरा से करीब 10 किलोमीटर दूर है। वृन्दावन को भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं के लिए जाना जाता है। यहां का बांके-बिहारी मंदिर प्रसिद्ध है।

14. गोकुल,,यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह स्थान भी मथुरा से करीब 8 किलोमीटर दूर है। कंस से रक्षा के लिए कृष्ण के पिता वसुदेव ने उन्हें अपने मित्र नंदराय के घर गोकुल में छोड़ दिया था। कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम गोकुल में साथ-साथ पले-बढ़े थे।

15. बरसाना,,,यह स्थान भी उत्तर प्रदेश में है। यहां की चार पहाड़ियां के बारे में कहा जाता है कि ये ब्रह्मा के चार मुख हैं।

16. मथुरा,,,यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह प्रसिद्ध शहर हिन्दू धर्म के लिए अनुयायियों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। यहां राजा कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यहीं पर श्रीकृष्ण ने बाद में कंस की हत्या की थी। बाद में कृष्ण के पौत्र वृजनाथ को मथुरा की राजगद्दी दी गई।

17. अंग देश,,,वर्तमान में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के इलाके का उल्लेख महाभारत में अंगदेश के रूप में है। दुर्योधन ने कर्ण को इस देश का राजा घोषित किया था। मान्यताओं के मुताबिक, जरासंध ने अंग देश दुर्योधन को उपहारस्वरूप भेंट किया था। इस स्थान को शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है।

18. कौशाम्बी,,,कौशाम्बी वत्स देश की राजधानी थी। वर्तमान में इलाहाबाद के नजदीक इस नगर के लोगों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था। बाद में कुरुवंशियों ने कौशाम्बी पर अपना अधिकार कर लिया। परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया।

19. काशी,,,महाभारत काल में काशी को शिक्षा का गढ़ माना जाता था। महाभारत की कथा के मुताबिक, पितामह भीष्म काशी नरेश की पुत्रियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका को जीत कर ले गए थे ताकि उनका विवाह विचित्रवीर्य से कर सकें। अम्बा के प्रेम संबंध राजा शल्य के साथ थे, इसलिए उसने विचित्रवीर्य से विवाह से इन्कार कर दिया। अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ कर दिया गया। विचित्रवीर्य के अम्बा और अम्बालिका से दो पुत्र धृतराष्ट्र और पान्डु हुए। बाद में धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहलाए और पान्डु के पांडव।

20. एकचक्रनगरी,,,,वर्तमान कालखंड में बिहार का आरा जिला महाभारत काल में एकचक्रनगरी के रूप में जाना जाता था। लाक्षागृह की साजिश से बचने के बाद पांडव काफी समय तक एकचक्रनगरी में रहे थे। इस स्थान पर भीम ने बकासुर नामक एक राक्षक का अन्त किया था। महाभारत युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया था, उस समय बकासुर के पुत्र ने भीषक ने उनका घोड़ा पकड कर रख लिया था। बाद में वह अर्जुन के हाथों मारा गया।

21. मगध,,,दक्षिण बिहार में मौजूद मगध जरासंध की राजधानी थी। जरासंध की दो पुत्रियां अस्ती और प्राप्ति का विवाह कंस से हुआ था। जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तब वह अनायास ही जरासंध के दुश्मन बन बैठे। जरासंध ने मथुरा पर कई बार हमला किया। बाद में एक मल्लयुद्ध के दौरान भीम ने जरासंध का अंत किया। महाभारत के युद्ध में मगध की जनता ने पांडवों का समर्थन किया था।

22. पुन्डरू देश,,,मौजूदा समय में बिहार के इस स्थान पर राजा पोन्ड्रक का राज था। पोन्ड्रक जरासंध का मित्र था और उसे लगता था कि वह कृष्ण है। उसने न केवल कृष्ण का वेश धारण किया था, बल्कि उसे वासुदेव और पुरुषोत्तम कहलवाना पसन्द था। द्रौपदी के स्वयंवर में वह भी मौजूद था। कृष्ण से उसकी दुश्मनी जगजाहिर थी। द्वारका पर एक हमले के दौरान वह भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया।

23. प्रागज्योतिषपुर,,,गुवाहाटी का उल्लेख महाभारत में प्रागज्योतिषपुर के रूप में किया गया है। महाभारत काल में यहां नरकासुर का राज था, जिसने 16 हजार लड़कियों को बन्दी बना रखा था। बाद में श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया और सभी 16 हजार लड़कियों को वहां से छुड़ाकर द्वारका लाए। उन्होंने सभी से विवाह किया। मान्यता है कि यहां के प्रसिद्ध कामख्या देवी मंदिर को नरकासुर ने बनवाया था।

24. कामख्या,,,गुवाहाटी से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कामख्या एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। भागवत पुराण के मुताबिक, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर बदहवाश इधर-उधर भाग रहे थे, तभी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के कई टुकड़े कर दिए। इसका आशय यह था कि भगवान शिव को सती के मृत शरीर के भार से मुक्ति मिल जाए। सती के अंगों के 51 टुकड़े जगह-जगह गिरे और बाद में ये स्थान शक्तिपीठ बने। कामख्या भी उन्हीं शक्तिपीठों में से एक है।

25. मणिपुर,,,नगालैन्ड, असम, मिजोरम और वर्मा से घिरा हुआ मणिपुर महाभारत काल से भी पुराना है। मणिपुर के राजा चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। इस विवाह से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम था बभ्रुवाहन। राजा चित्रवाहन की मृत्यु के बाद बभ्रुवाहन को यहां का राजपाट दिया गया। बभ्रुवाहन ने युधिष्ठिर द्वारा आयोजित किए गए राजसूय यज्ञ में भाग लिया था।

26. सिन्धु देश,,,सिन्धु देश का तात्पर्य प्राचीन सिन्धु सभ्यता से है। यह स्थान न केवल अपनी कला और साहित्य के लिए विख्यात था, बल्कि वाणिज्य और व्यापार में भी यह अग्रणी था। यहां के राजा जयद्रथ का विवाह धृतराष्ट्र की पुत्री दुःश्शाला के साथ हुआ था। महाभारत के युद्ध में जयद्रथ ने कौरवों का साथ दिया था और चक्रव्युह के दौरान अभिमन्यू की मौत में उसकी बड़ी भूमिका थी।

27. मत्स्य देश,,,राजस्थान के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में मत्स्य देश के रूप में है। इसकी राजधानी थी विराटनगरी। अज्ञातवास के दौरान पांडव वेश बदल कर राजा विराट के सेवक बन कर रहे थे। यहां राजा विराट के सेनापति और साले कीचक ने द्रौपदी पर बुरी नजर डाली थी। बाद में भीम ने उसकी हत्या कर दी। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यू का विवाह राजा विराट की पुत्री उत्तरा के साथ हुआ था।

28. मुचकुन्द तीर्थ,,,यह स्थान धौलपुर, राजस्थान में है। मथुरा पर जीत हासिल करने के बाद कालयावन ने भगवान श्रीकृष्ण का पीछा किया तो उन्होंने खुद को एक गुफा में छुपा लिया। उस गुफा में मुचकुन्द सो रहे थे, उन पर कृष्ण ने अपना पीताम्बर डाल दिया। कृष्ण का पीछा करते हुए कालयावन भी उसी गुफा में आ पहुंचा। मुचकुन्द को कृष्ण समझकर उसने उन्हें जगा दिया। जैसे ही मुचकुन्द ने आंख खोला तो कालयावन जलकर भस्म हो गया। मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब पांडव हिमालय की तरफ चले गए और कृष्ण गोलोक निवासी हो गए, तब कलयुग ने पहली बार यहां अपने पग रखे थे।

29. पाटन,,,महाभारत की कथा के मुताबिक, गुजरात का पाटन द्वापर युग में एक प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र था। पाटन के नजदीक ही भीम ने हिडिम्ब नामक राक्षस का संहार किया था और उसकी बहन हिडिम्बा से विवाह किया। हिडिम्बा ने बाद में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम था घटोत्कच्छ। घटोत्कच्छ और उनके पुत्र बर्बरीक की कहानी महाभारत में विस्तार से दी गई है।

30. द्वारका,,,माना जाता है कि गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित यह स्थान कालान्तर में समुन्दर में समा गया। कथाओं के मुताबिक, जरासंध के बार-बार के हमलों से यदुवंशियों को बचाने के लिए कृष्ण मथुरा से अपनी राजधानी स्थानांतरित कर द्वारका ले गए।

31. प्रभाष,,,गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण का निवास-स्थान रहा है। महाभारत कथा के मुताबिक, यहां भगवान श्रीकृष्ण पैर के अंगूठे में तीर लगने की वजह से घायल हो गए थे। उनके गोलोकवासी होने के बाद द्वारका नगरी समुन्दर में डूब गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि समुन्दर के सतह पर द्वारका नगरी के अवेशष मिले हैं।

32. अवन्तिका,,मध्यप्रदेश के उज्जैन का उल्लेख महाभारत में अवन्तिका के रूप में मिलता है। यहां ऋषि सांदपनी का आश्रम था। अवन्तिका को देश के सात प्रमुख पवित्र नगरों में एक माना जाता है। यहां भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में एक महाकाल लिंग स्थापित है।

33. चेदी,,,वर्तमान में ग्वालियर क्षेत्र को महाभारत काल में चेदी देश के रूप में जाना जाता था। गंगा व नर्मदा के मध्य स्थित चेदी महाभारत काल के संपन्न नगरों में एक था। इस राज्य पर श्रीकृष्ण के फुफेरे भाई शिशुपाल का राज था। शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, लेकिन श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचा लिया।

इस घटना की वजह से शिशुपाल और श्रीकृष्ण के बीच संबंध खराब हो गए। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समय चेदी नरेश शिशुपाल को भी आमंत्रित किया गया था। शिशुपाल ने यहां कृष्ण को बुरा-भला कहा, तो कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया। महाभरत की कथा के मुताबिक, दुश्मनी की बात सामने आने पर श्रीकृष्ण की बुआ उनसे शिशुपाल को अभयदान देने की गुजारिश की थी। इस पर श्रीकृष्ण ने बुआ से कहा था कि वह शिशुपाल के 100 अपराधों को माफ कर दें, लेकिन 101वीं गलती पर माफ नहीं करेंगे।

34. सोणितपुर,,,मध्यप्रदेश के इटारसी को महाभारत काल में सोणितपुर के नाम से जाना जाता था। सोणितपुर पर वाणासुर का राज था। वाणासुर की पुत्री उषा का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के साथ सम्पन्न हुआ था। यह स्थान हिन्दुओं के लिए एक पवित्र तीर्थ है।

35. विदर्भ,,,महाभारतकाल में विदर्भ क्षेत्र पर जरासंध के मित्र राजा भीष्मक का शासन था। रुक्मिणी भीष्मक की पुत्री थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचाया था। यही वजह थी कि भीष्मक उन्हें अपना शत्रु मानने लगे। जब पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ किया था, तब भीष्मक ने उनका घोड़ा रोक लिया था। सहदेव ने भीष्मक को युद्ध में हरा दिया

साभार : S. N. VYAS

SAI BABA - साईं बाबा के विरोधियों के प्रश्नों के जवाब


SAI BABA - साईं बाबा के विरोधियों के प्रश्नों के जवाब

साईं बाबा के विरोधी साईं बाबा के बारे में अक्सर जो प्रश्न पूछते रहते हैं, उनको हमें एक जगह एकत्र करके, उन सभी का जबाब देने की इस नोट में कोशिश की है…इन प्रश्नों के उत्तर हमने श्री साई सच्चरित्र और कुछ अन्य पुस्तको से लिए हैं..

अगर किसी साईं बाबा के विरोधी या जिगासु के मन में कोई और भी प्रश्न उठ रहा हो तो वे नीचे कमेन्ट के रूप में पूछ सकता है, अगर हमें वो प्रश्न नया लगा तो हम उसका उत्तर भी अवश्य ही देंगे ..

प्रश्न 1: क्या साईं हिन्दू है?

उत्तर: यह प्रश्न अक्सर पुछा जाता है और साईं बाबा को मुस्लिम बताकर उनके बारे में कुप्रचार और अपशब्द कहे जाते हैं, जाति तो पाँच तत्व से निर्मित नश्वर देह की होती है न कि ज्ञान-स्वरूप आत्मा की। इसीलिये तो कबीरदास जी ने कहा है –

“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान॥”

फिर भी साईं बाबा के सम्बन्ध में प्रमाणपूर्वक निश्चयात्मक रूप से सिद्ध करके बताया जा सकता है कि वे हिन्दू ही थे और वह भी ब्राह्मण।शिरडी के साईं बाबा का कर्ण छेदन संस्कार हुआ था। उनके कान छिदे हुये थे। कर्ण छेदन हिन्दुओं के सोलह संस्कारों में से एक है। बाबा भगवान की मूर्ति और मूर्ति पूजा पर विश्वास करते थे। अपने आप में पण्ढरपुर के विट्ठल भगवान का दर्शन करा देना इसका प्रबल प्रमाण है। जिन भक्तों के राम, कृष्ण, शिव जो भी इष्ट थे, साईं बाबा उन्हें उसी रूप में दिखते थे। साईं बाबा ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी’ के साकार स्वरूप थे। साईं बाबा हिन्दुओं के त्यौहार मनाते थे जिनमें कष्णाष्टमी और रामनवमी मुख्य थे। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता चाहते थे। इसलिये मुसलमानों के त्यौहार सन्दल और ईद भी मनाते थे। दीपावली के दिन उनका निवास स्थान दीपमालिका से जगमगा उठता था। बाबा का निवास स्थान मस्जिद में था।

तुलसीदास जी के इस कथन का, कि ‘मांगि के खैवो, मजीद में सोइवो’, साईं बाबा मूर्तिमान स्वरूप थे। साईं बाबा को भगवानश्री कृष्ण के निवास स्थान द्वारिकापुरी से इतना प्रेम था कि उन्होंने अपने निवास स्थान का नाम “द्वारिका माई मस्जिद” ही रख लिया था। वे “द्वारिका माई” में रात-दिन लगातार धूनी जलाते थे। आज भी शिरडी में उनके समाधि स्थल पर धूनी जलती रहती है। धूनी तो हिन्दू सन्त ही जलाते हैं। यह काम ‘अग्निहोत्र’ कहलाता है जिसे अग्निहोत्री ब्राह्मण ही किया करते हैं।बाबा के निवास स्थान में उनकी प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या समय आरती की जाती थी और शंख, झालर तथा घण्टे बजाये जाते थे।

वहाँ लोग उनके दर्शन करते थे, नाम सप्ताह, कीर्तन और सत्संग किये जाते थे। उस मस्जिद अथवा साईं बाबा के मन्दिर के ऊपर हिन्दुओं के झण्डे लहराते थे। साईं बाबा के भक्त उन्हें साष्टांग दण्डवत करते थे और साईं बाबा सर्व रोग नाशक धूनी की पवित्र भस्मि लोगों को वितरित करते थे।शिरडी के साईं बाबा पुनर्जन्म पर विश्वास करते थे। उन्हें वेद, शास्त्र, उपनिषद, गीता, भागवत, विष्णु सहस्र नाम जैसे ग्रंथों पर पूर्ण आस्था थी। भक्तजन साईं बाबा को चन्दन लगाते थे। साईं बाबा योगी और वेदान्ती थे। वे स्वयं ‘एक ईश्वर’ के प्रति श्रद्धा, विश्वास और आस्था रखते थे और ‘सबका मालिक एक’ उनका सिद्धान्त था। उन्हें ‘नवधा भक्ति’ पर पूर्ण विश्वास था। शिरडी के साईं बाबा के लिये खण्ड योग, धौति, नेति और समाधि अत्यन्त सामान्य कर्म थे।शिरडी में म्हालासपति साईं बाबा के अनन्य भक्त थे। वे उनके साथ द्वारका माई मस्जिद और चावड़ी में सोते थे।

उनके आग्रह पर साईं बाबा ने उनको बताया था कि वे ब्राह्मण थे और पथरी उनका गाँव था। एक बार जब पथरी से कुछ लोग आये थे तो बाबा ने उनसे वहाँ के कुछ व्यक्तियों के बारे में पूछा था। श्रीमती काशीबाई कानेटकर जब मस्जिद की सीढ़ियों पर पढ़ रही थीं तब उनकी शंका का निवारण करने के लिये बाबा तोले थे कि ‘मैं ब्राह्मण हूँ, शुद्ध ब्राह्मण। यह ब्राह्मण (साईं बाबा) लाखों लोगों को धर्म के मार्ग पर चला सकता है और उनको मुक्त कर सकता है।”

प्रश्न 2: क्या साईं का सनातन धर्म से कुछ सम्बन्ध है?

उत्तर: यदि सनातन धर्म के धर्म ग्रंथों की बात की जाए तो उनमे ये परिभाषा मिलती है कि “धारयते इति धर्मः” अर्थात जो आप धारण करते हैं वो आपका धर्म है | कलयुग में साईं बाबा ने अवतार लिया और लोगो ने उन्हें पूजना शुरू किया या कहिये कि धारण किया .. तो यह तो सनातन धर्म के अनुसार ही किया गया है न …

प्रश्न 3: क्या साईं के नाम पर कोई मन्त्र है?

उत्तर: हिंदू परंपरा में देवी-देवताओं के लिए ही नहीं अपितु गुरुओं के लिए भी मंत्रों के उच्चारण, श्लोकों के गायन और व्यकितगत या सामूहिक रूप से भजन-आरती करने को पूजा का एक महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है। साईं बाबा के भी कुछ मंत्र है :

ॐ श्री साईं जगत: पित्रे नम: (जगत पालन करने वाले साईं बाबा को नमन)

ॐ श्री साईं योगक्षेमवहाय नम: (हर सुख देने के साथ उसकी रक्षा भी करने वाले साईंबाबा)

ॐ श्री साईं प्रीतिवर्द्धनाय नम: (प्रेम भाव बढाने वाले साईंबाबा को नमन)

ॐ श्री साईं भक्ताभय प्रदाय नम: (अभय दान देने वाले हैं साईं बाबा को नमन)

प्रश्न 4: क्या साईं का वेदों पुराणों में कोई वर्णन है?

उत्तर: यह प्रश्न बिलकुल भी तर्कसंगत नहीं है क्योकि साईं बाबा का उदभव काल सन 1838 के आसपास का है और वेदों पुराणों की रचना तो सदियों पहले हुई थी ..तो इन ग्रंथो में साईं बाबा के नाम का वर्णन कैसे हो सकता है.

प्रश्न 5: क्या साईं की पूजा शास्त्रसम्मत है?

उत्तर: जी हाँ, आइए देखें वेदों शास्त्रों में दिए गए पूर्ण संत के कुछ मुख्य लक्षण :
१. सगुण और निर्गुण दोनोंके अस्तित्त्वको मान्यता देते हैं |
२. भक्ति और ज्ञानका उनमें अनूठा संगम होता है |
३. आवश्यकता पडनेपर क्षात्रवृत्तिका भी परिचय देते हैं |
४. वैदिक सनातन धर्मके सिद्धांतोंको ही पूर्ण रूपेण मानते हैं जैसे पितृ कर्म, पुनर्जन्म, सगुण निर्गुण स्वरूप इत्यादि |
५. उनके लेखनमें पूर्ण सत्यता होती है |
६. सूक्ष्म जगतकी पूर्ण जानकारी होती है |
७. इष्ट और अनिष्ट शक्तियां उनसे अपना उद्धार चाहती हैं |
८. उनकेद्वारा रचित ग्रंथ सृष्टिके अंत तक जीवोंका मार्गदर्शन करते हैं |
९. उन्हें सदेह मुक्ति प्राप्त होती है |
१०. अष्ट महासिद्धियां उनके आंगन खेलती हैं |
संक्षेपमें जिन संतोंमें ये गुण नहीं थे उन्हें पूर्णत्वकी प्राप्ति नहीं हुई थीपूर्णत्व प्राप्त संतों के कुछ उदाहरण – आदि गुरु शंकराचार्य, रमणा महर्षि, रामकृष्ण परमहंस, तेलंग स्वामी, शिर्डी साईं बाबा, भक्तराज महाराज, परम पूज्य डॉ. आठवले इत्यादि ( —सुश्री तनूजा ठाकुर, उपासना हिन्दू धर्मोथान संस्थान )

प्रश्न 6: क्या साईं अवतार है, या कोई देवता, या इश्वर?? यदि नहीं तो साईं की पूजा करके सनातन धर्म का अपमान क्यों??

उत्तर: इसमें कोई सन्देह नहीं कि शिरडी के साईं बाबा अवतार थे। प्रश्न यह है कि वे किसके अवतार थे? साईं बाबा के कुछ भक्त उन्हें भगवान दत्तात्रय का अवतार मानते हैँ। उनका विश्वास है कि भगवान दत्तात्रय ने चौदहवीं शताब्दी में श्रपाद श्री वल्लभ के रूप में और पन्द्रहवीं शताब्दी में श्री नरसिंह सरस्वती के रूप में अवतार लिये थे। भगवान दत्तात्रय के अन्य अवतार थे मानिक प्रभु और अक्कल कोटकर महाराज। साईं बाबा अक्कल कोटकर महाराज के अवतार माने जाते हैं। इस प्रकार साईं बाबा मूलतः दत्तात्रय भगवान के ही अवतार हुये।

दत्तात्रय का आविर्भाव ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों के वरदान स्वरूप हुआ था। ये त्रिदेव एक ही परब्रह्म के तीन रूप हैं। अतः श्री साईं बाबा परब्रह्म परमात्मा के अवतार थे। उनमें परब्रह्म के सभी लक्षण थे। शिरडी के साईं बाबा को परब्रह्म का अवतार मानना ही उचित है। वे सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्व शक्तिमान थे। वे अन्तर्यामी थे। प्रत्येक के हृदय में उनका निवास था, है और सदा रहेगा। उनका अन्तर्यामी होना इसीसे सिद्ध होता है कि जब कोई उनके दर्शन करने के लिये आता था तब वे बिना बताये ही उसका नाम, निवास स्थान और आने का उद्देश्य जान लेते थे। लोक कल्याण के लिये वे अनेक लीलाएँ करते थे। वे परब्रह्म परमात्मा के लीलावतार थे।साईं बाबा की आरती में उनके किसी भक्त ने लिखा है –“तुम दत्तात्रय तुम शिव बाबा, तुम मंगलमय श्याम विठोबा,तुम योगेश्वर राम कन्हाई, तुम समर्थ सर्वेश्वर साईं।”शिरडी के साईं बाबा परब्रह्म के अवतार थे उनमें सभी अवतारों का समावेश होना स्वाभाविक ही है। साईं बाबा के जीवन काल में ही उनके कुछ अनन्य भक्तों को उनके “ब्रह्मत्व” का बोध हो चुका था। इन्दौर हाई कोर्ट के जज माननीय श्री एम. बी. रेगे, बी.ए., एल.एल.बी. ने लिखा है, “शरीरधारी अवतारी साईं बाबा अपने भक्तों के लिये परमब्रह्म के अवतार थे जो अपने वचनों और कार्यों से साधकों का मार्ग प्रकाशित करते थे।”उत्तर भारत के तत्कालीन एक रियासत के हाई कोर्ट के एक जज ने कहा था, “मैं साईं बाबा को सृष्टि के रचयिता, पालक और संहारकर्ता मानता हूँ।” अमरावती के प्रख्यात और विद्वान अधिवक्ता माननीय दादा साहब खापर्डे ने साईं बाबा के विषय में अपने विचार व्यक्त किये थे कि ‘साईं बाबा अन्तर्यामी थे। वे हर एक के आन्तरिक विचारों को जानते थे, शरणागतों के अभावों को मिटाते और सबको सुख-शान्ति प्रदान करते थे। वे पृथ्वी पर साकार भगवान थे।’ साईं बाबा के गुणगान करने वाले कीर्तनकार दास गणू का कहना है कि ‘साईं बाबा सृष्टि के आदि कारण थे।’

प्रश्न 7: साईं यदि सभी धर्मो को मानने वाले थे तो साईं को अवतार बता कर झूठ का प्रचार क्यों???

उत्तर: साईं बाबा सभी धर्मो खासकर हिन्दू और मुस्लिम को मानने वाले थे या कहिये कि उन्हें इन दोनों धर्मो का ज्ञान था तो अगर वो अवतार है और उन्हें दो दो धर्मो का ज्ञान है तो इसमें गलत क्या है ? अवतारी पुरुषो तो ज्ञान का भण्डार होते हैं. इसमें झूठ क्या है ?

प्रश्न 8: साईं के नाम पर आरती, चालीसा आदि क्यों??
जबकि शास्त्रों में मंत्रो का किसी और के साथ प्रयोग पापकर्म बताया गया है.

उत्तर: साईं के भक्त पूरी दुनिया में लाखो करोड़ो की संख्या में हैं, और साईं बाबा की आरतियाँ, चालीसा आदि भी उन्होंने ही बनाई हैं, इन आरतियों का प्रयोग साईं बाबा की भक्ति के लिए करना कोई पाप नहीं हो सकता, यह सब सिर्फ भ्रम पैदा करने के लिए कहा जाता है. ऐसा किसी शास्त्र में नहीं लिखा है.

प्रश्न 9: साईं की मूर्ति मस्जिदों और चर्च में क्यों नहीं??

उत्तर: इसका सीधा सा कारण है : मुस्लिम मूर्ती पूजा के घोर विरोधी है इसीलिए वे साईं की मूर्ती की पूजा क्यों करेंगे वैसे भी वे अल्लाह के आलावा किसी और के आगे नतमस्तक नहीं हो सकते …चर्च में आपने आजतक ईसा मसीह / मरियम के आलावा किसी और की मूर्ति देखी है ??

मुस्लिम और ईसाई भले ही साईं बाबा पर श्रद्धा रखे हो, पर उन्हें पूजते बहुत कम ही है..

प्रश्न 10: साईं के जागरणों में अल्लाह अल्लाह क्यों???

उत्तर: एक हिन्दू साईं बाबा को हिन्दू मानकर पूजता है और मुस्लिम मुस्लिम मानकर, तो जब कोई मुस्लिम उनकी वंदना करेगा तो अल्लाह अल्लाह ही पुकारेगा न ? जैसे हिन्दू बोलते हैं ॐ साईं राम, ॐ साईं श्याम ..

दूसरा कारण यह है कि साईं बाबा को एक सूफी फ़कीर भी माना जाता है – और सूफी संगीत में अल्लाह शब्द प्राय: आया ही करता है.

इस नोट पर की गई टिप्पणियों में भी कुछ प्रश्न पूछे गए हैं, उनमे से कुछ प्रश्नों को हमने यहाँ जबाब के लिए चुना है, जिनको नहीं चुना, उनके उत्तर पहले ही इस नोट पर दिए जा चुके हैं या वे इस विषय से सम्बंधित नहीं है …

प्रश्न 11: भाई क्या किसी मस्जिद मे हिन्दू संत रह सकता है ??जो मुसलमान हिन्दुओ के साथ उनके त्योहार मानते है वो क्या हिन्दू हो जाते है ?

उत्तर: जिस मस्जिद में साईं बाबा रहते थे वो कोई सक्रिय मस्जिद नहीं थी, वो टूटी – फूटी, मस्जिद का एक खंडहर मात्र थी, मुस्लिम पंथ के अनुसार इस प्रकार की मस्जिद को मस्जिद माना ही नहीं जाता और न ही इसमें कोई नमाज ही पढ़ी जा सकती है. तो अगर साईं बाबा ने अपना डेरा इसमें बनाया था तो इसमें कोई आपत्ति नहीं की जा सकती थी, चुकीं साईं बाबा तो शिर्डी के रहने वाले थे नहीं, वे तो विचरण करते हुए शिर्डी में आये थे, कहीं और रहने की व्यवस्था नहीं थी .. मोह माया उनके पास फटकती भी नहीं थी तो इस सन्यासी ने उस खंडहर को अपना आश्रम / मंदिर / बसेरा / डेरा बना लिया …और नाम दिया अपने आराध्य श्री कृष्ण की द्वारका के नाम पर द्वारकामाई…

जो मुस्लिम हिन्दुओं के साथ उनके त्यौहार मानते हैं वो हिन्दू नहीं हो जाते .. बल्कि वास्तव में तो ऐसा होता है बहुत कम है कि कोई मुस्लिम हिन्दुओं के त्यौहार मनाये क्योकि उनके पंथ में यह सब हराम है / गलत है और यह सब करने की सख्ती से मनाही है बल्कि उनका तो मानना यहाँ तक है कि अगर कोई मुस्लिम मूर्ती पूजा करे तो वो मुस्लिम रह ही नहीं जाता …

और साईं बाबा तो विरोधाभासी जान पड़ते हैं, वो तो मूर्ती पूजा और बहुत से ऐसे कर्म करते थे, जो इस्लाम के विरुद्ध थे, जिनका विवरण हम पहले ऊपर दे ही चुके हैं … इसका निष्कर्ष क्या निकलता है, यह बनाते की जरुरत नहीं है …

प्रश्न 12: एक साई भक्त ने एक साई मंदिर खोला है उसके खोलने के बाद वो काफी अमीर हो गया है उसका कहना है की मंदिर मे काफी मात्रा मे चढ़ावा आता है ( सोना और रुपे )॥ तो क्या उसको भक्त कहे या व्यापारी ???? ( खोलना मैंने इसलिए लिखा की उसने उसे कमाई का साधन बना दिया है)…

उत्तर: क्या आप हमें उस तथाकथित साईं भक्त का कुछ और परिचय दे सकते हैं ? जो यह दावा करता हो कि साईं मंदिर के चढ़ावे से वो बहुत अमीर हो गया है, अगर वास्तव में वो इस प्रकार का दावा करता है तो उसे निश्चित तौर पर भक्त नहीं कहा जा सकता और हमारा मंच उसके इस कार्य का बिलकुल भी समर्थन नहीं करता…

प्रश्न 13: साई की मूर्ति मस्जिदों मे भी होनी चाहिए अगर उनको हिन्दू मुस्लिम दोनों भगवान मानते है तो क्यों की मुस्लिम को भी तो साक्षात भगवान के दर्शन हो गए होंगे उस समय,, आपके Q 10 के जवाब मे लिखा भी है की मुस्लिम उन्हे मुस्लिम मानकर वंदना करते है ॥ तो अपने भगवान की मूर्ति रखना सायद बुरा होगा … इस्लाम मूर्ति पुजा का विरोध करता है तो किसी मूर्ति को अल्लाह कैसे मान सकता है ये भी बताइये ??

उत्तर: वैसे तो आपके इस प्रश्न में ही इस प्रश्न का उत्तर भी छिपा हुआ है परन्तु फिर भी हम थोडा स्पष्ट कर देते हैं, कि जो भी मुस्लिम उन्हें मानते हैं वो निश्चित तौर पर उनकी मूर्ती की पूजा नहीं करते होंगे, मूर्ती को नहीं मानते होंगे.. किसी को मानने/ पूजने का अर्थ उसकी मूर्ती या चित्र का पूजन करना ही नहीं होता, भक्ति तो साकार और निराकार दोनों ही रूपों में की जा सकती है, और जैसा कि सर्वविदित है कि मुस्लिम मूर्ती पूजा विरोधी है तो वे मूर्ती को अपना अल्लाह नहीं मान रहे हैं / वे साईं को अल्लाह के रूप में देख रहे हैं ( वैसे यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यह भी इस्लाम विरुद्ध ही है कि कोई मुस्लिम किसी संत या फ़कीर को अल्लाह के रूप में माने, जो मुस्लिम मान रहे हैं वे अपवाद ही कहे जायेंगे)

साईं बाबा के बारे में बहुत भ्रम फैला है। वे हिन्दू थे या मुसलमान? क्या वे कबीर, नामदेव, पांडुरंग आदि के अवतार थे। कुछ लोग कहते हैं कि वे शिव के अंश हैं और कुछ को उनमें दत्तात्रेय का अंश नजर आता है। अन्य लोग कहते हैं कि वे अक्कलकोट महाराज के अंश हैं। कट्टर धार्मिक युग में व्यक्ति हर संत को धर्म के आईने में देखना चाहता है। कट्टरपंथी हिन्दू भी जानना चाहते हैं कि वे हिन्दू थे या मुसलमान? यदि मुसलमान थे तो फिर हम उनकी पूजा क्यों करें? मुसलमान भी जानना चाहते हैं कि अगर यदि वे हिन्दू थे तो फिर हम उनकी समाधि पर जाकर दुआ क्यों करें? साईं बाबा के बारे में अधिकांश जानकारी श्रीगोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर द्वारा लिखित ‘श्री साईं सच्चरित्र’ से मिलती है। मराठी में लिखित इस मूल ग्रंथ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। यह साईं सच्चरित्र साईं बाबा के जिंदा रहते ही 1910 से लिखना शुरू किया। 1918 के समाधिस्थ होने तक इसका लेखन चला। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि कितने हैं, जो ‘सबका मालिक एक’ की घोषणा करते हैं। साईं बाबा का मिशन था- लोगों में एकेश्वरवाद के प्रति विश्वास पैदा करना। लोगों के दुख-दर्द को दूर करना साथ ही समाज में भाईचारा कायम करना। साईं हिन्दू थे या मुसलमान साईं अपना ज्यादातर वक्त मुस्लिम फकीरों के संग बिताते थे, लेकिन माना जाता है कि उन्होंने किसी के साथ कोई भी व्यवहार धर्म के आधार पर नहीं किया। जो लोग साईं बाबा को हिन्दू मानते हैं वे उनके हिन्दू होने का तर्क देते हैं, जैसे- हिन्दू होने के कुछ कारण: 1. बाबा धूनी रमाते थे। धुनी तो सिर्फ शैव और नाथपंथी संत ही जलाते हैं। 2. बाबा के कान बिंधे हुए थे। कान छेदन सिर्फ नाथपंथियों में ही होता है। 3. साईं बाबा हर सप्ताह नाम कीर्तन का आयोजन करते थे जिसमें विट्ठल (कृष्ण) के भजन होते थे। बाबा कहते थे- ठाकुरनाथ की डंकपुरी, विट्ठल की पंढरी, रणछोड़ की द्व ारिका यहीं तो है। 4. साईं बाबा कपाल पर चंदन और कुमकुम लगाते थे। 5. जहां बाबा पहली बार लोगों को दिखे थे उस स्थान पर बाबा के गुरु का तप स्थान था। जब उस समाधि की खुदाई की गई तब वहां चार दीपक जल रहे थे। म्हालसापति तथा शिर्डी के अन्य भक्त इस स्थान को बाबा के गुरु का समाधि-स्थान मानकर सदैव नमन किया करते थे। साईं के बारे में जानकार मानते हैं कि वे नाथ संप्रदाय का पालन करते थे। हाथ में पानी का कमंडल रखना, धूनी रमाना, हुक्का पीना, कान बिंधवाना और भिक्षा पर ही निर्भर रहना- ये नाथ संप्रदाय के साधुओं की निशानी हैं। नाथों में धूनी जलाना जरूरी होता है जबकि इस्लाम में आग हराम मानी गई है। सिर्फ इस एक कर्म से ही उनका नाथपंथी होना सिद्ध होता है। यह बाबा का निवास स्थान है, जहां पुरानी वस्तुएं जैसे बर्तन, घट्टी और देवी-देवताओं की मूर्तियां रखी हुई हैं। मंदिर के व्यवस्थापकों के अनुसार यह साईं बाबा का जन्म स्थान है। उनके अनुसार साईं के पिता का नाम गोविंद भाऊ और माता का नाम देवकी अम्मा है। कुछ लोग उनके पिता का नाम गंगाभाऊ बताते हैं और माता का नाम देवगिरी अम्मा। कुछ हिन्दू परिवारों में जन्म के समय तीन नाम रखे जाते थे इसीलिए बीड़ इलाके में उनके माता-पिता को भगवंत राव और अनुसूया अम्मा भी कहा जाता है। वे यजुर्वेदी ब्राह्मण होकर कश्यप गोत्र के थे। साईं के चले जाने के बाद उनके परिवार के लोग शायद हैदराबाद चले गए थे और फिर उनका कोई अता-पता नहीं चला। शशिकांत शांताराम गडकरी की किताब ‘सद्गुरु साईं दर्शन’ (एक वैरागी की स्मरण गाथा) के अनुसार साईं ब्राह्मण परिवार के थे। उनका परिवार वैष्णव ब्राह्मण यजुर्वेदी शाखा और कौशिक गोत्र का था। उनके पिता का नाम गंगाभाऊ और माता का नाम देवकीगिरी था। देवकीगिरी के पांच पुत्र थे। पहला पुत्र रघुपत भुसारी, दूसरा दादा भुसारी, तीसरा हरिबाबू भुसारी, चैथा अम्बादास भुसारी और पांचवें बालवंत भुसारी थे। साईं बाबा गंगाभाऊ और देवकी के तीसरे नंबर के पुत्र थे। उनका नाम था हरिबाबू भुसारी। साईं बाबा के इस जन्म स्थान के पास ही भगवान पांडुरंग का मंदिर है। इसी मंदिर के बाईं ओर देवी भगवती का मंदिर है जिसे लोग सप्तशृंगीदेवी का रूप मानते हैं। इसी मंदिर के पास चैधरी गली में भगवान दत्तात्रेय और सिद्ध स्वामी नरसिंह सरस्वती का भी मंदिर है, जहां पवित्र पादुका का पूजन होता है। लगभग सभी मराठी भाषियों में नरसिंह सरस्वती का नाम प्रसिद्ध है। थोड़ी ही दूरी पर राजाओं के राजबाड़े हैं। यहां से एक किलोमीटर दूर साईं बाबा का पारिवारिक मारुति मंदिर है। साईं बाबा का परिवार हनुमान भक्त था। वे उनके कुल देवता हैं। यह मंदिर खेतों के मध्य है, जो मात्र एक गोल पत्थर से बना है। यहीं पास में एक कुआं है, जहां साईं बाबा स्नान कर मारुति का पूजन करते थे। साईं बाबा पर हनुमानजी की कृपा थी। साईं बाबा की पढ़ाई की शुरुआत घर से ही हुई। उनके पिता वेदपाठी ब्राह्मण थे। उनके सान्निध्य में हरिबाबू (साईं) ने बहुत तेजी से वेद-पुराण पढ़े और वे कम उम्र में ही पढ़ने-लिखने लगे। 7-8 वर्ष की उम्र में साईं को पाथरी के गुरुकुल में उनके पिता ने भर्ती किया ताकि यह कर्मकांड सीख ले और कुछ गुजर-बसर हो। यहां ब्राह्मणों को वेद- पुराण आदि पाठ पढ़ाया जाता था। जब साईं 7-8 वर्ष के थे तो अपने गुरुकुल के गुरु से शास्त्रार्थ करते थे। गुरुकुल में साईं को वेदों की बातें पसंद आईं, लेकिन वे पुराणों से सहमत नहीं थे और वे अपने गुरु से इस बारे में बहस करते थे। वे पुराणों की कथाओं से संभ्रमित थे और उनके खिलाफ थे। तर्क-वितर्क द्वारा वे गुरु से इस बारे में चर्चा करते थे। गुरु उनके तर्कों से परेशान रहते थे। वे वेदों के अंतिम और सार्वभौमिक सर्वश्रेष्ठ संदेश ‘ईश्वर निराकार है’ इस मत को ही मानते थे। अंत में हारकर गुरु ने कहा- एक दिन तुम गुरुओं के भी गुरु बनोगे। साईं ने वह गुरुकुल छोड़ दिया। गुरुकुल छोड़कर वे हनुमान मंदिर में ही अपना समय व्यतीत करने लगे, जहां वे हनुमान पूजा-अर्चना करते और सत्संगियों के साथ रहते। उन्होंने 8 वर्ष की उम्र में ही संस्कृत बोलना और पढ़ना सीख लिया था। उन्होंने चारों वेद और 18 पुराणों का अध्ययन कर लिया था। साईं जिस इलाके में रहते थे वह हैदराबाद निजामशाही का एक भाग था। उनकी राजशाही में मुस्लिमों का एक हथियारबंद संगठन था जिसे रजाकार कहा जाता था। इसके लोग हिन्दुओं को धर्मांतरण के लिए मजबूर करते थे। हिन्दुओं पर कट्टरपंथी लोग तरह-तरह के अत्याचार करते या उन पर मनमाने टैक्स लगाते थे। साईं का परिवार गरीब ब्राह्मण परिवार था। उनके पास खेती योग्य भूमि नहीं थी और न ही कोई रोजी-रोजगार। यदि वे इस्लाम कबूल कर लेते तो उनकी गरीबी दूर हो जाती और उनकी हैसियत बढ़ जाती। उनके माता-पिता जैसे-तैसे भिक्षा मांगकर, मजदूरी करके पांचों बच्चों का पेट पाल रहे थे। कई बार ऐसा होता कि माता-पिता को भूखा सोना पड़ता था लेकिन वे दोनों बच्चों का पेट भरने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते। उनके घर के पास ही मुस्लिम परिवार रहता था। उनका नाम चांद मियां था और उनकी पत्नी चांद बी थी। उन्हें कोई संतान नहीं थी। हरिबाबू उनके ही घर में अपना ज्यादा समय व्यतीत करते थे। चांद बी हरिबाबू को पुत्रवत ही मानती थीं। रजाकारों का जुल्म बढ़ा तो उनके पिता ने वह स्थान छोड़ने का मन बनाया। उस गांव में वे अपमान का घूंट पी रहे थे। एक बार गंगाभाऊ अपने परिवार के साथ पंढरपुर गए। भीमा नदी पंढरपुर के पास से बहती है। गंगाभाऊ का परिवार नाव में बैठकर नदी पार कर रहा था तभी दुर्भाग्य से नाव पलटी और परिवार डूबने लगा। किनारे खड़े एक सूफी फकीर और तीर्थयात्रियों ने जैसे-तैसे सभी को बचाया लेकिन वे गंगाभाऊ को नहीं बचा सके। जिस फकीर के प्रयास से यह परिवार बच गया उसका नाम था वली फकीर। उसने ही सभी अंतिम कार्य संपन्न कराए और देवगिरी सहित पांचों लड़कों के भोजन आदि की व्यवस्था की। मुस्लिम फकीर के साथ देवगिरी के रहने के कारण लोग उन्हें बदनाम करने लगे तो वली फकीर देवगिरी को समझा-बुझाकर हरिबाबू को अपने साथ ले गए। देवगिरी के दोनों बड़े पुत्र रोजी-रोटी की तलाश में हैदराबाद चले गए और खुद देवगिरी अपने दो पुत्रों के साथ अपनी माता के गांव चली गईं। इस तरह पिता की मौत के बाद पूरा परिवार बिखर गया। 8 वर्ष की उम्र में पिता की मृत्यु के बाद बाबा को सूफी वली फकीर ने पाला, जो उन्हें एक दिन ख्वाजा शमशुद्दीन गाजी की दरगाह पर इस्लामाबाद ले गए। यहां वे कुछ दिन रहे, जहां एक सूफी फकीर आए जिनका नाम था रोशनशाह फकीर। रोशनशाह फकीर अजमेर से आए हुए थे और इस्लाम के प्रचारक थे। रोशनशाह को साईं में रूहानीपन नजर आया और हरिबाबू (साईं) को लेकर अजमेर आ गए। इस तरह साईं वली फकीर के बाद रोशनशाह के साथी बन गए। अजमेर में साईं बाबा सूफी संत रोशनशाह के साथ रहे। वहां उन्होंने इस्लाम के अलावा कई देशी दवाओं की जानकारी हासिल की।  इस दौरान साईं बाबा ने जहां इस्लाम और सूफीवाद को करीब से जाना वहीं उनके मन में पिता और गुरु के द्वारा वेदांती शिक्षा की ज्योति भी जलती रही। भीतर से वे पक्के वेदांती थे तभी तो उनको दूसरे मुस्लिमों ने कई बार इस्लाम कबूल करने के प्रस्ताव दिए, लेकिन हर बार उन्होंने इसको दृढ़ता से खारिज कर दिया। वे धर्म-परिवर्तन के कट्टर विरोधी थे। रोशनशाह एक बार धार्मिक प्रचार के लिए इलाहाबाद गए, जहां हृदयाघात से उनका निधन हो गया। रोशनशाह बहुत ही पहुंचे हुए फकीर थे और वे मानवता के लिए ही कार्य करते थे। वे इस्लाम के प्रचारक जरूर थे लेकिन उनके मन में किसी को जबरन मुसलमान बनाने की भावना नहीं थी। रोशनशाह के जाने के बाद हरिबाबू (साईं) एक बार फिर अनाथ हो गए। रोशनशाह बाबा की मृत्यु के समय इलाहाबाद में थे हरिबाबू (साईं बाबा)। जब इलाहाबाद में थे बाबा, तब संतों का सम्मेलन चल रहा था। हिन्दुओं का पर्व चल रहा था। कोने-कोने से देश के संत आए हुए थे जिसमें नाथ संप्रदाय के संत भी थे। बाबा का झुकाव नाथ संप्रदाय और उनके रीति-रिवाजों की ओर ज्यादा था। वे नाथ संप्रदाय के प्रमुख से मिले और उनके साथ ही संत समागम और सत्संग किया। बाद में वे उनके साथ अयोध्या गए और उन्होंने राम जन्मभूमि के दर्शन किए, जहां उस वक्त बाबरी ढांचा खड़ा था। अयोध्या पहुंचने पर नाथ पंथ के संत ने उन्हें सरयू में स्नान कराया और उनको एक चिमटा (सटाका) भेंट किया। यह नाथ संप्रदाय का हर योगी अपने पास रखता है। फिर नाथ संत प्रमुख ने उनके कपाल पर चंदन का तिलक लगाकर कहा कि वे हर समय इसको धारण करके रखें। जीवनपर्यंत बाबा ने तिलक धारण करके रखा लेकिन सटाका उन्होंने हाजी बाबा को भेंट कर दिया था। अयोध्या यात्रा के बाद नाथपंथी तो अपने डेरे चले गए लेकिन हरिबाबू अकेले रह गए। बाबा घूमते-फिरते राजपुर पहंचे, वहां से चित्रकूट और फिर बीड़। बीड़ गांव में बाबा को भिक्षा देने से लोगों ने इंकार किया, तब एक मारवाड़ी प्रेमचंद ने उनकी सहायता की। उन्होंने बाबा को काम पर रखा। बाबा ने कुछ दिन वहां साड़ियों पर नक्काशी का काम किया और इस काम से साड़ियों की मांग बढ़ गई जिससे इसकी कीमत भी दोगुनी हो गई। मारवाड़ी ने भी बाबा का मेहनताना दोगुना कर दिया लेकिन बाबा का वहां मन नहीं लग रहा था। उनको अपने गांव पाथरी की याद आ रही थी। बीड़ के बाद बाबा ने अपने गांव का रुख किया इस आशा से कि वहां उनकी मां मिलेंगी, भाई होंगे और वह उनका जन्म स्थान भी है लेकिन वहां पहुंचने के बाद पता चला कि वहां कोई नहीं है। अंत में वे पड़ोस में रहने वाली चांद बी से मिले। चांद बी ने उनको सारा किस्सा बताया। चांद मियां को मरे बहुत दिन हो गए थे। हरिबाबू को देखकर चांद बी प्रसन्न हुईं। चांद बी हरिबाबू (बाबा) के रहने-खाने की व्यवस्था के लिए उन्हें नजदीक के गांव सेलू (सेल्यु) के वैंकुशा आश्रम में ले गई। उस वक्त बाबा की उम्र 15 वर्ष रही होगी। वैंकुशा बाबा एक दैवीय शक्ति संपन्न व्यक्ति थे और वे दत्त संप्रदाय की परंपरा का निर्वाह करने वाले संत थे। आश्रम के बाहर चांद बी और बाबा को इसलिए रोक दिया गया, क्योंकि दोनों अपने पहनावे से मुस्लिम नजर आ रहे थे। बाबा ने भी फकीरों जैसा बाना धारण कर रखा था। चांद बी ने मन ही मन वैंकुशा बाबा की प्रार्थना की तो ध्यान में बैठे बाबा को एकदम जागृति आ गई और वे खुद ही उठकर आश्रम के द्वार पर आ गए। बाबा से कुछ सवाल-जवाब करने के बाद वंैकुशा उनके उत्तरों से संतुष्ट हो गए और उन्होंने अपने आश्रम में उनको प्रवेश दिया। वे बाबा के उत्तरों से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने हरिबाबू को गले लगाकर अपना शिष्य बनाया। वैंकुशा के दूसरे शिष्य साईं बाबा से वैर रखते थे, लेकिन वैंकुशा के मन में बाबा के प्रति प्रेम बढ़ता गया और एक दिन उन्होंने अपनी मृत्यु के पूर्व बाबा को अपनी सारी शक्तियां दे दीं और वे बाबा को एक जंगल में ले गए, जहां उन्होंने पंचाग्नि तपस्या की। वहां से लौटते वक्त कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी लोग हरिबाबू (साईं बाबा) पर ईंट-पत्थर फेंकने लगे। बाबा को बचाने के लिए वैंकुशा सामने आ गए तो उनके सिर पर एक ईंट लगी। वैंकुशा के सिर से खून निकलने लगा। बाबा ने तुरंत ही कपड़े से उस खून को साफ किया। वैंकुशा ने वही कपड़ा बाबा के सिर पर तीन लपेटे लेकर बांध दिया और कहा कि ये तीन लपेटे संसार से मुक्त होने और ज्ञान व सुरक्षा के हैं। जिस ईंट से चोट लगी थी बाबा ने उसे उठाकर अपनी झोली में रख लिया। इसके बाद बाबा ने जीवनभर इस ईंट को ही अपना सिरहाना बनाए रखा। आश्रम पहुंचने के बाद दोनों ने स्नान किया और फिर वैंकुशा ने बताया कि 80 वर्ष पूर्व वे स्वामी समर्थ रामदास की चरण पादुका के दर्शन करने के लिए सज्जनगढ़ गए थे, वापसी में वे शिर्डी में रुके थे। उन्होंने वहां एक मस्जिद के पास नीम के पेड़ के नीचे ध्यान किया और उसी वक्त गुरु रामदास के दर्शन हुए और उन्होंने कहा कि तुम्हारे शिष्यों में से ही कोई एक यहां रहेगा और उसके कारण यह स्थान तीर्थ क्षेत्र बनेगा। वैंकुशा ने आगे कहा कि वहीं मैंने रामदास की स्मृति में एक दीपक जलाया है, जो नीम के पेड़ के पास नीचे एक शिला की आड़ में रखा है। इस वार्तालाप के बाद वैंकुशा ने बाबा को तीन बार सिद्ध किया हुआ दूध पिलाया। इस दूध को पीने के बाद बाबा को चमत्कारिक रूप से अष्टसिद्धि शक्ति प्राप्त हुई और वे एक दिव्य पुरुष बन गए। उन्हें परमहंस होने की अनुभूति हुई। इसके बाद वैंकुशा ने देह छोड़ दी। वैंकुशा के जाने के बाद साईं बाबा का आश्रम में रुकने का कोई महत्व नहीं रहा। इस आश्रम में बाबा करीब 8 वर्ष रहे यानी उस वक्त उनकी उम्र 22-23 वर्ष रही होगी। वैंकुशा की आज्ञा से साईं बाबा घूमते-फिरते शिर्डी पहुंचे। तब शिर्डी गांव में कुल 450 परिवारों के घर होंगे। शिर्डी के आसपास घने जंगल थे। वहां बाबा ने सबसे पहले खंडोबा मंदिर के दर्शन किए फिर वे वैंकुशा के बताए उस नीम के पेड़ के पास पहुंच गए। नीम के पेड़ के नीचे उसके आसपास एक चबूतरा बना था, जहां बैठकर बाबा ने कुछ देर ध्यान किया और फिर वे गांव में भिक्षा मांगने के लिए निकल पड़े। ग्रामीणों ने उन्हें भिक्षा में काफी अन्न दिया। उसे ग्रहण कर वे बाकी बचा भोजन पीछे- पीछे चल रहे श्वान को खिलाते गए और पुनः नीम के झाड़ के पास आ बैठे। उनका प्रतिदिन का यह नियम बन गया था। नीम के झाड़ के नीचे ही सोना-उठना, बैठना-ध्यान करना और फिर गांव में भिक्षा मांगने के लिए निकल पड़ना। कुछ लोगों ने उत्सुकतावश पूछा कि आप यहां नीम के वृक्ष के नीचे ही क्यों रहते हैं? इस पर बाबा ने कहा कि यहां मेरे गुरु ने ध्यान किया था इसलिए मैं यहीं विश्राम करता हूं। कुछ लोगों ने उनकी इस बात का उपहास उड़ाया, तब बाबा ने कहा कि यदि उन्हें शक है तो वे इस स्थान पर खुदाई करें। ग्रामीणों ने उस स्थान पर खुदाई की, जहां उन्हें एक शिला नजर आई। शिला को हटाते ही एक द्वार दिखा, जहां चार दीप जल रहे थे। उन दरवाजों का मार्ग एक गुफा में जाता था, जहां गौमुखी आकार की इमारत, लकड़ी के तख्ते, मालाएं आदि दिखाई पड़े। इस घटना के बाद लोगों में बाबा के प्रति श्रद्धा जागृत हो गई। बाबा ने उनके झोले से वही ईंट निकाली और उस दीपक के पास रख दी और ग्रामीणों से कहा कि इसे पुनः बंद कर दें। म्हालसापति, श्यामा तथा शिर्डी के अन्य भक्त इस स्थान को बाबा के गुरु का समाधि-स्थान मानकर सदैव नमन किया करते थे। प्रमुख ग्रामीणों में म्हालसापति और श्यामा बाबा के अनुयायी बन गए। बायजा माई नामक एक महिला थी, जो बाबा को प्रतिदिन भिक्षा देती थी। यदि बाबा किसी कारणवश भिक्षा लेने नहीं आते तो वे खुद नीम के वृक्ष के नीचे उनको भिक्षा देने पहुंच जाती थी। गांव के हिन्दू और मुसलमानों के बीच इसको लेकर चर्चा होती रहती थी कि बाबा हिन्दू हैं या मुसलमान? तीन महीने बाद बाबा किसी को भी बताए बगैर शिर्डी छोड़कर चले गए। लोगों ने उन्हें बहुत ढूंढ़ा लेकिन वे नहीं मिले। तीन माह बाद अचानक ही साईं कहीं चले गए और तीन साल बाद चांद पाशा पाटील (धूपखेड़ा के एक मुस्लिम जागीरदार) के साथ उनकी साली के निकाह के लिए बैलगाड़ी में बैठकर बाराती बनकर आए। इस बार तरुण फकीर के वेश में बाबा म्हालसापति के यहां गए तो उन्होंने उनका ‘या साईं’ ‘आओ साईं’ कहकर स्वागत किया, तब से उनका नाम ‘साईं बाबा’ पड़ गया। म्हालसापति विश्वकर्मा समुदाय के थे और सुनारी का काम करते थे। आज लोग इसका अर्थ यूं निकालते हैं- साईं का अर्थ हरि और बाबा का अर्थ भाऊ। म्हालसापति को साईं बाबा भगत के नाम से पुकारते थे। म्हालसापति और श्यामा का साईं बाबा में अटूट विश्वास था। वे उनके चमत्कार और संतत्व को जानते थे। माना जाता है कि यह बात 1854 की है जबकि बाबा का दूसरी बार शिर्डी में आगमन हुआ लेकिन शिर्डी के लोगों का कहना है कि 1856-58 में साईं बाबा नीम के नीचे पहली बार नजर आए। बाबा शिर्डी से पंचवटी गोदावरी के तट पर पहुंच गए थे, जहां उन्होंने ध्यान-तप किया। यहां बाबा की मुलाकात ब्रह्मानंद सरस्वती से हुई। बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया। पंचवटी के बाद बाबा शेगांव जा पहुंचे, जहां वे गजानन महाराज से मिले। वहां कुछ दिन रुकने के बाद बाबा देवगिरी के जनार्दन स्वामी की कुटिया पर पहुंचे। वहां से वे बिडर (बीड़) पहुंचे। वहां से फिर वे हसनाबाद गए जिसे पहले माणिक्यापुर कहा जाता था। माणिक प्रभु इस क्षेत्र के महान संत थे। माणिक प्रभु के पास बाबा पहुंचे तो माणिक प्रभु ने उन्हें गौर से देखा और फिर खड़े होकर गले लगा लिया। माणिक प्रभु के पास एक चमत्कारिक मग था जिसे आज तक कोई किसी भी वस्तु से भर नहीं सका था। कितने ही सिक्के डालो, मग खाली का खाली रहता था। बाबा ने कुछ खजूर और फूल उसमें डाले और मग भर गया। फिर बाबा वहां से बीजापुर होते हुए नरसोबा की वाडी पहुंच गए। यहां दत्त अवतार नृसिंह सरस्वती के चरण पादुका के दर्शन किए। यहीं कृष्णा नदी के किनारे एक युवा को तपस्या करते देखा तो उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम बड़े संत बनोगे। यही युवक आगे चलकर वासुदेवानंद सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने ही मराठी में गुरु चरित्र लिखा था। इसके पश्चात बाबा सज्जनगढ़ पहुंच गए, जहां समर्थ रामदास की चरण पादुका के दर्शन किए। इसके बाद बाबा सूफी फकीरों की दरगाह, हिन्दू संतों की समाधि पर जाते हाजिरी लगाते रहे। बाबा अहमदाबाद से भगवान कृष्ण की नगरी द्वारिका जा पहुंचे। यहीं उन्होंने तय किया कि शिर्डी में वे अपने निवास का नाम ‘द्वारिकामाई’ रखेंगे। द्वारिका से बाबा प्रभाष क्षे‍त्र गए, जहां भगवान कृष्ण ने अपनी देह छोड़ दी थी। पुनः शिर्डी आने से पहले चांद पाशा पाटील के पास बाबा.. औरंगाबाद के करीब 10 किलोमीटर दो गांव हैं- सिंधू और बिंदू। बिंदू ग्राम के 2 किलोमीटर पहले 2 छोटी-बड़ी आमने-सामने टेकरियां हैं। उसमें से एक टेकरी पर स्थित एक आम के झाड़ के नीचे लंबे प्रवास के बाद बाबा विश्राम के लिए रुके। ये दोनों ही गांव धूपखेड़ा के राजस्व अधिकारी चांद पाशा पाटील के राजस्व उगाही के अधिकार में आते थे। उनका एक घोड़ा चरने के लिए गया था, जो पिछले 8 दिनों से नहीं मिल रहा था। धूपखेड़ा वहां से 15 किलोमीटर दूर था। चांद पाशा अपना घोड़ा खोजते हुए सिंधू ग्राम के सड़क मार्ग से उस टेकरी पर पहुंचे। साईं बाबा ने उन्हें देखते ही पूछा- क्या तुम अपना घोड़ा खोज रहे हो? वहां सामने की टेकरी के पीछे वह घास चर रहा है। चांद पाशा पाटील ने देखा कि यहां से सामने जो टेकरी है उसके पीछे का तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा फिर ये कैसे कह सकते हैं कि वहां नीचे एक घोड़ा घास चर रहा है? उन्होंने वहां जाकर देखा तो वास्तव में वहां घोड़ा घास चर रहा था। चांद पाशा ने उसी वक्त बाबा के वहां कई चमत्कार देखे। बिंदू होते हुए बाबा सिंधू ग्राम पहुंचे। चांद पाशा भी उनके पीछे घोड़ा लेकर चलने लगा। सिंधू ग्राम की टेकरी पर बाबा ने कनीफनाथ के मजार के दर्शन किए, वहीं बाबा ने चांद पाशा से पूछा- प्यास लगी है? तो पाशा ने कहा- हां। बाबा ने जमीन खोदकर पानी का झरना निकाल दिया। चांद पाशा को आश्चर्य हुआ और उन्होंने बाबा को सूफी फकीर समझकर घर चलने का निमंत्रण दिया। पाशा के निमंत्रण पर बाबा धूपखेड़ा गांव पहुंच गए। धूपखेड़ा में चांद पाशा का भव्य बंगला था, जहां भरा-पूरा परिवार और रिश्तेदार मौजूद थे। चांद पाशा की साली की शादी की तैयारियां चल रही थीं। उनके मकान के पास ही एक नीम का झाड़ था, जहां एक शिला रखी थी। बाबा वहीं जाकर बैठक गए। बाबा चांद पाशा के यहां करीब एक माह रुके। मस्जिद बनी ‘द्वारिकामाई’ एक हिन्दू ने अपने मुसलमान भाइयों के लिए मस्जिद बनवाई थी लेकिन मुसलमानों के जाने के बाद वह मस्जिद खंडहर हो चुकी थी तथा वहां नमाज नहीं पढ़ी जाती थी। बाबा को जब और कोई ठिकाना न मिला तो उन्होंने मस्जिद की साफ-सफाई करवाकर उसे अपने रहने का स्थान बनाया और उस स्थान का नाम रखा- ‘द्वारकामाई’। गांव के मुसलमान उसे ‘हिन्दू मस्जिद’ कहते थे। वहां पर रहकर बाबा गांव में भिक्षा मांगने जाते और उस भिक्षा के सहारे ही गुजर-बसर करते थे। लोग उन्हें ‘साईं’ के नाम से पुकारा करते थे। उनकी दी गई जड़ी-बूटियों व भभूति से लोग भले-चंगे होते थे जिसके बदले में वे किसी से कुछ नहीं लेते थे। धीरे-धीरे उनके चमत्कार के चलते लोगों ने उनके यहां अन्न आदि सुख-सुविधाओं की पूर्ति कर दी। अब बाबा यहां लोगों को खुद अपने हाथ से भोजन कराने लगे थे। वे खुद चक्की चलाकर आटा निकालते थे और कड़ाव में दाल-भात बनाते थे। धीरे-धीरे उनके संतत्व की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी और उनसे मिलने दूर-दूर से लोग आने लगे।

Sunday, April 14, 2019

BAJIRAO PESHVA - इस हिंदू राजा से खौफ खाते थे मुगल

BAJIRAO PESHVA - इस हिंदू राजा से खौफ खाते थे मुगल, दिल्ली में मुगल शासक को तीन दिन बंधक बनाकर हराया था बुरी तरह



बाजीराव बल्लाल भट्ट एक ऐसा हिंदुस्तानी योद्धा जो कोई लड़ाई नहीं हारा।

तकरीबन चार साल पहले आई संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी ने मराठा इतिहास के सबसे बड़े नायक के साथ हुए अन्याय को कुछ हद तक दूर किया है, लेकिन उतना नहीं जितना की इस फिल्म से उम्मीद थी। शिवाजी ने एक सपने की नींव रखी थी, लेकिन उस सपने को पूरा किया था बाजीराव बल्लाल भट्ट यानी पेशवा बाजीराव प्रथम ने। कितने आम लोग उसे जानते थे? संजय लीला भंसाली ने एक तरह से इतिहास पर एक उपकार किया है। मराठा और हिंदुस्तानी इतिहास के साथ न्याय किया है, लेकिन ये न्याय अब भी अधूरा है।

निर्देशक भंसाली की मजबूरियां थीं कि फिल्म को हिंदू-मुस्लिम दोनों तरह के दर्शकों की कसौटी पर खरा उतारते हुए उसका रोमांटिक चरित्र ही बनाए रखना था। सवाल है कि क्या था शिवाजी का वो सपना, जिसे बाजीराव बल्लाल भट्ट ने पूरा कर दिखाया? दरअसल जब औरंगजेब के दरबार में अपमानित हुए वीर शिवाजी आगरा में उसकी कैद से बचकर भागे थे तो उन्होंने एक ही सपना देखा था, पूरे मुगल साम्राज्य को कदमों पर झुकाने का। मराठा ताकत का अहसास पूरे हिंदुस्तान को करवाने का। अटक से कटक तक केसरिया लहराने का और हिंदू स्वराज लाने का। इस सपने को किसने पूरा किया? पेशवाओं ने, खासकर पेशवा बाजीराव प्रथम ने। 

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 19-20 साल के उस युवा ने तीन दिन तक दिल्ली को बंधक बनाकर रखा। मुगल बादशाह की लालकिले से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई। यहां तक कि 12वां मुगल बादशाह और औरंगजेब का नाती दिल्ली से बाहर भागने ही वाला था कि बाजीराव मुगलों को अपनी ताकत दिखाकर वापस लौट गया। नहीं दिखाया भंसाली ने ये सब, जबकि उनके हर तीसरे सीन में बाजीराव ये कहता दिखाया गया कि दिल्ली को तो हम कभी भी झुका देंगे। लगा था कि भंसाली मराठा साम्राज्य का वो सपना पूरा होता हुआ परदे पर दिखाएंगे, लेकिन वो चूक गए।

बाजीराव की आक्रमण शैली को ब्रिटेन में डिफेंस स्टडीज के कोर्स में आज भी पढ़ाया जाता है।

पीढ़ियां कितना जानती है महान भारतीय बाजीराव पेशवा को? 

आगे की पीढ़ियां बाजीराव को जानेंगी, भंसाली को इसका क्रेडिट मिलना चाहिए, लेकिन एक रोमांटिक हीरो की तरह जानेंगी, एक ऐसे योद्धा की तरह जानेंगी, जिसने कट्टर ब्राह्मणों से टक्कर लेकर भी अपनी मुस्लिम बीवी को बनाए रखा। बेटे का संस्कार ना करने पर उसका नाम बदलकर गुस्से में कृष्णा से शमशेर बहादुर कर दिया, इसलिए जानेंगी। जोधा अकबर की तरह बाजीराव मस्तानी को भी जाना जाएगा। लेकिन क्या वो ये जानेंगी कि हिंदुस्तान के इतिहास का बाजीराव अकेला ऐसा योद्धा था, जिसने 41 लड़ाइयां लड़ीं और एक भी नहीं हारी, जबकि शिवाजी का भी रिकॉर्ड ऐसा नहीं है। 

वर्ल्ड वॉर सेकंड में ब्रिटिश आर्मी के कमांडर रहे मशहूर सेनापति जनरल मांटगोमरी ने भी अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ वॉरफेयर’में बाजीराव की बिजली की गति से तेज आक्रमण शैली की जमकर तारीफ की है और लिखा है कि बाजीराव कभी हारा नहीं। आज वो किताब ब्रिटेन में डिफेंस स्टडीज के कोर्स में पढ़ाई जाती है। बाद में यही आक्रमण शैली सेकंड वर्ल्ड वॉर में अपनाई गई, जिसे ‘ब्लिट्जक्रिग’बोला गया। निजाम पर आक्रमण के एक सीन में भंसाली ने उसे दिखाने की कोशिश भी की है।

पूरे भारत में चलता था सिक्का? ये चाहता था भारत के लिए 

बाजीराव पहला ऐसा योद्धा था, जिसके समय में 70 से 80 फीसदी भारत पर उसका सिक्का चलता था। वो अकेला ऐसा राजा था जिसने मुगल ताकत को दिल्ली और उसके आसपास तक समेट दिया था। पूना शहर को कस्बे से महानगर में तब्दील करने वाला बाजीराव बल्लाल भट्ट था, सतारा से लाकर कई अमीर परिवार वहां बसाए गए। निजाम, बंगश से लेकर मुगलों और पुर्तगालियों तक को कई कई बार शिकस्त देने वाली अकेली ताकत थी बाजीराव की। शिवाजी के नाती शाहूजी महाराज को गद्दी पर बैठाकर बिना उसे चुनौती दिए, पूरे देश में उनकी ताकत का लोहा मनवाया था बाजीराव ने। 

आज भले ही नई पीढ़ी के सामने उसे भंसाली की फिल्म के जरिए हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल के तौर पर पेश किया गया हो, लेकिन ये कौन बताएगा कि देश में पहली बार हिंदू पद पादशाही का सिद्धांत भी बाजीराव प्रथम ने दिया था। हर हिंदू राजा के लिए आधी रात मदद करने को तैयार था वो, पूरे देश का बादशाह एक हिंदू हो, उसके जीवन का लक्ष्य ये था, लेकिन जनता किसी भी धर्म को मानती हो उसके साथ वो न्याय करता था। उसकी अपनी फौज में कई अहम पदों पर मुस्लिम सिपहसालार थे, लेकिन वो युद्ध से पहले हर हर महादेव का नारा भी लगाना नहीं भूलता था। उसे टैलेंट की इस कदर पहचान थी कि उसके सिपहसालार बाद में मराठा इतिहास की बड़ी ताकत के तौर पर उभरे। होल्कर, सिंधिया, पवार, शिंदे, गायकवाड़ जैसी ताकतें जो बाद में अस्तित्व में आईं, वो सब पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट की देन थीं।

शनिवार वाड़ाः जहां जिंदा है बल्लाल भट्ट का इतिहास।

देश को ये रियासतें दी बाजीराव ने

ग्वालियर, इंदौर, पूना और बड़ौदा जैसी ताकतवर रियासतें बाजीराव के चलते ही अस्तित्व में आईं। बुंदेलखंड की रियासत बाजीराव के दम पर जिंदा थी, छत्रसाल की मौत के बाद उसका तिहाई हिस्सा भी बाजीराव को मिला। कभी वाराणसी जाएंगे तो उसके नाम का एक घाट पाएंगे, जो खुद बाजीराव ने 1735 में बनवाया था, दिल्ली के बिरला मंदिर में जाएंगे तो उसकी एक मूर्ति पाएंगे।

कच्छ में जाएंगे तो उसका बनाया आइना महल पाएंगे, पूना में मस्तानी महल और शनिवार वाड़ा पाएंगे। अकबर की तरह उसको वक्त नहीं मिला, कम उम्र में चल बसा, नहीं तो भव्य इमारतें बनाने का उसको भी शौक था, शायद तभी आज की पीढ़ी उसको याद नहीं करती। नहीं तो अकबर के अलावा कोई और मुगल बादशाह नहीं था, जिससे उनकी तुलना बतौर योद्धा, न्यायप्रिय राजा और बेहतर प्रशासक के तौर पर की जा सके।

दिल्ली पर कर दिया था आक्रमण 

दिल्ली पर आक्रमण उसका सबसे बड़ा साहसिक कदम था, वो अक्सर शिवाजी के नाती छत्रपति शाहू से कहता था कि मुगल साम्राज्य की जड़ों यानी दिल्ली पर आक्रमण किए बिना मराठों की ताकत को बुलंदी पर पहुंचाना मुमकिन नहीं, और दिल्ली को तो मैं कभी भी कदमों पर झुका दूंगा। छत्रपति शाहू सात साल की उम्र से 25 साल की उम्र तक मुगलों की कैद में रहे थे, वो मुगलों की ताकत को बखूबी जानते थे, लेकिन बाजीराव का जोश उस पर भारी पड़ जाता था।

धीरे-धीरे उसने महाराष्ट्र को ही नहीं पूरे पश्चिम भारत को मुगल आधिपत्य से मुक्त कर दिया। फिर उसने दक्कन का रुख किया, निजाम जो मुगल बादशाह से बगावत कर चुका था, एक बड़ी ताकत था। कम सेना होने के बावजूद बाजीराव ने उसे कई युद्धों में हराया और कई शर्तें थोपने के साथ उसे अपने प्रभाव में लिया।
इधर उसने बुंदेलखंड में मुगल सिपाहसालार मोहम्मद बंगश को हराया। मुगल असहाय थे, कई बार पेशवा से मात खा चुके थे, पेशवा का हौसला इससे बढ़ता गया। 1728 से 1735 के बीच पेशवा ने कई जंगें लड़ीं, पूरा मालवा और गुजरात उसके कब्जे में आ गया। बंगश, निजाम जैसे कई बड़े सिपहसालार पस्त हो चुके थे।


बाजीराव का बचपन का सपना मुगल बादशाह को अपनी ताकत का परिचय करवाने का था।

जब बाजीराव से बुरी तरह हारा मुगलशासक 

इधर दिल्ली का दरबार ताकतवर सैयद बंधुओं को ठिकाने लगा चुका था, निजाम पहले ही विद्रोही हो चुका था। उस पर औरंगजेब के वंशज और 12वें मुगल बादशाह मोहम्मद शाह को रंगीला कहा जाता था, जो कवियों जैसी तबियत का था। जंग लड़ने की उसकी आदत में जंग लगा हुआ था। कई मुगल सिपाहसालार विद्रोह कर रहे थे। उसने बंगश को हटाकर जय सिंह को भेजा, जिसने बाजीराव से हारने के बाद उसको मालवा से चौथ वसूलने का अधिकार दिलवा दिया। मुगल बादशाह ने बाजीराव को डिप्टी गर्वनर भी बनवा दिया। लेकिन बाजीराव का बचपन का सपना मुगल बादशाह को अपनी ताकत का परिचय करवाने का था, वो एक प्रांत का डिप्टी गर्वनर बनके या बंगश और निजाम जैसे सिपहासालारों को हराने से कैसे पूरा होता। 

उसने 12 नवंबर 1736 को पुणे से दिल्ली मार्च शुरू किया। मुगल बादशाह ने आगरा के गर्वनर सादात खां को उससे निपटने का जिम्मा सौंपा। मल्हार राव होल्कर और पिलाजी जाधव की सेना यमुना पार कर के दोआब में आ गई। मराठों से खौफ में था सादात खां, उसने डेढ़ लाख की सेना जुटा ली। मराठों के पास तो कभी भी एक मोर्चे पर इतनी सेना नहीं रही थी। लेकिन उनकी रणनीति बहुत दिलचस्प थी। इधर मल्हार राव होल्कर ने रणनीति पर अमल किया और मैदान छोड़ दिया। सादात खां ने डींगें मारते हुआ अपनी जीत का सारा विवरण मुगल बादशाह को पहुंचा दिया और खुद मथुरा की तरफ चला आया।

जब दिल्ली को बनाया था तीन दिन तक बंधक 

बाजीराव को पता था कि इतिहास क्या लिखेगा उसके बारे में। उसने सादात खां और मुगल दरबार को सबक सिखाने की सोची। उस वक्त देश में कोई भी ऐसी ताकत नहीं थी, जो सीधे दिल्ली पर आक्रमण करने का ख्वाब भी दिल में ला सके। मुगलों का और खासकर दिल्ली दरबार का खौफ सबके सिर चढ़ कर बोलता था। लेकिन बाजीराव को पता था कि ये खौफ तभी हटेगा जब मुगलों की जड़ यानी दिल्ली पर हमला होगा।

सारी मुगल सेना आगरा मथुरा में अटक गई और बाजीराव दिल्ली तक चढ़ आया, आज जहां तालकटोरा स्टेडियम है, वहां बाजीराव ने डेरा डाल दिया। दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल पांच सौ घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके। देश के इतिहास में ये अब तक दो आक्रमण ही सबसे तेज माने गए हैं, एक अकबर का फतेहपुर से गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए नौ दिन के अंदर वापस गुजरात जाकर हमला करना और दूसरा बाजीराव का दिल्ली पर हमला।

बाजीराव ने तालकटोरा में अपनी सेना का कैंप डाल दिया, केवल पांच सौ घोड़े थे उसके पास। मुगल बादशाह मौहम्मद शाह रंगीला बाजीराव को लाल किले के इतना करीब देखकर घबरा गया। उसने खुद को लाल किले के सुरक्षित इलाके में कैद कर लिया और मीर हसन कोका की अगुआई में आठ से दस हजार सैनिकों की टोली बाजीराव से निपटने के लिए भेजी। बाजीराव के पांच सौ लड़ाकों ने उस सेना को बुरी तरह शिकस्त दी। ये 28 मार्च 1737 का दिन था, मराठा ताकत के लिए सबसे बड़ा दिन। कितना आसान था बाजीराव के लिए, लाल किले में घुसकर दिल्ली पर कब्जा कर लेना। लेकिन बाजीराव की जान तो पुणे में बसती थी, महाराष्ट्र में बसती थी।

वो तीन दिन तक वहीं रुका, एक बार तो मुगल बादशाह ने योजना बना ली कि लाल किले के गुप्त रास्ते से भागकर अवध चला जाए। लेकिन बाजीराव बस मुगलों को अपनी ताकत का अहसास दिलाना चाहता था। वो तीन दिन तक वहीं डेरा डाले रहा, पूरी दिल्ली एक तरह से मराठों के रहमोकरम पर थी। उसके बाद बाजीराव वापस लौट गया। बुरी तरह बेइज्जत हुआ मुगल बादशाह रंगीला ने निजाम से मदद मांगी, वो पुराना मुगल वफादार था, मुगल हुकूमत की इज्जत को बिखरते नहीं देख पाया। वो दक्कन से निकल पड़ा। इधर से बाजीराव और उधर से निजाम दोनों एमपी के सिरोंजी में मिले। लेकिन कई बार बाजीराव से पिट चुके निजाम ने उसको केवल इतना बताया कि वो मुगल बादशाह से मिलने जा रहा है।

ये मुगलों की अब तक की सबसे बड़ी हार थी और मराठों की सबसे बड़ी जीत।

जब निजाम को बुरी तरह हराया बाजीराव ने

निजाम दिल्ली आया, कई मुगल सिपहसालारों ने हाथ मिलाया और बाजीराव को बेइज्जती करने का दंड देने का संकल्प लिया और कूच कर दिया। लेकिन बाजीराव बल्लाल भट्ट से बड़ा कोई दूरदर्शी योद्धा उस काल खंड में पैदा नहीं हुआ था। ये बात साबित भी हुई, बाजीराव खतरा भांप चुका था। अपने भाई चिमना जी अप्पा के साथ दस हजार सैनिकों को दक्कन की सुरक्षा का भार देकर वो अस्सी हजार सैनिकों के साथ फिर दिल्ली की तरफ निकल पड़ा। इस बार मुगलों को निर्णायक युद्ध में हराने का इरादा था, ताकि फिर सिर ना उठा सकें।

दिल्ली से निजाम के अगुआई में मुगलों की विशाल सेना और दक्कन से बाजीराव की अगुआई में मराठा सेना निकल पड़ी। दोनों सेनाएं भोपाल में मिलीं, 24 दिसंबर 1737 का दिन मराठा सेना ने मुगलों को जबरदस्त तरीके से हराया। निजाम की समस्या ये थी कि वो अपनी जान बचाने के चक्कर में जल्द संधि करने के लिए तैयार हो जाता था। इस बार 7 जनवरी 1738 को ये संधि दोराहा में हुई। मालवा मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने पचास लाख रुपये बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे। चूंकि निजाम हर बार संधि तोड़ता था, सो बाजीराव ने इस बार निजाम को मजबूर किया कि वो कुरान की कसम खाकर संधि की शर्तें दोहराए।

ये मुगलों की अब तक की सबसे बड़ी हार थी और मराठों की सबसे बड़ी जीत। पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट यहीं नहीं रुका, अगला अभियान उसका पुर्तगालियों के खिलाफ था। कई युद्दों में उन्हें हराकर उनको अपनी सत्ता मानने पर उसने मजबूर किया। अगर पेशवा कम उम्र में ना चल बसता, तो ना अहमद शाह अब्दाली या नादिर शाह हावी हो पाते और ना ही अंग्रेज और पुर्तगालियों जैसी पश्चिमी ताकतें। बाजीराव का केवल चालीस साल की उम्र में इस दुनिया से चले जाना मराठों के लिए ही नहीं देश की बाकी पीढ़ियों के लिए भी दर्दनाक भविष्य लेकर आया। अगले दो सौ साल गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहा भारत और कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हुआ, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध पाता। आज की पीढ़ी को बाजीराव बल्लाल भट्ट की जिंदगी का ये पहलू भी जानने की जरूरत है।

लेख साभार :  amarujala.com/columns/blog/bajirao-ballal-bhat-peshwa-war-history-in-hindi-with-mughal-badshah, विष्णु शर्मा

विष्णु शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं। 2016 में अपने ऐतिहासिक विषयों पर लिखे गए ब्लॉग के लिए उन्हें एबीपी न्यूज की ओर से बेस्ट ब्लॉगर एवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। यह लेख उनकी किताब गुमनाम नायकों की गौरवशाली गाथाएं से साभार लिया गया है। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.


Tuesday, February 13, 2018

इतना प्राचीन है सनातन हिन्दू धर्म

इतना प्राचीन है सनातन हिन्दू धर्म

कोई लाखों वर्ष, तो कोई हजारों वर्ष पुराना मानता है सनातन हिन्दू धर्म को। लेकिन क्या यह सच है? आओ हम कुछ महापुरुषों की जन्म तिथियों के आधार पर जानते हैं कि कितना पुराना है सनातन हिन्दू धर्म? सनातन धर्म की पुन: शुरुआत वराह कल्प से होती है। इससे पहले पद्म कल्प, ब्रह्म कल्प, हिरण्य गर्भ कल्प और महत कल्प बीत चुके हैं।

गुरु नानक : 500 वर्ष पहले सनातन हिन्दू धर्म

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक का जन्म 15 अप्रैल 1469 को हुआ और 22 सितंबर 1539 को उन्होंने देह छोड़ दी। गुरु परंपरा के सभी 10 गुरुओं द्वारा भारत और हिन्दू धर्म रक्षित हुआ।

बाबा रामदेव : 650 साल पहले हिन्दू धर्म

बाबा रामदेव का जन्म 1352 ईस्वी में हुआ और 1385 ईस्वी में उन्होंने समाधि ले ली। द्वारिका‍धीश के अवतार बाबा को पीरों का पीर 'रामसा पीर' कहा जाता है।

झूलेलाल : 1,000 साल पहले हिन्दू धर्म

सिन्ध प्रांत के हिन्दुओं की रक्षार्थ वरुणदेव ने झूलेलाल के रूप में अवतार लिया था। पाकिस्तान में झूलेलालजी को जिंद पीर और लालशाह के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म 1007 ईस्वी में हुआ था।

गुरु गोरक्षनाथ : 1,100 साल पहले हिन्दू धर्म

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार महान योगी गुरु गोरक्षनाथ या गोरखनाथ का जन्म 845 ई. को हुआ था। 9वीं शताब्दी में गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ के मंदिर के जीर्णोद्धार होने का उल्लेख मिलता है। गोरखनाथ लंबे काल तक जीवित रहे थे।

आदिशंकराचार्य : 1,200 साल पहले हिन्दू धर्म

आदिशंकराचार्य ने हिन्दू धर्म को पुनर्गठित किया था। उनका जन्म 788 ईस्वी में हुआ और 820 ईस्वी में उन्होंने मात्र 32 वर्ष की उम्र में देह छोड़ दी थी। उन्होंने 4 पीठों की स्थापना की थी। केरल में जन्म और केदारनाथ में उन्होंने समाधि ले ली थी। वैसे चार मठों की गुरु शिष्य परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य का जन्म 508 ईसा पूर्व हुआ था। 788 ईस्वी को जिन शंकराचार्य का जन्म हुआ था वे अभिनव शंकराचार्य थे।

सम्राट हर्षवर्धन : 1,400 साल पहले हिन्दू धर्म

महान सम्राट हर्षवर्धन का जन्म 590 ईस्वी में और मृत्यु 647 ईस्वी में हुआ था। माना जाता है कि हर्षवर्धन ने अरब पर भी चढ़ाई कर दी थी, लेकिन रेगिस्तान के एक क्षेत्र में उनको रोक दिया गया। इसका उल्लेख भविष्यपुराण में मिलता है। हर्ष के शासनकाल में ही चीन यात्री ह्वेनसांग आया था।

चन्द्रगुप्त द्वितीय : 1,650 साल पहले हिन्दू धर्म

सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त थी। उनका शासन 380 ईस्वी से 412 ईस्वी तक रहा। महाकवि कालिदास उसके दरबार की शोभा थे।

सम्राट विक्रमादित्य : 2,100 साल पहले हिन्दू धर्म

विक्रमादित्य के पिता गंधर्वसेन और बड़े भाई भर्तृहरि थे। कलिकाल के 3,000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उनके काल में हिन्दू धर्म ने महान ऊंचाइयों को प्राप्त किया था। वे एक ऐतिहासिक पुरुष थे।

आचार्य चाणक्य : 2,300 साल पहले हिन्दू धर्म

चाणक्य का जन्म ईस्वी पूर्व 371 में हुआ था जबकि उनकी मृत्यु ईस्वी पूर्व 283 में हुई थी। चाणक्य का उल्लेख मुद्राराक्षस, बृहत्कथाकोश, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, बौद्ध ग्रंथ महावंश, जैन पुराण आदि में मिलता है। चाणक्य के समय ही भारत पर सिकंदर का आक्रमण हुआ था।

भगवान महावीर स्वामी : 2,650 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

जैन धर्म के पुनर्संस्थापक महावीर स्वामी का जन्म ईस्वी पूर्व 599 में हुआ था। वे जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे। उनके काल में भी हिन्दू धर्म भारत का प्रमुख धर्म था। उनके काल में ही भगवान बुद्ध (563 ईस्वी पूर्व) ने अपना एक नया धर्म स्थापित किया था।

भगवान पार्श्वनाथ : 2,850 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

भगवान महावीर स्वामी के 250 वर्ष पहले 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए थे। माना जाता है कि उनके काल में हिन्दू धर्म भारत का राजधर्म हुआ करता था। पार्श्वनाथ के समय भारत में बहुत शांति और समृद्धि थी।

भगवान श्रीकृष्ण : 5,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

ऐतिहासिक शोध के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईस्वी पूर्व मथुरा में हुआ था। जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे। गीता हिन्दुओं का प्रमुख धर्मग्रंथ है, जो कि महाभारत एक हिस्सा है।

भगवान श्रीराम : 7,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

शोधानुसार 5114 ईसा पूर्व भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। राम के जन्म के समय आकाश में पुनर्वसु नक्षत्र के दौरान 5 ग्रह अपने उच्च स्थान में थे। वाल्मीकि द्वारा बताई गई यह स्थिति आज से 7,131 वर्ष पहले निर्मित हुई थी।

वैवस्वत मनु : 8,500 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

अनुमानित रूप से 6673 ईसा पूर्व वैवस्वत मनु हुए थे। इन मनु के काल में ही जलप्रलय हुई थी। कई माह तक वैवस्वत मनु और उनके लोगों द्वारा नाव में ही गुजारने के बाद उनकी नाव गौरी-शंकर के शिखर से होते हुए जल के उतरने के साथ ही नीचे उतरी। तब फिर से धरती पर मनुष्यों का जीवन चक्र चला। माथुरों के इतिहास में उनके होने की यही तिथि लिखी है।

सम्राट ययाति : 9,000 वर्ष पूर्व हिन्दू धर्म

सम्राट ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। अनुमानित रूप से 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,217 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने-अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई। ययाति प्रजापति ब्रह्मा की 10वीं पीढ़ी में हुए थे।

स्वायम्भुव मनु : 11,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

माथुरों के इतिहास के अनुसार स्वायम्भुव मनु अनुमानित 9057 ईसा पूर्व हुए थे। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ स्वायम्भुव मनु से 5वीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वायम्भुव मनु, प्रियव्रत, अग्नीघ्र, नाभि और फिर ऋषभ। ऋषभनाथ के 2 पुत्र थे- चक्रवर्ती सम्राट भरत और बाहुबली। स्वायम्भुव मनु को धरती का पहला मानव माने जाने के कई कारण हैं। धर्मशास्त्र और प्राचेतस मनु को अर्थशास्त्र का आचार्य माना जाता है। मनुस्मृति ने सनातन धर्म को आचार संहिता से जोड़ा था।

ब्रह्मा : 14,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

अनुमानित रूप से लगभग 12,000 ईसा पूर्व भगवान ब्रह्मा के कुल की शुरुआत हुई। ब्रह्मा के प्रमुख पुत्र ये थे- मारिचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कंदर्भ, नारद, सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार, स्वायम्भुव मनु और चित्रगुप्त। मरीचि के पुत्र ऋषि कश्यप थे जिनके देवता, दैत्य, दानव, राक्षस आदि सैकड़ों पुत्र थे। ब्रह्मा को प्रजातियों की उत्पत्ति का श्रेय जाता है।

नील वराह : 16,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

कहते हैं कि लगभग 14,000 विक्रम संवत पूर्व अर्थात आज से 15,923 वर्ष पूर्व भगवान नील वराह ने अवतार लिया था। नील वराह काल के बाद आदि वराह काल और फिर श्वेत वराह काल हुए। इस काल में भगवान वराह ने धरती पर से जल को हटाया और उसे इंसानों के रहने लायक बनाया था। उसके बाद ब्रह्मा ने इंसानों की जाति का विस्तार किया और शिव ने संपूर्ण धरती पर धर्म और न्याय का राज्य कायम किया। इससे पहले लोग स्वर्ग या कहें कि देवलोक में रहते थे। हालांकि मानव तब भी था लेकिन सभ्यता की शुरुआत यहीं से मानी जाती है। इस वीडियो में उल्लेखित समय अनुमानित और पुराणों से प्राप्त हैं। हिन्दू धर्म की यह कहानी वराह कल्प से ही शुरू होती है जबकि इससे पहले का इतिहास भी पुराणों में दर्ज है जिसे मुख्य 5 कल्पों के माध्यम से बताया गया है। जम्बूद्वीप का पहला राजा स्वायम्भुव मनु ही था।

पीढ़ियों का उल्लेख

ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए। 6673 ईसा पूर्व वैवस्वत मनु हुए थे। वैवस्वत मनु के कुल की 64वीं पीढ़ी में भगवान राम हुए थे और राम के पुत्र कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत में कौरवों की ओर से लड़े थे। महाभारत का युद्ध 3000 ईस्वी पूर्व हुआ था।

प्राचीन ग्रंथों में मानव इतिहास को 5 कल्पों में बांटा गया है-(1) हमत् कल्प 1 लाख 9,800 वर्ष विक्रम संवत पूर्व से आरंभ होकर 85,800 वर्ष पूर्व तक, (2) हिरण्य गर्भ कल्प 85,800 विक्रम संवत पूर्व से 61,800 वर्ष पूर्व तक, ब्राह्म कल्प 60,800 विक्रम संवत पूर्व से 37,800 वर्ष पूर्व तक, (3) ब्रह्म कल्प 60,800 विक्रम संवत पूर्व से 37,800 वर्ष पूर्व तक, (4) पद्म कल्प 37,800 विक्रम संवत पूर्व से 13,800 वर्ष पूर्व तक और (5) वराह कल्प 13,800 विक्रम संवत पूर्व से आरंभ होकर इस समय तक चल रहा है।

अब तक वराह कल्प के स्वायम्भुव मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तामस मनु, रैवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वंतर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतरदशा चल रही है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी संवत् प्रारंभ होने से 5,630 वर्ष पूर्व हुआ था....

महामृत्युंजय मंत्र की ऊर्जा के आगे बेबस है आधुनिक क्वांटम मशीन

महामृत्युंजय मंत्र की महिमा अपार, इसकी ऊर्जा के आगे बेबस है आधुनिक क्वांटम मशीन

57 वर्षीय स्वामी निरंजनानंद सरस्वती बताते हैं कि क्वांटम मशीन में विविध मंत्रों के मानसिक और बाह्य उच्चारण के दौरान उनसे उत्पन्न ऊर्जा को क्वांटम मशीन के माध्यम से मापा गया।

चेतना, जो कि ऊर्जा की विवेकपूर्ण व संपूर्ण अभिव्यक्ति है, आज भी विज्ञान के लिए एक अबूझ पहेली है। कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस तो विज्ञान ने रच ली है, लेकिन चेतना को पढ़ पाना भी अभी दूर की बात है, इसकी रचना का तो प्रश्न ही नहीं उठता। चेतना को समझा अवश्य जा सकता है, भारतीय योगी-मनीषी इसका अभ्यास सदियों से करते आए हैं। मुंगेर, बिहार स्थित दुनिया के प्रथम योग विश्वविद्यालय में मानसिक ऊर्जा के विविध आयामों को पढ़ने के लिए उच्चस्तरीय शोध जारी है। 


जुटे हैं दुनिया के 500 वैज्ञानिक

दुनिया के चुनिंदा 50 विश्वविद्यालयों और क्वांटम फिजिक्स पर शोध करने वाली वैश्विक शोध संस्थाओं के 500 वैज्ञानिक इस शोध पर एक साथ काम कर रहे हैं, विषय है- टेलीपोर्टेशन ऑफ क्वांटम एनर्जी, यानी मानसिक ऊर्जा का परिचालन व संप्रेषण। इस शोध के केंद्र में भारतीय योग व ध्यान परंपरा का नादानुसंधान अभ्यास भी है, जिसे नाद रूपी प्राण ऊर्जा यानी चेतना के मूल आधार तक पहुंचने का माध्यम माना जाता है। बिहार योग विश्वविद्यालय के परमाचार्य पदम भूषण परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती इस शोध में मुख्य भूमिका में हैं।


मंत्रों की ऊर्जा को पढ़ने का प्रयत्न

स्वामी निरंजन बताते हैं कि मंत्र विज्ञान भी शोध के केंद्र में है। प्रत्येक मंत्र के मानसिक व बाह्य उच्चारण से उत्पन्न ऊर्जा को क्वांटम मशीन के जरिये मापा गया है। मानसिक संवाद, परह्रद संवेदन या दूरानुभूति जिसे अंग्रेजी में टेलीपैथी कहते हैं, यह विधा भारतीय योग विज्ञान का विषय रही है। मानसिक ऊर्जा के परिचालन और संप्रेषण को वैज्ञानिक आधार पर समझने का प्रयास किया जा रहा है। स्वामी निरंजन कहते हैं, संभव है कि आने वाले कुछ सालों में एक ऐसा मोबाइल सेट प्रस्तुत कर दिया जाए, जिसमें न तो नंबर मिलाने की आवश्यकता होगी, न बोलने की और न ही कान लगाकर सुनने की।


महामृत्युंजय मंत्र में सर्वाधिक ऊर्जा

57 वर्षीय स्वामी निरंजनानंद सरस्वती बताते हैं कि क्वांटम मशीन में विविध मंत्रों के मानसिक और बाह्य उच्चारण के दौरान उनसे उत्पन्न ऊर्जा को क्वांटम मशीन के माध्यम से मापा गया। इस शोध के लिए विशेष रूप से तैयार की गई क्वांटम मशीन विज्ञान जगत में अपने तरह का अनूठा यंत्र है, जिसे मुंगेर के योग रिसर्च सेंटर में लाया गया। इसके सम्मुख जब महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण किया गया तो इतनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न हुई कि इसमें लगे मीटर का कांटा अंतिम बिंदु पर पहुंचकर फड़फड़ाता रह गया। गति इतनी तीव्र थी कि यह मीटर यदि अद्र्धगोलाकार की जगह गोलाकार होता तो कांटा कई राउंड घूम जाता। सामूहिक उच्चारण करने पर तो स्थिति इससे भी कई गुना अधिक आंकी गई। महामृत्युंजय मंत्र के अलावा, गायत्री मंत्र और दुर्गा द्वात्रिंश नाम माला का स्त्रोत अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न करने वाला साबित हुआ।

ऊर्जा को संकल्प शक्ति की ओर मोड़ दें

स्वामी निरंजन कहते हैं इन तीन मंत्रों का जप सुबह उठकर और सोने से पहले सात-सात बार अवश्य करना चाहिये। इनके पाठ या जप से उत्पन्न ऊर्जा को मानसिक संकल्प लेकर संकल्प शक्ति में परिवर्तित कर देने से वांछित लाभ प्राप्त किया जा सकता है। महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से पूर्व सतत आरोग्य का संकल्प, गायत्री मंत्र से पहले प्रज्ञा के सुप्त क्षेत्रों को जागृत करने का संकल्प और दुर्गा द्वात्रिंश नाम माला का तीन बार स्त्रोत करने से पहले जीवन से दुर्गति को दूर कर शांति, प्रेम व सद्भाव की स्थापना का संकल्प लेना चाहिये।


चेतना को अभिव्यक्त कर सकते हैं...

स्वामी निरंजन कहते हैं, जहां ऊर्जा है, वहां गति होगी, वहां कंपन होगा, और कंपन से ध्वनि होगी। कुछ ध्वनियां हैं, जो हमारे कानों के श्रवण परास से नीचे हैं, तो कुछ उससे ऊपर। ये कंपन भौतिक या प्राणिक शरीर तक ही सीमित नहीं होते हैं, ये मन, भावना और बुद्धि जगत में भी विद्यमान होते हैं। जब हम चिंतन करते हैं तो मन के अंदर तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो कंपन और ध्वनियां पैदा करती हैं। भारतीय योग विज्ञान में इसे नाद कहा गया है। नाद का अर्थ है चेतना का प्रवाह। विज्ञान भी इससे पूर्णत: सहमत है कि संसार की सभी चीजें कंपनीय ऊर्जा की सतत क्रियाएं हैं। यदि हम मानसिक-तरंग-प्रतिरूप को पुनर्संयोजति, पुनस्र्थापित और प्रेषित कर सकें, तब हम चेतना को अभिव्यक्त कर सकते हैं। 


साभार:  दैनिक जागरण