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Tuesday, November 18, 2014

खुद को बचाने के लिए सूर्य मंदिर ने बदल ली थी दिशा 150,000 year old surya temple changed direction from east to west




बिहार के औरंगाबाद जिले के देव स्थित ऎतिहासिक त्रेतायुगीन पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर अपनी विशिष्ट कलात्मक भव्यता के साथ साथ अपने इतिहास के लिए भी विख्यात है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया है। देव स्थित भगवान भास्कर का विशाल मंदिर अपने अप्रतिम सौंदर्य और शिल्प के कारण सदियों श्रद्धालुओं, वैज्ञानिकों, मूर्ति चोरों, तस्करों एवं आमजनों के लिए आकर्षण का केन्द्र है।

डेढ़ लाख वर्ष पुराना है यह सूर्य मंदिर

काले और भूरे पत्थरों की नायाब शिल्पकारी से बना यह सूर्यमंदिर उड़ीसा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर से मिलता जुलता है। मंदिर के निर्माणकाल के संबंध में उसके बाहर ब्राही लिपि में लिखित और संस्कृत में अनुवादित एक श्लोक जड़ा है जिसके अनुसार 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेता युग के बीत जाने के बाद इलापुत्र परू रवा ऎल ने देव सूर्य मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया। शिलालेख से पता चलता है कि सन् 2014 ईस्वी में इस पौराणिक मंदिर के निर्माण काल को एक लाख पचास हजार चौदह वर्ष पूरे हो गए हैं।

विश्व का एकमात्र पश्चिमाभिमुख सूर्यमंदिर है

देव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल (प्रात:) सूर्य, मध्याचल (दोपहर) सूर्य, और अस्ताचल (अस्त) सूर्य के रूप में विद्यमान है। पूरे देश में यही एकमात्र सूर्य मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है। करीब एक सौ फीट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। बिना सीमेंट अथवा चूना-गारा का प्रयोग किए आयताकार, वर्गाकार, आर्वाकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार आदि कई रू पों और आकारों में काटे गए पत्थरों को जोड़कर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक एवं विस्मयकारी है। जनश्रुतियों के आधार पर इस मंदिर के निर्माण के संबंध में कई किंवदतियां प्रसिद्ध है जिससे मंदिर के अति प्राचीन होने का स्पष्ट पता तो चलता है।

सूर्य पुराण में भी है इस मंदिर की कहानी

सूर्य पुराण के अनुसार ऎल एक राजा थे, जो किसी ऋषि के शापवश श्वेत कुष्ठ रोग से पीडित थे। वे एक बार शिकार करने देव के वनप्रांत में पहुंचने के बाद राह भटक गए। राह भटकते भूखे-प्यासे राजा को एक छोटा सा सरोवर दिखाई पडा जिसके किनारे वे पानी पीने गए और अंजुरी में भरकर पानी पिया। पानी पीने के क्रम में वे यह देखकर घोर आश्चर्य में पड़ गए कि उनके शरीर के जिन जगहों पर पानी का स्पर्श हुआ उन जगहों के श्वेत कुष्ठ के दाग जाते रहे। इससे अति प्रसन्न और आश्चर्यचकित राजा अपने वस्त्रों की परवाह नहीं करते हुए सरोवर के गंदे पानी में लेट गए और इससे उनका श्वेत कुष्ठ रोग पूरी तरह जाता रहा।

शरीर में आशर्चजनक परिवर्तन देख प्रसन्नचित राजा ऎल ने इसी वन में रात्रि विश्राम करने का निर्णय लिया। रात्रि में राजा को स्वप्न आया कि उसी सरोवर में भगवान भास्कर की प्रतिमा दबी पड़ी है। प्रतिमा को निकालकर वहीं मंदिर बनवाने और उसमे प्रतिष्ठित करने का निर्देश उन्हें स्वप्न में प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि राजा ऎल ने इसी निर्देश के मुताबिक सरोवर से दबी मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित कराने का काम किया और सूर्य कुंड का निर्माण कराया लेकिन मंदिर यथावत रहने के बावजूद उस मूर्ति का आज तक पता नहीं है। जो अभी वर्तमान मूर्ति है वह प्राचीन अवश्य है, लेकिन ऎसा लगता है मानो बाद में स्थापित की गई हो। 

देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक ही रात में बनाया था सूर्य मंदिर

मंदिर निर्माण के संबंध में एक कहानी यह भी प्रचलित है कि इसका निर्माण एक ही रात में देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने अपने हाथों किया था। कहा जाता है कि इतना सुंदर मंदिर कोई साधरण शिल्पी बना ही नहीं सकता। इसके काले पत्थरों की नक्काशी अप्रतिम है और देश में जहां भी सूर्य मंदिर है, उनका मुंह पूर्व की ओर है, लेकिन यही एक मंदिर है जो सूर्य मंदिर होते हुए भी प्रात:कालीन सूर्य की रश्मियों का अभिषेक नहीं कर पाता वरन अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें ही मंदिर का अभिषेक करती हैं।

जनश्रुति है कि एक बार बर्बर लुटेरा काला पहाड़ मूर्तियों एवं मंदिरों को तोड़ता हुआ यहां पहुंचा तो देव मंदिर के पुजारियों ने उससे काफी विनती की कि इस मंदिर को न तोडें क्योंकि यहां के भगवान का बहुत बड़ा महात्म्य है। इस पर वह हंसा और बोला यदि सचमुच तुम्हारे भगवान में कोई शक्ति है तो मैं रात भर का समय देता हूं तथा यदि इसका मुंह पूरब से पश्चिम हो जाए तो मैं इसे नहीं तोडूंगा। पुजारियों ने सिर झुकाकर इसे स्वीकार कर लिया और वे रातभर भगवान से प्रार्थना करते रहे। सबेरे उठते ही हर किसी ने देखा कि सचमुच मंदिर का मुंह पूरब से पश्चिम की ओर हो गया था और तब से इस मंदिर का मुंह पश्चिम की ओर ही है। हर साल चैत्र और कार्तिक के छठ मेले में लाखों लोग विभिन्न स्थानों से यहां आकर भगवान भास्कर की आराधना करते हैं भगवान भास्कर का यह त्रेतायुगीन मंदिर सदियों से लोगों को मनोवांछित फल देने वाला पवित्र धर्मस्थल रहा है। यूं तो सालों भर देश के विभिन्न जगहों से लोग यहां मनौतियां मांगने और सूर्यदेव द्वारा उनकी पूर्ति होने पर अर्ध्य देने आते हैं।

साभार : पत्रिका 


Friday, September 26, 2014

Ramayan and Sanatan(Hindu) Tradition In Muslim countries:

मुस्लिम राष्ट्र मलेशिया का राष्ट्रीय महाकाव्य हिकायत सेरी रामा है। यह रामायण का मलय भाषा का प्रतिरूप है। इसमें राम को सेरी राम और सीता को सीती देवी कहा गया है। वहां के राष्ट्रपति और मंत्री सेरी राम पादुका धूलि के नाम पर अपने पद की शपथ लेते हैं और समूचा शासन श्रीराम के नाम पर चलाते हैं। यहां तक कि यदि वहां पर कोई बड़ी मस्जिद बनानी होती है तो उसकी राजाज्ञा सेरी राम पादुका के नाम पर जारी की जाती है। इस्लामिक देश होने के बावजूद वहां के राष्ट्रपति को राजा परमेश्वर और उनकी पत्नी को राजा परमेश्वरी के नाम से पुकारा जाता है।

वहां के 9 सुल्तानों के प्रत्येक के दूसरे पुत्र का नाम लक्ष्मण रखा जाता है बौद्ध  देश थाईलैंड की राजधानी का नाम पहले अयुथ्या था। जिसे बाद में मॉडर्न लुक देने के लिए बैंकाक कर दिया गया। वहां के सबसे बड़े शहर का नाम लवपुरी है। वहां का राष्ट्रीय महाकाव्य रामकीयन है, जोकि रामायण का ही थाई प्रतिरूप है। थाईलैंड के राजा अपने नाम के साथ राम शब्द जरूर जोड़ते हैं। साउथ ईस्ट एशिया के देश लाओस का नाम भगवान श्री राम के बड़े बेटे लव के नाम पर पड़ा। जो बाद में बिगड़ते- बिगड़ते लव से लाओस हो गया।

बर्मा देश का नाम भगवान ब्रह्मा के नाम पर रखा गया। सिंगापुर का नाम संस्कृत से निकले सिंहों के देश के नाम पर सिंगापुर रखा गया। अरब कंट्री ब्रुनेई की राजधानी का नाम हनुमान के नाम पर बांदर श्री भगवान रखा गया है। वर्ष 1997 में आयोजित हुए दक्षिण पूर्वी एशियाई खेलों के शुभंकर हनुमान थे। दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर कंबोडिया देश के अंगकोरवाट शहर में है

दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम राष्ट्र इंडोनेशिया का राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह गरुड़ और सरकारी एयरलाइन गरुड़ एयरलाइन है। वहां की सरकारी करंसी पर दिवंगत राष्ट्रपति सुकार्णो के साथ गणेश का फोटो छपा रहता है। इंडोनेशिया की राजधानी का नाम राम की लंका विजय के उपलक्ष्य में जयकर्ता रखा गया था। जो धीरे - धीरे बिगड़कर जकार्ता हो गया। वहां के राष्ट्रीय महाकाव्य रामायण और महाभारत हैं।

देश की सभी यूनिवर्सिटियों में स्टूडेंट्स के लिए इन दोनों महाग्रंथों को पढ़ना अनिवार्य है। इंडोनेशिया में कई द्वीपों का नाम रामायण के पात्रों पर है। यहां पर लक्ष्मण की माता सुमित्रा के नाम पर सुमात्रा और सुग्रीव के नाम पर सुरब्य द्वीप व बाली द्वीप हैं। वहां के लोगों को अपनी इस विचित्र स्थिति पर कोई विरोधाभास भी प्रतीत नहीं होता है। वे गर्व से बताते हैं कि हमारा मजहब इस्लाम है लेकिन संस्कृति रामायण है। हम इसे किसी सूरत में नहीं छोड़ सकते।








Thursday, September 25, 2014

नरेंद्र मोदी यात्रा : अमेरिका एक हिन्दू देश है...


121 वर्ष पहले स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए थे और आज नरेंद्र दामोदर मोदी अमेरिका गए हैं। नरेंद्र मोदी की योग और ध्यान में गहरी रुचि है और उन्होंने अपने जीवन का कुछ समय संन्यासी रहकर भी बिताया है। विवेकानंद के जाने से लेकर तब से लेकर अब तक सबकुछ बदल चुका है। अमेरिका कई वर्षों पहले ही भौतिकवाद से ऊब गया है, लेकिन भारत में अब भौतिकवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है और इसके दुष्परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। अमेरिका भारत की राह पर चल पड़ा है और भारत भौतिकवादी अमेरिका की राह पर। हम में से कुछ तथाकथित बुद्धिवादी, धर्मांतरित और साम्यवादी लोग हिन्दू धर्म और इसकी परंपरा व त्योहारों को गाली बकते हैं। यही हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है। लेकिन सच तो यह है कि आध्यात्मिक रूप से अमेरिका की आत्मा अब भारतीय होती जा रही है। कुछ तो अब कहने लगे हैं कि अमेरिका एक हिन्दू देश है... 
भारत ने ज्ञान, धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में हमेशा से हर देश को मात दी, लेकिन आज भारत हर देश का अनुसरण करने लगा है। प्राचीन ग्रीक और योरपीयन दर्शन पर स्पष्ट रूप से भारतीय वेद और दर्शन का प्रभाव देखा जा सकता है। मध्यकाल में अमेरिका, रशिया, चीन और ब्रिटेन ने भारतीय ज्ञान के बल पर ही खुद का दर्शन और विज्ञान खड़ा किया।

लगभग 2 करोड़ से ज्यादा अमेरिकन योग और ध्यान करते हैं और उनकी हिन्दू और बौद्ध धर्म में गहरी आस्था है। ये वे अमेरिकी हैं जिनका भारत से कोई संबंध नहीं है, लेकिन वैदिक संस्कृति के प्रभाव से वैदिक जीवन जीने वाले हिन्दू बने हैं। इनका किसी भी रूप में कोई धर्मांतरण नहीं किया गया फिर भी ये सभी हिन्दू धर्म में गहरी आस्था रखते हैं और ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। भारतीय हिन्दू धर्म किसी को धर्म-परिवर्तन के लिए नहीं कहता बल्कि सबके कल्याण की बात करता है। इस कल्याण के मार्ग में वह किसी भी धर्म को बाधक नहीं मानता।

भारतीय संत स्वामी विवेकानंद, महेश योगी, वेदांत स्वामी, परमहंस योगानंद, महर्षि अरविंद, ओशो रजनीश, जड्डु कृष्णमूर्ति आदि संतों ने अमेरिका को भारतीय अध्यात्म से परिचित कराया और वहां भारतीय दर्शन एवं वेदांत का प्रसार किया। ऐसा कहना है प्रख्यात अमेरिकी लेखक और आध्यात्मिक गुरु और 'अमेरिकन वेदाज' पुस्तक के लेखक फिलिप गोल्डबर्ग का। फिलिप आध्यात्मिक काउंसलर, मेडिटेशन टीचर, वेद ज्ञाता हैं।

लेकिन यह एक आधा सच है, ये सारे संत तो आज से 60-70 वर्ष पूर्व ही अमेरिका गए थे। दरअसल, अमेरिका के दार्शनिक, कवि और साहित्यकार भारतीय दर्शन और अध्यात्म से अच्छी तरह वाकिफ थे। उन्होंने वेदों सहित भारत के महान दार्शनिकों के ज्ञान का अध्ययन कर अपना खुद का एक नया दर्शन गढ़ा था। 

राल्फ वाल्डो इमर्सन : बोस्टन के रहने वाले इमर्सन (1803-1882) का नाम सभी साहित्य और दर्शन को पढ़ने वाले लोग जानते ही होंगे। ये दार्शनिक होने के साथ-साथ प्रसिद्ध निबंधकार, वक्ता तथा कवि थे। इमर्सन भारतीय दर्शन, वेद और गीता के प्रकांड विद्वान थे। उनके लेखन में इसकी झलक मिलती है। 
इमर्सन ने अपने ग्रंथ 'स्वेडनबर्ग' में माया, कर्मफल एवं पुनर्जन्म के सिद्धांतों को हिन्दू दर्शन की पृष्ठभूमि पर समझाने का प्रयास किया है। वे लिखते हैं, 'जीवात्मा को हजारों बार जन्म लेना पड़ता है, जब तक कि वह अपने सभी दुष्कृत्यों से मुक्ति नहीं पा लेता। किन्हीं-किन्हीं को प्रयास करने पर अथवा अध्यात्म उपचारों द्वारा अथवा अनायास ही पूर्वजन्मों की स्मृति भी बनी रहती है, पर सृष्टा ने हर जन्म के बाद भूलने का ही सिद्धांत बनाया है। पुनर्जन्म के प्रसंग मात्र पौराणिक निरर्थक नहीं, वरन यथार्थ हैं।' उनके ये विचार ख्रीस्त (ईसाई) विचारधारा के विरुद्ध थे।

अपनी पहली पुस्तक 'नेचर' (1836) में आपने थोथी ईसाइयत तथा अमेरिकी भौतिकवाद की कड़ी आलोचना की। इसके लिए उनको कुछ ईसाई कट्टरपंथियों का विरोध भी झेलना पड़ा।

1857 में इमर्सन ने एक कविता लिखी थी जिसका नाम 'ब्रह्म' था। इमर्सन की इस कविता तथा अन्य रचनाओं में गीता, उपनिषद अन्य हिन्दू दर्शन व धर्मग्रंथों के अध्ययन की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इमर्सन के विचारों ने अमेरिकी दर्शन और विज्ञान की दिशा मोड़ दी।

डेविड हेनरी थोरो : इनकी एक प्रसिद्ध पुस्तक है- वाल्डेन। वाल्डेन रूस की एक नदी का नाम है। थोरो बहुत अमीर व्यक्ति थे। वे भोगवादी जीवन से ऊब गए थे। उन्होंने सबकुछ छोड़कर जंगल में संन्यासियों की तरह जीवन बिताने का निश्चय किया। क्यों? 

डेविड हेनरी थोरो ने अपनी एक किताब 'लाइफ इन दी वुड्स' में लिखा है, 'बंगला, गाड़ी, प्रसिद्धि, पद और पैसा प्राप्त करने के बाद भी जीवन से सुकून चला जाता है तो समझो तुम असफल हो। सफलता इस बात में निहित है कि तुम कितने निडर और सुकून से जी रहे हो। मुझे प्यार, पैसा या नाम मत दो, अगर कुछ दे सकते हो तो सत्य दो।' थोरो के मन में ऐसे विचार कहां से आए? महात्मा गांधी थोरो को अपना आदर्श मानते थे जबकि थोरो वेदों को अपना आदर्श मानते थे।

हेनरी डेविड थोरो अमेरिका के विख्यात समाज-सुधारक थे। वे 'सिविल डिसओबिडियेंस मूवमेंट' के जनक थे जिनसे गांधी ने अपना सविनय अवज्ञा आंदोलन' लिया था। थोरो के पास गीता के अलावा भारतीय दार्शनिकों की कई किताबें थीं, जो उन्होंने भारत से मंगवाई थीं। थोरो ने वेदों की कई जगहों पर खुलकर प्रशंसा की है।

अमेरिकी जनता मानती है कि भारतीय दर्शन और अध्यात्म बहुत ही समृद्ध है। यहां के संगीत में भी एक तरह का दर्शन महसूस होता है। आज अमेरिकी शिक्षा-पद्धति में परिवर्तन आ रहा है और इस परिवर्तन पर भारतीय दर्शन या भारतीयता की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। लाखों अमेरिकियों ने भारतीय अध्यात्म एवं दर्शन का अध्ययन किया है। भारतीय दर्शन और अध्यात्म का प्रभाव अमेरिका और पश्चिमी देशों पर स्पष्ट दिखाई देता है। भारत अपने शाश्वत जीवन-मूल्यों की रक्षा और उत्कृष्टता के लिए जाना जाता है और अमेरिकी जनता इससे बहुत प्रभावित है। अमेरिकियों का मानना है कि किसी भी कीमत पर शाश्वत मूल्यों से पीछे नहीं हटना चाहिए

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Wednesday, September 24, 2014

ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि व अत्री के कुल



मरीचि : महर्षि मरीचि ब्रह्मा के अन्यतम मानसपुत्र और एक प्रधान प्रजापति हैं। इन्हें द्वितीय ब्रह्मा ही कहा गया है। ऋषि मरीचि पहले मन्वंतर के पहले सप्तऋषियों की सूची के पहले ऋषि है। यह दक्ष के दामाद और शंकर के साढू थे।

इनकी पत्नि दक्ष- कन्या संभूति थी। इनकी दो और पत्निनयां थी- कला और उर्णा। संभवत: उर्णा को हीधर्मव्रता भी कहा जाता है जो एक ब्राह्मण कन्या थी। दक्ष के यज्ञ में मरीचि ने भी शंकर का अपमान किया था। इस पर शंकर ने इन्हें भस्म कर डाला था।

इन्होंने ही भृगु को दण्डनीति की शिक्षा दी है। ये सुमेरु के एक शिखर पर निवास करते हैं और महाभारत में इन्हें चित्रशिखण्डी कहा गया है। ब्रह्मा ने पुष्करक्षेत्र में जो यज्ञ किया था उसमें ये अच्छावाक् पद पर नियुक्त हुए थे। दस हजार श्लोकों से युक्त ब्रह्मपुराण का दान पहले-पहल ब्रह्मा ने इन्हीं को किया था। वेद और पुराणों में इनके चरित्र का चर्चा मिलती है। 

मरीचि ने कला नाम की स्त्री से विवाह किया और उनसे उन्हें कश्यप नामक एक पुत्र मिला। कश्यप की माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और ऋषि कपिल देव की बहन थी। ब्रह्मा के पोते और मरीचि के पुत्र कश्यप ने ब्रह्मा के दूसरे पुत्र दक्ष की 13 पुत्रियों से विवाह किया। मुख्यत इन्हीं कन्याओं से सृष्टि का विकास हुआ और कश्यप सृष्टिकर्ता कहलाए।

कश्यय पत्नी- अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्ठा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि। महर्षि कश्यप को विवाहित 13 कन्याओं से ही जगत के समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। वे लोकमाताएं कही जाती हैं। इन माताओं को ही जगत जननी कहा जाता है।

यहां यह बताना जरूरी है कि बहुत से विद्वान मानते हैं कि कश्यप ने दक्ष की 17 कन्याओं से विवाह किया था लेकिन ऐसा नहीं है। वो तार्क्ष्य कश्यप थे जिन्होंने विनीता कद्रू, पतंगी और यामिनी से विवाह किया था। इस तरह ये 17 कन्याएं होती है, लेकिन कुछ विद्वान सभी को कश्यप की पत्नी मान कर लिखते हैं। कश्यप ऋषि ने दक्ष की सिर्फ 13 कन्याओं से ही विवाह किया था।

कश्यप की पत्नी अदिति से आदित्य (देवता), दिति से दैत्य, दनु से दानव, काष्ठा से अश्व आदि, अरिष्ठा से गंधर्व, सुरसा से राक्षस, इला से वृक्ष, मुनि से अप्सरागण, क्रोधवशा से सर्प, ताम्रा से श्येन-गृध्र आदि, सुरभि से गौ और महिष, सरमा से श्वापद (हिंस्त्र पशु) और तिमि से यादोगण (जलजंतु) की उत्पत्ति हुई।

कश्यप के आदिति से 12 आदित्य पुत्रों का जन्म हुए जिनमें विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। राजा इक्ष्वाकु के कुल में जैन और हिन्दू धर्म के महान तीर्थंकर, भगवान, राजा, साधु महात्मा और सृजनकारों का जन्म हुआ है।

वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- 1.इल, 2.इक्ष्वाकु, 3.कुशनाम, 4.अरिष्ट, 5.धृष्ट, 6.नरिष्यन्त, 7.करुष, 8.महाबली, 9.शर्याति और 10.पृषध।

* ब्रह्मा के प्रमुख पुत्र :- 1. मरीचि, 2. अत्रि, 3. अंगिरस, 4. पुलस्त्य, 5. पुलह, 6. कृतु, 7. भृगु, 8. वशिष्ठ, 9. दक्ष, 10. कर्दम, 11. नारद, 12. सनक, 13. सनन्दन, 14. सनातन, 15. सनतकुमार, 16. स्वायम्भुव मनु और शतरुपा, 17. चित्रगुप्त, 18. रुचि, 19. प्रचेता 20. अंगिरा आदि।

* ब्रह्मा की प्रमुख पुत्रियां :- 1. सावित्री, 2. गायत्री, 3. श्रद्धा, 4. मेधा और 5. सरस्वती हैं।

* 10 प्रजापति : ब्रह्मा के 59 पुत्रों में से 10 पुत्र प्रजापति बने- 1. मरीचि, 2. अत्रि, 3. अंगिरा, 4. पुलस्त्य, 5. पुलह, 6. कृतु, 7. भृगु, 8. वशिष्ठ, 9. दक्ष और 10. कर्दम।

ब्रह्मा जी के पुत्र अत्री का कुल 


इनसे जन्मे- भारत, यादव, मलेच्छ और यवन - ब्रह्मा के दूसरे पुत्र अत्रि का कुल


अत्रि : अत्रि ने ब्रह्मा पुत्र कर्दम की पुत्री अनुसूया से विवाह किया था। अनुसूया की माता का नाम देवहूति था। अत्रि को अनुसूया से एक पुत्र जन्मा जिसका नाम दत्तात्रेय था। अत्रि-दंपति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा, महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में आविर्भूत हुए। इनके ब्रह्मावादिनी नाम की कन्या भी थी।

अत्रि पुत्र चन्द्रमा ने बृहस्पति की पुत्री  तारा से विवाह किया जिससे उसे बुध नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बाद में क्षत्रियों के चंद्रवंश का प्रवर्तक हुआ। इस वंश के राजा खुद को चंद्रवंशी कहते थे। चूंकि चंद्र अत्रि ऋषि की संतान थे इसलिए आत्रेय भी चंद्रवंशी ही हुए। ब्राह्मणों में एक उपनाम होता है आत्रेय अर्थात अत्रि से संबंधित या अत्रि की संतान।

चंद्रवंश के प्रथम राजा का नाम भी सोम माना जाता है जिसका प्रयाग पर शासन था। अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से यति, ययाति, संयाति, आयति, वियाति और कृति नामक छः महाबल-विक्रमशाली पुत्र हुए।

नहुष के बड़े पुत्र यति थे, जो संन्यासी हो गए इसलिए उनके दुसरे पुत्र ययाति राजा हुए। ययाति के पुत्रों से ही समस्त वंश चले। ययाति के 5 पुत्र थे। देवयानी से यदु और तर्वासु तथा शर्मिष्ठा से द्रुह्मु, अनु एवं पुरु हुए। तर्वासु से भोन (यवन), द्रुह्म से मलेच्छ (मिस्र-अरबी) तथा पुरु से सबसे प्रतापी पुरुवंश चला। अनु का वंश ज्यादा नहीं चला।

* ययाति के 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुह्मु।

ययाति ने दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु को (पंजाब से उत्तरप्रदेश तक), पश्चिम में द्रुह्मु को, दक्षिण में यदु को (आज का सिंध प्रांत) और उत्तर में अनु को माण्डलिक पद पर नियुक्त किया तथा पुरु को संपूर्ण भूमंडल के राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं वन को चले गए। हालांकि पुरु के राज्य में संपूर्ण कश्मीर और जम्मू सहित हिमालय और तिब्बत का क्षेत्र था। यरुशलम से काशी तक इन 5 कुल का ही शासन था।

1. पुरु का वंश : पुरु वंश में कई प्रतापी राजा हुए उनमें से एक थे भरत और सुदास। इसी वंश में शांतनु हुए जिनके पुत्र थे भीष्म। पुरु के वंश में ही अर्जुन पुत्र अभिमन्यु हुए। इसी वंश में आगे चलकर परीक्षित हुए जिनके पुत्र थे जन्मजेय।

2. यदु का वंश : यदु के कुल में भगवान कृष्ण हुए। 

3. तुर्वसु का वंश : तुर्वसु के वंश में भोज (यवन) हुए। ययाति के पुत्र तुर्वसु का वह्नि, वह्नि का भर्ग, भर्ग का भानुमान, भानुमान का त्रिभानु, त्रिभानु का उदारबुद्धि करंधम और करंधम का पुत्र हुआ मरूत। मरूत संतानहीन था इसलिए उसने पुरु वंशी दुष्यंत को अपना पुत्र बनाकर रखा था। परंतु दुष्यंत राज्य की कामना से अपने ही वंश में लौट गए।

महाभारत के अनुसार ययाति पुत्र तुर्वसु के वंशज यवन थे। पहले ये क्षत्रिय थे, पर ब्राह्मणों से द्वेष रखने के कारण इनकी गिनती शूद्रों में होने लगी। महाभारत युद्ध में ये कौरवों के साथ थे। इससे पूर्व दिग्विजय के समय नकुल और सहदेव ने इन्हें पराजित किया था।

4. अनु का वंश : अनु को ऋ‍ग्वेद में कहीं-कहीं आनव भी कहा गया है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह कबीला परुष्णि नदी (रावी नदी) क्षेत्र में बसा हुआ था। आगे चलकर सौवीर, कैकेय और मद्र कबीले इन्हीं आनवों से उत्पन्न हुए थे।

5. द्रुह्मु का वंश : द्रुह्मु के वंश में राजा गांधार हुए। ये आर्यावर्त के मध्य में रहते थे बाद में द्रहुओं को इक्ष्वाकु कुल के राजा मंधातरी ने मध्य एशिया की ओर खदेड़ दिया गया। पुराणों में द्रुह्यु राजा प्रचेतस के बाद द्रुह्युओं का कोई उल्लेख नहीं मिलता। प्रचेतस के बारे में लिखा है कि उनके 100 बेटे अफगानिस्तान से उत्तर जाकर बस गए और 'म्लेच्छ' कहलाए।

ययाति के पुत्र द्रुह्यु से बभ्रु का जन्म हुआ। बभ्रु का सेतु, सेतु का आरब्ध, आरब्ध का गांधार, गांधार का धर्म, धर्म का धृत, धृत का दुर्मना और दुर्मना का पुत्र प्रचेता हुआ। प्रचेता के सौ पुत्र हुए, ये उत्तर दिशा में म्लेच्छों (अरबों) के राजा हुए।

* यदु और तुर्वस को दास कहा जाता था। यदु और तुर्वस के विषय में ऐसा माना जाता था कि इंद्र उन्हें बाद में लाए थे। सरस्वती दृषद्वती एवं आपया नदी के किनारे भरत कबीले के लोग बसते थे। सबसे महत्वपूर्ण कबीला भरत का था। इसके शासक वर्ग का नाम त्रित्सु था। संभवतः सृजन और क्रीवी कबीले भी उनसे संबद्ध थे। तुर्वस और द्रुह्म से ही यवन और मलेच्छों का ‍वंश चला। इस तरह यह इतिहास सिद्ध है कि ब्रह्मा के एक पु‍त्र अत्रि के वंशजों ने ही यहुदी, यवनी और पारसी धर्म की स्थापना की थी। इन्हीं में से ईसाई और इस्लाम धर्म का जन्म हुआ। यहुदियों के जो 10 कबीले थे उनका संबंध द्रुह्मु से ही था। हालांकि यह शोध का विषय है।

संदर्भ : वेद, पुराण, महाभारत, साभार: वेबदुनिया

Monday, September 22, 2014

कृष्ण और बौद्ध काल के बीच के खोए हुए पन्ने



मध्‍यकाल में भारतीय इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा गया। तक्षशिला और पाटलीपुत्र के ध्वंस के बाद महाभारत युद्ध और बौद्ध काल के बीच के हिंदू इतिहास के अब बस खंडहर ही बचे हैं। विदेशी इतिहासकारों ने जानबूझकर इस काल के इतिहास को विरोधाभासी बनाया। क्योंकि उन्हें भारत में नए धर्म को स्थापित करना था। दरअसल बुद्ध के पूर्व के संपूर्ण इतिहास को नष्ट किए जाने का संपूर्ण प्रयास किया गया। इस धूमिल से इतिहास को इतिहासकारों ने खुदाईयों और ग्रंथों की खाक छानते हुए क्रमबद्ध करने का प्रयास किया है।

हड़प्पा, सिंधु और मोहनजोदड़ों सभ्यता का प्रथम चरण 3300 से 2800 ईसा पूर्व, दूसरा चरण 2600 से 1900 ईसा पूर्व और तीसरा चरण 1900 से 1300 ईसा पूर्व तक रहा। इतिहासकार मानते हैं कि यह सभ्यता काल 800 ईस्वी पूर्व तक चलता रहा। 

प्रथम चरण के काल में महाभारत हुई, दूसरे चरण के काल में मिस्र के फराओं और भारत के कुरु और पौरवो के राजवंश थे। तीसरे चरण में यहूदी धर्म के संस्थापक इब्राहिम, मूसा, सुलेमान ने यहूदी वंशों का निर्माण किया तो भारत में सभी वंशों के 16 महाजनपदों का उदय हुआ। हड़प्पा से पहले सिंधु नदी के आसपास मेहरगढ़ की सभ्यता का अस्तित्व था। उससे पूर्व मध्यप्रदेश में भीमबेटका में भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता को खोजा गया जिसका काल 9000-7000 ईसा पूर्व था। यहां गुफाओं में कुछ शैलचित्र ऐसे भी मिले हैं जिनकी उम्र कार्बनडेटिंग अनुसार 35 हजार ईसा पूर्व की मानी गई है।

सिंधु या मोहनजोदड़ो के काल में इराक में सुमेरी और मिस्र में सबाइन सभ्यता सबसे विकसित सभ्यता थी। मोहदजोदड़ों हड़प्पा से मिलने वली मुहरें, बर्तन, भित्तिचित्र आदि ईरान, मिस्र और इराकी सभ्यताओं में पाई गई मुहरों आदि से मिलती जुलती है। सिंधु घाटी की कई मोहरें सुमेरिया से मिली है जिससे यह भी सिद्ध होता है कि इस देश के उस काल में भारत से संबंध थे।

2800 से 1900 ईसापूर्व के बीच भारत में किन राजवंशों का राज था इसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। इस काल में धर्म का केंद्र हस्तीनापुर, मधुरा आदि से हटकर तक्षशिला हो गया था। अर्थात पेशावर से लेकर हिंदुकुश के इलाके में बहुत तेजी से परिवर्तन हो रहे थे।

1300 ईसा पूर्व भारत 16 महाजनपदों में बंटा गया- 1. कुरु, 2. पंचाल, 3. शूरसेन, 4. वत्स, 5. कोशल, 6. मल्ल, 7. काशी, 8. अंग, 9. मगध, 10. वृज्जि, 11. चे‍दि, 12. मत्स्य, 13. अश्मक, 14. अवंति, 15. गांधार और 16. कंबोज। अधिकांशतः महाजनपदों पर राजा का ही शासन रहता था, परंतु गण और संघ नाम से प्रसिद्ध राज्यों में लोगों का समूह शासन करता था। इस समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था।

महाभारत के बाद धीरे-धीरे धर्म का केंद्र तक्षशिला (पेशावर) से हटकर मगध के पाटलीपुत्र में आ गया। गर्ग संहिता में महाभारत के बाद के इतिहास का उल्लेख मिलता है। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा तक्षशिला और पाटलीपुत्र के संहार किए जाने के कारण महाभारत से बुद्धकाल तक के इतिहास का अस्पष्ट उल्लेख मिलता है।

यह काल बुद्ध के पूर्व का काल है, जब भारत 16 जनपदों में बंटा हुआ था। हर काल में उक्त जनपदों की राजधानी भी अलग-अलग रही, जैसे कोशल राज्य की राजधानी अयोध्या थी तो बाद में साकेत और उसके बाद बौद्ध काल में श्रावस्ती बन गई।

महाभारत युद्ध के पश्चात पंचाल पर पाण्डवों के वंशज तथा बाद में नाग राजाओं का अधिकार रहा। पुराणों में महाभारत युद्ध से लेकर नंदवंश के राजाओं तक 27 राजाओं का उल्लेख मिलता है।

महाभारत काल के बाद अर्थात कृष्ण के बाद हजरत इब्राहीम का काल ईस्वी पूर्व 1800 है अर्थात आज से 3813 वर्ष पूर्व का अर्थात कृष्ण के 1400 वर्ष बाद ह. इब्राहीम का जन्म हुआ था। यह उपनिषदों का काल था। ईसा से 1000 वर्ष पूर्व लिपिबद्ध किए गए छांदोग्य उपनिषद में महाभारत युद्ध के होने का जिक्र है।

हजरत इब्राहीम के काल में वेद व्यास के कुल के महान संत 'सुतजी' थे। इस काल में वेद, उपनिषद, महाभारत और पुराणों को फिर से लिखा जा रहा था। सुतजी और इब्राहीम का काल थोड़ा-बहुत ही आगे-पीछे रहा।

इस काल में उत्तर वैदिक काल की सभ्यता का पतन होना शुरू हो गया था। इस काल में एक और जहां जैन धर्म के अनुयायियों और शासकों की संख्‍या बढ़ गई थी वहीं धरती पर यहूदियों के वंश विस्तार की कहानी लिखी जा रही थी। हजरत इब्राहीम इस इराक का क्षेत्र छोड़कर सीरिया के रास्ते इसराइल चले गए थे और फिर वहीं पर उन्होंने अपने वंश और यहूदी धर्म का विस्तार किया। 

इस काल में भरत, कुरु, द्रुहु, त्रित्सु और तुर्वस जैसे राजवंश राजनीति के पटल से गायब हो रहे थे और काशी, कोशल, वज्जि, विदेह, मगध और अंग जैसे राज्यों का उदय हो रहा था। इस काल में आर्यों का मुख्य केंद्र 'मध्यप्रदेश' था जिसका प्रसार सरस्वती से लेकर गंगा दोआब तक था। यही पर कुरु एवं पांचाल जैसे विशाल राज्य भी थे। पुरु और भरत कबीला मिलकर 'कुरु' तथा 'तुर्वश' और 'क्रिवि' कबीला मिलकर 'पंचाल' (पांचाल) कहलाए।

अंतिम राजा निचक्षु : महाभारत के बाद कुरु वंश का अंतिम राजा निचक्षु था। पुराणों के अनुसार हस्तिनापुर नरेश निचक्षु ने, जो परीक्षित का वंशज (युधिष्ठिर से 7वीं पीढ़ी में) था, हस्तिनापुर के गंगा द्वारा बहा दिए जाने पर अपनी राजधानी वत्स देश की कौशांबी नगरी को बनाया। इसी वंश की 26वीं पीढ़ी में बुद्ध के समय में कौशांबी का राजा उदयन था। निचक्षु और कुरुओं के कुरुक्षेत्र से निकलने का उल्लेख शांख्यान श्रौतसूत्र में भी है। 

जन्मेजय के बाद क्रमश: शतानीक, अश्वमेधदत्त, धिसीमकृष्ण, निचक्षु, उष्ण, चित्ररथ, शुचिद्रथ, वृष्णिमत सुषेण, नुनीथ, रुच, नृचक्षुस्, सुखीबल, परिप्लव, सुनय, मेधाविन, नृपंजय, ध्रुव, मधु, तिग्म्ज्योती, बृहद्रथ और वसुदान राजा हुए जिनकी राजधानी पहले हस्तिनापुर थी तथा बाद में समय अनुसार बदलती रही। बुद्धकाल में शत्निक और उदयन हुए। उदयन के बाद अहेनर, निरमित्र (खान्दपनी) और क्षेमक हुए।

मगध वंश में क्रमश: क्षेमधर्म (639-603 ईपू), क्षेमजित (603-579 ईपू), बि‍म्बिसार (579-551), अजातशत्रु (551-524), दर्शक (524-500), उदायि (500-467), शिशुनाग (467-444) और काकवर्ण (444-424 ईपू) ये राजा हुए।

नंद वंश में नंद वंश उग्रसेन (424-404), पण्डुक (404-294), पण्डुगति (394-384), भूतपाल (384-372), राष्ट्रपाल (372-360), देवानंद (360-348), यज्ञभंग (348-342), मौर्यानंद (342-336), महानंद (336-324)। इससे पूर्व ब्रहाद्रथ का वंश मगध पर स्थापित था।

अयोध्या कुल के मनु की 94 पीढ़ी में बृहद्रथ राजा हुए। उनके वंश के राजा क्रमश: सोमाधि, श्रुतश्रव, अयुतायु, निरमित्र, सुकृत्त, बृहत्कर्मन्, सेनाजित, विभु, शुचि, क्षेम, सुव्रत, निवृति, त्रिनेत्र, महासेन, सुमति, अचल, सुनेत्र, सत्यजित, वीरजित और अरिञ्जय हुए। इन्होंने मगध पर क्षेमधर्म (639-603 ईपू) से पूर्व राज किया था।

साभार: वेबदुनिया