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Thursday, August 23, 2012

प्राचीन भारत में (वर्तमान पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित) चिकित्सा एवं सर्जरी प्रौद्योगिकी :



* प्लास्टिक सर्जरी की उत्पत्ति ?

कई लोग प्लास्टिक सर्जरी को अपेक्षाकृत एक नई विधा के रूप में मानते हैं। प्लास्टिक सर्जरी की उत्पत्ति की जड़ें भारत से सिंधु नदी सभ्यता से 4000 से अधिक साल से जुड़ी हैं।

इस सभ्यता से जुड़े श्लोकों(भजनों) को 3000 और 1000 ई॰पू॰ के बीच संस्कृत भाषा में वेदों के रूप में संकलित किया गया है, जो हिंदू धर्म की सबसे पुरानी पवित्र पुस्तकों में हैं। इस युग को भारतीय इतिहास में वैदिक काल (5000 साल ईसा पूर्व) के रूप में जाना जाता है, जिस अवधि के दौरान चारों वेदों, अर्थात् ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद को संकलित किया गया। सभी चारों वेद श्लोक(भजन), छंद, मंत्र के रूप में संस्कृत भाषा संकलित किए गए हैं। 'सुश्रुत संहिता' अथर्ववेद का एक हिस्सा माना जाता है।

'सुश्रुत संहिता' (सुश्रुत संग्रह), जो भारतीय चिकित्सा में सर्जरी की प्राचीन परंपरा का वर्णन करता है, को भारतीय चिकित्सा साहित्य के सबसे शानदार रत्नों में से एक के रूप में माना जाता है। इस ग्रंथ में महान प्राचीन सर्जन 'सुश्रुत' की शिक्षाओं और अभ्यास का विस्तृत विवरण है, जो आज भी महत्वपूर्ण प्रासंगिक शल्य ज्ञान है।

प्लास्टिक सर्जरी का मतलब है - "शरीर के किसी हिस्से को ठीक करना।" प्लास्टिक सर्जरी में प्लास्टिक का उपयोग नहीं होता है। सर्जरी के पहले जुड़ा प्लास्टिक ग्रीक शब्द- "प्लास्टिको" से आया है। ग्रीक में "प्लास्टिको" का अर्थ होता है बनाना या तैयार करना। प्लास्टिक सर्जरी में सर्जन शरीर के किसी हिस्से के उत्तकों को लेकर दूसरे हिस्से में जोड़ता है। भारत में सुश्रुत को पहला सर्जन (शल्य चिकित्सक) माना जाता है। आज से करीब 2500 साल पहले सुश्रुत युद्ध या प्राकृतिक विपदाओं में जिनकी नाक खराब हो जाती थी उन्हें ठीक करने का काम करते थे। 'सुश्रुत' प्राचीन भारत के प्रसिद्ध ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। आयुर्वेद की एक संहिता के सुश्रुतसंहिता के प्रणेता। ये ६ठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत में पैदा हुए थे। इनको शल्य क्रिया का पितामह माना जाता है।"

* चिकित्सा एवं सर्जरी:

प्राचीन भारत में ही ऑपरेशन की कला का प्रदर्शन किया गया। जटिल से जटिल ऑपरेशनों को किया गया। इन सभी ऑपरेशनों को एक आश्चर्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए क्यूंकी सर्जरी, प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति (आयुर्वेद) की आठ शाखाओं में से एक है। सर्जरी के क्षेत्र का सबसे प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता (सुश्रुत संग्रह) है।

सुश्रुत जो काशी में रहते थे, कई भारतीय चिकित्सकों जैसे अत्रि और चरक में से एक थे। उन्होनें सबसे पहले मानव शरीर रचना विज्ञान (Human Anatomy) का अध्ययन किया था। सुश्रुत संहिता में, उन्होनें शरीर रचना विज्ञान के अध्ययन को एक मृत शरीर की सहायता से विस्तार के साथ वर्णित किया है। सुश्रुत को नासासंधान/राइनोंप्लासी (नाक की प्लास्टिक सर्जरी) और नेत्र विज्ञान (मोतियाबिंद के निष्कासन) में दक्षता प्राप्त थी। सुश्रुत ने सर्जरी (शल्य चिकित्सा) में आठ प्रकार की शल्य क्रियाएं का वर्णन किया है: छेद्य (छेदन हेतु), भेद्य (भेदन हेतु), लेख्य (अलग करने हेतु), वेध्य (शरीर में हानिकारक द्रव्य निकालने के लिए), ऐष्य (नाड़ी में घाव ढूंढने के लिए), अहार्य (हानिकारक उत्पत्तियों को निकालने के लिए), विश्रव्य (द्रव निकालने के लिए), सीव्य (घाव सिलने के लिए)।

योग शारीरिक और मानसिक पोषण के लिए व्यायाम की एक प्रणाली है। योग का मूल पुरातनता और रहस्य में डूबा हुआ है। वैदिक काल के समय हजारों साल पहले योग के सिद्धांतों और अभ्यास का संघनन हुआ था लेकिन 200 ई॰पू॰ के आसपास योग की सभी बुनियादी बातों को 'पतंजलि' द्वारा अपने ग्रंथ "योगसूत्र" में एकत्र किया गया था। पतंजलि ने सर्वप्रथम अनुमान लगाया था कि योग के अभ्यास के माध्यम से शरीर और मन को एक स्वास्थ्यप्रद बनाया जा सकता है। आधुनिक चिकित्सकों का भी मानना है कि उच्च रक्तचाप, अवसाद, भूलने की बीमारी, अम्लता सहित कई बीमारियों को योग के द्वारा नियंत्रण इया जा सकता है। भौतिक चिकित्सा में भी योग के सिद्धांतों को सम्मान और स्वीकृति मिल रही है।

प्राचीन भारत की चिकित्सा व्यवस्था इतनी उन्नत थी की इंग्लैंड की 'रॉयल सोसाइटी ऑफ सर्जन' अपने इतिहास में लिखते हैं की "हमने सर्जरी भारत से सीखी है और उसके बाद पूरे यूरोप को हमने ये सर्जरी सिखायी है।" अंग्रेजों के आने से पहले के भारत के सर्जन या वैद्य कितने योग्य थे इसका अनुमान एक घटना से हो जाता है। सन १७८१ में कर्नल कूट ने हैदर अली पर आक्रमण किया और उससे हार गया। हैदर अली ने कर्नल कूट को मारने के बजाय उसकी नाक काट कर उसे भगा दिया. भागते, भटकते कूट बेलगाँव नामक स्थान पर पहुंचा तो एक नाई सर्जन को उस पर दया आ गई। उसने कूट की नई नाक कुछ ही दिनों में बना दी। हैरान हुआ कर्नल कूट ब्रिटिश पार्लियामेंट में गया और उसने सबने अपनी नाक दिखा कर बताया कि मेरी कटी नाक किस प्रकार एक भारतीय सर्जन ने बनाई है। नाक कटने का कोई निशान तक नहीं बचा था। उस समय तक दुनिया को प्लास्टिक सर्जरी की कोई जानकारी नहीं थी। तब इंग्लॅण्ड के चिकित्सक उसी भारतीय सर्जन के पास आये और उससे शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक सर्जरी सीखी। उसके बाद उन अंग्रेजों के द्वारा यूरोप में यह प्लास्टिक सर्जरी पहुंची।

गर्व से कहो हम भारतीय हैं !
जय हिन्द, जय भारत !!



साभार : शंखनाद, धर्म और राजनीति, फेसबुक

स्मृद्ध भारतीय जन-जीवन


आज विकसित कहे जाने वाले देशों के लोग जब तन ढकने के लिये पशुओं की खालें ओढते थे और भोजन कि लिये कच्चे पक्के माँस पर ही निर्वाह करते थे तब से भी सैंकडों वर्ष पूर्व भारत को ऐक विकसित महाशक्ति के रूप में जाना जाता था। सिकन्दर के गुरु अरस्तु के अनुसार ‘भारत-विजय’ का अर्थ ही ‘विश्व-विजय’ था। भारत धरती पर जीता जागता स्वर्ग था। तब भारत के लोग विदेश जाने को तत्पर नहीं होते थे बल्कि विदेशी भारत आने के लिये ललायत रहते थे।
पुरुषार्थ से जी भर के जियो
हिन्दू जीवन का लक्ष्य धर्म के मार्ग पर चल कर कर्तव्यों का पालन करते हुये जीवन में ‘अर्थ’ और ‘काम’ की तृप्ति कर के जीवन काल में ही ‘मोक्ष’ की प्राप्ति करना था। मृत्यु के पश्चात मोक्ष का कोई अर्थ नहीं रहता। मोक्ष की प्राप्ति संन्यास से पूर्व ही होनी चाहिये नहीं तो संन्यासी बनने के पश्चात घोटालों में फंस जाने के कारण सब किया कराया भी नष्ट हो जाता है। मोक्ष प्राप्ति की होड में ‘धर्म’ की स्थानीय मर्यादाओं का उलंघन और किसी चीज़ की इति नहीं होनी चाहिये।
बिना गृहस्थाश्रम का धर्म निभाये वानप्रस्थाश्रम या संन्यासाश्रम में प्रवेश लेना उचित नहीं समझा जाता। हिन्दू समाज में स्त्री-पुरुष दोनों को ही संतान रहित होने पर ‘अधूरा’ समझा जाता है क्यों कि उन्हों ने ईश्वर के प्रति सृष्टी क्रम को प्रवाहित रखने के लिये निजि उत्तरदाईत्व का निर्वाह नहीं किया। जो स्त्री-पुरुष अपने पुरुषार्थ के भरोसे अपनी स्वाभाविक इन्द्रीय सुखों से वँचित रहे हों वह मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते।
अर्थ के बिना भी कुछ सार्थक नहीं हो सकता केवल अनर्थ ही होता है। जीवन के साधन अर्जित करना सभी का कर्तव्य है। वन में रहने वाले संन्यासी को भी कम से कम बीस-तीस वस्तुओं की आवशयक्ता निरन्तर पडती रहती है जिन की आपूर्ति का भार गृहस्थी ही उठाते हैं। अतः संसाधनों के बिना कभी मोक्ष प्राप्त नहीं होता।
धर्म, अर्थ, और काम – जीवन में तीनों का महत्व है। केवल धर्म के मार्ग पर चल कर, अर्थ और काम से वँचित रह कर मोक्ष प्राप्ति कर लेना अति कठिन है। भारत के ऋषि अपनी अपनी पत्नियों के संग ही आश्रमों में रह कर संन्यास धर्म का पालन करते रहै हैं। स्वेच्छा से संन्यासी हो जाना ऐक मानसिक अवस्था है तथा संन्यास का भौतिक दिखावा करते रहना केवल नाटकबाजी है।   
विदेशी धर्मों के मतानुसार वैवाहिक सम्बन्ध का लक्ष्य संतान उपन्न करना ही है। इस की तुलना में हिन्दू जीवन का लक्ष्य पुरुषार्थ दूारा धर्म (कर्तव्यों का निर्वाह), अर्थ (संसाधनों का सदोप्योग तथा आपूर्ति), काम (सभी प्रकार के सुख भोगना) तथा मोक्ष ( पूर्ण सँतुष्टि) की प्राप्ति है। इन सभी का समान महत्व है। किसी अवस्था में यदि धर्म, अर्थ और काम समान मात्रा में अर्जित ना किये जा सकते हों तो क्रमशाः काम, अर्थ को छोडना चाहिये। धर्म का त्याग किसी भी अवस्था में नहीं किया जा सकता क्यों कि केवल धर्म का पालन ही मोक्ष प्राप्ति करवा सकता है। निजि कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य है।
काम-सूत्र  
ऋषि वात्सायन दूारा लिखित काम-सूत्र शरीरिक सुखों के विषय पर सम्पूर्ण गृन्थ है। हिन्दू धर्म में वैवाहिक काम सम्बन्ध किसी ‘ईश्वरीय-आज्ञा’ का उलन्धन नहीं माने जाते। वह ईश्वर के प्रति मानव कर्तव्यों के निर्वाह के निमित हैं और सृष्टि के क्रम को चलाये रखने की श्रंखला के अन्तर्गत आते हैं। कामदेव को देवता माना जाता है ना कि शैतान। काम-सूत्र गृन्थ का लग भग सभी विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और भारतीय अध्यात्मिकता की तरह अपने क्षेत्र में यह गृन्थ भी सर्वत्र प्रेरणादायक है। इस से प्रेरणा ले कर शिल्पियों और चित्रकारों ने अपनी कला से विश्व भर के पर्यटकों को चकित किया है। चन्देल राजाओं दूारा निर्मित खजुरोहो के तीस मन्दिर काम-कला कृतियों को ही समर्पित हैं जो इस विषय में मानव कल्पनाओ की पराकाष्ठा दर्शाती हैं। काम को धर्म शास्त्रों की पूर्ण स्वीकृति है अतः शिल्प कृतियों में अधिकतर देवी – देवताओ को ही नायक नायकाओं के रूप में दिखाया गया है।     
हिन्दू समाज में कोई ‘तालिबानी ’ ढंग का अंकुश नहीं है। केवल धर्म और सार्वजनिक स्थलों पर सामान्य शिष्टाचार का निर्वाह करना ही आवश्यक है।  खजुरोहो कृतियों के पीछे छिपा अध्यात्मवाद और इतिहास शायद तथाकथित ‘ओवर-लिबरल’ विदेशी पर्यटकों को समझ नहीं आये गा फिर भी उन्हें स्वीकारना पडे गा कि काम-कला प्रदर्शन में भी आज से दस शताब्दी पूर्व भारतवासी योरूप्यिन लोगों से कहीं आगे थे। 
काम का क्षेत्र केवल शरीरिक सम्बन्धों तक ही सीमित नहीं है। इस के अन्तर्गत सहचर्य के अतिरिक्त अच्छा भोजन, वस्त्र, आभूषण, रहन-सहन, कला, मनोरंजन, आराम, सुगन्धित वातावरण आदि जीवन के सभी भौतिक ऐश्वर्यों के आकर्षण आ जाते हैं। धर्म की सीमा के प्रतिबन्ध के अन्तर्गत सभी कुछ हिन्दू समाज में स्वीकृत है। यही वास्तविक ‘लिबरलज़िम ’ है।
वाल्मीकि रामायण में कई भौतिक सुखों की परम्पराओ के उल्लेख देखे जा सकते हैं। ऱाजा दशरथ को प्रातः जगाने का विधान अयोध्या नगरी की भव्यता तथा ऐश्वर्य  का भान कराता है। ऋषि भारदूाज चित्रकूट मार्ग पर राजकुमार भरत तथा अयोध्या वासियों के सत्कार में ऐक भोज का प्रबन्ध अपने आश्रम में ही करते है जो किसी भी पाँचतारा होटल की ‘बैंक्विट’ से कम नहीं। ऱावण के अन्तःपुर में सीता की खोज में जब हनुमान प्रवेष करते हैं तो वहाँ के वातावरण का चित्रण अमेरिका के किसी भी नाईट-कल्ब को पीछे छोड दे गा। किन्तु ऋषि वालमीकि कहीं भी वर्णन चित्रण करते समय भव्यता और शालीनता की रेखा को नहीं लाँघते।
भारतीय खान-पान 
हिन्दू धर्म शास्त्रों में, कर्म क्षेत्र के अनुसार, समाज के सभी वर्गों के लिये, भोजन का वर्गीकरण तीन श्रेणियों में किया गया है जिसे सात्विक, राजसिक, तथा तामसिक भोजन कहते हैं। य़ह वर्गीकरण आधुनिक डायटीशियनों के विचारों से आज भी पूर्णत्या प्रमाणित हो रहा है। मनुस्मृति में भोजन परोसने, खाने तथा अन्त में हाथ और दाँत साफ करने तक की क्रियाओं का लिखित वर्णन है जैसा कि आधुनिक ‘आई ऐस ओ’ मानकशास्त्री आजकल कम्पनियों में करवाते हैं।
हिन्दू जीवन में अधिकाँश तौर पर शाकाहारी भोजन को ही प्रोत्साहन दिया जाता है किन्तु धर्म अपने अपने कर्म क्षेत्र के उत्तरदाईत्व का निर्वाह करने के लिये सभी को शाकाहारी अथवा मांसाहारी भोजन गृहण करने की स्वतन्त्रता भी देता है। आखेट के माध्यम से मांसाहारी भोजन जुटाने की अनुमति है क्यों कि इस से जीवों की व्यवसायिक मात्रा में हत्यायें नहीं होंगी। आखेट पर प्रतिबन्ध पशु-पक्षियों के प्रजन्न काल की अवधि में पालन करना अनिवार्य होता है।
जहाँ अन्य धर्मों के कुछ लोग व्यक्तिगत स्वास्थ के कारणों से मांसाहारी भोजन त्याग कर शाकाहारी बन जाते हैं, वहीं हिन्दू जीवों के प्रति संवेदनशील हो कर जीवों की रक्षा के कारण शाकाहारी बने रहते हैं। इसी तथ्य में जियो – और जीने दो का मूलमंत्र छिपा है। 
भारतवासी कई प्रकार के अनाजों का उत्पादन करते थे जिन में अनाज, दालें और फल भी शामिल हैं। चावल, बाजरा, मक्की, गेहूँ की खेती भारत में प्राचीन काल से ही करी जाती थी। भारत में आम, केले, खरबूजे, और नारियल आदि कई प्रकार के फलों के निजि कुंज भी थे। गाय पालन गौरवशाली समझा जाता था। दूध, दही, मक्खन, घी, और पनीर आदि पदार्थ दैनिक प्रयोग के घरेलू पदार्थ थे। इन तथ्यों की तुलना में अमेरिका तथा योरूप के प्रगतिशील महिलायें आज भी दालों, मसालों तथा घी का प्रयोग नहीं जानतीं। आज भी विदेशी भोजन में प्रोटीन की प्राप्ति मांसाहार या जंक-फूड से ही पूरी करते हैं।
जंगल में शिकार को आग पर भून कर खाने, और पेट भर जाने पर वहीं नाचने-गाने की आदत को आज कल ‘केम्प-फायर’ तथा ‘बारबेक्यू’ कहते हैं। नुकीले तीरों या छुरियों से भुने मांस को नोच कर खाने का आधुनिक सभ्य रूप छुरी-काँटे से खाना है। इसकी तुलना में शाकाहारी खाना सभ्यता और संस्कृति की प्रगति का बोध करवाता है।  
पाक-कला
पाक-कला को चौंसठ कलाओं की श्रेणी में रखा गया है। भारतीय विविध रीतियों से भोजन पकाना जानते थे जिस में उबलाना, सेंकना, भूनना, धीमी आँच पर पकाना, तलना, तथा धूप में सुखाना भी शामिल हैं। प्रत्येक गृहणी को मसालों के औषधीय गुणों की जानकारी थी तथा वह दैनिक जीवन में मसालों का यथोचित प्रयोग करती थीं। संतुलन बनाये रखने के विचार से दिन के प्रत्येक भोजन में छः मौलिक स्वादों (मीठा, कडुआ, खट्टा, नमकीन, तीखा और फीका) को सम्मिलित किया जाता था। यह परम्परा आज भी अधिकाँश घरों में है। भोजन के पश्चात सुगन्धयुक्त पान अर्पित करना विशिष्ट शिष्टाचार माना जाता था। गृहस्थाश्रम में मदिरा पान पर शालीनता में रहने के अतिरिक्त अन्य कोई रोक-टोक नहीं थी। इस की तुलना में अन्य देशों में केवल माँस, नान, पिज्जा या इस प्रकार के पदार्थों को आग पर भूनना ही मुख्यता आता था। आज भी उन्हें मसालों की जानकारी नहीं के बराबर है और उन का दैनिक भोजन स्वाद में लगभग फीका ही होता है।
चीनी – भारत का उतपादन
अन्य देशों नें ‘शूगर ’ शब्द भारतीय शब्द शक्करा से ही अपनाया है। इसी को अरबी भाषा में शक्कर, लेटिन में साकारम, फरैंच में साकरे, जर्मन भाषा में ज़क्कार तथा अंग्रेज़ी में शूगर कहते हैं। चीनी का निर्माण भारत ही शूगरकेन (गन्ने) से किया था। अंग्रेजी में शूगरकेन का शब्दिक अर्थ “शूगर वाला बाँस” होता है।
हिन्दू घरों में मिष्टान को सात्विक भोजन माना जाता है। देवी देवताओं को अर्पण किये जाने वाले प्रसाद मीठे ही होते हैं। मीठे दूध में चावल पका व्यंजन क्षीर (पायसम) अति पवित्र तथा संतोष जनक माना जाता है। भारत के खान पान में विभन्न प्रकार की मिठाईयों की भरमार है जिन से विश्व के अन्य समाज आज तक भी अनिभिज्ञ्य हैं। आज  भारतीय मिठाईयाँ विदेशों में भी लोकप्रिय हो रही हैं। यह भारत का दुर्भाग्य है कि कुछ मिलावटखोरों के कारण भारत में ही भारतीय मिठाईयों का स्थान चोकलेट, कुकीस और विदेशी मिठाईयों ने छीनना शुरु कर दिया है। 
भारतीय परिधान
मानव सभ्यता को कपास की खेती तथा उन से निर्मित सूती वस्त्र भी भारत की ही देन हैं। पाँच लाख वर्ष पूर्व हडप्पा के अविशेषों में चाँदी के गमले में कपास, करघना तथा सूत कातना और बुनती का पाया जाना इस कला की पूरी कहानी दर्शाता है। वैदिक साहित्य में भी सूत कातने तथा अन्य की प्रकार के साधनों के प्रयोग के उल्लेख मिलते हैं। योरूप वासियों को कपास की जानकारी ईसा से 350 वर्ष पूर्व सिकंदर महान के सैनिकों के माध्यम से हुई थी। तब तक योरूप के लोग जानवरों की खालों से तन ढांकते थे। कपास का नाम भी भारत से ही विश्व की अन्य भाषाओं में प्रचिल्लत हुआ जैसे कि संस्कृत में कर्पस, हिन्दी में कपास, हिब्रू (यहूदी भाषा) में कापस, यूनानी तथा लेटिन भाषा में कार्पोसस ।
हथ-कर्घा तथा हाथ से बुने वस्त्र आज भी भारत का गौरव हैं। आज से दो हजार वर्ष पूर्व तक मिस्र के लोग मम्मियों को भारतीय मलमल में ही लपेट कर सुरक्षित करते थे। जूलियस सीज़र के काल तक भारतीय सूती वस्त्रों का कोई भी प्रतिस्पर्धी नहीं था। भारतीय वस्त्रों के कलात्मिक पक्ष और गुणवत्ता के कारण उन्हें अमूल्य उपहार माना जाता था। खादी से ले कर सुवर्णयुक्त रेशमी वस्त्र, रंग बिरंगे परिधान, अदृष्य लगने वाले काशमीरी शाल भारत के प्राचीन कलात्मिक उद्योग का प्रत्यक्ष प्रमाण थे जो ईसा से दो सौ वर्ष पूर्व विकसित हो चुके थे। कई प्रकार के गुजराती छापों तथा रंगीन वस्त्रों का मिस्र में फोस्तात के मकबरे के में पाया जाना भारतीय वस्त्रों के निर्यात का प्रमाण है।
आरम्भ में योरूप वासी भारत की ओर गर्म मसालों के व्यापार की होड में आये थे किन्तु शीघ्र ही भारतीय परिधान उन का मुख्य व्यवसाय बन गये। कताई बुनाई के क्षेत्र में पाँच हजार वर्षों के अनुभव तथा अनुसंधान का जादु इंगलैण्ड वासियों पर इस कदर चढा कि वस्त्रों का मानव निर्मित होना असम्भव जान पडता था।
ढाके की मलमल
मलमल एक प्रकार का पतला कपड़ा होता है जो बहुत बारीक़ सूत से बुना जाता है। प्राचीनकाल में यह कपड़ा विशेषकर बंगाल और बिहार में बुना जाता था। ढाके की मलमल अपनी बारीकी और नफासत के लिए विश्व विख्यात थी। एक अंगूठी से सात थान मलमल आर-पार किया जा सकता था। ढाके के मलमल के आगे मैनचेस्टर में बने वस्त्र फीके पड़ जाने के भय से अंग्रेजों ने भारतीय बुनकरों की उंगलियां काटवा दीं थी।
बंगाली बुनकरों की मलमल इतनी निर्मल और महीन थी कि उसे चलता पानी (रनिंग वाटर) तथा सायंकालीन ओस (ईवनिंग डयू) की उपाधि दी जाती थी। बनारसी सिल्क पर सोने चाँदी के महीन तारों की नक्काशी विश्व चर्चित थी। कशमीर के पशमीना शाल एक अंगूठी में से निकाले जा सकते थे। परिधानों के रंग प्रत्येक धुलाई के पश्चात और निखरते थे।   
परिधानों, आभूष्णों तथा सौंदर्य प्रसाधनों के कारण भारतीय स्त्रियों की तुलना स्वर्ग की अप्सराओं से करी जाती थी क्यों कि वह हर प्रकार के इन्द्रीय विलास के गुणों से पूर्णत्या सम्पन्न थीं। जो लोग आज विदेशी तकनीक की वकालत करते हैं उन के लिये यह कहना प्रसंगिक होगा कि भारत के उस समृद्ध वातावरण में तब तक पाश्चात्य तकनीक की कोई छाया भी नहीं पडी थी।  
साभार :चाँद शर्मा

Monday, August 20, 2012

भारत की विश्व को साहित्यिक देन


भारत कथा साहित्य का जनक देश है। भारत रचित कथायें  आज विश्व के दूर दराज़ देशों की सभी भाषाओं और शैलियों में प्रचिलित हैं, लेकिन सुनने और पढने वालों को उन के मूल के बारे में कोई जानकारी नहीं होती।  पाश्चात्य साहित्यकारों को संस्कृत भाषा की औपचारिक जानकारी अठाहरवीं शताब्दी में मिली थी जिस के पश्चात उन को भारत की साहित्यक प्रतिभाओं का ज्ञान हुआ था। लेकिन साहित्य का हस्तान्तरण श्रुति के आधार पर इस से पूर्व ही हो चुका था। किस सीमा तक हमारी मौलिक साहित्यिक विरास्त बाहर जा चुकी है इस का कोपी-राईट के युग में आंकलन करना अब शौध का विषय है। अंग्रेजी साहित्य के जन्म से कई शताब्दियों पूर्व भारत के कथा संग्रह अपने उत्थान पर पहुँच चुके थे। अठाहरवीं शताब्दी से पूर्व विश्व साहित्य में ऐसी कोई लेखन शैलि नहीं थी जिस का जन्म भारत में नहीं हुआ था।    
भारतीय लोक कथा शैलियाँ 
बैलेड सिंगिंग - रामायण, महाभारत तथा पौराणिक कथाओं के अतिरिक्त, भारत के लोक गायक नल-दमयन्ती, राजा भर्तरि, आल्हा-उदल आदि के प्रेम, विरह, और शौर्य की गाथायें ऐकत्रित जन समूहों में गा कर सुनाया करते थे। इसी रिवाज से प्रेरणा ले कर सदियों बाद पाश्चात्य जगत में भी बैलैड सिंगिंग की शुरुआत हुई। पुराण ऐतिहासिक ग्रन्थ होने के साथ साथ कथा साहित्य के प्राचीनत्म ग्रन्थ हैं जो जन जीवन की कथायें अपनें में समेटे हुये हैं। उन कथाओं में जन जीवन चित्रण के साथ समस्या का समाधान भी दिया जाता था। भारतीय लेखक समाज सुधारक पहले भी थे और आज भी उसी परम्परा पर चल रहै हैं। उन की लेखन शैलि में नैतिकता की प्रधानता आदिकाल से रही है।
पंचतंत्र - शताब्दियों पूर्व भारत की लोक कथाओं ने योरुप, अरब तथा पूर्व ऐशिया में लोकप्रियता हासिल कर ली थी। पँचतन्त्र की कथायें, हितोपदेश तथा जातक कथाओं को यात्री अपने देशों में सुनाते रहै थे। मानव कथा साहित्य में पँचतन्त्र से अधिक किसी अन्य कथा ग्रन्थ का योगदान नहीं है। अधिकाँश भारतीयों को शायद पता भी नहीं कि बाईबल के अतिरिक्त पाश्चात्य देशों में यदि कोई पुस्तक सर्वाधिक लोकप्रिय हुई है तो वह विष्णु शर्मा रचित भारतीय साहित्य की अनमोल कृति पँचतन्त्र ही है।   
जातक कथायें -  हिन्दू आस्थाओं में पुनर्जन्म का प्रावधान अति महत्वशाली है। जातक कथाओं में भगवान बुध (बोधिसत्वः) बार बार कभी बन्दर, हिरण, हाथी, अथवा मानव के रूप में अवतरित होते हैँ और कथा के माध्यम से कोई शिक्षाप्रद संदेश देते हैं। प्रत्येक कथानाक के साराँश में शिक्षात्मक रहस्य अपने आप ही पाठकों को समझ आ जाता है।
हितोपदेश - हितोपदेश में तत्कालिक सामाजिक अवस्थाओं और जन जीवन की दैनिक घटनाओं का शिक्षाप्रद चित्रण किया गया है, जैसे कि जीवन में मित्रों का चुनाव किस प्रकार करना चाहिये, आदि। यह कथायें व्यवहारिक जीवन में सकारात्मिक मूल्यों तथा चरित्र निर्माण का श्रेष्ट स्त्रोत्र हैं।
बैताल पच्चीसी - बैताल पच्चीसी में पच्चीस कथायें हैं। बैताल राजकुमार विक्रम को प्रति रात्रि ऐक कथा सुना कर अन्त में कथा से सम्बन्धित ऐक विश्ष्ट प्रश्न पूछता है जो किसी महत्वपूण नैतिकता के बारे में होता है।
सिहासन बत्तीसी - इसी प्रकार का अन्य संग्रह सिहासन बत्तीसी है जिस में महाराज विक्रमादित्य के सिंहासन पर बनी बत्तीस पुतलियाँ बारी बारी से महाराज विक्रम के न्याय, शौर्य, या धैर्य से सम्बन्धित कोई वृतानत सुनाती हैं।
शुक-रम्भा - ऐक अन्य कथा संग्रह शुक-रम्भा है जिस में तोता और मैना स्त्री पुरुषों के प्रस्पर प्रेम सम्बन्धों, षटयन्त्रों, ईर्षा, व्याभिचार आदि की कथायें प्रति दिन सुना कर शिक्षा देने हेतु कोई प्रश्न पुछ कर समस्या का समाधान सुझाते हैं। इसी ग्रंथ का उर्दू रुपान्तर किस्सा ‘तोता-मैना ’ है।
लोक कथाओं का रूपान्तिकरण
अरब और ईरानी व्यापारियों के माध्यम से भारत की लोक कथायें तुर्की, रोम तथा योरुप के कई देशों में पहुँचीं। कुस्तुनतुनियाँ (कान्स्टीनोपल) से वह कथायें वेनिस और नेपल्स के व्यापारिक सूत्रों से योरुप और इंगलैंड पहुँची जहाँ वह बोकेशियो, चासर, केरवेन्टिस, शेक्सपियर, लिसेगे लाफोंटेनी तथा वोल्टायर आदि योरुपियन लेखकों की प्रेऱणा स्त्रोत्र बनीं। उस समय साहित्य सर्जन कोई व्यापार नहीं था और कोपी-राईट का कोई विधान नहीं था अतः प्रत्येक विदेशी कहानी लेखक ने कहानी को नयी छवि में रुपान्तरित किया और अपने देश वासियों को सुनाया। मूल कथाओं में इतने परिवर्तन होते गये कि उन की मौलिक छवि से मेल जोल के भारतीय चिन्ह मिटते चले गये। इसी का ऐक उदाहरण प्रस्तुत है।
होलैण्ड देश में समुद्र अकसर तट लाँघ कर स्थल को डुबो देता है। सुरक्षा के लिये पानी को रोकने के लिये स्थानीय लोगों ने तट के साथ साथ मिट्टी और पत्थरों की दीवार निर्माण कर दी थी। फिर भी उस अवरोध पर हर समय नजर रखनी पडती थी कि वह कहीं टूट ना जाये। कोई छोटा सा छेद भी खतरनाक हो सकता था। कई वर्ष पहले होलैण्ड में पीटर नाम का ऐक सात वर्षीय बालक रहता था। ऐक दिन पीटर की माँ ने उस को कुछ दूरी पर किसी नेत्रहीन बूढें व्यक्ति के पास कुछ केक देने के लिये भेजा और रात्रि होने से पूर्व ही लौट आने का आदेश भी दिया । घर वापिस लौटते समय पीटर ने देखा कि समुद्र की उफानी लहरें सुरक्षा दीवार के साथ टकरा रही थीं। उस के देखते ही देखते दीवार में दरार पड गयी और पानी नगर में रिसने लगा। पीटर ने अपने यत्न से दीवार में पानी का रिसाव रोकने की कोशिश की किन्तु दरार बढती गयी और रात्रि का अन्धेरा भी छाने लगा। सर्दी भी बढने लगी थी। पीटर की सहायता के लिये आस पास में कोई नहीं था। उस ने पूरी रात वहाँ अपने हाथों से ही दरार को यथासम्भव रोके रखा और प्रातः नगरवासियों ने उसे थकान के कारण निढाल अवस्था में देखा। लोगों ने दरार को बन्द किया तथा पीटर को उस के घर पर ले गये। उस का ऐक वीर नायक की तरह सम्मान किया गया। अब जब भी सागर गर्जता है तो वहाँ के लोग बच्चों को पीटर के दृष्टाँत से सिखाते हैं कि ऐक अकेला बालक भी बहुत कुछ कर सकता है। माता पिता अपने बच्चों को सागर तट पर ले जा कर पीटर की कहानी सुनाते हैं, लोक गीत गाते है जिस ने साहस कर के अपने नगर को बचा लिया था।
अब तनिक पहचानियें कुछ वैसी ही कथा हमारे प्राचीन ग्रन्थो  में बालक उपमन्यु की भी है जो ऋषि अपाद्द्योम्य के गुरुकुल में गायों की देख भाल करता था। ऐक दिन सायंकाल उपमन्यु को वन से सूखी लकडियाँ चुनने के लिये जब भेजा गया तो उस ने देखा कि गुरुकुल के खेत में जल भरता जा रहा था। उसे आशंका हुई कि यदि जल का रिसाव ना रोका गया तो प्रातः काल होने तक खेत नष्ट हो जाये गा। उपमन्यु ने पहले तो अपने यत्न से रिस्ती हुयी मेड की मरम्मत की किन्तु जब सफलता नहीं मिली तो स्वयं मेड बन कर रात भर जल में ही लेटा रहा और खेत को नष्ट होने से बचा लिया। अगले दिन गुरु तथा गुरुकुल के विद्यार्थियों ने उसे ढूंड निकाला।
दोनों लोक कथाओं में एक बालक की कर्तव्य परायणता दर्शायी गयी है। घटनायें एक जैसी हैं केवल बैकग्राऊड बदली गयी है। इसी प्रकार शेक्सपियर के नाटक मेकबेथ में मेकडफ पात्र की मृत्यु का पटाक्षेप महाभारत से प्रेरित है। कई अन्य लोकप्रिय कथायें जैसे कि हैंस ऐन्डरसन की फेयरी-टेल्स में मैजिक मिरर, जैक एण्ड दि बीन्स स्टाक, पर्स आफ फार्चुनेटस इत्यादि का मूल स्त्रोत्र भारतीय लोक कथाओं से है। कई कथाये जातक कथाओं तथा ‘कथासरितसागर’ से ली गयी हैं। अरेबियन नाईटस की भी कई कथाओं का मूल स्त्रोत्र भारतीय है। अरब इतिहासकार अलमसूद के अनुसार सिन्दबाद की विश्व प्रसिद्ध कथा ‘किताब-एल-सिन्दबाद’ का स्त्रोत्र भी भारत से है।
विश्व साहित्य पर भारतीय प्रभाव 
कथा शैली - प्रति दिन ऐक कथा सुना कर नैतिकता दर्शाने की भारतीय कथा शैली का विश्व के सभी प्राचीन कथाकारों ने प्रयोग किया है। 1350 ईस्वी में लिखी ईंगलिश साहित्य की प्रथम पुस्तक चासर कीकेन्टरबरी-टेलेस हैं जहाँ कहानी सुनाने की भारतीय शैली को अपनाया गया है। केन्टरबरी जाने वाला प्रत्येक तीर्थयात्री सराय में अपनी बारी आने पर समय काटने के लिये ऐक ऐक कहानी दूसरे यात्रियों को सुनाता है।
सूत्रधार - नाटक के कथानक के वह अँश जिन को रंग मंच पर दृष्य में दिखाना सम्भव नहीं होता था उसे कालीदास तथा अन्य भारतीय नाटक कार ‘सूत्रधार’ के माध्यम से दर्शकों को अवगत कराते थे। इसी शैली का प्रयोग शेक्सपियर ने भी सोहलवीं शाताब्दी में किया। महारानी ऐलिजाबेथ प्रथम के काल के नाटक कारों ने प्रोलोग (प्रस्तावना) तथा एपिलोग (उपसंहार) का प्रयोग भी नाटकों में किया है। वास्तव में यह प्रथा कालीदास के समय की है जब इंगलैंड वासियों को रोमन लिपि का ज्ञान ही नहीं था। विलियम शेक्सपियर के समकालीन नाटककार क्रिस्टोफर मार्लो के नाटक डाक्टर फासस्टस की प्रसिद्ध प्रस्तावना (प्रोलोग) भी कालीदास प्रेरित है।
विदूषक – नाटकों में ऐक अन्य भारतीय प्रथा ‘विदूषक’ की भूमिका थी जिस को माध्यम बना कर नाटककार अपनी निजि टिप्पणियाँ कथानक के बीच में करते रहते थे। किसी ‘मूर्ख’ के चरित्र में विदूषक नायक या नायिका का सहयोगी पात्र होता था। विदूषक की भूमिका का अन्य लक्ष्य दुखान्त भाव को हास्यरस से क्षीण (कोमिक रिलीफ) कर के दर्शकों की भावनाओं में संतुलन बनाना होता था। ऐलिजाबेथ काल के नाटकों में से मुख्यतः शेक्सपियर के ऐतिहासिक नाटकों में विदूषक फालस्टफ इसी प्रकार के पात्र है जिस की प्रेरणा के जनक कालीदास थे।
नृत्य नाटिका - रंग मंच के सभी पक्षों पर मौलिक प्राचीनत्म ग्रंथ भरत मुनि रचित नाट्यशास्त्र है जो तीसरी शताब्दी में रचा गया था। महाकाव्यों और लोक कथाओं के अतिरिक्त कथाओं का गा कर या नृत्य-नाटकों के माध्यम से प्रस्तुत करने का चलन भी भारतीय है। कालीदास को ओपेरा का जनक कहना उचित होगा। भारत में सातवीं शताब्दी से पूर्व ही नृत्य-नाटिका लोकप्रियता की प्राकाष्ठा को पहुँच चुकी थी जब कि इंगलैण्ड, आस्ट्रीया आदि योरोपियन देशों में ओपेरा का कोई नामोनिशान ही नहीं था। कालीदास के अतिरिक्त भवभूति, बाणभट्ट और स्वयं महारज हर्षवर्द्धन उच्च कोटि के नाटककार थे।
संस्कृत साहित्य प्राचीन परम्परा और आधुनिक विचारधारा को जोडने में सफल रहा है। कालीदास की शकुन्तला पर आधारित शकुन्तला ओवरचर हंगरी देश के संगीतकार कार्ल गोल्डमार्क (1830-1915) की ऐक  श्रेष्य़तम संगीत कृति है। उस के मतानुसार यदि कालीदास की भाषा इतनी सशक्त ना होती तो वैसी संगीत कला कृति की रचना असम्भव होती। लेकिन कालीदास रचित नृत्य नाटिका शैली को योरूप में फलने फूलने के लिये सोहलवीं शताब्दी तक इन्तिजार करना पडा था। 
नाटकीय चित्रण का ऐक उदाहरण कालीदास के प्रसिद्ध नाटक रघुवंशमहाकाव्यम् से यहाँ प्रस्तुत है

स्वयंवर में वर चुनने की प्रक्रिया में राजकुमारी इन्दुमती जयमाला लिए राजाओं की पंक्ति के बीच से गुजर रही है। चलती हुई दीपशिखा की भाँति इन्दुमती जिस--जिस राजा के पास से गुजर जाती थी वह राजा प्रकाश के आगे बढ़ जाने पर अंधेरी अट्टालिकाओं की तरह कांतिहीन हो जाता था। इस प्रकार के दृश्य का पूर्ववर्ती साहित्य में कहीं उल्लेख नहीं हुआ है जब कि परवर्ती फ़िल्मों और धारावाहिकों में इससे प्रेरणा लेकर आज भी यह दृश्य प्रस्तुत किया जाता है। सदियों बाद इस प्रकार के दृष्य केवल फिल्म मुगले-आजम में ही देखने को मिले थे।

साहित्य शैली का सम्पू्र्ण विकास
साहित्य सर्जन में सभी प्रकार की लेखन शैलियों जिन में श्रव्य-काव्य (जो मौखिक सुनाये जाते हैं) तथा दृष्य-काव्य जो नाटक आदि की तरह दिखाये जाते हैं का विकास भारत में ही स्वतन्त्र रूप से हुआ था। उन्ही स्वरूपों को अन्य भाषाओं ने भी बाद में अपनाया। जैसे किः-
  • गूढ रहिस्य समझाने के लिये प्रश्न-उत्तर संवाद की शैली अधिक सक्षम मानी जाती है जिसे पुराणों, उपनिष्दों तथा गीता में अपनाया गया था।
  • महाकाव्य महामानवों सम्बन्धी घटनाओं को अलंकिृत कर के दर्शाते हैं तथा उन की लेखन शैली में उपमा, तुलना और अतिश्योक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग होता है जो रामायण तथा महाभारत तथा संस्कृत नाटकों में प्रचुर मात्रा में देखे जा सकते हैं। यही प्रभाव होमर कृत ‘औडेसी’ (ग्रीक), दाँते कृत‘इलियड’ (लेटिन) और मिलटन रचित ‘पैराडाईज लोस्ट’ (इंग्लिश) के ग्रैंड-स्टाईल में देखा जा सकता है। संस्कृत भाषा के उन्हीं अलंकारों (फिगर्स आफ स्पीच) का इस्तेमाल ही अंग्रेजीं साहित्य में किया गया है जिन्हें सिमली (उपमा) कमेपेरिज़न (तुलना) और मेटाफर (अतिश्योक्ति) आदि कहा जाता है। कोई इतिहासकार या साहित्य विषेज्ञ्य यह कह कर उल्टी गंगा नहीं बहा सकता कि संस्कृत साहित्य को अलंकारों के प्रयोग की प्रेरणा अंग्रेजी साहित्यकारों ने दी थी।
  • महाकाव्यों में ‘मंगलाचरण’ दूारा प्रेरणादायक इष्ट (गणेश, सरस्वती आदि) को सर्वप्रथम अभिवादन किया जाता है। विदेशी महाकवि होमर, दाँते और मिलटन आदि ने भी उसी परम्परानुसार अपने महाकाव्यों में अपने प्रेरणादायक ‘हैवनली म्यूज’ की आराधना करी है।
  • वेदों में देवताओं, प्रकृतिक शक्तियों तथा औष्धियों को ‘सम्बोधन’ कर के उन का बखान किया गया है। इस शैली को अंग्रेज़ी में ‘ओड’ कहा जाता है जिस का प्रयोग अंग्रेजी साहित्य के रोमांटिक कवि जोन कीट्स और शौलि ने सर्वाधिक किया था जैसे कि कीट्स की ओड टू नाईटिंगेल, ग्रऐशियन अर्न, मेलंकोली और शैली की ओड टू वेस्ट विंड हैं।  
गुप्त काल के विश्व प्रसिद्ध नाटककार कालीदास को इण्डियन शेक्सपियर की उपाधि से सम्मानित होते देख कर हम भारतवासी ‘गर्व’ तो महसूस करते हैं परन्तु यह उस प्रकार है जैसे कोई पिता कहे कि उस में उस के पुत्र के सभी गुण विद्यमान हैं। आजतक किसी  भारतीय ने शेक्सपियर को ‘इंग्लैण्ड का कालीदास’ कहने का साहस नहीं किया है, क्योंकि जितना प्रेम अंग्रेज अपने शेक्सपियर से करते हैं उतना भारतीय कालीदास से नहीं करते। अंग्रेजी का गुणगान करने वालों को शायद मालूम नहीं कि आज से केवल 800 वर्ष पूर्व, तेहरवीं शताब्दी तक विश्व में अंग्रेज़ी नाम की कोई भाषा नहीं थी। अंग्रेजी के जन्म से चार सौ वर्ष पूर्व हिन्दी भाषा ने भी अपने साहित्यिक इतिहास का सवर्णमय ‘वीर-गाथा काल’  समाप्त कर के ‘भक्ति-काल’ में प्रवेश कर लिया था। पृथ्वीराज-रासो, वीसलदेव-रासो, और पद्मावत आदि महाकाव्य लिखे जा चुके थे। संत कबीर के समक्ष अंग्रेजी साहित्य में कोई भी मेटाफिजिकल कवि नहीं है। किन्तु आज भी हमारी ‘नाम-मात्र राष्ट्रभाषा’ हिन्दी भारत में ही उपेक्षित हो रही है।
साभार : चाँद शर्मा

Friday, August 17, 2012

दशावतार की परिकल्पना और राजनीतिक आंदोलन



हिंदू धर्म में दशावतार की जो कल्पना है, उसे आज का युवा समझ सके तो वह अपने जीवन को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढालने में सहजता महसूस करेगा। माना गया है कि भगवान विष्णु अलग-अलग युगों में दस अलग-अलग रूपों में अवतरित होंगे- मत्स्य अवतार से ले कर कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण और बुद्ध अवतार तक। इन अवतारों का सूक्ष्म विवेचन करें तो हम पाएंगे कि इनका क्रम हमारे शारीरिक विकास, हमारे करियर के बदलाव और समाज में जटिल होती व्यवस्थाओं के क्रम की भी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति होती है। इन अवस्थाओं में हमें किस प्रकार कार्य करना चाहिए, उसका एक स्पष्ट संकेत दशावतारों में छिपा है। 

मत्स्यावतार यानी जल की मछली, जीवन की शिशु अवस्था का प्रतीक है। इसमें व्यक्ति जल में है। उसने अभी स्थल और दुनिया देखी नहीं। कूर्मावतार यानी कछुआ जीवन की उस अवस्था प्रतीक है जब जल से निकल कर स्थल यानी कठोर धरातल पर धीमी गति से शुरुआत की जाए। यही बाल्यकाल है। वाराहावतार अर्थात सुअर द्वारा धरती को सागर से बाहर निकालने का कथानक जीवन की किशोरावस्था है। नृसिंह अवतार तरुण से युवा अवस्था के मध्य की अवस्था है।  
इसके बाद वामन, परशुराम, राम, कृष्ण और बुद्ध जैसे सभी अवतार गहरे सामाजिक और राजनैतिक चिंतन के कूट प्रतीक हैं। वे दिखाते हैं कि जब आप कार्यकारी जीवन में प्रवेश करते हैं तो समाज में किस प्रकार से परिस्थितियां आपके सामने आती हैं और आपको कैसे अपने व्यक्तित्व को उनके अनुसार ढालना पड़ता है। आज के युवाओं को जीवन में इन चारों अवस्थाओं को पार करना होगा। 

वामन अवतार में केवल भिक्षा मांगने मात्र से राजा बलि का मान मर्दन हो जाता है और पूरा ब्रह्मांड उनसे छिन जाता है। यह उद्धरण उस अवस्था को दिखाता है जब आप अपना करियर प्रारंभ कर रहे हों। अर्थात आपको मांग कर अपने लिए एक स्थान बनाना है। बड़े से बड़े व्यक्ति को अपने छोटे से दिखने वाले व्यक्तित्व का एहसास कराना है। फिर परशुराम अवतार अर्थात समस्त शस्त्रों को धारण कर अकेले युद्ध लड़ना। आपके करियर के उस भाग को दर्शाता है जब आपको वन मैन आर्मी के रूप में विरोधियों पर स्वयं विजय पानी है। जब आप अपना एक स्थान बना लेते हैं तब राम की तरह मर्यादा के अनुसार युद्ध करना है। व्यवस्था का नेतृत्व करना है। आप शीर्ष स्तर पर आ जाते हैं तो आपको भगवान कृष्ण की ओर देखना है। अब आपको युद्ध के मध्य खडे़ तो रहना है परंतु युद्ध करना नहीं है। उसे गाइड करना है। फिर जब आप बुजुर्ग होकर रिटायर हो जाते हैं तब आप भगवान बुद्ध के अवतार की तरफ देखिए। अब न तो युद्ध करना है और न ही रणभूमि में जाना है। आपको शांतिपूर्वक एकांत में रहकर अनुभवों के आधार पर ऐसे कल्याणकारी सुझाव देने हैं जो दूसरों के मार्गदर्शक बन सकें। 

करियर के विविध अवसरों पर हमारे भीतर की क्षमता प्रारंभ में भगवान वामन के समान भक्ति युक्त होनी चाहिए। फिर भगवान परशुराम और भगवान राम के समान शक्ति से और आगे चलकर भगवान कृष्ण के समान युक्ति से युक्त होनी चाहिए। अंत में भगवान बुद्ध के समान अनासक्त रहते हुए मुक्ति के लिए प्रवृत्त होनी चाहिए। 

अवतारों का यह क्रम राजनैतिक दृष्टि से भी समाज में क्रमश: जटिल होते हुए राजनैतिक समीकरणों और परिस्थितियों का एक तर्कसंगत प्रतीक प्रस्तुत करता है। वामन के बाद भगवान परशुराम का अवतार आता है जो स्वयं ही सभी शस्त्रों को धारण कर रहे हैं और अकेले युद्ध कर रहे हैं। यह राजनीति की वह व्यवस्था इंगित करता है जब मानव समाज आदिम स्थिति में था। तब नेतृत्व करने के लिए किसी भी व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से स्वयं युद्ध करना पड़ता था। स्वयं ही शस्त्रों को धारण करना पड़ता था। युद्ध और शस्त्र संचालन की क्षमता ही नेतृत्व का मुख्य आधार थी। विश्व के इतिहास में कबीलाई युग के सभी समाज ऐसी ही राजनीति के प्रतीक थे। 

इसके बाद राम अवतार आता है। यह राजनीति के स्तर और जटिल व परिपक्व हो जाने का प्रतीक है। इसमें नेतृत्व करने के लिए अकेले युद्ध करना पर्याप्त नहीं है। संगठित सेना द्वारा विशिष्ट मूल्यों के माध्यम से सेनानायक सेना को प्रेरित करता है और फिर नेतृत्व कर सत्ता पाना राजनीति का मूल मंत्र हो जाता है। विश्व के इतिहास में सिकंदर से लेकर किंग चार्ल्स, चंगेज खां, मुगल और नेपोलियन से लेकर हिटलर तक राजनीति के इसी सिद्धांत के उदाहरण हैं। यह उस स्तर को दर्शाता है, जब सत्ता प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष युद्ध की बजाय नेतृत्व करने वाले को कुछ मूल्यों और सिद्धांतों के आधार पर प्रेरित करना होता है। जरूरी नहीं है कि नेता बहुत अच्छा योद्धा हो, उसे युद्ध भूमि अर्थात आंदोलित समाज में मार्ग दर्शन करना है। आधुनिक युग में 20वीं शताब्दी की कई ऐतिहासिक क्रांतियां ऐसी ही हैं। लेनिन और माओ के नाम इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। 

भगवान कृष्ण के बाद बुद्ध का अवतार आता है। कृष्ण ने शस्त्र नहीं उठाया था परंतु युद्ध भूमि में उपस्थित रहे थे। बुद्ध का अवतार इसके आगे की राजनीति दर्शाता है, क्योंकि बुद्ध युद्ध क्षेत्र में भी नहीं जाते। वे अपने स्थान पर बैठकर जनता के मध्य में जाकर कुछ मूल्यों के द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करते हैं कि बगैर युद्ध के सत्ता परिवर्तन होने लगता है। आधुनिक युग में महात्मा गांधी का आंदोलन, अमेरिका में माटिर्न लूथर किंग का संघर्ष और दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के आंदोलन द्वारा हुए सत्ता परिवर्तन ऐसी राजनीति के उदाहरण हैं। बुद्ध अवतार कहीं न कहीं विश्व में वर्तमान में स्थापित लोकतांत्रिक व्यवस्था की राजनीति का प्रतीक है। 

दशावतार की अवधारणा में छिपे राजनैतिक विकास क्रम की जटिलता व परिपक्वता के गूढ़ संदेश को पढ़ कर वर्तमान और भविष्य की राजनीति को समझने के लिए एक अच्छा उपकरण मिल सकता है। आधुनिक भारत में गांधी ने जो धारा प्रारंभ की थी, उसी परंपरा में जेपी और आज अन्ना और रामदेव के आंदोलन राजनीति के इसी विकास क्रम की सफलता को इंगित करते हैं। 

साभार : गौरी राय, फेस बुक 


Wednesday, August 15, 2012

देववाणी संस्कृत भाषा


संस्कृत विश्व की सब से प्राचीन भाषा है तथा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है। संस्कृत का शाब्दिक अर्थ है परिपूर्ण भाषा। संस्कृत पू्र्णतया वैज्ञायानिक तथा सक्षम भाषा है। संस्कृत भाषा के व्याकरण नें विश्व भर के भाषा विशेषज्ञ्यों का ध्यानाकर्षण किया है तथा उन के मतानुसार भी यह भाषा कम्पयूटर के उपयोग के लिये सर्वोत्तम भाषा है। 
मूल ग्रंथ
संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी लिपि है। इस भाषा को ऋषि मुनियों ने मन्त्रों की रचना कि लिये चुना क्योंकि इस भाषा के शब्दों का उच्चारण मस्तिष्क में उचित स्पन्दन उत्पन्न करने के लिये अति प्रभावशाली था। इसी भाषा में वेद प्रगट हुये, तथा उपनिष्दों, रामायण, महाभारत और पुराणों की रचना की गयी। मानव इतिहास में संस्कृत का साहित्य सब से अधिक समृद्ध और सम्पन्न है। संस्कृत भाषा में दर्शनशास्त्र, धर्मशास्त्र, विज्ञान, ललित कलायें, कामशास्त्र, संगीतशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, हस्त रेखा ज्ञान, खगोलशास्त्र, रसायनशास्त्र, गणित, युद्ध कला, कूटनिति तथा महाकाव्य, नाट्य शास्त्र आदि सभी विषयों पर मौलिक तथा विस्तरित गृन्थ रचे गये हैं। कोई भी विषय अनछुआ नहीं बचा।
पाणनि रचित अष्याध्यायी
किसी भी भाषा के शब्दों का शुद्ध ज्ञान व्याकरण शास्त्र कराता है। पाणनि कृत अष्याध्यायी संस्कृत की व्याकरण ईसा से 300 वर्ष पूर्व रची गयी थी। स्वयं पाणनि के कथनानुसार अष्टाध्यायी से पूर्व लग भग साठ व्याकरण और भी उपलब्द्ध थे।अष्याध्यायी विश्व की सब से संक्षिप्त किन्तु पूर्ण व्याकरण है। इस में भाषा का विशलेषण कर के शब्द निर्माण के मूल सिद्धान्त दर्शाये गये हैं। अंक गणित की पद्धति का प्रयोग कर के सभी शब्दों की रचना के सिद्धान्त संक्षिप्त में ही सीखे जा सकते हैं। संस्कृत में शब्द निर्माण पूर्णत्या वैज्ञानिक और तर्क संगत है। उदाहरण के लिये सिंहः शब्द हिंसा का प्रतीक है इस लिये हिंसक पशु को सिहं की संज्ञा दी गयी है। इसी प्रकार सम्पूर्ण विवरण स्पष्ट, संक्षिप्त तथा सरल हैं।
भाषा विज्ञान के क्षेत्र में पाणनि रचित अष्याध्यायी निस्संदेह ऐक अमूल्य देन है। अष्टाध्यायी के आठ अध्याय और चार हजार सूत्र हैं जिन में विस्तरित ज्ञान किसी कम्प्रेस्सड  कमप्यूटर फाईल की तरह भरा गया है। उन में स्वरों (एलफाबेट्स) का विस्तृत विशलेषण किया गया है। इस का ऐक अन्य आश्चर्यजनक पक्ष यह भी है कि अष्टाध्यायी का मूल रूप लिखित नही था अपितु मौखिक था। उसे समर्ण रखना होता था तथा श्रुति के तौर पर पीढी दर पीढी हस्तांत्रित करना होता था। अभी अष्टाध्यायी के लिखित संस्करण उपलब्द्ध हैं, और व्याख्यायें भी उपलब्द्ध हैं। किन्तु फिर भी शब्दों की मूल उत्पत्ति को स्मर्ण रखना आवश्यक है। संस्कृत व्याकरण के ज्ञान के लिये अष्टाध्याय़ी मुख्य है।
पाणनि के पश्चात कात्यायन तथा पतंजलि जैसे व्याकरण शास्त्रियों ने भी इस ज्ञान को आगे विकसित किया था। उन के अतिरिक्त योगदान से संस्कृत और सुदृढ तथा विकसित हुयी और प्राकाष्ठा तक पहुँच कर बुद्धिजीवियों की सशक्त भाषा रही है 
संस्कृत भाषा की वैज्ञ्यानिक्ता
प्राचीन काल से ही भारत का भाषा ज्ञान ग्रीक तथा इटली से कहीं अधिक श्रेष्ठ तथा वैज्ञिानिक था। भारत के व्याकरण शास्त्रियों ने योरूपियन भाषा विशेषज्ञ्यों को शब्द ज्ञान का विशलेषण करने की कला सिखायी। यह तब की बात है जब अपने आप को आज के युग में सभी से सभ्य कहने वाले अंग्रेज़ों को तो बोलना भी नहीं आता था। आज से ऐक हजार वर्ष पूर्व वह उधार में पायी स्थानीय अपभ्रंश भाषाओं में ‘योडलिंग’ कर के ऐक दूसरे से सम्पर्क स्थापित किया करते थे। अंग्रेजी साहित्य का इतिहास 1350 से चासर रचित ‘केन्टरबरी टेल्स’ के साथ आरम्भ होता है जिसे ‘फादर आफ इंग्लिश पोयट्री’ कहा जाता है। विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेज़ी के साथ संस्कृत की सीमित तुलना ही कुछ इस प्रकार करें तो संस्कृत की वैज्ञ्यानिक प्रमाणिक्ता के लिये हमें विदेशियों के आगे गिडगिडाने की कोई आवश्क्ता नहीं हैः-
  • वर्ण-माला - व्याकरण में किसी भी छोटी से छोटी ध्वनि को वर्ण या अक्षर कहते हैं और वर्णों के समूह  वर्णमाला। अंग्रेजी में कुल 26 वर्ण (एलफाबेट्स) हैं जिस का अर्थ है कि 26 शुद्ध ध्वनियों को ही लिपिबद्ध किया जा सकता है। यह 26 ध्वनियां भी प्राकृतिक नहीं है जैसे कि ऐफ़, क्यू, डब्लयू, ऐक्सआदि एलफाबेट्स को छोटे बच्चे आसानी से नहीं बोल सकते हैं। इस की तुलना में संस्कृत वर्णमाला में 46 अक्षर हैं जो संख्या में अंग्रेज़ी से लगभग दुगने हैं और प्राकृतिक ध्वनियों पर आधारित हैं।
  • स्वर और व्यञ्जनों की संख्या - अंग्रेजी और संस्कृत दोनों भाषाओं में अक्षरों को स्वर (कान्सोनेन्ट्स) और व्यञ्जन (वोवल्स) की श्रेणी में बाँटा गया है। स्वर प्राकृतिक ध्वनियाँ होती हैं। व्यञ्जनों का प्रयोग प्राकृतिक ध्वनियों को लम्बा या किसी वाँछित दिशा में घुमाने के लिये किया जाता है जैसे का, की कू चा ची चू आदि। अंग्रेजी भाषा में केवल पाँच वोवल्स हैं जबकि संस्कृत में उन की संख्या 13 है। विश्व की अन्य भाषाओं की तुलना में संस्कृत के स्वर और व्यंजनो की संख्या इतनी है कि सभी प्रकार की आवाजों को वैज्ञानिक तरीके से बोला तथा लिपिबद्ध किया जा सकता है।
  • सरलता - अंग्रेज़ी भाषा में बहुत सी ध्वनियों को जैसे कि ख, ठ. ढ, क्ष, त्र, ण आदि को वैज्ञ्यानिक तरीके से लिखा ही नहीं जा सकता। अंग्रेज़ी में के ऐ टी – ‘कैट’ लिखना कुछ हद तक तो माना जा सकता है क्यों कि वोवल ‘ऐ’ का उच्चारण भी स्थाई नहीं है और रिवाज के आधार पर ही बदलता रहता है। लेकिन सी ऐ टी – ‘केट’ लिखने का तो कोई वैज्ञ्यानिक औचित्य ही नहीं है। इस के विपरीत देवनागरी लिपि का प्रत्येक अक्षर जिस प्रकार बोला जाता है उसी प्रकार ही लिखा जाता है। अंग्रेज़ी का ‘डब्लयू’ किसी प्राकृतिक आवाज को नहीं दर्शाता, ना ही अन्य अक्षर ‘व्ही’ से कोई प्रयोगात्मिक अन्तर को दर्शाता है। दोनो अक्षरों के प्रयोग और उच्चारण का आधार केवल परम्परायें हैं, वैज्ञ्यानिक नहीं। अतः सीखने में संस्कृत अंग्रेज़ी से कहीं अधिक सरल भाषा है।
  • उच्चारण – कहा जाता है अरबी भाषा को कंठ से और अंग्रेजी को केवल होंठों से ही बोला जाता है किन्तु संस्कृत में वर्णमाला को स्वरों की आवाज के आधार पर कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अन्तःस्थ और ऊष्म वर्गों में बाँटा गया है। फिर शरीर के उच्चारण अंगों के हिसाब से भी दन्तर (ऊपर नीचे के दाँतों से बोला जाने वाला), तलबर (जिव्हा से), मुखोपोत्दर (ओष्ट गोल कर के), कंठर ( गले से) बोले जाने वाले वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। अंग्रेजी में इस प्रकार का कोई विशलेशण नहीं है सब कुछ रिवाजानुसार है।
यह संस्कृत भाषा की अंग्रेज़ी भाषा की तुलना में सक्ष्मता का केवल संक्षिप्त उदाहरण है। 1100 ईसवी तक संस्कृत समस्त भारत की राजभाषा के रूप सें जोडने की प्रमुख कडी थी।
भारत की सांस्कृतिक पहचान
प्रत्येक व्यक्ति, जाति तथा राष्ट्र की पहचान उस की वाणी से होती है। आज संसार में इंग्लैण्ड जैसे छोटे से देश की पहचान ऐक साम्राज्य वादी शक्ति की तरह है तो वह अंग्रेज़ी भाषा की बदौलत है जिसे उधार ली भाषा होने के बावजूद अंग्रेज़ जाति ने राजनैतिक शक्ति का प्रयोग कर के विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के तौर पर स्थापित कर रखा है। इस की तुलना में इच्छा शक्ति और आत्म सम्मान की कमी के कारण संसार की ऐक तिहाई जनसंख्या होने के बावजूद भी भारतवासी अपनी तथाकथित ‘राष्ट्रभाषा’ हिन्दी को विश्व में तो दूर अपने ही देश में ही स्थापित नहीं कर सके हैं। हमारे पूर्वजों ने तो हमें बहुत कुछ सम्मानजनक विरासत में दिया था परन्तु यह ऐक शर्मनाक सच्चाई है कि हमारी वर्तमान पीढियाँ पूर्वजों दूारा अर्जित  गौरव के बोझ को सम्भाल पाने में असमर्थ रही हैं। उसी गौरव की ऐक उपलब्द्धी संस्कृत भाषा है जिस की आज भारत में ही उपेक्षा की जा रही है। 
हम मुफ्त में अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि संस्कृत की गूंज कुछ साल बाद अंतरिक्ष में सुनाई दे सकती है। अमेरिका संस्कृत को 'नासा' की भाषा बनाने की कसरत में जुटा है क्योंकि संस्कृत ऐसी प्राकृतिक भाषा है, जिसमें सूत्र के रूप में कंप्यूटर के जरिए कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में भेजा जा सकता है।
रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं। दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्तकरने के लिए जुटे हैं, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय भारत में नहीं है। हमारे देश में तो इंग्लिश बोलना शान की बात मानी जाती है। इंग्लिश नहीं आने पर लोग आत्मग्लानि अनुभव करते है जिस कारण जगह जगह इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स चल रहें है।
भारत की सरकार और लोगों को भी अब जागना चाहिए और अँग्रेजी की गुलामी से बाहर निकाल कर अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करना चाहिए। भारत सरकार को भी 'संस्कृत' को नर्सरी से ही पाठ्यक्रम में शामिल करके देववाणी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाना चाहिए। केवल संस्कृत ही भारत के प्राचीन इतिहास तथा विज्ञान को वर्तमान से जोडने में सक्षम है। यदि हम भारत में संस्कृत की अवहेलना करते रहे तो हम अपने समूल को स्वयं ही नष्ट कर दें गे जो सृष्टि के निर्माण काल से वर्तमान तक की अटूट कडी है। नहीं तो फिर हमें संस्कृत सीखने के लिये विदेशों में जाना पडे गा। 
साभार : चाँद शर्मा