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Thursday, August 22, 2013

दुनिया पर भारतीय संस्कृति की छाप

अमरीकी अन्तरिक्ष संस्था ‘नासा’ ने ‘संस्कृत’ मिशन नाम से एक कार्यक्रम शुरु किया है। इसके संस्कृत सिखाई जाती है। 

अफ्रीका महाद्वीप ईथोपिया और मोरीटोनिया में संयुक्त राष्ट्र संघ की देखरेख में हुई खुदाई में गणपति की मूर्तियां मिली हैं।

नासा का नाम सुपरिचित है। अंतरिक्ष की खोज में इस अमरीकी संस्था का क्या योगदान है यह सर्वविदित है। उक्त संस्था अपने आप में एक प्रयोगशाला भी है और विश्व विद्यालय भी। इसका प्रशिक्षण कितना कठोर है यह तो नासा से जुड़ी सुनीता विलियम जैसा कोई विद्यार्थी ही बता सकता है। लेकिन इसका अध्ययन अत्यंत कठिन है। नासा ने माना है कि संस्कृत बहुत ही वैज्ञानिक भाषा है और संस्कृत साहित्य में विज्ञान के बारे में बड़ी अच्छी जानकारी है। इसलिए नासा ने ‘संस्कृत मिशन’ की शुरुआत की है। इसके अन्तर्गत संस्कृत सिखाई जाती है। वहां जो लोग संस्कृत सीख रहे हैं वे बाद में नासा के लिए बड़े उपयोगी सिद्ध होंगे। नासा ने यह भी माना है कि तकनीकी आधार पर भी इस भाषा के माध्यम से तालमेल सरलतापूर्वक हो सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि संस्कृत साहित्य में अनेक जानकारियां उपलब्ध हैं इसलिए उन्होंने इस भाषा को प्राथमिकता दी है। भारत में संस्कृत भले ही उपेक्षित है, लेकिन नासा में उसे वैज्ञानिकों की भाषा का दर्जा दिया गया है।

पिछले दिनों वैष्णो देवी तीर्थ को लेकर भारत सरकार ने जब पांच रुपए का सिक्का जारी किया तो भारत के अल्पसंख्यक समाज के मुट्ठी भर लोगों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि भारत एक पंथनिरपेक्ष देश है इसलिए यहां किसी देवी-देवता का सिक्का जारी नहीं किया जा सकता है। लेकिन विरोध करने वाले इस तथ्य को भूल गए कि भारतीय संस्कृति की छाप तो पूरी दुनिया में दिखती है। उससे आप कहां तक दूर भागेंगे? किसी देश की सांस्कृतिक विरासत का विरोध करना तर्क संगत नहीं है। जो लोग आज मूर्ति पूजा का विरोध करते हैं कल उन्हीं के देशों में देवी-देवताओं की पूजा होती थी। ग्रीक और मिस्र से लेकर अरबस्तान में इस्लाम से पूर्व तक की यही कहानी है। विश्व में जहां कहीं ऐतिहासिक वस्तुओं की खोज और खंडहरों की खुदाई होती है उसमें अधिकतर धर्म से जुड़ी वस्तुएं उपलब्ध होती हैं। इसलिए इतिहास और प्राचीन धर्म से जुड़ी संस्कृति के बीच एक महीन रेखा है जिसको समझना और उसका वैचारिक विश्लेषण करना बड़ा जरूरी है। 

कुछ वर्ष पूर्व भारत सरकार ने लालकिले के भूगर्भ में एक ऐसा ही कैप्सूल दफन किया है जिसके माध्यम से सैकड़ों वर्षों के बाद आने वाली दुनिया आज के विकास और प्रगति को मानवीय इतिहास के रूप में समझ पाएगी। आज खुदाई करने के पश्चात ्जो कुछ उपलब्ध होता है उसमें भूतकाल की परछाइयां होती हैं। विश्व के किसी भी कोने में इन दिनों जब इतिहास की खोज होती है तो हम देखते हैं कि उसमें प्राचीन भारत की छवि दिखाई पड़ती है।

अफ्रीका महाद्वीप, जो भारत से लाखों किलोमीटर दूर स्थित है, में राष्ट्र संघ के नेतृत्व में हो रही खुदाई में जो वस्तुएं प्राप्त हुई हैं उनमें गणपति के चित्र और तत्कालीन धातुओं से बनी गणपति की मूर्तियां मुख्य हैं। हाल ही में धुर पूर्व में बसे ईथोपिया और धुर पश्चिम में बसे मोरीटोनिया में एक जैसी गणपति की मूर्तियां प्राप्त होना आश्चर्यजनक बात है। आज का सऊदी अरब अफ्रीका के इन देशों से काफी दूर है। यहां नाइला नामक देवता की मूर्ति अर्ध नारेश्वरी का प्रतीक दिखाई पड़ता है, तो हुबल सफा और इज्जा नामक प्रतिमाएं कोई गणपति के आकार की है, तो कोई अन्य भारतीय देवी-देवताओं जैसी। उपरोक्त प्रतिमाओं का वर्णन उर्दू के प्रसिद्ध क वि अलताफ हुसैन हाली ने भी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मुसददसे-हाली’ में किया है। हाली ने उन्हें प्राचीन अरब के बुत बताए हैं। खलील जिब्रान ने ‘दी प्रोफेट’ नामक अपनी पुस्तक में इसी प्रकार के देवी-देवताओं के माध्यम से विश्व दर्शन की ओर इशारा किया है। इससे एक सवाल खड़ा होता है कि भिन्न-भिन्न देशों में होने वाली खुदाई में एक जैसी प्रतिमाएं क्यों उपलब्ध हो रही हैं? या तो इनको बनाने वाला कोई एक ही था या फिर उन दिनों इनका प्रचार प्रसार चारों ओर था। वे इनके माध्यम से प्रकृति के रहस्यों को उजागर करते थे। यह भारतीय संस्कृति के फैलाव और विश्वव्यापी होने का एक ठोस सबूत है। 

तालिबानी जिस जिहाद के लिए लालायित हैं उनके मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट भारतीय संस्कृति का बोलबाला ही है। इस दिशा में इंडोनेशिया सरकार के एक निर्णय ने उन्हें बहुत निराश किया। 

पिछले दिनों इंडोनेशिया ने अमरीका को एक चौंका देने वाली वस्तु भेंट की है। वह न केवल उसके इस्लाम पूर्व की अपनी संस्कृति से जुड़े होने का संदेश देती है, बल्कि वह उसकी अनेकता में एकता के दृढ़ विश्वास को भी रेखांकित करती है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आज की दुनिया में मुसलमानों की सबसे अधिक आबादी वाला देश इंडोनेशिया है। लेकिन उसकी भाषा और पोशाक कहीं भी अरब संस्कृति से प्रभावित नहीं है। दक्षिण पूर्व एशिया का यह देश अपने नगरों और नेताओं के नाम भी अपनी प्राचीन संस्कृति के आधार पर ही रखता है। फिर वह सुकार्णों हो या सुहार्तों अथवा मेघावती। अपनी विमान सेवा को वह ‘गरुड़ा’ का नाम देने में गर्व महसूस करता है। उसी इंडोनेशिया में पिछले दिनों एक विचित्र घटना घटी। मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया की मुस्लिम सरकार ने अमरीका को हिन्दू देवी सरस्वती की 6 फीट ऊंची प्रतिमा भेंट की है। इस सांस्कृतिक उपहार को वाशिंगटन में व्हाइट हाउस से कुछ दूरी पर स्थापित किया गया है। जहां महात्मा गांधी की प्रतिमा भी पहले से ही मौजूद है। इस्लाम मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता है लेकिन अपनी राष्ट्रीय भावना को इंडोनेशिया आज भी सरस्वती की प्रतिमा के रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि धर्म से महान संस्कृति है, जिसका गुणगान करना देश की धरती के यशोगान करने के समान है।

मुस्लिम शासनकाल में भारत के असंख्य नगरों के नाम मुस्लिम शासकों ने बदल दिए। चूंकि वे भारतीय संस्कृति पर आधारित थे अथवा उनके पीछे किसी न किसी देवी-देवता का नाम था। उत्तर भारत में तो नगरों के नामों में इतने फेर-बदल हुए कि मानो वे इतिहास को ही परिवर्तित करने के लिए कटिबद्ध हों। किसी भी स्थान के नाम को बदलकर कोई भी विजेता अपने अहं को शांत कर सकता है लेकिन उसके पीछे के इतिहास को बदलना बड़ा कठिन होता है। प्राचीन नगरों के नाम केवल धार्मिक आधार पर ही नहीं थे, बल्कि उसकी माटी में कोई न कोई विशेष गुण होता था इसलिए उस गुण को परिभाषित करने वाला नाम रख दिया जाता था। यह नाम भौगोलिक भी होते थे और पौराणिक भी। इन सबके उपरांत कुछ नामों में ऐसा जादू था कि मुस्लिम शासक उसका नाम तो बदल नहीं सके लेकिन उसके समानान्तर एक दूसरा नाम अवश्य रख लिया। भारत में ऋषिकेश एक पवित्र धार्मिक स्थल है। गंगा के किनारे बसे होने के कारण इस नगर का अपना सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है। मुस्लिम शासक चाहते तो इसका नाम कुछ भी दे सकते थे, लेकिन उन्होंने इस पवित्र नगर का नाम बदलने में रुचि नहीं दिखाई। क्योंकि सहस्रों वर्षों के पश्चात् भी यह आज ऋषिकेश ही है। इस पर मुस्लिम आक्रांताओं ने विचार नहीं किया होगा ऐसा भी नहीं है। वे जानते थे कि ऋषिकेश का नाम बदल भी देंगे तब भी इस तीर्थस्थल का नाम बदलने और उसे जन प्रिय बनाने में बड़े कष्ट उठाने पड़ेंगे। इसलिए उन्होंने यह प्रयास नहीं किया। लेकिन ऋषिकेश के तुल्य एक स्थान अवश्य ही कश्मीर की घाटी में तैयार कर लिया। जिस जगह पैगम्बर मोहम्मद के पवित्र बाल होने के सम्बंध में किवदंती प्रचलित है उसका नाम उन्होंने ‘हजरत बाल’ रख दिया। इस्लाम पूजा-पद्धति में विश्वास नहीं रखता। लेकिन अपने पैगम्बरों और ओलियाओं के प्रति श्रद्धा तो अवश्य ही व्यक्त करता है इसलिए उनसे सम्बंधित ऋषिकेश के अनुवाद स्वरूप हजरत बाल नामकरण कर दिया होगा। यह एक व्याख्या है इतिहास नहीं। अमीर हमजा नामक लेखक एवं बुद्धिजीवी पाकिस्तान के आंतकवादी संगठनों के मित्र एवं दार्शनिक माने जाते हैं। उनके कथनानुसार भारतीय वैज्ञानिकों ने अपनी मीसाइलों के नाम 'अग्नि' और 'पृथ्वी' दिए हैं, जो इस बात को सिद्ध करते हैं कि वे आतंकवादियों को इनसे नष्ट करके विजय प्राप्त कर लेंगे। एक ओर वे मुस्लिम राष्ट्र हैं जो भारतीय संस्कृति के सकारात्मक पहलू की प्रशंसा करते हुए थकते नहीं हैं, जबकि दूसरी ओर आंतकवादी मानसिकता से ग्रसित ऐसे जिहादियों की भी कमी नहीं है जिन्हें पृथ्वी और अग्नि जैसे पंचभूत तत्वों में भी राजनीति ही दिखाई पड़ती है।

अब लाहौर में श्मशान घाट भी नहीं बचे

हाल ही में एक खबर आई है कि पाकिस्तान के लाहौर में अब एक भी श्मशान घाट नहीं रहा। इस कारण लाहौर में रहने वाले हिन्दुओं और सिखों को बड़ी परेशानी होती है। किसी हिन्दू या सिख के मरने पर उनके परिजन इस चिन्ता से शोक भी नहीं मना पाते कि अब इसका अन्तिम संस्कार कहाँ किया जाए? लाहौर में रावी नदी के किनारे अन्तिम संस्कार करने की मनाही है। प्रशासन का कहना है कि रावी नदी के किनारे अन्तिम संस्कार करने से मुस्लिमों की मजहबी भावनाएँ आहत होती हैं। इसलिए लाहौर में रहने वाले हिन्दुओं को अपने मृत परिजन का अन्तिम संस्कार करने के लिए करीब 90 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। इतना ही नहीं शव को दिन में एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी खतरे से खाली नहीं है। कट्टरवादी विरोध करते हैं और शव को मुस्लिम रीति से दफनाने पर जोर देते हैं। इसलिए रात में शव को ले जाया जाता है,वह भी चोरी-छुपे। उल्लेखनीय है कि 1947 में लाहौर में 11 श्मशान घाट थे। ये घाट मडल टाऊन, टकसाली गेट, बक्कर मंडी, इशरा, कृष्ण नगर आदि इलाकों में थे। पहले इन श्मशान घाटों पर कट्टरवादियों ने जबरन कब्जा किया और अब उन लोगों ने इन्हें बेच दिया है। जहाँ पहले श्मशान घाट होते थे अब वहाँ बड़े-बड़े व्यावसायिक परिसर बन गए हैं। दिल्ली में रहने वाले कई पाकिस्तानी हिन्दुओं ने पाञ्चजन्य को बताया कि यह सब एक साजिश के तहत हुआ है। इस साजिश में पाकिस्तान की सरकार भी शामिल है। इन लोगों ने यह भी कहा कि लाहौर में अंगुली में गिनने लायक हिन्दू रह गए हैं। कट्टरवादियों को ये हिन्दू भी बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं। इसलिए वे लोग हिन्दुओं को पाकिस्तान से भगाने में लगे हैं। 

साभार: पाञ्चजन्य, लेखक: मुजफ्फर हुसैन

Wednesday, August 21, 2013

GOVT. LOOT - सरकारी लूट




औरंगजेब ने जजिया कर लगाया था जो साल मे एक हि बार देना पड़ता था, आमदनी पर उसने भी कोई कर नही लगाया था | लेकिन अंग्रेजों ने भारत की लोगोंकी आमदनी पर कर लगाया वो भी 97%, माने 100 रूपए अगर किसी की आमदनी हो तो 97 रूपए अंग्रेजों को देना पड़ता था सिर्फ 3 रूपए उसके पास बचता था | ऐसा व्यवस्था अंग्रेजों ने बनाया था जिससे सारा पैसा भारतीय से लूट लेना ताकि भारतीय के हात मे कुछ न बचे, ताकि वे क्रांतिकारियों को दान न दे सके, इसके लिए इनकम टैक्स का कानून इस देश मे आया था |

बड़ी दुःख बात यह है के अंग्रेजों ने जो लूट का कानून बनाया था वो आज़ादी के 65 साल बाद भी चल रहा है, Indian Income Tax के नाम से हि चल रहा है, और आज भी भारतवासियों से धन लूटा जा रहा है | बस अंतर इतना है पहले गोर अंग्रेजों ने लूटा था और उस धन को लन्दन मे जमा किया था, अब काले अंग्रेज उस कानून के आधार पर धन लूट रहे है और सुईजरलैंड मे ले जाकर उस धन को जमा कर रहें है; व्यवस्था वोही के वोही चल रही है कानून वोही के वोही चल रही है |

अंग्रेजों ने Central Excise Act बनाया – कोई भी भारतवासी किसी वस्तु का उत्पादन करे तो उसपर 350% excise duty, अंग्रेजों ने sales tax लगाया, अंग्रेजों ने road tax लगाया, toll tax अगया, municipal corporation tax लगाया और ऐसे 23 तरह के टैक्स कानून लगाकर इस देश के नागरिकों को जमकर लूटा, लहभग 190 वर्षों तक |

अब अंग्रेजों ने यह सब कानून बनाये थे लूटने के लिए, तो आज़ादी के बाद होना ये चाहिए था के ये सारे कानून ख़तम किये जाये Income Tax ख़तम किये जाये, Central Excise ख़तम किये जाये, Road Tax ख़तम किये जाये, Toll Tax ख़तम किये जाये, Municipal Corporation Tax ख़तम किये जाये माने, अंग्रेजों के लगाये हुए 23 तरह के सारे टैक्स ख़तम किया जाये | लेकिन हमारे काले अंग्रेजों ने इसका उल्टा किया, अंग्रेजों के जाने के 65 साल के बाद काले अंग्रेजों ने इस देश पर अब 64 तरह के टैक्स लगा रखे है, और देश को लूट रहे है, अंग्रेजों ने भी जितना नही लूटा होगा उससे कई गुना जादा काले अंग्रेज, भ्रष्टाचारी नेता, और भ्रष्टाचारी अधिकारी इस देश को लूट रहें है और इसी लूट के damदम पर 100 लाख करोड़ रूपए से जादा इन्होने विदेशी बैंकों मे जमा करके रखा हुआ है |

साभार: फेस बुक, राजीव दीक्षित जी, कुनाल आर्य व दिनेश राठोर जी 

Friday, August 16, 2013

हिदुत्व के व्यापक विरोध के कारण गनजवी 10 प्रतिशत भारत भी नही जीत पाया था

आनंदपाल के पश्चात उसके पौत्र भीमपाल ने अपने महान पूर्वज राजा जयपाल की वीर और राष्टभक्ति से परिपूर्ण परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। इस शिशु राजा को पुन: कुछ अन्य राजाओं ने सैन्य सहायता देने का निश्चय किया। अत: एक बार पुन: देशभक्ति का एक रोमांचकारी वातावरण देश में बना। राजा ने झेलम नदी के तट पर बालानाथ की पहाड़ियों में मार्गला घाटी में महमूद का सामना करने के लिए स्थान का निर्धारण किया। यहां इस स्थान पर छापामार युद्घ को अच्छी तरह लड़ा जा सकता था, लेकिन नवयुवक राजा ने ऐसा न करके सीधे सीधे सामना करना ही उचित समझा। देश की इस राष्ट्रीय सेना के लिए यह पहला अवसर था जब उसे पहाड़ों के बीच ऐसा युद्घ लड़ना पड़ रहा था। फलस्वरूप वीरता पर क्रूरता हावी हो गयी और हम युद्घ हार गये। यह घटना 1014 ई. की है।

राजा भीमपाल ने लुटेरे को मार भगाया

अगले ही वर्ष महमूद ने फिर भीमपाल पर हमला किया। पर इस बार राजा भीमपाल ने इस लुटेरे आक्रांता को पीछे धकेलकर देश से बाहर भगाने में सफलता प्राप्त की। परंतु महमूद गजनवी ने 1018ई. में उस पर फिर आक्रमण किया और इस बार सारे पश्चिम एशिया से छंटे हुए लुटेरों और आततायियों को सम्मिलित कर वह भारत की ओर बढ़ा। महमूद गजनवी के विशाल दल को देखकर तथा अपने साथ इस बार किसी अन्य राजा को न पाकर राजा ने संधि करना ही श्रेयस्कर समझा। महमूद गजनवी और आगे बढ़ा तथा बुलंदशहर के राजा हरदत्त को हराकर मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि पर खड़े विशाल मंदिर को नष्ट कर दिया गया और भारी मात्रा में लूट का सामान प्राप्त कर लिया गया। प्रो. हबीब कहते हैं कि इस बार लूटते समय मालूम होता है कि ईर्ष्या से महमूद गजनवी का माथा पागल हो गया था।

विदेशी इतिहासकारों की दुरंगी बातें

भारत के विषय में विदेशी इतिहासकारों की बातें नितांत दुरंगी हैं। यदि हमारे रामायण कालीन और महाभारत कालीन पात्रों तथा उनके वैभव और विकास की बातें होने लगें तो ये लोग उन सब बातों को काल्पनिक कहकर उन्हें मूल्यहीन सिद्घ करने का प्रयास करते हैं। परंतु द्रोपदी के पांच पति होने के गप्प को भी सच मानकर हमारी संस्कृति का उपहास उड़ाते हैं। द्रोपदी के तो इस गप्प को सच मानते हैं और राम व कृष्ण आदि के अस्तित्व को ही नकारते हैं। कैसी बिडंबना है?

इसी प्रकार इतिहास बता रहा है कि भारत के सांस्कृतिक वैभव को सोमनाथ से भी पहले मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि को अपमानित करके नष्टï किया गया था। परंतु हमें बता दिया गया कि कृष्ण तो वैसे ही काल्पनिक हैं, इसलिए उनके जन्मस्थल पर खड़े मंदिर के नष्टï होने से अधिक दुखी होने की बात नही है। बीते हुए कल की ऐसी दुखद घटनाओं को तो हमें इसलिए भूलने के लिए कहा जाता है कि बीती ताहि बिसार दे और आगे की सुधि लेहि, वाली बात ध्यान में रखो और आज जो कुछ हो रहा है उसे धर्मनिरपेक्षता छाप सहिष्णुता को अपनाने की बात कहकर भूलने की अपेक्षा की जाती है।

‘शैतान’ से कोई नही कहता कि तू अपनी शैतानियों को छोड़ और जो अब तक शैतानियां की हैं उन पर प्रायश्चित कर। उसे बिगडै़ल बच्चा समझकर ‘सब सुधर जाएगा’ वाली स्थिति में रखकर क्षम्य माना जाता है और देश के बहुसंख्यकों को नितांत मर्यादित रहने की शिक्षा दी जाती है। यह तो अच्छी बात है कि हमें नितांत मर्यादित रखा जाए, परंतु यही बात ‘बिगडै़ल बच्चे’ पर भी लागू होनी चाहिए। वह सदियों से बिगडै़ल है और क्या आने वाली सदियों तक बिगड़ैल ही रहेगा?

….और तब तक हमारा क्या होगा?

कृष्ण जन्म भूमि का कण-कण हमसे यही प्रश्न कर रहा है। हमने कुरूक्षेत्र के कृष्ण की गीता को उनके नाम पर बढ़ाते बढ़ाते इतना भारी कर दिया कि उनकी मूल वाणी ही कहीं विलुप्त हो गयी, उनकी द्वारिका को समुद्र ने विलुप्त कर दिया, उनके मंदिर को महमूद ने विलुप्त कर दिया और उनकी ऐतिहासिकता को विदेशी इतिहासकारों ने विलुप्त कर दिया। हमने विलुप्त के इस अंतहीन क्रम के अतिरिक्त अपने ‘योगीराज कृष्ण को और दिया ही क्या है? स्वयं अपने ही विषय में अनभिज्ञ रहने के आदी हो चुके हैं हम लोग। श्रीकृष्ण को वैसे और दे भी क्या सकते हैं? यदि हम कुछ नही कर सकते हैं तो हमारी ओर से हमारे राष्टधर्म का प्रो. हबीब देखिए किन शब्दों में निर्वाह कर रहे हैं :-

महमूद असीम संपत्ति में लोटता था। भारतीय उसके धर्म से घृणा करने लगे। लुटे हुए लोग कभी भी इस्लाम को अच्छी नजर से नही देखेंगे?….जबकि इसने अपने पीछे लुटे मंदिर बर्बाद शहर, और कुचली लाशों की सदा जीवित रहने वाली कहानी को ही छोड़ा है। इससे धर्म के रूप में इस्लाम का नैतिक पतन ही हुआ है, नैतिक स्तर उठने की बात तो दूर रही। उसकी लूट 30,00,000 दिहराम आंकी गयी है।

क्या हिंदू कायर थे

विदेशी आक्रामकों की क्रूरता के सामने भारत की वीरता हारी हुई देखकर अक्सर लोग हिंदुओं को कायर कह देते हैं। अपनों ने हमें ‘कायर मान लिया, उन्होंने ‘काफिर मान लिया, जबकि अंग्रेजों ने हमें ‘टायर्ड (थकी हुई मानसिकता से ग्रस्त) मान लिया और देखिए कि हम इन तीनों पुरस्कारों को ही अपनी पीठ पर लादे फिर रहे हैं। यदि कोई ये हमसे कहे भी कि इन को उतारो, फेंको अथवा छोड़ दो तो हम ऐसा कहने वाले पर ही गुर्राते हैं। शेर सयारों में बहुत दिन रह लिया तो अपने शेरत्व को ही भूल गया है। हिंदू कायर आदि नही था। वह हर स्थान पर और हर वस्तु में नैतिक नियमों की पवित्रता का समर्थक था। व्यापक नरसंहार, स्त्रियों के साथ दानवीय अनाचार और बच्चों तक के साथ अमानवीय अत्याचार भारत की, युद्घ शैली में कभी सम्मिलित नही थे। पूर्णत: वर्जित थे ये अमानवीय कृत्य। मुस्लिम आक्रामकों की युद्घ शैली में पहली बार ऐसे कृत्य देखकर हिंदू इन आक्रामकों के प्रति घृणा से भर गया। यही कारण रहा कि कभी भविष्य में भी ये दोनों विचारधाराएं निकट नही आ सकीं। इसलिए यह भी दावे के साथ कहा जा सकता है कि भारत में किसी हिंदू मुस्लिम नाम की मिश्रित संस्कृति का निर्माण भी नही हुआ। संस्कृति तब निर्मित होती है, जब आपकी नैतिकता और मेरी नैतिकता समान स्तर की हों, तो वे मिलते ही परस्पर घुल मिल जाती हैं। जबकि यहां शिवाजी अपने शत्रु की पुत्रवधू को अपने खेमे में आने पर भी लौटा रहे हैं और वो हमारी बहू बेटियों को लूट का माल समझ रहे हैं। कैसे आप इसे मिश्रित संस्कृति कहेंगे? जैन, बौद्घ, पारसी और सिक्खों ने कभी ऐसा कृत्य नही किया, इसलिए वह हमारी वास्तविक संस्कृति के अंग बन गये और आज तक हैं। यही सोच भारत की संस्कृति के सर्वाधिक निकट है। आप हिंदुओं की देश धर्म के प्रति असीम भक्ति देखिए कि हर बार के आक्रमण के साथ गजनवी हजारों स्त्री पुरूषों व बच्चों को दास बनाकर ले जाता था, उनका फिर एक मेला लगाता था। जिसमें अरब के लोग उन्हें अपनी वासना पूर्ति या अन्य कार्यों के लिए खरीदते थे जो इस पकड़ में आ जाते थे वो आजीवन यातना झेलते थे और जो नही आते थे, वो अपनों के बिछुड़ने की पीड़ा से कराहते रहते थे-परंतु फिर भी देश धर्म के प्रति श्रद्घा बनाए रखी, असीम यातनाओं को लंबे काल तक झेलना भी कायरता नही शूरवीरता ही होती है।

कन्नौज के अपघाती शासक को दण्ड

कन्नौज का दुर्भाग्य रहा है कि वहां कई जयचंदों ने जन्म लिया है। महमूद गजनवी के काल में कन्नौज के शासक ने उसके सामने फटाफट आत्मसमर्पण कर दिया था और अपनी प्रजा पर असीम अत्याचारों को मूक होकर देखता रह गया था। यह बात कालिंजर और ग्वालियर के राजाओं को अच्छी नही लगी थी। इन राजाओं ने मिलकर कन्नौज पर आक्रमण कर दिया और प्रजा पीड़क राजा से कन्नौज की प्रजा को मुक्ति दिलाकर अपने राजधर्म का पालन किया। इन दोनों राजाओं की राष्ट्रीय भावना यहीं तक सीमित नही रही उन्होंने महमूद के आक्रमण को रोकने के लिए राजा भीमपाल और उसके पिता त्रिलोचन पाल की सहायता करने का भी निश्चय किया। 1019 ई. के शीतकाल में महमूद ने पंजाब की ओर से आक्रमण करने की योजना बनाई। दुर्भाग्य रहा इस देश का कि त्रिलोचन पाल की सेना युद्घ से पहले ही बिखर गयी। उसकी सेना की ये स्थिति देखकर सहायक राजाओं का भी मनोबल टूट गया। तब महमूद गजनवी को इस सेना का जो कुछ भी माल पल्ले पड़ा उसे ही लेकर वह चला गया। हमारी अहिंसा परमो धर्म: की नीति हमारे लिए घातक सिद्घ हुई। फिर भी अलबरूनी ने भीमपाल राजा के वंश के विषय में लिखा है:-वे उच्च विचार और सभ्य आचार के महान व्यक्ति थे। अपनी महानता के कारण वे अच्छे और सच्चे कामों को करने में कभी भी पीछे नही हटे। अंतिम जीवित उत्तराधिकारी भीमपाल अजमेर के राय के पास चले गये। वहां 1029 ई. में उनका देहांत हो गया।

शत्रु के मुंह से भी प्रशंसा निकलना किसी के व्यक्तित्व की महानता को नमन करना ही होता है। हमें स्मरण रखना होगा कि अवरोध की निर्बल पड़ती परंपरा के कारण महमूद गजनवी ने लाहौर को हमसे छीनकर वहां मुस्लिम शासक की नियुक्ति कर दी थी। यह राज्य पंजाब के कल्लूर शासकों की राजधानी रहा था। महमूद ने भारत की धरती पर लूटमार और आक्रमण तो कई किये थे, पर शासन स्थापित करने का उसका ये कार्य पहला ही था। सन 1022 में महमूद ने ग्वालियर और कालिंजर पर आक्रमण किया। यहां से वह कुछ लूट का माल लेकर लौट गया।

वीर सेल्यूक हिंदू जाति

वृहत्तर भारत अत्यंत विस्तृत था। आज हम जिस भारत को देखते हैं वह तो उस समय के महाभारत का अत्यंत लघु रूप है। महमूद गजनवी के समय समरकंद (समरखण्ड) के पास एक वीर हिंदू सेल्यूक जाति रहती थी। इसके योद्घाओं की उस समय धाक थी। उनके आसपास से गजनवी कई बार निकलकर भारत की ओर आया, परंतु उनसे कभी युद्घ का खतरा मोल नही लिया। ये लोग भी अपने देश धर्म के प्रति गहरी निष्ठा रखते थे और उन्हें यह पसंद नही था कि कोई उनके देशधर्म को किसी प्रकार से क्षति पहुंचाए। महमूद भी इन लोगों से सीधे टकराने और उन्हें समाप्त करने से बचता था। एक बार उसने इन लोगों को अपने मूल स्थान से उठाकर अन्यत्र बसाने का निश्चय किया। जिससे उसका इस्लामी राज्य पूर्णत: मुस्लिम माना जाए। इसी सोच के वशीभूत होकर महमूद ने सेल्यूकों को परशियन के चरागाहों में जा बसने को कहा। उस समय तो सेल्यूकों ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया परंतु गजनवी के मरने के पश्चात इन्हीं सेल्यूकों ने उसका साम्राज्य छिन्न भिन्न करने में विशेष योगदान देकर पिछले पापों का प्रतिशोध लिया था। जब ये लोग महमूद के समय में स्थान परिवर्तन कर नदी पार कर रहे थे तो कहा जाता है कि इन्हें नदी में ही डुबोकर मारने का परामर्श गजनवी को उसके सैन्याधिकारियों ने दिया था। परंतु महमूद का इनकी वीरता से ऐसा करने का साहस नही हुआ था। निश्चित ही इन सेल्यकों के योगदान पर अभी भी विशेष शोध की आवश्यकता है।

सोमनाथ पर आक्रमण

सोमनाथ का मंदिर उस समय के सर्वाधिक संपन्न मंदिरों में गिना जाता था। कहा जाता है कि इस मंदिर के पास जितनी धन संपदा उस समय थी उसका सौवां भाग भी किसी राजा के पास नही था। अत: ऐसे धन संपदा संपन्न मंदिर पर महमूद जैसे लुटेरे की दृष्टिï ना पड़े ऐसा कैसे संभव था? इसलिए उसने अक्टूबर 1025ई. में इस मंदिर पर आक्रमण करने के आशय से गजनवी से प्रस्थान किया। जनवरी 1026 में उसने मंदिर पर आक्रमण किया। मंदिर में दो सौ मन सोने की एक जंजीर थी। मंदिर के प्रांगण में स्थित पाषाण स्तंभ भी स्वर्णावेष्टित थे। 3000 ऊंटों पर व हजारों घोड़ों और हाथियों पर मंदिर का खजाना लादकर ले जाया गया था।

उस समय के लिए कहा जाता है कि सारे राजस्थान के राजपूत राजाओं ने वापस लौटते महमूद को घेरने की योजना बनाई थी, लेकिन उसने मार्ग परिवर्तन कर लिया और दूसरी ओर से निकल गया। तब रास्ते में उसे जाटों ने मुलतान में घेरने का प्रयास किया था, लेकिन वह जाटों से भी बच गया था। गजनवी पहुंचकर वह मुलतान के जाटों से प्रतिशोध लेने पुन: आया। जाटों को बड़ी यातनाएं दी गयीं और उनकी पत्नियों को मुस्लिम लुटेरे अपने साथ ले गये। सोमनाथ के मंदिर का पूर्णत: विध्वंस मचा दिया गया था।

महमूद ने कितना भारत जीता

अब हम 1030 की बात कर रहे हैं। 30 अप्रैल को इसी वर्ष महमूद मृत्यु का ग्रास बना। वह उस समय 63 वर्ष का था। मूलत: वह लुटेरा था, परंतु फिर भी उसने भारत के पश्चिम में एक इस्लामिक साम्राज्य खड़ा कर लिया था। यह साम्राज्य कुछ अफगानिस्तान में तो कुछ पाकिस्तान में और कुछ आज के पंजाब के क्षेत्र से मिलकर बना था। उस समय के भारत का यह लगभग 10 प्रतिशत भाग ही होगा। शेष 90 प्रतिशत भारत तो तब भी स्वतंत्र था। 1030 में हम 10 प्रतिशत की हानि झेल रहे थे जबकि सन 712 ई. से मुस्लिम आक्रांता हमारे भूभाग को हड़पना चाह रहे थे। 318 वर्ष में उन्हें 10 प्रतिशत की अस्थायी सफलता मिली। जबकि हम संघर्ष के 318 वर्षों में अपने 90 प्रतिशत भूभाग को बचाए रखने में सफल रहे। दुर्भाग्य है इस देश का कि जो 318 वर्षों में 10 प्रतिशत सफल हुए उन्हें तो शत प्रतिशत अंक दिये गये और जिन्होंने मात्र 10 प्रतिशत ही विदेशी शत्रु को सफल होने दिया उन्हें पूर्णत: असफल मानकर शून्य अंक दिये गये। कितना बड़ा छल, कितना बड़ा प्रपंच, और कितना बड़ा झूठ है ये? जिसे हम सदियों से ढोते आ रहे हैं। इसी छल के कारण हमारे भीतर यह धारणा बैठा दी गयी कि मौहम्मद बिन कासिम यहां आया और उसने आते ही भारत को हथकड़ी बेड़ी लगायी और पराधीनता की कारावास में डाल दिया और अगले 1235 वर्ष तक यह देश पराधीनता की कारावास में पड़ा सड़ता रहा। अपने पुरूषार्थ और पौरूष पर अपने आप ही पानी फेरने का ऐसा अपघात किसी अन्य देश में होता नही देखा जाता। सचमुच हमें इतिहास बोध नही है, यदि इतिहास बोध होता तो हम अब तक अपना वास्तविक इतिहास लिख डालते।

डकैतों का वंदन राष्ट्रघात है

राजा जब अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए दूसरे देशों पर आक्रमण करता है तो ऐसे आक्रमण राजनीतिक उद्देश्य से किये जाते हैं, जिनके प्रतिशोध में कई बार आपकी ओर से भी आक्रमण हो सकता है। जहां युद्घों का ऐसा आदान प्रदान होता है वहां युद्घों से होने वाली क्षति भी क्षम्य होती है। परंतु जहां लूट और नरसंहार आक्रमण का एक मात्र उद्देश्य हो वहां ऐसे आक्रमण को लूट व नरसंहार की घटना मानकर आक्रांता को डकैत अथवा मानवता का हत्यारा कहना ही उचित होता है।

भारत ने कभी सिकंदर के यूनान पर आक्रमण नही किया भारत ने कभी गजनवी या गोरी के देश पर भी चढ़ाई नही की, इसलिए इनको लुटेरा ही कहा जाएगा। परंतु इन्हें महान कहकर हमें पढ़ाया गया है। जो हीरो थे और वास्तव में महान थे वे तो जीरो हो गये और जो जीरो थे वो हीरो या महान कहकर प्रस्तुत किये गये। छल व कपट का ऐसा ताना बाना भारतीय इतिहास पर चढ़ाया गया कि आज तक वह उतारे से भी उतर नही रहा है। लूट, हत्या, डकैती, बलात्कार और क्रूरता कभी सांस्कृतिक सामंजस्य स्थापित कराने में सहायक नही हो सकते और ना ही इन कार्यों को कभी महान माना जा सकता है, तो फिर भारतीय इतिहास में ऐसा क्यों पढ़ाया जा रहा है?


Hindu-Vedic Culture of Ancient Indonesia - इण्डोनेशिया की प्राचीन हिन्दू संस्कृति




७वीं - ८वीं सदी तक इण्डोनेशिया में पूर्णतया हिन्दू-वैदिक संस्कृति ही विद्यमान थी इसके आज भी अनेकों प्रमाण मिल रहे है तथा कई तो निर्भय होकर मूरत रूप में खड़े है


निम्न जानकारी लाल कृष्ण आडवाणी जी के ब्लॉग से ली गई है --


कुछ वर्ष पूर्व मेरे एक मित्र ने दुनिया के सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाले देश इण्डोनेशिया से लौटने के बाद कच्छ के आदीपुर (गुजरात) में मुझे एक 20 हजार रुपया वहां की करेंसी का नोट दिखाया जिस पर भगवान गणेश मुद्रित थे। मैं आश्चर्यचकित हुआ और प्रभावित भी ।

जब पिछले महीने इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता से सिंधी समुदाय के कुछ महानुभावों के समूह ने 9,10 तथा 11 जुलाई 2010 को जकार्ता में होने वाले विश्व सिंधी सम्मेलन में आने का न्यौता दिया तो मैंने इसे तुरन्त स्वीकारा । इसका कारण यह था कि मैं इस देश पर भारतीय सभ्यता और विशेष रुप से रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथों के प्रभाव के बारे में अक्सर सुनता रहता था। करेंसी नोट पर गणेशजी का छपा चित्र इसका एक उदाहरण है।

मेरी पत्नी कमला, सुपुत्री प्रतिभा, दशकों से मेरे सहयोगी दीपक चोपड़ा और उनकी पत्नी वीना के साथ मैं 8 जुलाई को यहां से रवाना हुआ तथा 13 जुलाई को इस यात्रा की अविस्मरणीय स्मृतियां लेकर लौटा। इण्डोनेशिया में 13,677 द्वीप हैं जिनमें से 6000 से ज्यादा पर आबादी है। वहां की कुल जनसंख्या 20.28 करोड़ में से 88 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम और 10 प्रतिशत ईसाई हैं। यहां की 2 प्रतिशत हिन्दू आबादी मुख्य रुप से बाली द्वीप में रहती है।

Bali Brand Logo


बाली द्वीप के लिए हाल ही में स्वीकृत किया गया नया ब्राण्ड ‘लोगो’ (प्रतीक चिन्ह) देश की हिन्दू परम्परा का प्रकटीकरण है। इण्डोनेशिया के पर्यटन मंत्रालय का प्रकाशन इस प्रतीक चिन्ह को इस प्रकार बताता है, त्रिकोण (प्रतीक चिन्ह की आकृति) स्थायित्व और संतुलन का प्रतीक है। यह तीन सीधी रेखाओं से बना है जिनमें दोनों सिरे मिलते हैं, जो सास्वत, अग्नि (ब्रह्मा- सृष्टि निर्माता), लिंग या लिंग प्रतिमान के प्रतीक हैं। त्रिकोण् ब्रहमाण्ड के तीनों भगवानों - (त्रिमूर्ति- ब्रह्मा, विष्णु और शिव), प्रकृति के तीन चरणों (भूर, भुव और स्वाहा लोक) और जीवन के तीन चरणों (उत्पत्ति, जीवन और मृत्यु ) को भी अभिव्यक्त करते हैं। प्रतीक चिन्ह के नीचे लिखा बोधवाक्य शान्ति, शान्ति, शान्ति भुवना अलित दन अगुंग (स्वयं और विश्व) पर शान्ति, जोकि एक पावन और पवित्र सिरहन देती है, जिससे गहन दिव्य ज्योति जागृत होती है जो सभी जीवित प्राणियों में संतुलन और शान्ति कायम करती है।

यहां 20000 रुपये के करेंसी नोट का नमूना दिया गया है। जैसा मैंने ऊपर वर्णन किया कि कुछ वर्ष पूर्व मैंने इसे देखा था और तभी तय किया था कि यदि मुझे इस देश की यात्रा करने का अवसर मिला तो मै स्वयं जा कर इसे प्राप्त करुंगा तथा औरों को दिखाऊंगा।


Indonesian Rupiah with Ganesha inscription


जकार्ता जाने वाले यात्रियों के लिए इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता के उत्तर-पश्चिम तट पर स्थित शहर के बीचोंबीच भव्य निर्मित अनेक घोड़ों से खिंचने वाले रथ पर श्री कृष्ण-अर्जुन की प्रतिमा सर्वाधिक आकर्षित करने वाली है।


Krishna-Arjuna statue at Jakarta main square


इण्डोनेशिया में स्थानों, व्यक्तियों के नाम और संस्थानों का नामकरण संस्कृत प्रभाव की स्पष्ट छाप छोड़ता है


Bheema statue


निश्चित रूप से यह जानकर कि इण्डोनेशिया में सैन्य गुप्तचर का अधिकारिक शुभांकर (mascot) हनुमान हैं, काफी प्रसन्नता हुई। इसके पीछे के औचित्य को वहां के एक स्थानीय व्यक्ति ने यूं बताया कि हनुमान ने ही रावण द्वारा अपहृत सीता को जिन्हें अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा गया था, का पता लगाने में सफलता पाई थी।


हमारे परिवार ने चार दिन इण्डोनेशिया - दो दिन जकार्ता और दो दिन बाली में बिताए।

बाली इस देश के सर्वाधिक बड़े द्वीपों में से एक है। यहां के उद्योगों में सोने और चांदी के काम, लकड़ी का काम, बुनाई, नारियल, नमक और कॉफी शामिल हैं। लेकिन जैसे ही आप इस क्षेत्र में पहुंचते हैं तो आप साफ तौर पर पाएंगे कि यह पर्यटकों से भरा हुआ है। लगभग तीन मिलियन आबादी वाले बाली में प्रतिवर्ष एक मिलियन पर्यटक आते हैं।

इस द्वीप की राजधानी देनपासर है। हमारे ठहरने का स्थान मनोरम दृश्य वाला फोर सीजंस रिसॉर्ट था जो समुद्र के किनारे पर है और हवाई अड्डे से ज्यादा दूर नहीं है। रिसॉर्ट जाते समय रास्ते में मैंने जकार्ता में कृष्ण-अर्जुन जैसी विशाल पत्थर पर बनी आकृति देखी हालांकि यह जकार्ता में देखी गई आकृति से अलग किस्म की थी।

मैंने अपनी कार के ड्राइवर से पूछा: यह किसकी प्रतिमा है? और क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब उसने जवाब दिया तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। उसने बताया, ”यह महाभारत के घटोत्कच की प्रतिमा है।” उसने आगे बताया ”और शहर में इस आकृति में घटोत्कच के पिता भीम को भी दिखाया गया है जो दानव से भीषण युध्द कर रहे हैं!”


Ghatotakacha (Son of Bheema) statue near the Ngurah Rai International Airport


भारत में, इन दोनों महाकाव्यों रामायण और महाभारत में से सामान्य नागरिक रामायण के अधिकांश चरित्रों को पहचानते हैं। लेकिन महाभारत के चरित्र कम जाने जाते है।वस्तुत:, भारत में भी बहुत कम होंगे जिन्हें पता होगा कि घटोत्कच कौन है? और वहां हमारी कार का ड्राइवर भीम से उसके रिश्ते के बारे में भी पूरी तरह से जानता था। : D

जकार्ता में सिंधी सम्मेलन और बाली में हमें रामायण के दृश्यों के मंचन की झलक देखने को मिली जो भारत में प्रचलित परम्परागत रुप से थोड़ा भिन्न थी। कलाकारों का प्रदर्शन तथा प्रस्तुति और जिन स्थानों पर यह प्रदर्शन देखने को मिले वहां का सामान्य वातावरण भी पर्याप्त श्रध्दा और भक्ति से परिपूर्ण था।

मैं यह अवश्य कहूंगा कि इण्डोनेशिया के लोग हमसे ज्यादा अच्छे ढंग से रामायण और महाभारत को जानते हैं और संजोए हुए है।

-- लाल कृष्ण आडवाणी

नयी दिल्ली

१७ जुलाई, २०१०

Archaeology--

इसके अतिरिक्त शिव जी तथा गणेश जी का एक १००० वर्ष पुराना मंदिर भी खुदाई में प्राप्त हुआ है शोधकर्ताओं का कहना है की १० वीं सदी में हुए भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट के कारन ये मंदिर लावे की तह में दब गया था तथा उनका कहना है की अब तक पूरी दुनियां में प्राप्त हुई विरासतों में यह सबसे उत्तम अवस्था में है

"This temple is a quite significant and very valuable because we have never found a temple as whole and intact as this one," said archaeologist Dr Budhy Sancoyo, who is one of the researchers painstakingly cleaning up the temple.


इण्डोनेशिया की विमान सेवा का नाम भी विष्णु जी के वाहन गरुड़ के नाम पर रक्खा गया है

Garuda , the vehicle ( Vimana ) of Lord Vishnu , holds an important role for Indonesia, as it serves as the national symbol of Indonesia.

इण्डोनेशिया के प्राचीन हिन्दू मंदिरों की कई अन्य तस्वीरें -

Archaeologists found a statue of Ganesha, a Hindu deity, during their excavations on the campus of the Islamic University, Indonesia














EVEN MORE --

Bali, Indonesia -

Mother Temple of Besakih, Karangasem Regency (the biggest Hindu temple in Indonesia)

Pura Ulun Danu Bratan

Pura Luhur Ulu Watu

Kehen Temple, southern slope of Bangli hill

Makori temple, Bali

Batur Temple (Ulun Danu temple), Kalanganyar Batur village, Kintamani

Watukaru Temple, Wangaya Gede village, Tabanan

Pucak Penulisan, Kintamani

Pancering Jagat, Trunyan village, Kintamani

Jagadnatha, Jalan Mayor Wisnu, Puputan Square

Maospahit Denpasar, Banjar Gerenceng

Tanah Lot, Marga

Goalawah

Tirtha Empul Temple

Sakenan, boat Pirelli, Klungkung Regency

Taman Ayun

Pengerebongan, Kesiman Culture Village, Kesiman Petilan Village, District of East Denpasar

Lombok

Lingsar Temple, 7 kilometer from Narmada, one hour drive to east from Mataram, Hindu Temple, but at some occasions is used also by Animism Islamic Wektu Telu which only do the prayer 3 times a day

Java

Prambanan Temples

Parahyangan Agung Jagat Kartta Temple, Warung Loak Village, Taman Sari, Bogor Regency (the second biggest Hindu temple in Indonesia)

Ijo Temple

Barong Temple

Sambisari Temple

Kedulan Temple

Gebang Temple

Pustakasala Temple

Dieng Temples

Sukuh Temple

Cetho Temple

Penataran Temple

Kidal Temple

Surawana Temple

North Sumatra

Shri Sithi Vinayagar Kuil, Karang Sari, Polonia Medan

Shri Balaji Venkateshwara Koil, Jln.Bunga Wijaya Kesuma/Pasar IV,Padang Bulan, Medan

Shri Mariamman Kuil, Jalan Teuku Umar, Kampung Madras, Medan

Thandayuthapani Temple, Medan

Shri Kaliamman Kuil, Jalan Zainul Arifin, Medan

Maha Muniswarar Temple, Medan

Arulmigu Shri Maha Mariamman Koil, Sampali

Shri Thendayudhabani Koil, Jln.Sultan Hasanuddin, Lubuk Pakam

Shri Subramaniam Nagarattar Kuil (Chettiar Kuil), Jalan Kejaksaan, Kebun Bunga, Medan

Shri Maha Shiva Shakti Kuil, Karang Sari, Medan

Shri Mariamman Kuil, Medan Helvetia

Shri Singgama Kali Kuil, Jalan Karya, Medan Barat

Shri Kaliamman Kuil, Jalan Karya, Medan Barat (persis di sebelah Vihara Manggala)

Shri Mariamman Kuil, Bekala, Medan Simalingkar B

Shri Rajarajeshvari Amman Kuil, Selesai, Binjai Barat

dan puluhan kuil lainnya namun berukuran kecil dan tersebar di hampir seluruh kota Medan

Jakarta

Sri Siva Temple, Pluit (Indian Hindu Style)

Shri Bathra Kaliamman Koil, Komplek Perumahan Puri Metropolitan, Jl. Krisan Asri V, Blok B3, No. 20-22, Gondrong Petir, Cipondoh - Tangerang

Pura Aditya Jaya, Jl. Daksinapati Raya 10, Jakarta, Indonesia




अब बताइए हिन्दुत्व की इतनी गहरी छाप तो हिन्दुस्थान में भी नही है !!


साभार :

Thursday, August 1, 2013

भारत का स्वर्णिम अतीत जिसे जानकर आप चौक जायेंगे

लेखिका: विजया भारती 

आज से लगभग 100-150 साल से शुरू करके पिछले हज़ार साल का इतिहास के कुछ तथ्य। भारत के इतिहास/ अतीत पर दुनिया भर के 200 से ज्यादा विद्वानों/ इतिहास विशेषज्ञों ने बहुत शोध किया है। इनमें से कुछ विद्वानों/ इतिहास विशेषज्ञों की बात आपके सामने रखूँगा। ये सारे विद्वानों/ इतिहास विशेषज्ञ भारत से बाहर के हैं, कुछ अंग्रेज़ हैं, कुछ स्कॉटिश हैं, कुछ अमेरिकन हैं, कुछ फ्रेंच हैं, कुछ जर्मन हैं। ऐसे दुनिया के अलग अलग देशों के विद्वानों/ इतिहास विशेषज्ञों ने भारत के बारे में जो कुछ कहा और लिखा है उसकी जानकारी मुझे देनी है।

आज आप भारत के विषय में कुछ ऐसी जानकारी पड़ेंगे जो न तो पहले आपने पढ़ी होगी और न ही सुनी होगी | ये बहुत ही आश्चर्य और दुःख की बात यह है कि हमारी सरकार इस प्रकार की जानकारी को छुपाती है, इसको आज की शिक्षा-प्रणाली में शामिल नहीं करती | आखिर क्यों नहीं बताया जाता है हमको हमारे भारत के विषय में !! क्यों स्कूल की किताबो में बस वही सब मिलता है जिससे हम अपने अतीत पर गर्व नहीं, शर्म कर सके !! और दुःख इस बात का भी है कि आधुनिक सरकारी-शिक्षा ने हमें ऐसा बना दिया है कि हमारे लिए भारत के वास्तविक अतीत पर विश्वास करना सहज नहीं है, लेकिन स्कूल में पढ़े आधे-अधूरे सत्य पर हमें विश्वास हो जाता है | चलिए आज आपका एक छोटा सा परिचय करता है .. भारत के स्वर्णिम अतीत है !!!

1. सबसे पहले एक अंग्रेज़ जिसका नाम है ‘थॉमस बैबिंगटन मैकाले’, ये भारत में आया और करीब 17 साल रहा। इन 17 वर्षों में उसने भारत का काफी प्रवास किया, पूर्व भारत, पश्चिम भारत, उत्तर भारत, दक्षिण भारत में गया। अपने 17 साल के प्रवास के बाद वो इंग्लैंड गया और इंग्लैंड की पार्लियामेंट ‘हाउस ऑफ कोमेन्स’ में उसने 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटिश संसद एक लंबा भाषण दिया।

उसका अंश पुन: प्रस्तुत करूँगा उसने कहा था :: “ I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation. ”

इसी भाषण के अंत में वो एक वाक्य और कहता है : वो कहता है ”भारत में जिस व्यक्ति के घर में भी मैं कभी गया, तो मैंने देखा की वहाँ सोने के सिक्कों का ढेर ऐसे लगा रहता हैं, जैसे की चने का या गेहूं का ढेर किसानों के घरों में रखा जाता है और वो कहता है की भारतवासी इन सिक्को को कभी गिन नहीं पाते क्योंकि गिनने की फुर्सत नही होती है इसलिए वो तराजू में तौलकर रखते हैं। किसी के घर में 100 किलो, इसी के यहा 200 किलो और किसी के यहाँ 500 किलो सोना है, इस तरह भारत के घरों में सोने का भंडार भरा हुआ है।”


तक्षिला विश्वविद्यालय

2. इससे भी बड़ा एक दूसरा प्रमाण मैं आपको देता हूँ एक अंग्रेज़ इतिहासकर हुआ उसका नाम है “विलियम डिगबी”। ये बहुत बड़ा इतिहासकर था, सभी यूरोपीय देशों में इसको काफी इज्ज़त और सम्मान दिया जाता है। अमेरिका में भी इसको बहुत सम्मान दिया जाता है, कारण ये है की इसके बारे में कहा जाता है की ये बिना के प्रमाण कोई बात नही कहता और बिना दस्तावेज़/ सबूत के वो कुछ लिखता नहीं है। इस डिगबी ने भारत के बारे में एक पुस्तक में लिखा है जिसका कुछ अंश मैं आपको बताता हूँ। ये बात वो 18वीं शताब्दी में कहता है: ” विलियम डिगबी कहता है की अंग्रेजों के पहले का भारत विश्व का सर्वसंपन्न कृषि प्रधान देश ही नहीं बल्कि एक ‘सर्वश्रेष्ठ औद्योगिक और व्यापारिक देश’ भी था। इसके आगे वो लिखता है की भारत की भूमि इतनी उपजाऊ है जितनी दुनिया के किसी देश में नहीं। फिर आगे लिखता है की भारत के व्यापारी इतने होशियार हैं जो दुनिया के किसी देश में नहीं। उसके आगे वो लिखता है की भारत के कारीगर जो हाथ से कपड़ा बनाते हैं उनका बनाया हुआ कपड़ा रेशम का तथा अन्य कई वस्तुएं पूरे विश्व के बाज़ार में बिक रही हैं और इन वस्तुओं को भारत के व्यापारी जब बेचते हैं तो बदले में वो सोना और चाँदी की मांग करते हैं, जो सारी दुनिया के दूसरे व्यापारी आसानी के साथ भारतवासियों को दे देते हैं। इसके बाद वो लिखता है की भारत देश में इन वस्तुओं के उत्पादन के बाद की बिक्री की प्रक्रिया है वो दुनिया के दूसरे बाज़ारों पर निर्भर है और ये वस्तुएं जब दूसरे देशों के बाज़ारों में बिकती हैं तो भारत में सोना और चाँदी ऐसे प्रवाहित होता है जैसे नदियों में पानी प्रवाहित होता है और भारत की नदियों में पानी प्रवाहित होकर जैसे महासागर में गिर जाता है वैसे ही दुनिया की तमाम नदियों का सोना चाँदी भारत में प्रवाहित होकर भारत के महासागर में आकार गिर जाता है। अपनी पुस्तक में वो लिखता है की दुनिया के देशों का सोना चाँदी भारत में आता तो है लेकिन भारत के बाहर 1 ग्राम सोना और चाँदी कभी जाता नहीं है। इसका कारण वो बताता है की भारतवासी दुनिया में सारी वस्तुओं उत्पादन करते हैं लेकिन वो कभी किसी से खरीदते कुछ नहीं हैं।” इसका मतलब हुआ की आज से 300 साल पहले का भारत निर्यात प्रधान देश था। एक भी वस्तु हम विदेशों से नहीं खरीदते थे।

3. एक और बड़ा इतिहासकार हुआ वो फ़्रांस का था, उसका नाम है “फ़्रांसवा पिराड”। इसने 1711 में भारत के बारे में एक बहुत बड़ा ग्रंथ लिखा है और उसमे उसने सैकड़ों प्रमाण दिये हैं। वो अपनी पुस्तक में लिखता है की “भारत देश में मेरी जानकारी में 36 तरह के ऐसे उद्योग चलते हैं जिनमें उत्पादित होने वाली हर वस्तु विदेशों में निर्यात होती है। फिर वो आगे लिखता है की भारत के सभी शिल्प और उद्योग उत्पादन में सबसे उत्कृष्ट, कला पूर्ण और कीमत में सबसे सस्ते हैं। सोना, चाँदी, लोहा, इस्पात, तांबा, अन्य धातुएं, जवाहरात, लकड़ी के सामान, मूल्यवान, दुर्लभ पदार्थ इतनी ज्यादा विविधता के साथ भारत में बनती हैं जिनके वर्णन का कोई अंत नहीं हो सकता। वो अपनी पुस्तक में लिख रहा है की मुझे जो प्रमाण मिलें हैं उनसे ये पता चलता है की भारत का निर्यात दुनिया के बाज़ारों में पिछले ‘3 हज़ार वर्षों’ से आबादीत रूप से बिना रुके हुए लगातार चल रहा है।”

4. इसके बात एक स्कॉटिश है जिसका नाम है ‘मार्टिन’ वो इतिहास की पुस्तक में भारत के बारे में कहता है: “ब्रिटेन के निवासी जब बार्बर और जंगली जानवरों की तरह से जीवन बिताते रहे तब भारत में दुनिया का सबसे बेहतरीन कपड़ा बनता था और सारी दुनिया के देशों में बिकता था। वो कहता है की मुझे ये स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं है की “भारतवासियों ने सारी दुनिया को कपड़ा बनाना और कपड़ा पहनना सिखाया है” और वो कहता है की हम अंग्रेजों ने और अंग्रेजों की सहयोगी जातियों के लोगों ने भारत से ही कपड़ा बनाना सीखा है और पहनना भी सीखा है। फिर वो कहता है की रोमन साम्राज्य में जीतने भी राजा और रानी हुए हैं वो सभी भारत के कपड़े मांगते रहे हैं, पहनते रहे हैं और उन्हीं से उनका जीवन चलता रहा है।”


भारत का सांस्कृतिक प्रभाव-क्षेत्र

5. एक फ्रांसीसी इतिहासकार है उसना नाम है ‘टैवरणीय’,1750 में वो कहता है: “भारत के वस्त्र इतने सुंदर और इतने हल्के हैं की हाथ पर रखो तो पता ही नहीं चलता है की उनका वजन कितना है। सूत की महीन कताई मुश्किल से नज़र आती है, भारत में कालीकट, ढाका, सूरत, मालवा में इतना महीन कपड़ा बंता है की पहनने वाले का शरीर ऐसा दिखता है की मानो वो एकदम नग्न है। वो कहता है इतनी अदभूत बुनाई भारत के करीगर जो हाथ से कर सकते हैं वो दुनिया के किसी भी देश में कल्पना करना संभव नहीं है।”

6. इसके बाद एक अंग्रेज़ है ‘विलियम वोर्ड’: वो कहता है की “भारत में मलमल का उत्पादन इतना विलक्षण है, ये भारत के कारीगरों के हाथों का कमाल है, जब इस मलमल को घास पर बिछा दिया जाता है और उस पर ओस की कोई बूंद गिर जाती है तो वो दिखाई नहीं देती है क्योंकि ओस की बूंद में जितना पतला रंग होता है उतना ही हल्का वो कपड़ा होता है, इसलिए ओस की बूंद और कपड़ा आपस में मिल जाते हैं। वो कहता है की भारत का 13 गज का एक लंबा कपड़ा हम चाहें तो एक चोटी सी अंगूठी में से पूरा खींचकर बाहर निकाल सकते हैं, इतनी बारीक और इतनी महीन बुनाई भारत के कपड़ों की होती है। भारत का 15 गज का लंबा थान उसका वजन 100 ग्राम से भी कम होता है। वो कहता है की मैंने बार बार भारत के कई थान का वजन किया है हरेक थान का वजन 100 ग्राम से भी कम निकलता है। हम अंग्रेजों ने कपड़ा बनाना तो सन् 1780 के बाद शुरू किया है भारत में तो पिछले 3,000 साल से कपड़े का उत्पादन होता रहा है और सारी दुनिया में बिकता रहा है।”

7. एक और अंग्रेज़ अधिकारी था ‘थॉमस मुनरो’ वो मद्रास में गवर्नर रहा है। जब वो गवर्नर था तो भारत के किसी राजा ने उसको शॉल भेंट में दे दिया। जब वो नौकरी पूरी करके भारत से वापस गया तो लंदन की संसद में सन् 1813 में उसने अपना बयान दिया। वो कहता है: ”भारत से मैं एक शॉल लेकर के आया उस शॉल को मैं 7 वर्षों से उपयोग कर रहा हूँ, उसको कई बार धोया है और प्रयोग किया है उसके बाद भी उसकी क्वालिटी एकदम बरकरार है और उसमे कहीं कोई सिकुड़न नहीं है। मैंने पूरे यूरोप में प्रवास किया है एक भी देश ऐसा नहीं है जो भारत की ऐसी क्वालिटी की शॉल बनाकर दे सके। भारत ने अपने वस्त्र उद्योग में सारी दुनिया का दिल जीत लिया है और भारत के वस्त्र अतुलित और अनुपमेय मानदंड के हैं जिसमे सारे भारतवासी रोजगार पा रहे हैं। इस तरह से लगभग 200 से अधिक इतिहासकारों ने भारत के बारे में यही कहा है की भारत के उद्योगों का, भारत की कृषि व्यवस्था का, भारत के व्यापार का सारी दुनिया में कोई मुक़ाबला नहीं है।”

8. अंग्रेजों की संसद में भारत के बारे में समय समय पर बहस होती रही है। सन् 1813 में अंग्रेजों की संसद में बहस हो रही थी की भारत की आर्थिक स्थिति क्या है ? उसमें अंग्रेजी सांसद कई सारी रिपोर्ट और सर्वेक्षणों के आधार पर कह रहे हैं की: “सारी दुनिया में जो कुल उत्पादन होता है उसका 43% उत्पादन अकेले भारत में होता है और दुनिया के बाकी 200 देशों में मिलाकर 57% उत्पादन होता है।”ये आंकड़ा अंग्रेजों द्वारा उनकी संसद में 1835 में और 1840 में भी दिया गया। इन आंकड़ों को अगर आज के समय में अगर इसे देखा जाए तो अमेरिका का उत्पादन सारी दुनिया के उत्पादन का 25% है, चीन का 23% है। सोचिए आज से लगभग पौने दो सौ साल पहले तक चीन और अमेरिका के कुल उत्पादन को मिलाकर लगभग उससे थोड़ा कम उत्पादन भारत अकेले करता था। इतना बड़ा उत्पादक देश था हमारा भारत। इसके बाद अँग्रेजी संसद में एक और आंकड़ा प्रस्तुत किया गया की: “सारी दुनिया के व्यापार में भारत का हिस्सा लगभग 33% है।” मतलब पूरी दुनिया में जो निर्यात होता था उसमे 33% अकेले भारत का होता था और ये आंकड़ा अंग्रेजों ने 1840 तक दिया है। इसी तरह से एक और आंकड़ा भारत के बारे में अँग्रेजी संसद में दिया गया की: “सारी दुनिया की जो कुल आमदनी है, उस आमदनी का लगभग 27% हिस्सा अकेले भारत का है।” सोचिए सन् 1840 तक भारत ऐसा अदभूत उत्पादक, निर्यातक और व्यापारी देश रहा है। 1840 तक सारी दुनिया का जो निर्यात था उसमें अमेरिका का निर्यात 1% से भी कम हैं, ब्रिटेन का निर्यात 0.5% से भी कम है और पूरे यूरोप और अमेरिका के सभी देशों को मिलाकर उनका निर्यात दुनिया के निर्यात का 3-4% है। 1840 तक यूरोप और अमेरिका के 27 देश मिलकर 3-4% निर्यात करते थे और भारत अकेले 33% निर्यात करता था। उन सभी 27 देशों का उस समय उत्पादन 10-12% था और भारत का अकेले उत्पादन 43% था और ये 27 देशों को इकट्ठा कर दिया जाए तो 1840 तक उनकी कुल आमदनी दुनिया की आमदनी में 4-4.5% थी और भारत की आमदनी अकेले 27% थी।”

9. अब थोड़ी बात भारत की शिक्षा व्यवस्था, तकनीकी और कृषि व्यवस्था की। उद्योगों के साथ भारत विज्ञान और तकनीक में विश्व में सर्वश्रेस्थ था…. भारत के विज्ञान और तकनीक के बारे में दुनिया भर के अंग्रेजों ने बहुत सारी पुस्तकें लिखी हैं। ऐसा ही अंग्रेज़ हैं ‘जी॰डबल्यू॰लिटनर’ और ‘थॉमस मुनरो’, इन दोनों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर बहुत अध्ययन किया था। एक अंग्रेज़ है ‘पेंडुरकास्ट’ उसने भारत की तकनीक और विज्ञान पर बहुत अध्ययन किया और एक अंग्रेज़ है ‘केंमवेल’ उसने भी भारत की तकनीक और विज्ञान पर बहुत अध्ययन किया था।केंमवेल ने कहा है: “जिस देश में उत्पादन सबसे अधिक होता है ये तभी संभव है जब वहाँ पर कारखाने हो और कारखाने तभी संभव हैं जब वहाँ पर टेक्नालजी हो और टेक्नालजी किसी देश में तभी संभव है जब वहाँ पर विज्ञान हो और विज्ञान किसी देश में मूल रूप से शोध के लिए अगर प्रस्तुत है तभी तकनीकी का निर्माण होता है।” 18वीं शताब्दी तक इस देश में इतनी बेहतरीन टेक्नालॉजी रही है स्टील/लोहा/इस्पात बनाने की वो दुनिया में कोई कल्पना नही कर सकता। केंमवेल कहता है की “भारत का बनाया हुआ लोहा/इस्पात सारी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ये बात वो 1842 में इस तरह कहता है की: “इंग्लैंड या यूरोप में जो अच्छे से अच्छा लोहा या स्टील बनता है वो भारत के घटिया से घटिया लोहे या स्टील का भी मुक़ाबला नही कर सकता।”


अंकोरवाट, विश्व का सबसे बड़ा मंदिर 

उसके बाद एक ‘जेम्स फ़्रेंकलिन’ नाम का अंग्रेज़ है जो धातुकर्मी विशेषज्ञ था वो कहता है की: “भारत का स्टील दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। भारत के कारीगर स्टील को बनाने के लिए जो भट्टियाँ तैयार करते हैं वो दुनिया में कोई नही बना पाता। वो कहता है इंग्लैंड में लोहा बनाना तो हमने 1825 के बाद शुरू किया भारत में तो लोहा 10वीं शताब्दी से ही हजारों हजारों टन में बनता रहा है और दुनिया के देशों में बिकता रहा है। वो कहता है की मैं 1764 में भारत से स्टील का एक नमूना ले के आया था, मैंने इंग्लैंड के सबसे बड़े विशेषज्ञ डॉ॰ स्कॉट को स्टील दिया था और उनको कहा था की लंदन रॉयल सोसाइटी की तरफ से आप इसकी जांच कराइए। डॉ॰ स्कॉट ने उस स्टील की जांच कराने के बाद कहा की ये भारत का स्टील इतना अच्छा है की सर्जरी के लिए बनाए जाने वाले सारे उपकरण इससे बनाए जा सकते हैं, जो दुनिया में किसी देश के पास उपलब्ध नहीं हैं। अंत में वो कहते हैं की मुझे ऐसा लगता है की भारत का ये स्टील हम पानी में भी डालकर रखे तो इसमे कभी जंग नही लगेगा क्योंकि इसकी क्वालिटी इतनी अच्छी है।”

10. एक अंग्रेज़ है लेफ्टिनेंट कर्नल ए॰ वॉकर उसने भारत की शिपिंग इंडस्ट्री पर सबसे ज्यादा शोध किया है। वो कहता है की “भारत का जो अदभूत लोहा/ स्टील है वो जहाज बनाने के काम में सबसे ज्यादा आता है। दुनिया में जहाज बनाने की सबसे पहली कला और तकनीकी भारत में ही विकसित हुई है और दुनिया के देशों ने पानी के जहाज बनाना भारत से सीखा है। फिर वो कहता है की भारत इतना विशाल देश है जहां दो लाख गाँव हैं जो समुद्र के किनारे स्थापित हुआ माना जाता है इन सभी गाँव में जहाज बनाने का काम पिछले हजारों वर्षों से चलता है। वो कहता है की हम अंग्रेजों को अगर जहाज खरीदना हो तो हम भारत में जाते है और जहाज खरीद कर लाते हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी के जीतने भी पानी के जहाज दुनिया में चल रहे हैं ये सारे के सारे जहाज भारत की स्टील से बने हुए हैं ये बात मुझे कहते हुए शर्म आती है की हम अंग्रेज़ अभी तक इतनी अछि क्वालिटी का स्टील बनाना नही शुरू कर पाये हैं। वो कहता है भारत का कोई पानी का जहाज जो 50 साल चल चुका है उसको हम खरीद कर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में लगाएँ तो 50 साल भारत में चलने के बाद भी वो हमारे यहाँ 20-25 साल और चल जाता है इतनी मजबूत पानी के जहाज बनाने की कला और टेक्नालजी भारत के कारीगरों के हाथ में है। आगे वो कहता है हम जीतने धन में 1 नया पानी का जहाज बनाते हैं उतने ही धन में भारतवासी 4 नए जहाज पानी के बना लेते हैं। फिर वो अंत में कहता है की हम भारत में पुराने पानी के जहाज खरीदें और उसको ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में लगाएँ यही हमारे लिए अच्छा है। इसी तरह से वो कहता है भारत में तकनीक के द्वारा ईंट बनती है, ईंट से ईंट को जोड़ने का चुना बनता है उसके अलावा 36 तरह के दूसरे इंडस्ट्री हैं। इन सभी उद्योगों में भारत दुनिया में सबसे आगे है, इसलिए हमें भारत से व्यापार करके ये सब तकनीकी लेनी है और इन सबको इंग्लैंड में लाकर फिर से पुनउत्पादित करना है।”

11. भारत के विज्ञान के बारे में बीसियों अंग्रेजों ने शोध की है और वो ये कहते हैं की भारत में विज्ञान की 20 से ज्यादा शाखाएँ हैं, जो बहुत ज्यादा पुष्पित और पल्लवित हुई है। उनमें से सबसे बड़ी शाखा है खगोल विज्ञान, दूसरी नक्षत्र विज्ञान, तीसरी बर्फ बनाने का विज्ञान, चौथी धातु विज्ञान, भवन निर्माण का विज्ञान ऐसी 20 तरह की वैज्ञानिक शाखाएँ पूरे भारत में हैं। वॉकर लिखा रहा है की “भारत में ये जो विज्ञान की ऊंचाई है वो इतनी अधिक है इसका अंदाज़ा हम अंग्रेजों को नहीं लगता।” एक यूरोपीय वैज्ञानिक था कॉपरनिकस, उसके बारे में कहा जाता है की उसने पहली बार बताया सूर्य का पृथ्वी के साथ क्या संबंध है, जिसने पहली बार सूर्य से पृथ्वी की दूरी का अनुमान लगाया और जिसने सूर्य से दूसरे उपग्रहों के बारे में जानकारी सारी दुनिया को दी। लेकिन इस कॉपरनिकस की बात को वॉकर ही कह रहा है की ये असत्य है। वॉकर कहता है की अंग्रेजों के हजारों साल पहले भारत में ऐसे विशेषज्ञ वैज्ञानिक हुए हैं जिनहोने पृथ्वी से सूर्य का ठीक ठीक पता लगाया है और भारत के शास्त्रों में उसको दर्ज़ कराया है। यजुर्वेद में ऐसे बहुत सारे श्लोक हैं जिनसे खगोल शास्त्र का ज्ञान मिलता है। कॉपरनिकस का जिस दिन जन्म हुआ था यूरोप में, उससे ठीक एक हज़ार साल पहले एक भारतीय वैज्ञानिक “श्री आर्यभट्ट जी” ने पृथ्वी और सूर्य की दूरी बिलकुल ठीक ठीक बता दी थी और जितनी दूरी आर्यभट्ट जी ने बताई थी उसमे कॉपरनिकस एक इंच भी इधर उधर नही कर पाया। वही दूरी आज अमेरिका और यूरोप में मानी जाती है। भारत में खगोल विज्ञान इतना गहरा था की इसी से नक्षत्र विज्ञान का विकास हुआ। भारतीय वैज्ञानिकों ने ही दिन और रात की लंबाई, समय के आंकड़े निकाले है और सारी दुनिया में उनका प्रचार हुआ है। ये जो दिनों की हम गिनती करते हैं रविवार, सोमवार इन सभी दिनों का नामकरण और अवधि पूरी की पूरी महान महर्षि आर्यभट्ट की निकाली हुई है और उनके द्वारा ही ये दिन तय किए हुए हैं। अंग्रेज़ इस बात को स्वीकार करते हैं की भारत के दिनों को ही उधार लेकर हमने सनडे, मंडे बनाया है। पृथ्वी अपनी अक्ष और सूर्य के चारों ओर घूमती है ये बात सबसे पहले 10वीं शताब्दी में भारतीय वैज्ञानिकों ने प्रमाणित की थी। पृथ्वी के घूमने से दिन रात होते हैं, मौसम और जलवायु बदलते हैं, ये बात भी भारतीय वैज्ञानिकों के द्वारा प्रमाणित हुई है सारी दुनिया में। सूर्य के कितने उपग्रह हैं और उनका सूर्य के साथ अंतरसंबंध क्या है ये सारी खोज भारत में तीसरी शताब्दी में हुई थी जब दुनिया में कोई पढ़ना लिखना भी नहीं जानता था।

12. एक अंग्रेज़ है ‘डेनियल डिफ़ों’ वो कहता है की “भारत के वैज्ञानिक कितने ज्यादा पक्के हैं गणित में की चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण का ठीक ठीक समय बता देते हैं सालों पहले।” 1708 में ये लंदन की संसद में के रहा है की ‘मैंने भारत का पंचांग जब भी पढ़ा है मुझे एक प्रश्न का उत्तर कभी नही मिला की भारत के वैज्ञानिक कई कई साल पहले कैसे पता लगा लेते हैं की आज चन्द्र ग्रहण पड़ेगा, आज सूर्य ग्रहण पड़ेगा और इस समय पर पड़ेगा और सही सही उसी समय पर पड़ता है।’ इसका मतलब भारत के वैज्ञानिकों की खगोल और नक्षत्र विज्ञान में बहुत गहरी शोध है। 
13. भारतीय शिक्षा के बारे में जर्मन दार्शनिक ‘मैक्स मूलर’ ने सबसे ज्यादा शोध किया है और वो ये कहता है की “मैं भारत की शिक्षा व्यवस्था से इतना प्रभावित हूँ शायद ही दुनिया के किसी देश में इतनी सुंदर शिक्षा व्यवस्था होगी जो भारत में है। भारत के बंगाल प्रांत में मेरी जानकारी के अनुसार 80 हज़ार से ज्यादा गुरुकुल पिछले हजारों साल से सफलता के साथ चल रहे हैं।” एक अंग्रेज़ शिक्षाशास्त्री, विद्वान है ‘लुडलो’ वो 18वीं शताब्दी में कह रहा है की “भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं है जहां कम से कम एक गुरुकुल नहीं है और भारत के एक भी बच्चे ऐसे नहीं हैं जो गुरुकुल में न जाते हो पढ़ाई के लिए।” इसके अलावा एक और अंग्रेज़ “जी॰डबल्यू॰ लिटनर”, कहता है की मैंने भारत के उत्तरी इलाके का सर्वेक्षण किया है और मेरी रिपोर्ट कहती है की भारत में 200 लोगों पर एक गुरुकुल चलता है। इसी तरह थॉमस मुनरो कहता है की दक्षिण भारत में 400 लोगों पर कम से कम एक गुरुकुल भारत में है। दोनों के आंकड़े मिलाने पर भारत में औसत 300 लोगों पर एक गुरुकुल चलता था और जिस जमाने के ये आंकड़े है तब भारत की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ थी। माने सन् 1822 के आसपास सम्पूर्ण भारत देश में 7,32000 गुरुकल थे। सन् 1822 में भारत में कुल गाँव भी लगभग 7,32000 थे, इस प्रकार लगभग हर गाँव में एक गुरुकुल था। वहीं अंग्रेजों के इतिहास से पता चलता है की सन् 1868 तक पूरे इंग्लैंड में सामान्य बच्चों को पढ़ाने के लिए एक भी स्कूल नहीं था। हमारी शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों से बहुत बहुत आगे थी। सबसे अच्छी बात ये थी की इन गुरुकुलों को चलाने के लिए कभी भी किसी राजा से कोई दान और अनुदान नहीं लिया जाता था, ये सारे गुरुकुल समाज के द्वारा चलाये जाते थे।’ जी॰डबल्यू॰ लिटनर’ की रिपोर्ट कहती है की 1822 में सम्पूर्ण भारत में 97% साक्षरता की दर है। हमारे प्राचीन गुरुकुलों में पढ़ाई का समय होता था सूर्योदय से सूर्यास्त तक। इतने समय में वो 18 विषय पढ़ते है जिसमें वो गणित/ वैदिक गणित, खगोल शास्त्र , नक्षत्र विज्ञान, धातु विज्ञान, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, शौर्य विज्ञान जैसे लगभग 18 विषय पढ़ाये जाते थे।

एक अंग्रेज़ अधिकारी ‘पेंडरगास्ट’ लिखाता है की ‘जब कोई बच्चा भारत में 5 साल, 5 महीने और 5 दिन का हो जाता था बस उसी दिन उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता था और लगातार 14 वर्ष तक वो गुरुकुल में पढ़ता था। इसके बाद जिसको विशेषज्ञता हासिल करनी होती थी उसके लिए उच्च शिक्षा के केंद्र भी थे। भारत में शिक्षा इतनी आसान है की गरीब हो या अमीर सबके लिए शिक्षा समान है और व्यवस्था समान है। उदाहरण: भगवान श्रीकृष्ण जिस गुरुकुल में पढे थे, उसी में सुदामा भी पढे थे, एक करोड़पति का बेटा और एक रोडपति का।’



जबकि 2009 तक भारत में सरकार द्वारा लाखों करोड़ों खर्च करने के बाद 13,500 विद्यालय और 450 विश्वविद्यालय हैं। जबकि 1822 में अकेले मद्रास प्रांत (उस जमाने का कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडू) में 11,575 विद्यालय और 109 विश्वविद्यालय थे। इसके बाद मुंबई प्रांत, पंजाब प्रांत और नॉर्थ वेस्ट फ़्रोंटिएर चारों स्थानों को मिला दिया जाए तो भारत में लगभग 14,000+ विद्यालय और 500-525 विश्वविद्यालय थे। इसने इंजीनियरिंग, सर्जरी, मैडिसिन, आयुर्वेद, प्रबंधन सबके लिए अलग अलग विद्यालय और विश्वविद्यालय थे। तक्षशिला, नालंदा जैसे 500 से ज्यादा विश्वविद्यालय रहे थे। जबकि पूरे यूरोप में ‘सामान्य लोगों के लिए शिक्षा व्यवस्था’ सबसे पहले इंग्लैंड में 1868 में आयी। इससे पहले जो स्कूल थे वो सिर्फ राजाओं के बच्चों के लिए थे जो उनके ही महल में चला करते थे। साधारण लोगों को उनमे प्रवेश नहीं मिलता था। यूरोप के दार्शनिकों का मानना है की आम लोगों को तो गुलाम बनके रहना है उसको शिक्षित होने से कोई फायदा नहीं। अरस्तू और सुकरात दोनों कहते हैं की “सामान्य लोगों को शिक्षा नहीं देनी चाहिए, शिक्षा सिर्फ राजा और अधिकारियों के बच्चों को देनी चाहिए, इसलिए सिर्फ उनके लिए ही विद्यालय होते थे।”

14. भारत में कृषि व्यवस्था के बारे में “लेस्टर” नाम का अंग्रेज़ कहता है की “भारत में कृषि उत्पादन दुनिया में सर्वोच्च है। अंग्रेजों की संसद में भाषण देते समय वो कहता है, भारत में एक एकड़ में सामान्य रूप से 56 कुंटल धान पैदा होता है। ये उत्पादन औसतन है, भारत के कुछ इलाकों में तो 70-75 कुंटल धान होता है और कुछ इलाकों में 45-50 कुंटल धान पैदा होता है। भारत में एक एकड़ में सामान्य रूप से 120 मीट्रिक टन गन्ना पैदा होता है। कपास का उत्पादन सारी दुनिया में सबसे ज्यादा भारत में है।”

जबकि आज भारत में “यूरिया, डीएपी, फॉस्फेट” डालने के बाद औसतन एक एकड़ में 30 कुंटल से ज्यादा धान पैदा नहीं होता है। जबकि 150 साल पहले सिर्फ गाय के गोबर और गौमूत्र की खाद से एक एकड़ में औसतन 56 कुंटल धान पैदा होता था। आज भारत में “यूरिया, डीएपी, फॉस्फेट” के बोरे के बोरे डालने के बाद एक एकड़ में औसतन उत्पादन 30-35 मीट्रिक टन है।

एक अंग्रेज़ कहता है की: ”भारत में फसलों की विविधता दुनिया में सबसे ज्यादा है। भारत में धान के कम से कम 1 लाख प्रजाति के बीज हैं। भारत में दुनिया में सबसे पहला ‘हल’ बना। जो दुनिया को भारत की अदभूत दें है। इसके अलावा खुरपी, खुरपा, हसिया, हथौड़ा, बेल्ची, कुदाल, फावड़ा आदि सब चीज़ें दुनिया में बाद में आई है भारत में ये सैकड़ों साल पहले ही बन चुकी है। बीज को एक पंक्ति में बोने की परंपरा भी हजारों साल पहले भारत में विकसित हुई है।”

आज भी धान की 50,000 प्रजातियाँ पूरे देश में मौजूद हैं। दुनिया ने सन् 1750 में खेती करना भारत से ही सीखा है। इससे पहले ये यूरोप के लोग जंगली फलों और पशुओं को शिकार करके ही हजारों साल यही खाते रहे हैं। जिस समय इंग्लैंड और यूरोप के लोग दो ही चीज़ें खाते थे या तो जंगली फल या मांस, उस समय भारत में 1 लाख किस्म के चावल होते थे, बाकी चीजों की तो बात ही छोड़ दीजिये। हजारों साल तक भारत ने दुनिया को चावल, गुड, दालें उत्पादित करके खिलाई है। और खाने पीने की हजारों चीज़ें दुनियाभर के देश हमसे खरीदते थे और हमें बदले में सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात देते थे।

15. भारत के लोगों का स्वास्थ्य दुनिया में सबसे अदभूत था क्योंकि यहाँ की चिकित्सा व्यवस्था भी दुनिया में सबसे उत्तम थी। हजारों लाखों जड़ी बूटियाँ और सर्जरी की विद्या पूरी दुनिया को भारत से ही गयी है। भारत में हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडू, केरल इन राज्यों में सर्जरी के सबसे बड़े शोध केंद्र चला करते थे। जब दुनिया में कोई नहीं जानता था तब आँख में मोतियाबिंद का पहला ऑपरेशन भारत में ही हुआ है। सर्जरी की सबसे आधुनिकम विद्या ‘राइनोंप्लासी’ का सबसे पहला परीक्षण और प्रयोग भी भारत में ही हुआ है। इंग्लैंड की ‘रॉयल सोसाइटी ऑफ सर्जन’ अपने इतिहास में लिखते हैं की हमने सर्जरी भारत से सीखी है और उसके बाद पूरे यूरोप को हमने ये सर्जरी सिखायी है।

आज से 150 वर्ष पहले तक भारत चिकित्सा, तकनीक, विज्ञान, उद्योग, व्यपार सबसे दुनिया में शीर्ष पर रहा है और इन सबका श्रेय भारत की शिक्षा व्यवस्था को जाता है, जो दुनिया में सबसे ऊंची थी। ऐसा अदभूत ‘हमारा भारत’ देश अंग्रेजों के आने से पहले तक था। अंग्रेजों की नीतियों और क़ानूनों के कारण आज भारत ऐसा देश बन गया है जहाँ भय भूख बीमारी निर्धनता अन्याय अपराध अत्याचार भ्रस्टाचार लूट एक ऐसा देश जिसका अपना अस्तित्व संकट में है। इसका एकमात्र कारण है गुलामी की शिक्षा व्यवस्था ‘INDIAN EDUCATIONAL ACT’ !!! वर्त्तमान शिक्षा प्रणाली…….गुलामी का षड्यंत्र |||

LEKH SAABHAAR: Vijaya Bharti in Bharat - Glorious India
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