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Thursday, March 21, 2013

आदिवाराह - प्रतिहार




तद्वंशे प्रतिहार केतान्भ्रुती त्रैलोक्य रक्षास्पदे
देवो नागभट पुरातन मुनेर्भुतिर्ववाद्भुतम ।
येनासो सुकृत्प्रमार्थिर्बल्न म्लेच्छ-धिपाक्शोहीनिः
क्शुन्दानास्फुर दुग्रहेतिरुचिरैर्दोश्च्तुर्भिर्वभौ ।। 


युगों पूर्व हिरण्याक्ष नामक असुर ने धरती को रसातल मे डुबो दिया था, तब धरती को पाताल से मुक्त करने हेतु भगवान् वाराह ने हिरण्याक्ष का वध किया और धरती को पाताल से बाहर निकाल कर उसका उद्धार किया,जिसप्रकार वे धरती के रक्षक कहलाये ।

यही एक कारण था,की प्रतिहार शासक आदिवाराह नाम से जाने लगे,उनकी राजमुद्रा पर भी वराह का रूप अंकित उन्होंने करवाया क्योंकि वे भी भगवान् वाराह की तरह हिन्दुभूमि को म्लेच्छो के काल-पाश में जाने से बचा पाए थे,और म्लेच्छो के अधिकार में गयी हुयी भूमि को उनसे वापस छीन कर उसका उद्धार करने में सफल हो पाए थे ।

इस्लाम की स्थापना तथा अरबो का रक्तरंजीत साम्राज्यविस्तार सम्पूर्ण विश्व के लिए एक भयावह घटना है, मोहम्मद पैगम्बर के मृत्यु के बाद अरबो का अत्यंत प्रेरणादायी रूप से समरज्यिक उत्थान हुआ|

१०० वर्ष भीतर ही उन्होंने पश्चिम में स्पेन से पूर्व में चीन तक अपने साम्राज्य को विस्तारित किया। वे जिस भी प्रदेश को जितते वहा के लोगो के पास केवल दो ही विकल्प रखते, या तो वे उनका धर्म स्वीकार कर ले या मौत के घाट उतरे|उन्होंने पर्शिया जैसी महान संस्कृतियों,सभ्यताओं,शिष्टाचारो को रौंध डाला,मंदिर,चर्च,पाठशालाए, ग्रंथालय नष्ट कर डाले। कला और संस्कृतियों को जला डाला सम्पूर्ण विश्व में हाहाकार मचा डाला।

ग्रीस, इजिप्त, स्पेन, अफ्रीका, इरान आदि महासत्ताओ को कुचलने के बाद अरबो के खुनी पंजे हिन्दुस्तान की भूमि तरफ बढे।

कठिन परिश्रम के बाद अंतर्गत धोकाधडियो से राजा दाहिर की पराजय हुयी और अरबो की सिंध के रूप में भारत में पहली सफलता मिली।

सिंध विजय के तुरंत बाद अरबो ने सम्पूर्ण हिन्दुस्तान को जीतकर वहा की संस्कृति को नष्ट भ्रष्ट करने हेतु महत्वाकांक्षी सेनापति अब्दुल-रहमान-जुनैद-अलगारी और अमरु को सिंध का सुबेदार बनाकर भेजा।

जुनैद ने पुरे शक्ति के साथ गुजरात, मालवा और राजस्थान के प्रदेशो पर हमला बोल दिया। उस समय वहा बहुत  सी छोटी रियासते राज्य करती थी। जैसलमेर के भाटी, अजमेर के चौहान, भीनमाल के चावड़ा आदि ने डट कर अरबी सेना का मुकाबला किया, पर वे सफल नहीं हो पाए और एक के बाद एक टूटने लगे। जैसलमेर के भाटी शासको की पराजय के बाद वहा के प्रदेशो पर अरबो का अधिकार हो गया।

इन सबको हराकर जुनैद ने मालवा पर आक्रमण कर दिया,जहा की राजधानी थी उजैन,जहा प्रतिहार साम्राज्य का शासन था और जहा का शासक था एक महावीर धर्मपुरुष सम्राट नागभट प्रतिहार।

अरबी सेना का नागभट के साथ युद्ध हुआ जिसमे अरबी सेना को वापस लौटना पडा क्योंकि नाग भट ने उनका कडा प्रतिकार किया था,परन्तु वे लौट कर पूर्ण शक्ति के साथ आयेंगे ये निश्चित था।
सम्पूर्ण भारत पर अब अरबो के भीषण आक्रमण से होनेवाले महाविनाश का खतरा मंडराने लगा,और सम्पूर्ण भारत की जनता ये प्रतीक्षा करने लगी की कोई अवतारी पुरुष उन्हें इस खतरे से बचाए.....

उन दिनों चित्तोड और मेवाड़ से मौर्य साम्राज्य को हटाकर नागदा के गहलोत वंशीय बाप्पा रावल ने वहा अपना अधिकार जमा लिया था, नाग भट की तरह वो भी अरबो के संभावी खतरे को जानता था, इसीलिए उसने अरबो के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा स्थापित किया जिसमे अनेक पूर्व, पश्चिमी, उत्तर और दक्षिणी राजाओ ने हिस्सा लिया।

नाग भट को ये पता चलते ही उसने अपनी सारी सेना और शक्ति लेकर वो बाप्पा रावल के साथ हो लिया। चालुक्यो ने अपने युवा युवराज अव्निजनाश्रय पुल्केशी को भी भारी सेना के साथ नाग भट के साथ भेज दिया और इस प्रकार एक महान सेना का गठन हुवा जिसकी संख्य लक्षावधि थी।

मारवाड़ के आसपास सन ७३८ में अरबो की विशाल सेना से हिन्दुओ की इस सेना का जिसका नेतृत्व नाग भट और बाप्पा रावल कर रहे थे भीषण संग्राम हुआ जिस संग्राम का वर्णन देवासुर संग्राम से करना उचित होंगा.

दिन ढलने से पूर्व ही अरबो की सेना की मुख्य टुकड़ी काट कर फेक दी गयी, सूर्यास्त होने से पूर्व इने गिने अरबी सैनिको को छोड़ के बाकी सारे वध कर दिए गए,जुनैद अपने अंगरक्षको के साथ भाग निकला,युद्ध में आये हुए घावों के कारण उसी रात उसकी मृत्यु हो गयी। सम्पूर्ण अरेबिया में उनके बड़े सेनापति के अपनी सेना के साथ मारे जाने से हाहाकार मच गया।

बाप्पा रावल ने युद्ध में विजय प्राप्त होने के पश्चात सिंध पर आक्रमण कर वहा भी मुसलमानों को उखाड़ फेका। सिन्धु नदी को लांघकर इरान तक प्रदेश को विजय कर,और वहाके सुलतान हैबत्खान की पुत्री से विवाह कर बाप्पा रावल ने संन्यास ले लिया।

अरबो की भारत में भीषण पराजय होने से उनकी प्रतिष्ठा को कलंक लग गया था जिसे धोकर उस खोयी हुयी प्रतिष्ठा को प्राप्त करने और प्रतिशोध की भावना से अरब भारत के विरुद्ध एक दूसरा अभियान छेड़ने के लिए शाक्ति संचय में लग गए। उन्होंने इरान,ईराक,इजिप्त आफ्रिका आदि से सेनाये और सेनानायको को इकठ्ठा किया और तामीन के नेतृत्व में भारत तथा नाग भट की और कूच कर दिया ।

अत्यंत दूर दृष्टी रखनेवाले नाग भट ये जानते थे की ये एक ना एक दिन होना ही था,इसलिए वे दक्षिण में राष्ट्रकूट से हो रहे युध्धो को छोड़कर वापस उजैन आये और वहासे सीधे चित्तौर पहुचे जहा बाप्पा रावल का पुत्र खुमान रावल राज्य करता था। नाग भट ने खुमान को उसके पिता बाप्पा रावल से  किये हुए संयुक्त युद्ध को याद दिलाया और पुनः एक बार वैसा ही मोर्चा तथा सेना संघटन अरबो के विरुद्ध करने का आवाहन किया जिसे खुम्मान ने स्वीकार किया,एक बार फिर पुल्केशी परमारों,सोलंकियो ने मोर्चे में सहभाग लिया और महासेना का गठन हुआ।

इस बार मोर्चे का नेतृत्व पूर्ण रूप से नाग भट के हाथ में था, नाग भट ने अनोखी सोच सोची की इस से पहले की शत्रु हम पर वार करे हम खुद ही शत्रु पर कूच करे.  इस से पहले की अरबी सेना सिन्धु नदी को लांघ पाती नाग भट ने उनपर आक्रमण किया,जो युद्ध कुछ सप्ताह बाद होना था वो कुछ पहले हो जाने से अरब चकित हो गए,भीषण संग्राम में रणभूमि म्लेच्छो के रक्त से तर हुयी.

सूर्यास्त होने से पूर्व तामीन का शीश हवा में लहरा गया और सेना नायक की मृत्यु होने से युद्ध में अरबो की पूर्ण रूप से पराजय हुयी, भागते हुए अरबो का हिन्दू सेना ने कई दूर तक पीछा किया,कई स्थानों पर अरब वापस खड़े होते गए और उखड़ते गए।

मुस्लिम इतिहासकारों ने अरबो की इस पराजय का वर्णन "फुतुहूल्बल्दान" नामक ग्रन्थ में किया है जिसमे अरब लिखते है की हिन्दुओ ने अरबी मुसलमानों के लिए थोड़ी भी जमीं नहीं छोड़ी इसलिए उन्हें भागकर दरिया के उस पार एक महफूज नगर बसाना पड़ा|

बार बार भारत में अपनी सेना की हानि होने की वजह से अपनी बची हुयी प्रतिष्ठा वापस मिलाने अरबो ने ये निश्चय कर लिया की भारत के किसी भी हिस्से को अब छुआ नहीं जाए और इसीलिए अगले ३५० सालो तक अरबो ने भारत खंड में पैर नहीं रखा।

और इसप्रकार प्रतिहार नागभट और बाप्पा रावल ने अपने भूमि और धर्म की रक्षा की!

आज इस घटना और हमारे बिच दीर्घ काल बित गया है,कल्पना करना भी भयावह है की ये लोग यदि उस वक्त राज्यों में बटे भारत को एक कर अरबो के विरुद्ध ना खड़े होते तो आज हम कौन होते,क्या कर रहे होते और किस हाल में होते, और इसीलिए हमें उन धर्मवीरो का अहसान मान ना चाहिए.

अरबी राक्षसों के मुह में जाने से प्रतिहारो ने हिन्दुभूमि को बचाया और अपने आप को आदिवाराह की उपाधि दी.

आज भी हमारीभूमि अधर्मियों के चंगुल में फसी हुयी है और जर्वत है नाग भट जैसे "आदिवाराह" की, जो की अधर्मियों का नाश कर धर्म की पताका फहराए.

जयति अखंड हिन्दू राष्ट्रं

नर व्याघ्रो आर्यों सार्वभौम

साभार:  लेखक ठाकुर कुलदिप सिंह, फेसबुक