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Tuesday, February 13, 2018

इतना प्राचीन है सनातन हिन्दू धर्म


कोई लाखों वर्ष, तो कोई हजारों वर्ष पुराना मानता है सनातन हिन्दू धर्म को। लेकिन क्या यह सच है? आओ हम कुछ महापुरुषों की जन्म तिथियों के आधार पर जानते हैं कि कितना पुराना है सनातन हिन्दू धर्म? सनातन धर्म की पुन: शुरुआत वराह कल्प से होती है। इससे पहले पद्म कल्प, ब्रह्म कल्प, हिरण्य गर्भ कल्प और महत कल्प बीत चुके हैं।

गुरु नानक : 500 वर्ष पहले सनातन हिन्दू धर्म

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक का जन्म 15 अप्रैल 1469 को हुआ और 22 सितंबर 1539 को उन्होंने देह छोड़ दी। गुरु परंपरा के सभी 10 गुरुओं द्वारा भारत और हिन्दू धर्म रक्षित हुआ।

बाबा रामदेव : 650 साल पहले हिन्दू धर्म

बाबा रामदेव का जन्म 1352 ईस्वी में हुआ और 1385 ईस्वी में उन्होंने समाधि ले ली। द्वारिका‍धीश के अवतार बाबा को पीरों का पीर 'रामसा पीर' कहा जाता है।

झूलेलाल : 1,000 साल पहले हिन्दू धर्म

सिन्ध प्रांत के हिन्दुओं की रक्षार्थ वरुणदेव ने झूलेलाल के रूप में अवतार लिया था। पाकिस्तान में झूलेलालजी को जिंद पीर और लालशाह के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म 1007 ईस्वी में हुआ था।

गुरु गोरक्षनाथ : 1,100 साल पहले हिन्दू धर्म

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार महान योगी गुरु गोरक्षनाथ या गोरखनाथ का जन्म 845 ई. को हुआ था। 9वीं शताब्दी में गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ के मंदिर के जीर्णोद्धार होने का उल्लेख मिलता है। गोरखनाथ लंबे काल तक जीवित रहे थे।

आदिशंकराचार्य : 1,200 साल पहले हिन्दू धर्म

आदिशंकराचार्य ने हिन्दू धर्म को पुनर्गठित किया था। उनका जन्म 788 ईस्वी में हुआ और 820 ईस्वी में उन्होंने मात्र 32 वर्ष की उम्र में देह छोड़ दी थी। उन्होंने 4 पीठों की स्थापना की थी। केरल में जन्म और केदारनाथ में उन्होंने समाधि ले ली थी। वैसे चार मठों की गुरु शिष्य परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य का जन्म 508 ईसा पूर्व हुआ था। 788 ईस्वी को जिन शंकराचार्य का जन्म हुआ था वे अभिनव शंकराचार्य थे।

सम्राट हर्षवर्धन : 1,400 साल पहले हिन्दू धर्म

महान सम्राट हर्षवर्धन का जन्म 590 ईस्वी में और मृत्यु 647 ईस्वी में हुआ था। माना जाता है कि हर्षवर्धन ने अरब पर भी चढ़ाई कर दी थी, लेकिन रेगिस्तान के एक क्षेत्र में उनको रोक दिया गया। इसका उल्लेख भविष्यपुराण में मिलता है। हर्ष के शासनकाल में ही चीन यात्री ह्वेनसांग आया था।

चन्द्रगुप्त द्वितीय : 1,650 साल पहले हिन्दू धर्म

सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त थी। उनका शासन 380 ईस्वी से 412 ईस्वी तक रहा। महाकवि कालिदास उसके दरबार की शोभा थे।

सम्राट विक्रमादित्य : 2,100 साल पहले हिन्दू धर्म

विक्रमादित्य के पिता गंधर्वसेन और बड़े भाई भर्तृहरि थे। कलिकाल के 3,000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उनके काल में हिन्दू धर्म ने महान ऊंचाइयों को प्राप्त किया था। वे एक ऐतिहासिक पुरुष थे।

आचार्य चाणक्य : 2,300 साल पहले हिन्दू धर्म

चाणक्य का जन्म ईस्वी पूर्व 371 में हुआ था जबकि उनकी मृत्यु ईस्वी पूर्व 283 में हुई थी। चाणक्य का उल्लेख मुद्राराक्षस, बृहत्कथाकोश, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, बौद्ध ग्रंथ महावंश, जैन पुराण आदि में मिलता है। चाणक्य के समय ही भारत पर सिकंदर का आक्रमण हुआ था।

भगवान महावीर स्वामी : 2,650 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

जैन धर्म के पुनर्संस्थापक महावीर स्वामी का जन्म ईस्वी पूर्व 599 में हुआ था। वे जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे। उनके काल में भी हिन्दू धर्म भारत का प्रमुख धर्म था। उनके काल में ही भगवान बुद्ध (563 ईस्वी पूर्व) ने अपना एक नया धर्म स्थापित किया था।

भगवान पार्श्वनाथ : 2,850 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

भगवान महावीर स्वामी के 250 वर्ष पहले 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए थे। माना जाता है कि उनके काल में हिन्दू धर्म भारत का राजधर्म हुआ करता था। पार्श्वनाथ के समय भारत में बहुत शांति और समृद्धि थी।

भगवान श्रीकृष्ण : 5,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

ऐतिहासिक शोध के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईस्वी पूर्व मथुरा में हुआ था। जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे। गीता हिन्दुओं का प्रमुख धर्मग्रंथ है, जो कि महाभारत एक हिस्सा है।

भगवान श्रीराम : 7,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

शोधानुसार 5114 ईसा पूर्व भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। राम के जन्म के समय आकाश में पुनर्वसु नक्षत्र के दौरान 5 ग्रह अपने उच्च स्थान में थे। वाल्मीकि द्वारा बताई गई यह स्थिति आज से 7,131 वर्ष पहले निर्मित हुई थी।

वैवस्वत मनु : 8,500 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

अनुमानित रूप से 6673 ईसा पूर्व वैवस्वत मनु हुए थे। इन मनु के काल में ही जलप्रलय हुई थी। कई माह तक वैवस्वत मनु और उनके लोगों द्वारा नाव में ही गुजारने के बाद उनकी नाव गौरी-शंकर के शिखर से होते हुए जल के उतरने के साथ ही नीचे उतरी। तब फिर से धरती पर मनुष्यों का जीवन चक्र चला। माथुरों के इतिहास में उनके होने की यही तिथि लिखी है।

सम्राट ययाति : 9,000 वर्ष पूर्व हिन्दू धर्म

सम्राट ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। अनुमानित रूप से 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,217 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने-अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई। ययाति प्रजापति ब्रह्मा की 10वीं पीढ़ी में हुए थे।

स्वायम्भुव मनु : 11,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

माथुरों के इतिहास के अनुसार स्वायम्भुव मनु अनुमानित 9057 ईसा पूर्व हुए थे। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ स्वायम्भुव मनु से 5वीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वायम्भुव मनु, प्रियव्रत, अग्नीघ्र, नाभि और फिर ऋषभ। ऋषभनाथ के 2 पुत्र थे- चक्रवर्ती सम्राट भरत और बाहुबली। स्वायम्भुव मनु को धरती का पहला मानव माने जाने के कई कारण हैं। धर्मशास्त्र और प्राचेतस मनु को अर्थशास्त्र का आचार्य माना जाता है। मनुस्मृति ने सनातन धर्म को आचार संहिता से जोड़ा था।

ब्रह्मा : 14,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

अनुमानित रूप से लगभग 12,000 ईसा पूर्व भगवान ब्रह्मा के कुल की शुरुआत हुई। ब्रह्मा के प्रमुख पुत्र ये थे- मारिचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कंदर्भ, नारद, सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार, स्वायम्भुव मनु और चित्रगुप्त। मरीचि के पुत्र ऋषि कश्यप थे जिनके देवता, दैत्य, दानव, राक्षस आदि सैकड़ों पुत्र थे। ब्रह्मा को प्रजातियों की उत्पत्ति का श्रेय जाता है।

नील वराह : 16,000 वर्ष पहले हिन्दू धर्म

कहते हैं कि लगभग 14,000 विक्रम संवत पूर्व अर्थात आज से 15,923 वर्ष पूर्व भगवान नील वराह ने अवतार लिया था। नील वराह काल के बाद आदि वराह काल और फिर श्वेत वराह काल हुए। इस काल में भगवान वराह ने धरती पर से जल को हटाया और उसे इंसानों के रहने लायक बनाया था। उसके बाद ब्रह्मा ने इंसानों की जाति का विस्तार किया और शिव ने संपूर्ण धरती पर धर्म और न्याय का राज्य कायम किया। इससे पहले लोग स्वर्ग या कहें कि देवलोक में रहते थे। हालांकि मानव तब भी था लेकिन सभ्यता की शुरुआत यहीं से मानी जाती है। इस वीडियो में उल्लेखित समय अनुमानित और पुराणों से प्राप्त हैं। हिन्दू धर्म की यह कहानी वराह कल्प से ही शुरू होती है जबकि इससे पहले का इतिहास भी पुराणों में दर्ज है जिसे मुख्य 5 कल्पों के माध्यम से बताया गया है। जम्बूद्वीप का पहला राजा स्वायम्भुव मनु ही था।

पीढ़ियों का उल्लेख

ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए। 6673 ईसा पूर्व वैवस्वत मनु हुए थे। वैवस्वत मनु के कुल की 64वीं पीढ़ी में भगवान राम हुए थे और राम के पुत्र कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत में कौरवों की ओर से लड़े थे। महाभारत का युद्ध 3000 ईस्वी पूर्व हुआ था।

प्राचीन ग्रंथों में मानव इतिहास को 5 कल्पों में बांटा गया है-(1) हमत् कल्प 1 लाख 9,800 वर्ष विक्रम संवत पूर्व से आरंभ होकर 85,800 वर्ष पूर्व तक, (2) हिरण्य गर्भ कल्प 85,800 विक्रम संवत पूर्व से 61,800 वर्ष पूर्व तक, ब्राह्म कल्प 60,800 विक्रम संवत पूर्व से 37,800 वर्ष पूर्व तक, (3) ब्रह्म कल्प 60,800 विक्रम संवत पूर्व से 37,800 वर्ष पूर्व तक, (4) पद्म कल्प 37,800 विक्रम संवत पूर्व से 13,800 वर्ष पूर्व तक और (5) वराह कल्प 13,800 विक्रम संवत पूर्व से आरंभ होकर इस समय तक चल रहा है।

अब तक वराह कल्प के स्वायम्भुव मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तामस मनु, रैवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वंतर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतरदशा चल रही है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी संवत् प्रारंभ होने से 5,630 वर्ष पूर्व हुआ था....

महामृत्युंजय मंत्र की ऊर्जा के आगे बेबस है आधुनिक क्वांटम मशीन

महामृत्युंजय मंत्र की महिमा अपार, इसकी ऊर्जा के आगे बेबस है आधुनिक क्वांटम मशीन

57 वर्षीय स्वामी निरंजनानंद सरस्वती बताते हैं कि क्वांटम मशीन में विविध मंत्रों के मानसिक और बाह्य उच्चारण के दौरान उनसे उत्पन्न ऊर्जा को क्वांटम मशीन के माध्यम से मापा गया।

चेतना, जो कि ऊर्जा की विवेकपूर्ण व संपूर्ण अभिव्यक्ति है, आज भी विज्ञान के लिए एक अबूझ पहेली है। कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस तो विज्ञान ने रच ली है, लेकिन चेतना को पढ़ पाना भी अभी दूर की बात है, इसकी रचना का तो प्रश्न ही नहीं उठता। चेतना को समझा अवश्य जा सकता है, भारतीय योगी-मनीषी इसका अभ्यास सदियों से करते आए हैं। मुंगेर, बिहार स्थित दुनिया के प्रथम योग विश्वविद्यालय में मानसिक ऊर्जा के विविध आयामों को पढ़ने के लिए उच्चस्तरीय शोध जारी है। 


जुटे हैं दुनिया के 500 वैज्ञानिक

दुनिया के चुनिंदा 50 विश्वविद्यालयों और क्वांटम फिजिक्स पर शोध करने वाली वैश्विक शोध संस्थाओं के 500 वैज्ञानिक इस शोध पर एक साथ काम कर रहे हैं, विषय है- टेलीपोर्टेशन ऑफ क्वांटम एनर्जी, यानी मानसिक ऊर्जा का परिचालन व संप्रेषण। इस शोध के केंद्र में भारतीय योग व ध्यान परंपरा का नादानुसंधान अभ्यास भी है, जिसे नाद रूपी प्राण ऊर्जा यानी चेतना के मूल आधार तक पहुंचने का माध्यम माना जाता है। बिहार योग विश्वविद्यालय के परमाचार्य पदम भूषण परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती इस शोध में मुख्य भूमिका में हैं।


मंत्रों की ऊर्जा को पढ़ने का प्रयत्न

स्वामी निरंजन बताते हैं कि मंत्र विज्ञान भी शोध के केंद्र में है। प्रत्येक मंत्र के मानसिक व बाह्य उच्चारण से उत्पन्न ऊर्जा को क्वांटम मशीन के जरिये मापा गया है। मानसिक संवाद, परह्रद संवेदन या दूरानुभूति जिसे अंग्रेजी में टेलीपैथी कहते हैं, यह विधा भारतीय योग विज्ञान का विषय रही है। मानसिक ऊर्जा के परिचालन और संप्रेषण को वैज्ञानिक आधार पर समझने का प्रयास किया जा रहा है। स्वामी निरंजन कहते हैं, संभव है कि आने वाले कुछ सालों में एक ऐसा मोबाइल सेट प्रस्तुत कर दिया जाए, जिसमें न तो नंबर मिलाने की आवश्यकता होगी, न बोलने की और न ही कान लगाकर सुनने की।


महामृत्युंजय मंत्र में सर्वाधिक ऊर्जा

57 वर्षीय स्वामी निरंजनानंद सरस्वती बताते हैं कि क्वांटम मशीन में विविध मंत्रों के मानसिक और बाह्य उच्चारण के दौरान उनसे उत्पन्न ऊर्जा को क्वांटम मशीन के माध्यम से मापा गया। इस शोध के लिए विशेष रूप से तैयार की गई क्वांटम मशीन विज्ञान जगत में अपने तरह का अनूठा यंत्र है, जिसे मुंगेर के योग रिसर्च सेंटर में लाया गया। इसके सम्मुख जब महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण किया गया तो इतनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न हुई कि इसमें लगे मीटर का कांटा अंतिम बिंदु पर पहुंचकर फड़फड़ाता रह गया। गति इतनी तीव्र थी कि यह मीटर यदि अद्र्धगोलाकार की जगह गोलाकार होता तो कांटा कई राउंड घूम जाता। सामूहिक उच्चारण करने पर तो स्थिति इससे भी कई गुना अधिक आंकी गई। महामृत्युंजय मंत्र के अलावा, गायत्री मंत्र और दुर्गा द्वात्रिंश नाम माला का स्त्रोत अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न करने वाला साबित हुआ।

ऊर्जा को संकल्प शक्ति की ओर मोड़ दें

स्वामी निरंजन कहते हैं इन तीन मंत्रों का जप सुबह उठकर और सोने से पहले सात-सात बार अवश्य करना चाहिये। इनके पाठ या जप से उत्पन्न ऊर्जा को मानसिक संकल्प लेकर संकल्प शक्ति में परिवर्तित कर देने से वांछित लाभ प्राप्त किया जा सकता है। महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से पूर्व सतत आरोग्य का संकल्प, गायत्री मंत्र से पहले प्रज्ञा के सुप्त क्षेत्रों को जागृत करने का संकल्प और दुर्गा द्वात्रिंश नाम माला का तीन बार स्त्रोत करने से पहले जीवन से दुर्गति को दूर कर शांति, प्रेम व सद्भाव की स्थापना का संकल्प लेना चाहिये।


चेतना को अभिव्यक्त कर सकते हैं...

स्वामी निरंजन कहते हैं, जहां ऊर्जा है, वहां गति होगी, वहां कंपन होगा, और कंपन से ध्वनि होगी। कुछ ध्वनियां हैं, जो हमारे कानों के श्रवण परास से नीचे हैं, तो कुछ उससे ऊपर। ये कंपन भौतिक या प्राणिक शरीर तक ही सीमित नहीं होते हैं, ये मन, भावना और बुद्धि जगत में भी विद्यमान होते हैं। जब हम चिंतन करते हैं तो मन के अंदर तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो कंपन और ध्वनियां पैदा करती हैं। भारतीय योग विज्ञान में इसे नाद कहा गया है। नाद का अर्थ है चेतना का प्रवाह। विज्ञान भी इससे पूर्णत: सहमत है कि संसार की सभी चीजें कंपनीय ऊर्जा की सतत क्रियाएं हैं। यदि हम मानसिक-तरंग-प्रतिरूप को पुनर्संयोजति, पुनस्र्थापित और प्रेषित कर सकें, तब हम चेतना को अभिव्यक्त कर सकते हैं। 


साभार:  दैनिक जागरण 

संसार के कण-कण में बसे हैं भोलेनाथ, दुनिया के अलग-अलग देशों में ये हैं बड़े शिवालय

संसार के कण-कण में बसे हैं भोलेनाथ, दुनिया के अलग-अलग देशों में ये हैं बड़े शिवालय

कहते हैं भगवान शिव शंकर संसार के कण-कण में विराजमान हैं। शायद यही वजह है कि शिव की पूजा सिर्फ भारत में ही नहीं कई अन्‍य देशों में भी होती है।

 कहते हैं भगवान शिव शंकर संसार के कण-कण में विराजमान हैं। शायद यही वजह है कि शिव की पूजा सिर्फ भारत में ही नहीं कई अन्‍य देशों में भी होती है। विदेशों में भगवान शिव के कई भव्‍य मंदिर हैं, जिनके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे। यहां भारतीयों से ज्‍यादा विदेशी भक्‍त नजर आते हैं। हाल ही में अपनी ओमान यात्रा के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने यहां के मस्कट में मौजूद 125 वर्ष पुराने शिव मंदिर में पूजा-अर्चना की। शिवरात्रि के मौके पर यहां हम जानेंगे दुनियाभर के शिव मंदिरों के बारे में... सबसे पहले मस्कट के शिवमंदिर की कहानी...


125 वर्ष पुराना है मस्कट का शिव मंदिर

तीन देशों की यात्रा पर निकले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को ओमान की राजधानी मस्कट में बने 125 वर्ष पुराने शिव मंदिर के दर्शन किए। मोतीश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर कई सदी पहले भारत से ओमान जाकर बसे व्यापारियों ने बनवाया था। 1999 में इसका नवीनीकरण किया गया।


गुजराती कनेक्शन

माना जाता है कि गुजरात के कच्छ इलाके के भाटिया व्यापारिक समुदाय के लोग 1507 में मस्कट जाकर बसे। इस समुदाय ने वहां कई मंदिरों और तीर्थ स्थलों का निर्माण कराया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक 19वीं सदी की शुरुआत में मस्कट में गुजराती परिवारों का प्रभाव इतना ज्यादा बढ़ गया कि उन्होंने ओमान के सुल्तान सैयद सैद को अपनी राजधानी मस्कट से जांजिबार स्थानांतरित करने को राजी कर लिया।

मरुस्थल में जल का स्रोत

हालांकि मस्कट रेगिस्तानी इलाका है, इसके बावजूद शिव मंदिर के परिसर में एक कुआं मौजूद है जिसमें साल भर पर्याप्त मात्रा में जल रहता है। महाशिवरात्रि के समय 20 हजार से भी ज्यार्दा हिंदू श्रद्धालु मंदिर के दर्शन करने आते हैं।


समुदाय का संगम स्थल

यह मंदिर मस्कट में रहने वाले हिंदू समुदाय को जोड़ने का काम करता है। यहां तीन पुजारी, तीन सेवाकर्मी और चार प्रबंधन कर्मी मंदिर की सेवा में रहते हैं। बड़ी संख्या में स्वयंसेवी लोग अपनी सेवाएं मंदिर को देते हैं।

तीन देवताओं का वास

मंदिर परिसर में तीन देवताओं के मंदिर हैं। श्री आदि मोतीश्वर महादेव मंदिर, श्री मोतीश्वर महादेव मंदिर और श्री हनुमान मंदिर। मंदिर में शिवरात्रि के अलावा वसंत पंचमी, रामनवमी, हनुमान जयंती, सावन माह और गणेश चतुर्थी भी मनाए जाते हैं।


मस्कट के अलावा अन्य देशों के भव्‍य शिव मंदिर

प्रम्बानन मंदिर (जावा, इंडोनेशिया)- ये प्राचीन मंदिर इंडोनेशिया के जावा नाम की जगह पर है। हिंदू संस्कृति और देवी-देवताओं को समर्पित ये एक बहुत सुंदर मंदिर है। 10वीं शताब्दी में बना यह मंदिर प्रम्बानन मंदिर के नाम से जाना जाता है।


अरुल्मिगु श्रीराजा कलिअम्मन मंदिर (जोहोर बरु, मलेशिया)- कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1922 के आस-पास किया गया था। यह मंदिर जोहोर बरु के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। मंदिर के गर्भ गृह में लगभग 3,00,000 मोतियों को दीवार पर चिपकाकर सजावट की गई है।


शिवा हिन्दू मंदिर (जुईदोस्त, एम्स्टर्डम)- यह मंदिर लगभग 4,000 वर्ग मीटर को क्षेत्र में फैला हुआ है। इस मंदिर में भगवान शिव के साथ-साथ भगवान गणेश, देवी दुर्गा, परमभक्त हनुमान की भी पूजा की जाती है। यहां पर भगवान शिव पंचमुखी शिवलिंग के रूप में है।


शिवा-विष्णु मंदिर (मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया)- शिव और विष्णु को समर्पित इस मंदिर का निर्माण लगभग 1987 के आस-पास किया गया था। इस मंदिर की वास्तुकला हिन्दू और ऑस्ट्रेलियाई परंपराओं का अच्छा उदाहरण है। मंदिर परिसर के अंदर भगवान शिव और विष्णु के साथ-साथ अन्य हिंदू देवी-देवताओं की भी पूजा-अर्चना की जाती है।


मुन्नेस्वरम मंदिर (मुन्नेस्वरम, श्रीलंका)- मान्यताओं के अनुसार, रावण का वध करने के बाद भगवान राम ने इसी जगह पर भगवान शिव की आराधना की थी। इस मंदिर परिसर में पांच मंदिर हैं, जिनमें से सबसे बड़ा और सुंदर मंदिर भगवान शिव का ही है।


शिवा विष्णु मंदिर (लिवेरमोरे, कैलिफोर्निया)- वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर उत्तर भारत और दक्षिण भारत की कला का सुंदर मिश्रण है। मंदिर में भगवान शिव के साथ-साथ भगवान गणेश, देवी दुर्गा, भगवान अय्यप्पा, देवी लक्ष्मी आदि की भी पूजा की जाती है। मंदिर की ज्‍यादातर मूर्तियां 1985 में तमिलनाडु सरकार द्वारा दी गई थीं।


पशुपतिनाथ मंदिर (काठमांडू, नेपाल)- ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 11वीं सदी में किया गया था। 17वीं सदी में इसका पुनर्निर्माण किया गया। मंदिर में भगवान शिव की एक चार मुंह वाली मूर्ति है।



शिवा मंदिर (ऑकलैंड, न्यूजीलैंड)- कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी शिवेंद्र महाराज और यज्ञ बाबा के मार्गदर्शन में हिन्दू शास्त्रों के अनुसार किया गया था। इस मंदिर में भगवान शिव नवदेश्वर शिवलिंग के रूप में हैं।


कटासराज मंदिर (चकवाल, पाकिस्तान)- कटासराज मंदिर पाकिस्तान के चकवाल गांव से लगभग 40 किलोमी‍टर की दूरी पर कटस में एक पहाड़ी पर है। कहा जाता है कि यह मंदिर महाभारत काल (त्रेतायुग) में भी था। मान्यताओं के अनुसार, कटासराज मंदिर का कटाक्ष कुंड भगवान शिव के आंसुओं से बना है। 

साभार: दैनिक जागरण, संजय पोखरियाल 

Thursday, June 8, 2017

हिन्दू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई

हिन्दू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई।*


कुछ लोग कहते हैं की हिन्दू शब्द फारसियों की देन है । क्यूंकि इसका उल्लेख वेद पुराणों में नहीं है।
मेरे सनातनी हिन्दू भाईयों, इन जैसे लोगों का मुंह बंद करने के लिये आपके सन्मुख हजारों वर्ष पूर्व लिखे गये सनातन शास्त्रों में लिखित चंद श्लोक (अर्थ सहित) प्रमाणिकता सहित बता रहा हूँ । आप सब सेव करके रख लें, और मुझसे या आप से यह सवाल करने वाले को मेरा जवाब भी देख लें !

*1-ऋग्वेद के ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया है......!*
*"हिमलयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं ।*
*तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।*
*(अर्थात हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिंदुस्थान कहते हैं)*
*2- सिर्फ वेद ही नहीं.... बल्कि.. मेरूतंत्र ( शैव ग्रन्थ ) में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया है.....*
*"हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये ।"*
*(अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं)*
*3- और इससे मिलता जुलता लगभग यही यही श्लोक कल्पद्रुम में भी दोहराया गया है....!*
*"हीनं दुष्यति इति हिन्दू ।"*
*(अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते है )*
*4- पारिजात हरण में हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है....!*
*"हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टं । हेतिभिः श्त्रुवर्गं च स हिन्दुर्भिधियते ।।"*
*(अर्थात जो अपने तप से शत्रुओं का दुष्टों का और पाप का नाश कर देता है, वही हिन्दू है )*
*5- माधव दिग्विजय में भी हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है....!*
*"ओंकारमन्त्रमूलाढ्य पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य: ।*
*गौभक्तो भारतगरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः ।।*
*(अर्थात.... वो जो ओमकार को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करे, सदैव गौपालक रहे तथा बुराईयों को दूर रखे, वो हिन्दू है )।*
*6- केवल इतना ही नहीं हमारे ऋगवेद ( ८:२:४१ ) में विव हिन्दू नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है । जिन्होंने 46000 गौमाता दान में दी थी.... और ऋग्वेद मंडल में भी उनका वर्णन मिलता है ।*
*7- ऋग वेद में एक ऋषि का उल्लेख मिलता है जिनका नाम सैन्धव था । जो मध्यकाल में आगे चलकर "हैन्दव/हिन्दव" नाम से प्रचलित हुए, जिसका बाद में अपभ्रंश होकर हिन्दू बन गया...!!*
*8- इसके अतिरिक्त भी कई स्थानों में हिन्दू शब्द उल्लेखित है....।।*
*इसलिये गर्व से कहो, हाँ हम हिंदू थे, हिन्दू हैं और सदैव सनातनी हिन्दू ही रहेंगे ॥*
हिन्दू🚩
साभार: WEB, FACEBOOK 

Saturday, April 22, 2017

महान हिन्दू योद्धा पेशवा बाजीराव का वो सच, जो फिल्म में दिखाने से चूक गए भंसाली



जब संजय लीला भंसाली ने बाजीराव मस्तानी नाम की फिल्म बनाने का ऐलान किया था, तो लग रहा था कि शायद अब तक हिंदुस्तान के इतिहासकारों ने मराठा इतिहास के सबसे बड़े नायक के साथ जो अन्याय किया है, वो कुछ हद तक दूर होगा। शिवाजी ने एक सपने की नींव रखी थी, लेकिन उस सपने को पूरा किया था बाजीराव बल्लाल भट्ट यानी पेशवा बाजीराव प्रथम ने। कितने आम लोग उसे जानते थे? संजय लीला भंसाली ने एक तरह से इतिहास पर एक उपकार किया है। मराठा और हिंदुस्तानी इतिहास के साथ न्याय किया है, लेकिन ये न्याय अब भी अधूरा है।

भंसाली की मजबूरियां थीं कि फिल्म को हिंदू-मुस्लिम दोनों तरह के दर्शकों की कसौटी पर खरा उतारते हुए उसका रोमांटिक चरित्र ही बनाए रखना था। सवाल है कि क्या था शिवाजी का वो सपना, जिसे बाजीराव बल्लाल भट्ट ने पूरा कर दिखाया? दरअसल जब औरंगजेब के दरबार में अपमानित हुए वीर शिवाजी आगरा में उसकी कैद से बचकर भागे थे तो उन्होंने एक ही सपना देखा था, पूरे मुगल साम्राज्य को कदमों पर झुकाने का। मराठा ताकत का अहसास पूरे हिंदुस्तान को करवाने का। अटक से कटक तक केसरिया लहराने का और हिंदू स्वराज लाने का। इस सपने को किसने पूरा किया? पेशवाओं ने, खासकर पेशवा बाजीराव प्रथम ने। उन्नीस-बीस साल के उस युवा ने तीन दिन तक दिल्ली को बंधक बनाकर रखा। मुगल बादशाह की लाल किले से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई। यहां तक कि 12वां मुगल बादशाह और औरंगजेब का नाती दिल्ली से बाहर भागने ही वाला था कि बाजीराव मुगलों को अपनी ताकत दिखाकर वापस लौट गया। नहीं दिखाया भंसाली ने ये सब, जबकि उनके हर तीसरे सीन में बाजीराव ये कहता दिखाया गया कि दिल्ली को तो हम कभी भी झुका देंगे। लगा था कि भंसाली मराठा साम्राज्य का वो सपना पूरा होता हुआ परदे पर दिखाएंगे, लेकिन वो चूक गए।


आगे की पीढ़ियां बाजीराव को जानेंगी, भंसाली को इसका क्रेडिट मिलना चाहिए, लेकिन एक रोमांटिक हीरो की तरह जानेंगी, एक ऐसे योद्धा की तरह जानेंगी, जिसने कट्टर ब्राह्मणों से टक्कर लेकर भी अपनी मुस्लिम बीवी को बनाए रखा। बेटे का संस्कार ना करने पर उसका नाम बदलकर गुस्से में कृष्णा से शमशेर बहादुर कर दिया, इसलिए जानेंगी। जोधा अकबर की तरह बाजीराव मस्तानी को भी जाना जाएगा। लेकिन क्या वो ये जानेंगी कि हिंदुस्तान के इतिहास का बाजीराव अकेला ऐसा योद्धा था, जिसने 41 लड़ाइयां लड़ीं और एक भी नहीं हारी, जबकि शिवाजी का भी रिकॉर्ड ऐसा नहीं है। वर्ल्ड वॉर सेकंड में ब्रिटिश आर्मी के कमांडर रहे मशहूर सेनापति जनरल मांटगोमरी ने भी अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ वॉरफेयर’ में बाजीराव की बिजली की गति से तेज आक्रमण शैली की जमकर तारीफ की है और लिखा है कि बाजीराव कभी हारा नहीं। आज वो किताब ब्रिटेन में डिफेंस स्टडीज के कोर्स में पढ़ाई जाती है। बाद में यही आक्रमण शैली सेकंड वर्ल्ड वॉर में अपनाई गई, जिसे ‘ब्लिट्जक्रिग’ बोला गया। निजाम पर आक्रमण के एक सीन में भंसाली ने उसे दिखाने की कोशिश भी की है।

बाजीराव पहला ऐसा योद्धा था, जिसके समय में 70 से 80 फीसदी भारत पर उसका सिक्का चलता था। वो अकेला ऐसा राजा था जिसने मुगल ताकत को दिल्ली और उसके आसपास तक समेट दिया था। पूना शहर को कस्बे से महानगर में तब्दील करने वाला बाजीराव बल्लाल भट्ट था, सतारा से लाकर कई अमीर परिवार वहां बसाए गए। निजाम, बंगश से लेकर मुगलों और पुर्तगालियों तक को कई कई बार शिकस्त देने वाली अकेली ताकत थी बाजीराव की। शिवाजी के नाती शाहूजी महाराज को गद्दी पर बैठाकर बिना उसे चुनौती दिए, पूरे देश में उनकी ताकत का लोहा मनवाया था बाजीराव ने। आज भले ही नई पीढ़ी के सामने उसे भंसाली की फिल्म के जरिए हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल के तौर पर पेश किया गया हो, लेकिन ये कौन बताएगा कि देश में पहली बार हिंदू पद पादशाही का सिद्धांत भी बाजीराव प्रथम ने दिया था। हर हिंदू राजा के लिए आधी रात मदद करने को तैयार था वो, पूरे देश का बादशाह एक हिंदू हो, उसके जीवन का लक्ष्य ये था, लेकिन जनता किसी भी धर्म को मानती हो उसके साथ वो न्याय करता था। उसकी अपनी फौज में कई अहम पदों पर मुस्लिम सिपहसालार थे, लेकिन वो युद्ध से पहले हर हर महादेव का नारा भी लगाना नहीं भूलता था। उसे टैलेंट की इस कदर पहचान थी कि उसके सिपहसालार बाद में मराठा इतिहास की बड़ी ताकत के तौर पर उभरे। होल्कर, सिंधिया, पवार, शिंदे, गायकवाड़ जैसी ताकतें जो बाद में अस्तित्व में आईं, वो सब पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट की देन थीं।


ग्वालियर, इंदौर, पूना और बड़ौदा जैसी ताकतवर रियासतें बाजीराव के चलते ही अस्तित्व में आईं। बुंदेलखंड की रियासत बाजीराव के दम पर जिंदा थी, छत्रसाल की मौत के बाद उसका तिहाई हिस्सा भी बाजीराव को मिला। कभी वाराणसी जाएंगे तो उसके नाम का एक घाट पाएंगे, जो खुद बाजीराव ने 1735 में बनवाया था, दिल्ली के बिरला मंदिर में जाएंगे तो उसकी एक मूर्ति पाएंगे। कच्छ में जाएंगे तो उसका बनाया आइना महल पाएंगे, पूना में मस्तानी महल और शनिवार बाड़ा पाएंगे। अकबर की तरह उसको वक्त नहीं मिला, कम उम्र में चल बसा, नहीं तो भव्य इमारतें बनाने का उसको भी शौक था, शायद तभी आज की पीढ़ी उसको याद नहीं करती। नहीं तो अकबर के अलावा कोई और मुगल बादशाह नहीं था, जिससे उनकी तुलना बतौर योद्धा, न्यायप्रिय राजा और बेहतर प्रशासक के तौर पर की जा सके।

दिल्ली पर आक्रमण उसका सबसे बड़ा साहसिक कदम था, वो अक्सर शिवाजी के नाती छत्रपति शाहू से कहता था कि मुगल साम्राज्य की जड़ों यानी दिल्ली पर आक्रमण किए बिना मराठों की ताकत को बुलंदी पर पहुंचाना मुमकिन नहीं, और दिल्ली को तो मैं कभी भी कदमों पर झुका दूंगा। छत्रपति शाहू सात साल की उम्र से 25 साल की उम्र तक मुगलों की कैद में रहे थे, वो मुगलों की ताकत को बखूबी जानते थे, लेकिन बाजीराव का जोश उस पर भारी पड़ जाता था। धीरे धीरे उसने महाराष्ट्र को ही नहीं पूरे पश्चिम भारत को मुगल आधिपत्य से मुक्त कर दिया। फिर उसने दक्कन का रुख किया, निजाम जो मुगल बादशाह से बगावत कर चुका था, एक बड़ी ताकत था। कम सेना होने के बावजूद बाजीराव ने उसे कई युद्धों में हराया और कई शर्तें थोपने के साथ उसे अपने प्रभाव में लिया।

इधर उसने बुंदेलखंड में मुगल सिपाहसालार मोहम्मद बंगश को हराया। मुगल असहाय थे, कई बार पेशवा से मात खा चुके थे, पेशवा का हौसला इससे बढ़ता गया। 1728 से 1735 के बीच पेशवा ने कई जंगें लड़ीं, पूरा मालवा और गुजरात उसके कब्जे में आ गया। बंगश, निजाम जैसे कई बड़े सिपहसालार पस्त हो चुके थे।

इधर दिल्ली का दरबार ताकतवर सैयद बंधुओं को ठिकाने लगा चुका था, निजाम पहले ही विद्रोही हो चुका था। उस पर औरंगजेब के वंशज और 12 वें मुगल बादशाह मोहम्मद शाह को रंगीला कहा जाता था, जो कवियों जैसी तबियत का था। जंग लड़ने की उसकी आदत में जंग लगा हुआ था। कई मुगल सिपाहसालार विद्रोह कर रहे थे। उसने बंगश को हटाकर जय सिंह को भेजा, जिसने बाजीराव से हारने के बाद उसको मालवा से चौथ वसूलने का अधिकार दिलवा दिया। मुगल बादशाह ने बाजीराव को डिप्टी गर्वनर भी बनवा दिया। लेकिन बाजीराव का बचपन का सपना मुगल बादशाह को अपनी ताकत का परिचय करवाने का था, वो एक प्रांत का डिप्टी गर्वनर बनके या बंगश और निजाम जैसे सिपहासालारों को हराने से कैसे पूरा होता।

उसने 12 नवंबर 1736 को पुणे से दिल्ली मार्च शुरू किया। मुगल बादशाह ने आगरा के गर्वनर सादात खां को उससे निपटने का जिम्मा सौंपा। मल्हार राव होल्कर और पिलाजी जाधव की सेना यमुना पार कर के दोआब में आ गई। मराठों से खौफ में था सादात खां, उसने डेढ़ लाख की सेना जुटा ली। मराठों के पास तो कभी भी एक मोर्चे पर इतनी सेना नहीं रही थी। लेकिन उनकी रणनीति बहुत दिलचस्प थी। इधर मल्हार राव होल्कर ने रणनीति पर अमल किया और मैदान छोड़ दिया। सादात खां ने डींगें मारते हुआ अपनी जीत का सारा विवरण मुगल बादशाह को पहुंचा दिया और खुद मथुरा की तरफ चला आया।


बाजीराव को पता था कि इतिहास क्या लिखेगा उसके बारे में। उसने सादात खां और मुगल दरबार को सबक सिखाने की सोची। उस वक्त देश में कोई भी ऐसी ताकत नहीं थी, जो सीधे दिल्ली पर आक्रमण करने का ख्वाब भी दिल में ला सके। मुगलों का और खासकर दिल्ली दरबार का खौफ सबके सिर चढ़ कर बोलता था। लेकिन बाजीराव को पता था कि ये खौफ तभी हटेगा जब मुगलों की जड़ यानी दिल्ली पर हमला होगा। सारी मुगल सेना आगरा मथुरा में अटक गई और बाजीराव दिल्ली तक चढ़ आया, आज जहां तालकटोरा स्टेडियम है, वहां बाजीराव ने डेरा डाल दिया। दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल पांच सौ घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके। देश के इतिहास में ये अब तक दो आक्रमण ही सबसे तेज माने गए हैं, एक अकबर का फतेहपुर से गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए नौ दिन के अंदर वापस गुजरात जाकर हमला करना और दूसरा बाजीराव का दिल्ली पर हमला।

बाजीराव ने तालकटोरा में अपनी सेना का कैंप डाल दिया, केवल पांच सौ घोड़े थे उसके पास। मुगल बादशाह मौहम्मद शाह रंगीला बाजीराव को लाल किले के इतना करीब देखकर घबरा गया। उसने खुद को लाल किले के सुरक्षित इलाके में कैद कर लिया और मीर हसन कोका की अगुआई में आठ से दस हजार सैनिकों की टोली बाजीराव से निपटने के लिए भेजी। बाजीराव के पांच सौ लड़ाकों ने उस सेना को बुरी तरह शिकस्त दी। ये 28 मार्च 1737 का दिन था, मराठा ताकत के लिए सबसे बड़ा दिन। कितना आसान था बाजीराव के लिए, लाल किले में घुसकर दिल्ली पर कब्जा कर लेना। लेकिन बाजीराव की जान तो पुणे में बसती थी, महाराष्ट्र में बसती थी।

वो तीन दिन तक वहीं रुका, एक बार तो मुगल बादशाह ने योजना बना ली कि लाल किले के गुप्त रास्ते से भागकर अवध चला जाए। लेकिन बाजीराव बस मुगलों को अपनी ताकत का अहसास दिलाना चाहता था। वो तीन दिन तक वहीं डेरा डाले रहा, पूरी दिल्ली एक तरह से मराठों के रहमोकरम पर थी। उसके बाद बाजीराव वापस लौट गया। बुरी तरह बेइज्जत हुआ मुगल बादशाह रंगीला ने निजाम से मदद मांगी, वो पुराना मुगल वफादार था, मुगल हुकूमत की इज्जत को बिखरते नहीं देख पाया। वो दक्कन से निकल पड़ा। इधर से बाजीराव और उधर से निजाम दोनों एमपी के सिरोंजी में मिले। लेकिन कई बार बाजीराव से पिट चुके निजाम ने उसको केवल इतना बताया कि वो मुगल बादशाह से मिलने जा रहा है।

निजाम दिल्ली आया, कई मुगल सिपहसालारों ने हाथ मिलाया और बाजीराव को बेइज्जती करने का दंड देने का संकल्प लिया और कूच कर दिया। लेकिन बाजीराव बल्लाल भट्ट से बड़ा कोई दूरदर्शी योद्धा उस काल खंड में पैदा नहीं हुआ था। ये बात साबित भी हुई, बाजीराव खतरा भांप चुका था। अपने भाई चिमना जी अप्पा के साथ दस हजार सैनिकों को दक्कन की सुरक्षा का भार देकर वो अस्सी हजार सैनिकों के साथ फिर दिल्ली की तरफ निकल पड़ा। इस बार मुगलों को निर्णायक युद्ध में हराने का इरादा था, ताकि फिर सिर ना उठा सकें।

दिल्ली से निजाम के अगुआई में मुगलों की विशाल सेना और दक्कन से बाजीराव की अगुआई में मराठा सेना निकल पड़ी। दोनों सेनाएं भोपाल में मिलीं, 24 दिसंबर 1737 का दिन मराठा सेना ने मुगलों को जबरदस्त तरीके से हराया। निजाम की समस्या ये थी कि वो अपनी जान बचाने के चक्कर में जल्द संधि करने के लिए तैयार हो जाता था। इस बार 7 जनवरी 1738 को ये संधि दोराहा में हुई। मालवा मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने पचास लाख रुपये बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे। चूंकि निजाम हर बार संधि तोड़ता था, सो बाजीराव ने इस बार निजाम को मजबूर किया कि वो कुरान की कसम खाकर संधि की शर्तें दोहराए।

ये मुगलों की अब तक की सबसे बड़ी हार थी और मराठों की सबसे बड़ी जीत। पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट यहीं नहीं रुका, अगला अभियान उसका पुर्तगालियों के खिलाफ था। कई युद्दों में उन्हें हराकर उनको अपनी सत्ता मानने पर उसने मजबूर किया। अगर पेशवा कम उम्र में ना चल बसता, तो ना अहमद शाह अब्दाली या नादिर शाह हावी हो पाते और ना ही अंग्रेज और पुर्तगालियों जैसी पश्चिमी ताकतें। बाजीराव का केवल चालीस साल की उम्र में इस दुनिया से चले जाना मराठों के लिए ही नहीं देश की बाकी पीढ़ियों के लिए भी दर्दनाक भविष्य लेकर आया। अगले दो सौ साल गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहा भारत और कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हुआ, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध पाता। आज की पीढ़ी को बाजीराव बल्लाल भट्ट की जिंदगी का ये पहलू भी जानने की जरूरत है।
साभार: News18 India