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Tuesday, August 23, 2016

हमारे पुराण - OUR PURANS

पुराण शब्द का अर्थ है प्राचीन कथा। पुराण विश्व साहित्य के प्रचीनत्म ग्रँथ हैं। उन में लिखित ज्ञान और नैतिकता की बातें आज भी प्रासंगिक, अमूल्य तथा मानव सभ्यता की आधारशिला हैं। वेदों की भाषा तथा शैली कठिन है। पुराण उसी ज्ञान के सहज तथा रोचक संस्करण हैं। उन में जटिल तथ्यों को कथाओं के माध्यम से समझाया गया है। पुराणों का विषय नैतिकता, विचार, भूगोल, खगोल, राजनीति, संस्कृति, सामाजिक परम्परायें, विज्ञान तथा अन्य विषय हैं।

महृर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया है। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश उन पुराणों के मुख्य देव हैं। त्रिमूर्ति के प्रत्येक भगवान स्वरूप को छः पुराण समर्पित किये गये हैं। आइए जानते है 18 पुराणों के बारे में।

1.ब्रह्म पुराण (Brhma Purana)–

ब्रह्म पुराण सब से प्राचीन है। इस पुराण में 246 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा की महानता के अतिरिक्त सृष्टि की उत्पत्ति, गंगा आवतरण तथा रामायण और कृष्णावतार की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ से सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर सिन्धु घाटी सभ्यता तक की कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

2.पद्म पुराण (Padma Purana)-

पद्म पुराण में 55000 श्र्लोक हैं और यह ग्रंथ पाँच खण्डों में विभाजित है जिन के नाम सृष्टिखण्ड, स्वर्गखण्ड, उत्तरखण्ड, भूमिखण्ड तथा पातालखण्ड हैं। इस ग्रंथ में पृथ्वी आकाश, तथा नक्षत्रों की उत्पति के बारे में उल्लेख किया गया है। चार प्रकार से जीवों की उत्पत्ति होती है जिन्हें उदिभज, स्वेदज, अणडज तथा जरायुज की श्रेणा में रखा गया है। यह वर्गीकरण पुर्णत्या वैज्ञायानिक है। भारत के सभी पर्वतों तथा नदियों के बारे में भी विस्तरित वर्णन है। इस पुराण में शकुन्तला दुष्यन्त से ले कर भगवान राम तक के कई पूर्वजों का इतिहास है। शकुन्तला दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम से हमारे देश का नाम जम्बूदीप से भरतखण्ड और पश्चात भारत पडा था।

3.विष्णु पुराण (Vishnu Purana)-

विष्णु पुराण में 6 अँश तथा 23000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में भगवान विष्णु, बालक ध्रुव, तथा कृष्णावतार की कथायें संकलित हैं। इस के अतिरिक्त सम्राट पृथु की कथा भी शामिल है जिस के कारण हमारी धरती का नाम पृथ्वी पडा था। इस पुराण में सू्र्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास है। भारत की राष्ट्रीय पहचान सदियों पुरानी है जिस का प्रमाण विष्णु पुराण के निम्नलिखित शलोक में मिलता हैःउत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।(साधारण शब्दों में इस का अर्थ है कि वह भूगौलिक क्षेत्र जो उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में सागर से घिरा हुआ है भारत देश है तथा उस में निवास करने वाले सभी जन भारत देश की ही संतान हैं।) भारत देश और भारत वासियों की इस से स्पष्ट पहचान और क्या हो सकती है? विष्णु पुराण वास्तव में ऐक ऐतिहासिक ग्रंथ है।

4.शिव पुराण (Shiva Purana)–

शिव पुराण में 24000 श्र्लोक हैं तथा यह सात संहिताओं में विभाजित है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की महानता तथा उन से सम्बन्धित घटनाओं को दर्शाया गया है। इस ग्रंथ को वायु पुराण भी कहते हैं। इस में कैलाश पर्वत, शिवलिंग तथा रुद्राक्ष का वर्णन और महत्व, सप्ताह के दिनों के नामों की रचना, प्रजापतियों तथा काम पर विजय पाने के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है। सप्ताह के दिनों के नाम हमारे सौर मण्डल के ग्रहों पर आधारित हैं और आज भी लगभग समस्त विश्व में प्रयोग किये जाते हैं।

5.भागवत पुराण (Bhagwata Purana)–

भागवत पुराण में 18000 श्र्लोक हैं तथा 12 स्कंध हैं। इस ग्रंथ में अध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप है। भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया गया है। विष्णु और कृष्णावतार की कथाओं के अतिरिक्त महाभारत काल से पूर्व के कई राजाओं, ऋषि मुनियों तथा असुरों की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ में महाभारत युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण का देहत्याग, द्वारिका नगरी के जलमग्न होने और यदु वंशियों के नाश तक का विवरण भी दिया गया है।

6.नारद पुराण (Narad Purana)-

नारद पुराण में 25000 श्र्लोक हैं तथा इस के दो भाग हैं। इस ग्रंथ में सभी 18 पुराणों का सार दिया गया है। प्रथम भाग में मन्त्र तथा मृत्यु पश्चात के क्रम आदि के विधान हैं। गंगा अवतरण की कथा भी विस्तार पूर्वक दी गयी है। दूसरे भाग में संगीत के सातों स्वरों, सप्तक के मन्द्र, मध्य तथा तार स्थानों, मूर्छनाओं, शुद्ध एवं कूट तानो और स्वरमण्डल का ज्ञान लिखित है। संगीत पद्धति का यह ज्ञान आज भी भारतीय संगीत का आधार है। जो पाश्चात्य संगीत की चकाचौंध से चकित हो जाते हैं उन के लिये उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नारद पुराण के कई शताब्दी पश्चात तक भी पाश्चात्य संगीत में केवल पाँच स्वर होते थे तथा संगीत की थ्योरी का विकास शून्य के बराबर था। मूर्छनाओं के आधार पर ही पाश्चात्य संगीत के स्केल बने हैं।

7.मार्कण्डेय पुराण (Markandeya Purana)–

अन्य पुराणों की अपेक्षा यह छोटा पुराण है। मार्कण्डेय पुराण में 9000 श्र्लोक तथा 137 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में सामाजिक न्याय और योग के विषय में ऋषिमार्कण्डेय तथा ऋषि जैमिनि के मध्य वार्तालाप है। इस के अतिरिक्त भगवती दुर्गा तथा श्रीक़ृष्ण से जुड़ी हुयी कथायें भी संकलित हैं।

8.अग्नि पुराण (Agni Purana)–

अग्नि पुराण में 383 अध्याय तथा 15000 श्र्लोक हैं। इस पुराण को भारतीय संस्कृति का ज्ञानकोष (इनसाईक्लोपीडिया) कह सकते है। इस ग्रंथ में मत्स्यावतार, रामायण तथा महाभारत की संक्षिप्त कथायें भी संकलित हैं। इस के अतिरिक्त कई विषयों पर वार्तालाप है जिन में धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद मुख्य हैं। धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद को उप-वेद भी कहा जाता है।

9.भविष्य पुराण (Bhavishya Purana)–

भविष्य पुराण में 129 अध्याय तथा 28000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में सूर्य का महत्व, वर्ष के 12 महीनों का निर्माण, भारत के सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक विधानों आदि कई विषयों पर वार्तालाप है। इस पुराण में साँपों की पहचान, विष तथा विषदंश सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गयी है। इस पुराण की कई कथायें बाईबल की कथाओं से भी मेल खाती हैं। इस पुराण में पुराने राजवँशों के अतिरिक्त भविष्य में आने वाले नन्द वँश, मौर्य वँशों, मुग़ल वँश, छत्रपति शिवा जी और महारानी विक्टोरिया तक का वृतान्त भी दिया गया है। ईसा के भारत आगमन तथा मुहम्मद और कुतुबुद्दीन ऐबक का जिक्र भी इस पुराण में दिया गया है। इस के अतिरिक्त विक्रम बेताल तथा बेताल पच्चीसी की कथाओं का विवरण भी है। सत्य नारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गयी है।

10.ब्रह्म वैवर्त पुराण (Brahma Vaivarta Purana)–

ब्रह्माविवर्ता पुराण में 18000 श्र्लोक तथा 218 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा, गणेश, तुल्सी, सावित्री, लक्ष्मी, सरस्वती तथा क़ृष्ण की महानता को दर्शाया गया है तथा उन से जुड़ी हुयी कथायें संकलित हैं। इस पुराण में आयुर्वेद सम्बन्धी ज्ञान भी संकलित है।

11.लिंग पुराण (Linga Purana)–

लिंग पुराण में 11000 श्र्लोक और 163 अध्याय हैं। सृष्टि की उत्पत्ति तथा खगौलिक काल में युग, कल्प आदि की तालिका का वर्णन है। राजा अम्बरीष की कथा भी इसी पुराण में लिखित है। इस ग्रंथ में अघोर मंत्रों तथा अघोर विद्या के सम्बन्ध में भी उल्लेख किया गया है।

12.वराह पुराण (Varaha Purana)–

वराह पुराण में 217 स्कन्ध तथा 10000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में वराह अवतार की कथा के अतिरिक्त भागवत गीता महामात्या का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस पुराण में सृष्टि के विकास, स्वर्ग, पाताल तथा अन्य लोकों का वर्णन भी दिया गया है। श्राद्ध पद्धति, सूर्य के उत्तरायण तथा दक्षिणायन विचरने, अमावस और पूर्णमासी के कारणों का वर्णन है। महत्व की बात यह है कि जो भूगौलिक और खगौलिक तथ्य इस पुराण में संकलित हैं वही तथ्य पाश्चात्य जगत के वैज्ञिानिकों को पंद्रहवी शताब्दी के बाद ही पता चले थे।

13.स्कन्द पुराण (Skanda Purana)–

स्कन्द पुराण सब से विशाल पुराण है तथा इस पुराण में 81000 श्र्लोक और छः खण्ड हैं। स्कन्द पुराण में प्राचीन भारत का भूगौलिक वर्णन है जिस में 27 नक्षत्रों, 18 नदियों, अरुणाचल प्रदेश का सौंदर्य, भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों, तथा गंगा अवतरण के आख्यान शामिल हैं। इसी पुराण में स्याहाद्री पर्वत श्रंखला तथा कन्या कुमारी मन्दिर का उल्लेख भी किया गया है। इसी पुराण में सोमदेव, तारा तथा उन के पुत्र बुद्ध ग्रह की उत्पत्ति की अलंकारमयी कथा भी है।

14.वामन पुराण (Vamana Purana)-

वामन पुराण में 95 अध्याय तथा 10000 श्र्लोक तथा दो खण्ड हैं। इस पुराण का केवल प्रथम खण्ड ही उपलब्ध है। इस पुराण में वामन अवतार की कथा विस्तार से कही गयी हैं जो भरूचकच्छ (गुजरात) में हुआ था। इस के अतिरिक्त इस ग्रंथ में भी सृष्टि, जम्बूदूीप तथा अन्य सात दूीपों की उत्पत्ति, पृथ्वी की भूगौलिक स्थिति, महत्वशाली पर्वतों, नदियों तथा भारत के खण्डों का जिक्र है।

15.कुर्मा पुराण (Kurma Purana)–

कुर्मा पुराण में 18000 श्र्लोक तथा चार खण्ड हैं। इस पुराण में चारों वेदों का सार संक्षिप्त रूप में दिया गया है। कुर्मा पुराण में कुर्मा अवतार से सम्बन्धित सागर मंथन की कथा विस्तार पूर्वक लिखी गयी है। इस में ब्रह्मा, शिव, विष्णु, पृथ्वी, गंगा की उत्पत्ति, चारों युगों, मानव जीवन के चार आश्रम धर्मों, तथा चन्द्रवँशी राजाओं के बारे में भी वर्णन है।

16.मतस्य पुराण(Matsya Purana)–

मतस्य पुराण में 290 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मतस्य अवतार की कथा का विस्तरित उल्लेख किया गया है। सृष्टि की उत्पत्ति हमारे सौर मण्डल के सभी ग्रहों, चारों युगों तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास वर्णित है। कच, देवयानी, शर्मिष्ठा तथा राजा ययाति की रोचक कथा भी इसी पुराण में है।

17.गरुड़ पुराण (Garuda Purana)–

गरुड़ पुराण में 279 अध्याय तथा 18000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस पुराण में कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का वर्णन भी है। साधारण लोग इस ग्रंथ को पढ़ने से हिचकिचाते हैं क्योंकि इस ग्रंथ को किसी परिचित की मृत्यु होने के पश्चात ही पढ़वाया जाता है। वास्तव में इस पुराण में मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म होने पर गर्भ में स्थित भ्रूण की वैज्ञानिक अवस्था सांकेतिक रूप से बखान की गयी है जिसे वैतरणी नदी आदि की संज्ञा दी गयी है। समस्त यूरोप में उस समय तक भ्रूण के विकास के बारे में कोई भी वैज्ञानिक जानकारी नहीं थी।

18.ब्रह्माण्ड पुराण (Brahmanda Purana)-

ब्रह्माण्ड पुराण में 12000 श्र्लोक तथा पू्र्व, मध्य और उत्तर तीन भाग हैं। मान्यता है कि अध्यात्म रामायण पहले ब्रह्माण्ड पुराण का ही एक अंश थी जो अभी एक पृथक ग्रंथ है। इस पुराण में ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रहों के बारे में वर्णन किया गया है। कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास भी संकलित है। सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ले कर अभी तक सात मनोवन्तर (काल) बीत चुके हैं जिन का विस्तरित वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है। परशुराम की कथा भी इस पुराण में दी गयी है। इस ग्रँथ को विश्व का प्रथम खगोल शास्त्र कह सकते है। भारत के ऋषि इस पुराण के ज्ञान को इण्डोनेशिया भी ले कर गये थे जिस के प्रमाण इण्डोनेशिया की भाषा में मिलते है।

साभार:  http://aapkikhabar.com

-aapkikhabar

Thursday, August 18, 2016

हरी सिंह नलवा, एक महान हिन्दू योद्धा

वीरों को जन्म देने वाली इस भारत भूमि की गाथा कौन नही जानता , इसने हमेशा ऐसे ऐसे वीर राजाओं और योद्धाओं को जन्म दिया है जिन्होंने इस मिटटी की आन बान और शान के लिए ना केवल अपना पूरा जीवन कुर्बान किया बल्कि भारत विरोधियों के लिए भी हमेशा काल के रूप बनकर रहे |

ये कहानी है ऐसे ही एक वीर कि जो अफगानी हमलावरों और उनके सैनिकों को अपने यहाँ नौकर बनाकर रखता था और हर अफगानी केवल उस वीर के नाम से ऐसे थर थर कांपता था जैसे उसने नाम नही सुना हो बल्कि साक्षात् महा काल के दर्शन कर लिए हो पर सबसे बड़ा अफ़सोस इस बात का है कि आजादी के बाद चाटुकार वामपंथियों और कांग्रेस के मिलकर इस देश से महान हिन्दू योद्धाओं का इतिहास मिटा के रख दिया ताकि हिन्दुओं को कभी सच्चाई पता ना चल सके और उनको अपने भूतकाल और इतिहास पर कभी गौरव का अनुभव ना हो यानि कि सीधे सीधे हिन्दुओं की अस्मिता को कुचल डालने का गहरा षड्यंत्र .. पर सच्चाई भी कहीं छुपती है ..

इस महान योद्धा जिनका नाम है हरी सिंह नलवा और जिसकी वीरता की ये कहानी है उनका जन्म 1791 में पंजाब के गुजरांवाला ( अब पाकिस्तान में ) में हुआ था , जब हरी सिंह नलवा बड़े हुए तो तो उन्होंने तत्कालीन महाराजा रणजीत सिंह जी द्वारा आयोजित एक प्रतिभा खोज कार्यकर्म में युद्ध कुशलता के ऐसे ऐसे करतब दिखाए कि स्वयं महाराज भी दंग रह गये और उन्होंने नलवा को अपनी फ़ौज में शामिल होने का न्योता दे डाला |,एक बार जंगल में महाराज रणजीतसिंह को बचाने के लिए नलवा शेर से जा भिड़े और उसको भी परास्त कर दिया तथा महाराज को आंच तक नही आने दी

समय जैसे जैसे आगे बढ़ा हरी सिंह नलवा की ख्याति बढ़ने लगी और एक दिन महाराज रणजीत सिंह ने नलवा को अपना सेनानायक नियुक्त कर दिया वे महाराज से सबसे विश्वासपात्र योद्धा बन गये अपने युद्ध कौशल पे विशवास कह लीजिये या हरी सिंह नलवा का जूनून कह लीजिये , देखते ही देखते सेना में बढ़ौतरी होती गयी और फिर एक दिन सरदार हरी सिंह नलवा ने अफगान पर चढ़ाई करने की अपनी योजना से महाराज रणजीतसिंह को अवगत कराया उनके अनुसार मुग़ल आक्रमणकारियों को सबक सिखाना अनिवार्य था |


अपने युद्ध कौशल और जबरदस्त रणनीति की बदोलत नलवा ने अटक , मुल्तान और पेशावर को जीत लिया और वे महारज रणजीतसिंह के राज्य के अधीन हो गये , ये सब युद्ध 1813 से 1824 तक चलते रहे जिसमे हरी सिंह नलवा की वीरता ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए , मुग़ल उनसे इतने घबराते थे कि उनके आने की बात सुनकर ही नमाज तक छोड़कर भाग जाते थे और थर थर कांपते थे , हो भी क्यूँ ना नलवा ने उस समय चढ़ाई करके अफगान को जीता था जब कोई अफगान की तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत नही करता था |

30 अप्रेल 1837 को एक युद्ध में हरी सिंह नलवा लड़ते लड़ते वीर गति को प्राप्त हुए ये युद्ध जमरूद में हुआ था , जिसमे हरी सिंह नलवा को 2 गोली लगी थी पर बड़ी बात ये थी कि अपनी सहादत के बावजूद उन्होंने पेशावर को अपने हाथ से जाने नही दिया था , ऐसे वीर थे बहादुर सरदार हरी सिंह नलवा जी हम उनको कोटि कोटि नमन करते हैं और आपसे आग्रह करते हैं कि ये कहानियां अपने बच्चों को जरुर सुनाएँ , ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और याद रखें हिन्दुओं का इतिहास वीरता से भरा पड़ा है और सदेव हर हिन्दू को इस पर गर्व करना चाहिए जय हिन्द वन्देमातरम !!


दलितों के बिना कैसा हिंदू जागरण




हिंदू आज भी दलगत राजनीति और सवर्ण अहंकार की चुनावी रणनीतियों में व्यस्त है। हिंदू समाज लगातार आश्वासनों, संकल्पों, आंदोलनों का ही शिकार होता रहा।

देश के विभिन्न हिस्सों में हिंदू समाज के अविभाज्य अंग अनुसूचित जातियों पर अत्याचार और कतिपय दलित वर्गों द्वारा इस्लाम स्वीकारने की चेतावनी के समाचार हिंदू संगठनों को चौंकाने और सचेत करने वाले होने चाहिए थे, किंतु अपने इतिहास से सबक न लेने वाला हिंदू आज भी दलगत राजनीति और सवर्ण अहंकार की चुनावी रणनीतियों में व्यस्त है। खंडित भारत को मिली आजादी में बहुसंख्य हिंदू के व्यापक हित तात्कालिक राजनीति के फायदे की धुंध में खो से गए हैं। इसके परिणामस्वरूप दलित मुस्लिम जनजातीय त्रिकोण के उभरने के साथ हिंदुओं पर छाने वाले खतरे आंखों से ओझल हो गए हैं। एक समय था जब तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में हिंदुओं के धर्मांतरण की घटना ने पूरे देश में आक्रोश को ज्वार पैदा कर दिया था और विराट हिंदू सम्मेलन की स्थापना हुई जिसकी वोट क्लब, नई दिल्ली में आयोजित विशाल सभा ने हिंदू जागरण का नया पर्व रचा था। कांग्रेस छोड़ वरिष्ठ नेता डा. कर्ण सिंह भी उस सम्मेलन का हिस्सा बने थे, लेकिन उसके बाद हिंदू समाज लगातार आश्वासनों, संकल्पों, आंदोलनों और राजनीतिक छल के भंवर का ही शिकार होता रहा। न तो मीनाक्षीपुरम ने और न ही अयोध्या आंदोलन ने हिंदुओं को किसी तार्किक परिणति तक पहुंचाया। राजनीतिक छल के सामने सामाजिक परिवर्तन की धारा चुनावी आवश्यकताओं के रेगिस्तान में सूखती रही। अनुसूचित जातियों के साथ भेदभाव हमारे मानस का हिस्सा बन गया है। न तो हम उनके साथ रोटी-बेटी का संबंध सहन करते हैं और न ही अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों का निर्वाह करने के लिए सचेष्ट दिखते हैं। दलित से ब्याह करने पर तो जान से मार दिया जाता है। हिंदुओं के बड़बोलेपन और पाखंड का तो यह हाल है कि कथित सवर्णों की सभा में वक्ताओं द्वारा सामाजिक समरसता और समानता पर वाणी-विलास किया जाता है। यही सवर्ण साथी सवर्णों को पुरस्कार देते हैं और घर आकर चैन से सोते हैं कि उन्होंने अपना कत्र्तव्य निभा दिया। दलितों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और गायत्री परिवार जैसे संगठनों के अलावा जाता कौन है? उन्हें अपने समान हिंदू कौन मानता है? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में समुद्री जहाजों, विमानों तक में करोड़पति भक्तों के सामने प्रभावशाली भगवद् भजन और प्रवचन करने वाले धनी हिंदू कथाकारों के एजेंडे में एक बार भी हिंदू समाज में समानता का प्रश्न शामिल हुआ क्या? क्या कभी किसी ने साधु-संन्यासी या राष्ट्रीय एकता के लिए भर-भर आंसू बहाने वालों को दलितों से सहानुभूति प्रकट करते हुए देखा है? जो पीडि़त-प्रताडि़त दलितों के पास जाते भी हैं वे आम तौर वही होते हैं जिनकी राष्ट्रीय सद्भाव या दलीय राजनीति से ऊपर उठकर हिंदू एकता में कोई दिलचस्पी नहीं होती। मूर्ति के विरोध में साधु और पंडित इकट्ठा हो सकते हैं, लेकिन क्या कभी उन्हें दलितों पर अत्याचार के विरूद्ध इकट्ठा होते देखा है? मंदिर के लिए आंदोलन होगा पर अपने ही समाज के मनुष्यों की रक्षा और हिंदू एकता के लिए सन्नाटा क्यों छाया रहता है?

अपने देश में दलितों के लिए अलग शमशान घाट तक विद्यमान हैं। उन्हें मंदिर में प्रवेश से अनेक क्षेत्रों में आज भी मनाही है। गांवों में उन्हें उन नलों से पानी नहीं लेने दिया जाता जहां कथित सवर्ण रहते हैं। उनकी बस्तियां गांव के बाहर बनाई जाती हैं। अनुसूचित जाति की महिला जैसे कर्नाटक की राधम्मा स्कूल में मध्याह्न भोजन की प्रभारी बन जाए तो बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। पढ़े लिखे हिंदू अपने ही हिंदू दलितों की जान लेने का प्रयास करते हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती, क्योंकि कथित सवर्णों की दलितों के विरुद्ध राजनीतिक एकता हो जाती है। कोई इन जाति-अहंकार से ग्रस्त हिंदुओं से पूछे कि आखिर कब तक आप हिंदू दलितों पर पत्थर मारोगे? सिर्फ तब तक ही न जब तक वे स्वयं को हिंदू कहते हैं? उसके बाद? जब वे 'सिर्फ सवर्णों के लिए' मंदिर के सामने मस्जिद या चर्च बनाएंगे तब तुम उनका क्या बिगाड़ लोगे? और ये महान कथाकार साधु और जाति-रक्षक नेता भूल जाते हैं कि कभी कराची, रावलपिंडी और लाहौर में भी इनके बड़े-बड़े आश्रम सजा करते थे। तब भी उन्होंने हिंदू समाज की एकता पर ध्यान नहीं दिया, फलत: वहां न मंदिर रहे, न आश्रम और न ही धन विलास में डूबे प्रवचनकार। अगर हिंदू समाज ने अपने धर्म के वास्तविक रक्षक दलितों को समानता का अधिकार नहीं दिया तो उनका खोखला, धर्म-विलास बाकी जगहों पर भी अर्थहीन, धर्महीन और प्रभावहीन होने में देर नहीं लगेगी। कुछ समय पहले उत्तराखंड में जब हम अपने कुछ दलित साथियों के साथ मंदिर प्रवेश के लिए गए तो हमें कल्पना भी नहीं थी कि पढ़े लिखे हिंदू मंदिर के प्रांगण में ही हम पर हमला बोल देंगे। हमें एक गाड़ी में जान बचाकर वहां से निकलना पड़ा तो चालक ने भी डर कर रास्ते में उतार दिया। खून से सने, सिर पत्थरों के प्रहार से घायल हम लोगों को एक अनपढ़ पीडब्लूडी के मजदूर उमर ने शरण दी, अपनी कुटिया में छिपाया, क्योंकि पीछे से गाडिय़ों में सवर्ण लड़के हमें मारने आ रहे थे। उस मुसलमान ने हमें अपनी चादर दी, चाय दी और मोबाइल दिया, जिससे मैंने जिलाधिकारी और राज्यपाल से सहायता की गुहार की। एम्बुलेंस तक को सवर्णों ने हम तक पहुंचने से रोका और जब तीन घंटे बाद डीएम और एसपी आए तब जाकर हम अस्पताल पहुंचाए गए। बाद में ऐसे लेखक-चिंतक दिखे जिन्होंने पत्थरबाजों का समर्थन किया और दलितों को ही 'उकसाने' का अपराधी बना कर उन पर पुलिस रपट की। यह है आज के हिंदू समाज का प्रगतिशील रूप?

एक समय था जब तथाकथित सवर्ण हिंदू जातियों के महानायकों ने जाति प्रथा के कलंक से समाज को मुक्त कराने के प्रयास किए। महामना मदन मोहन मालवीय, वीर सावरकर, बाला साहब देवरस जैसे लोग ब्राह्मण ही थे, लेकिन वे अनुसूचित जातियों के प्रति समानता और समता का व्यवहार चाहते थे। वे मंदिर प्रवेश से दलितों को रोकने की कोशिशों के विरोधी थे। आज दलितों को सिर्फ वोट बैंक का खिलौना बनाया जा रहा है। इसे दलित भी समझते हैं और इसीलिए वे कहते हैं कि आप हमें मंदिर प्रवेश दिलवा भी दोगे तो क्या एहसान करोगे? जो हिंदू अपने भगवान और यमराज को भी जाति में बांटता है उस हिंदू के मंदिर में जाने का सुख क्या होगा? यह स्थिति हिंदू समाज के लिए बहुत खतरनाक है। सभी राजनीतिक दलों में हिंदू हैं। क्या यह आशा की जा सकती है कि हिंदू समाज के भविष्य के लिए वे सब राजनीतिक लाभ-अलाभ छोड़कर एकजुटता के साथ अनुसूचित जातियों पर हो रहे अन्याय को समाप्त करने की पहल करेंगे और जिस धर्म ने वसुधैव कुटुम्बकम का संदेश दिया उसे अपने ही देश में क्षतिग्रस्त होने से बचाएंगे?

साभार: श्री तरुण विजय 

[ लेखक तरुण विजय, राज्यसभा के पूर्व सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं ]



SAMRAT SHALIWAHAN - विश्व विजेता - सम्राट शालिवाहन

SAMRAT SHALIWAHAN - विश्व विजेता - सम्राट शालिवाहन 

सम्राट विक्रमादित्य के ५९ वर्ष बाद शालिवाहन का राज्याभिषेक ७७ (इ.) हुआ था तो मुर्ख वामपंथी का यह तथ्य बिलकुल गलत हैं की सम्राट विक्रमादित्य की हत्या उनके परपोत्र शालिवाहन ने किया हैं ।

मित्रों मैकॉले ने तो इतिहास को बर्बाद किया हैं पर मैकॉले के मानसपुत्र काले अंग्रेज़ो ने इस परंपरा को आगे ज़ारी रखते हुए इस राष्ट्र के वीरों को गुमनाम कर दिया गया और लूटेरों को इस भारत भूमि के शासक बना दिया जैसे अंगिनत बार हारनेवाला मैसिडोनिया सिकंदर को विश्व विजयी बना दिया सिकंदर १२८ राज्यों से पराजित हुआ था सिकंदर को विश्वविजयेता घोषित करनेवाले मैकॉले के मानसपुत्र इतिहासकार थे आप सोच भी नहीं सकते इन्होंने इतिहास में कितनी गंदी मिलावट की प्रियदर्शिनी नाम का राजा हुआ करता था|

जो विश्वविजयता था उनको मिटा कर राजा अशोक का नाम प्रियदर्शिनी कर दिया गया सातवाहन राजा सातकर्णि राजा कोई और था पर इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के परपौत्र के नाम को मिटाने के लिए शालिवाहन को सातकर्णि बना दिया । हमारे भारत के १२ ऐसे राजा हुये जिन्होंने विश्वविजय किया उनमे से एक का इतिहास आपके समक्ष रखूंगी सम्राट विक्रमादित्य के परपौत्र शालिवाहन ७७-१३७ (ई.) इन्होंने अफ्रीका , रोम , यूरोप को पूरी तरह से जीत लिया था कश्मीर भ्रमण करने आये अंग्रेज़ो के मसीहा ईसा से इनकी मुलाकात हुई थी हिन्दू कुश पर्वत पर सन ७८ में मुलाकात हुआ था ऐसी लिपियों को भारत सरकार द्वारा हटा दिया गया था सन १९५० में अब बात करते हैं विश्वविजयी सम्राट शालिवाहन के बारे में.

१) प्रथम युद्ध टाइटस ग्रीक-रोम के शासक थे त्रिविष्टप पर आक्रमण किया था सन ८०(ई.) ग्रीक-रोम (पुराणों में इन्हें गुरुंड कहा गया हैं) ३०० घुड़सवार सैनिक ६०,००० पैदल सैनिको के साथ आक्रमण किया था त्रिविष्टप पर सम्राट शालिवाहन ने मात्र १२००० की सेना में साथ जय महाकाल की शंखनाद के साथ टूट पड़ा रोम आक्रमणकारियों पर । सन ८० (ई.) से रोम आक्रमणकारियों का भारत पर आक्रमण लगातार होता रहा पर कभी भारतवर्ष को ग़ुलाम नहीं बना पाया तो यह केवल इसलिए संभव हो पाया क्यों की भारतगण राज्य में शालिवाहन जैसे १२ ऐसे राजा हुए जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व को जीत लिया था ।

शालिवाहन से हारने के बाद रोम साम्राज्य की ५२% भाग शालिवाहन ने हिन्दू राज्य में सम्मिलित कर लिया । इस युद्ध की शानदार वर्णन Cassius Dio, Roman History LXV.15 में किया गया हैं ।

२) द्वितीय युद्ध सम्राट शालिवाहन परमार ने दोमिटियन (Domitian) के विरुद्ध लड़ा था सन ८२(ई.) में जिसमे सम्राट शालिवाहन ने दोमिटियन को परास्त किया था जो की रोम एवं फ्रैंको (वर्तमान में फ्रांस) का राजा था जिसने स्पेन तक अपनी साम्राज्य विस्तार किया था इस युद्ध का वर्णन Heinrich Friedrich Theodor ने अपनी पुस्तक “A history of German” में लिखा था एवं Previte Orton द्वारा लिखा गया पुस्तक “The Shorter Medieval History” vol:1 पृष्ठ-: १५१ एवं Suetonius, The Lives of Twelve Caesars, Life of Vespasian 9 में आपको मिलेगा सम्राट शालिवाहन परमार के साथ कुल तीन युद्ध हुए थे प्रथम दो युद्ध भारतवर्ष पर आक्रमण करने हेतु शालिवाहन परमार के हाथों हार कर वापस लौटना पड़ा |

तीसरे युद्ध में शालिवाहन ने फ्रैंको पर आक्रमण कर दोमिटियन (Domitian) को हराकर पूर्वी फ्रान्किया (जो वर्तमान में जर्मन कहलाता हैं ) और स्पेन पे अधिकार कर लिया था । दोमिटियन (Domitian) ने शालिवाहन शासित राज्य परतंगण पर आक्रमण किया था (यह राज्य मानसरोवर के पास उपस्थित हैं भारत चीन सीमांत में) दोमिटियन (Domitian) की सेना ८०,००० की थी घुड़सवार और पैदल सैनिक २५-२७,००० थे शालिवाहन की सेना ३०००० से ४० हज़ार की थी शालिवाहन की युद्धकौशल रणनीति कौशल के सामने यवन पीछे हटने पर मजबूर होगये थे दोमिटियन (Domitian) की लाखों की सेना के साथ आये थे पर इस ऐतिहासिक युद्ध की जिक्र विदेश इतिहासकारों ने “war of blood”घोषित किया क्यों की यह भयंकर युद्ध इतिहास में सायद ही दोबारा हुआ होगा १लाख से अधिक सेना के साथ आक्रमण करनेवाले दोमिटियन (Domitian) रोम में मात्र १२०० सैनिक के साथ वापस लौटा था । इसके बाद शालिवाहन ने स्पेन पर आक्रमण कर दिया मात्र ४५,००० सेना के साथ स्पेन के राजा दोमिटियन (Domitian) युद्ध करने की हिम्मत नहीं किया और समझौता कर स्पेन का आधा राज्य और पूर्वी फ्रान्किया पर भी शालिवाहन ने भगवा ध्वज लहरा दिया था ।

३) ट्राजन (Trajan) मेसोपोटामिया एवं अर्मेनिया के ज़ार (राजा) थे जिन्होंने भारतवर्ष पर सन ११४(ई.) में आक्रमण किया स्वीडिश एवं स्कॅन्डिनेवियन (Scandinavian)जर्नल में लिखा गया हैं शालिवाहन शासित राज्य विदेह जो नेपाल की राजधानी जनकपुर का हिस्सा हैं वहा आक्रमण किया था ज़ार को मुह की खानी पड़ी थी शालिवाहन के पास ६७ रणनीति में कुशल शस्त्र विद्या में पारंगत युद्ध व्यू रचने में भी पारंगत सेनापतियों की टोली थी, सेनापति अह्वान परमार के साथ शालिवाहन १५००० की सेना के साथ ज़ार ट्राजन को परास्त कर स्कॅन्डिनेवियन पर शालिवाहन ने सनातन वैदिक राज की स्थापना किया था ज़ार के साथ लड़े गए युद्ध मेरु युद्ध जो मेसोपोटामिया में लड़ा गया था शालिवाहन ने मेसोपोटामिया की ३ चौथाई राज्य जीत लिया था ।

४) सन १२५(ई.)पर्शिया के राजा हद्रियन की नज़र भारतवर्ष की धन दौलत पर पड़ी थी हद्रियन ने सम्राट शालिवाहन को अपनी ग़ुलाम बना कर भारतवर्ष पर अपना राजसत्ता कायम करना चाहता था सम्राट शालिवाहन को गुप्तचर शिव सिंह से सुचना मिली की हद्रियन अपने लश्कर के साथ निकल चूका है सिंघल्द्वीप (श्रीलंका)पर आक्रमण किया था तीस से चालीस हज़ार पैदल लश्कर ९,००० घुड़सवार और ग्यारह से बारह हज़ार की तादात पर धनुर्धारी लश्कर की फ़ौज थी सम्राट शालिवाहन ने बाज़ व्यूह का उपयोग किया था सम्राट शालिवाहन ने २१नये युद्ध व्यूह की रचना किया था जिससे पलक जपकते ही दुश्मन दल को नेस्तनाबूद कर सकते थे इसलिए सम्राट शालिवाहन की सात से नौ हज़ार की घुड़सवार फ़ौज और विश्व के श्रेष्ठ धनुर्धरों सैनिको ने हद्रियन को धूल चटा दिया था ।

और भी अनंत हैं पर अफ़सोस हम भारतीयों को ग़ुलामी की दास्ताँ पढ़ाया जाता हैं सम्राट शालिवाहन जैसे ११ दिग्विजयी सम्राट और हुए थे सम्राट शालिवाहन परमार को वामपंथी इतिहासकार ने सम्राट विक्रमादित्य का हत्यारा बना दिया जब की सम्राट विक्रमादित्य के परपौत्र थे सम्राट शालिवाहन ।

सम्राट शालिवाहन का राज्य मध्य यूरोप , दक्षिणी इंग्लैंड , फ्रान्किया (फ़्रान्स), कैपेटियान्स, रोम , और भी कई देशो पर सनातन धर्मध्वजा को सात समुन्दर पार फैराया था।

हर हर महादेव । वंदे मातरम् ।

साभार  : Hindutv hindutva.info/true-indian-history/छत्रपतीची वाघिन मनीषा सिंह8/17/2016
लेखिका मनीषा सिंह

Friday, May 20, 2016

बुद्ध का धर्म चक्र प्रवर्तन


बुद्ध का धर्म चक्र प्रवर्तन

बहुतेरे लोग मानते हैं कि गौतम बुद्ध ने कोई नया धर्म चलाया था और वे हिंदू धर्म से अलग हो गए थे। हालांकि ऐसे लोग कभी नहीं बता पाते कि बुद्ध कब हिंदू धर्म से अलग हुए? हाल में एक वाद-विवाद में बेल्जियम के विद्वान डॉ. कोएनराड एल्स्ट ने चुनौती दी कि वे बुद्ध धर्म को हिंदू धर्म से अलग करके दिखाएं। एल्स्ट तुलनात्मक धर्म-दर्शन के प्रसिद्ध ज्ञाता हैं। ऐसे सवालों पर वामपंथी लेखकों की पहली प्रतिक्रिया होती है कि ‘दरअसल तब हिंदू धर्म जैसी कोई चीज थी ही नहीं।’ यह विचित्र तर्क है। जो चीज थी ही नहीं उसी से बुद्ध तब अलग हो गए? वामपंथी दलीलों में यह भी कहा जाता है कि हिंदू धर्म हाल की निर्मिति है।

रोमिला थापर तो इसे बमुश्किल दो सौ साल पुराना मानती हैं। वैसे आज अगर कोई हिंदू भारत के सारे शास्त्र पढ़ जाए और सारे तीर्थ कर ले तो भी बोलने-सुनने में कहीं ‘हिंदू’ शब्द नहीं मिलेगा। इसलिए नहीं मिलेगा, क्योंकि यह नाम ही भौगोलिक है। इसका हमारे धर्म दर्शन से कोई लेना-देना नहीं। यह संज्ञा बाहर के लोगों ने गढ़ी। इसका तात्पर्य था-सिंधु नदी के पार रहने वाले लोग। उसी से हिंदू और हिंदुस्तान शब्द बना। यह नामकरण बुद्ध की लगभग समकालीन घटना है।

‘हिंदू’ शब्द का प्रचलन मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा आरंभ हुआ। इससे उनका मतलब था वे सभी लोग जो मुस्लिम, ईसाई या यहूदी नहीं हैं। इस नकारात्मक बोध के अलावा इसका कोई दार्शनिक अर्थ नहीं था। इस मूल परिभाषा से आज हिंदू में बौद्ध, जैन, कबीरपंथी, आर्य समाजी आदि सभी आएंगे। वस्तुत: यही अर्थ स्वतंत्र भारत के ‘हिंदू मैरेज एक्ट, 1955’ में भी लिया गया। इससे भी दिखता है कि बौद्धों, सिखों और जैनों आदि को हिंदुओं से अलग करने की मान्यता कितनी नई है, लेकिन असली चिंताजनक बात दुष्प्रचार है। एक ओर बौद्ध, सिख और जैन यहां तक कि दलितों को भी हिंदू नहीं माना जाता और दूसरी ओर जब चर्च-मिशनरी और इस्लामी अतिक्रमण पर हिंदू चिंता रखी जाती है तब उपहास होता है कि आखिर 80 प्रतिशत हिंदुओं को दो प्रतिशत ईसाइयों और 18 प्रतिशत मुसलमानों से क्या खतरा हो सकता है?

ईसाई-मिशनरी भी वनवासियों, जनजातियों को हिंदू नहीं मानते, लेकिन जब उनकेधर्मातरण कुचक्र का यही जनजातीय प्रतिकार करते हैं तब उन्हें ‘हिंदू दंगाई’ कहा जाता है। डॉ. एल्स्ट के अनुसार हिंदू शब्द में जो एक अर्थ कभी नहीं रहा वह है ‘वैदिक’। हिंदू धर्म में अनेक तत्व वैदिक परंपरा से संबंधित हैं तो बहुतेरे ऐसे भी हैं जिसका वैदिक मान्यताओं से कोई संबंध नहीं। स्मृति और श्रुति, शास्त्र और लोक, महायान और हीनयान, यहां सदा से चलते रहे हैं।

किसी मुख्यधारा के साथ-साथ यहां छोटी-छोटी स्वतंत्र धाराओं, मतों, परंपराओं और रीतियों आदि के सदा पनपने, बने रहने का अवसर रहा है। वैदिक मान्यताओं के साथ ही बुद्ध या कबीर की बातें भी समाज में साथ-साथ चलती रही हैं। 1इतिहास यह है कि सिद्धार्थ गौतम क्षत्रिय थे, इक्क्षवाकु वंश के यानी मनु के वंशज। यह बात स्वयं बुद्ध ने ही कही। सिद्धार्थ शाक्य वंश के राजा के बेटे थे। स्वयं बौद्ध लोग भी बुद्ध को ‘शाक्य-मुनि कहते हैं। अर्थात शाक्य वंश के श्रेष्ठ ज्ञानी। यदि उस वंश और पहले की धर्म-परंपरा से बुद्ध ‘अलग’ हो गए होते तो नि:संदेह यह विशेषण गौरवशाली न होता। वह परंपरा मनु की यानी सनातन हिंदू ही थी।

इक्क्षवाकु मनु के ही ज्येष्ठ पुत्र का वंश है। इसे खारिज करने और अपने को अलग करने की घोषणा या उल्लेख बुद्ध ने कभी नहीं की। वस्तुत: सिद्धार्थ गौतम ने 29 वर्ष की आयु में समाज का त्याग किया, हिंदू धर्म-परंपरा का नहीं। समय-समय पर खोजियों, ज्ञानियों, भावी ऋषियों द्वारा परिवार, समाज और दुनियादारी का त्याग करना एक चिर-स्थापित हिंदू परंपरा ही थी। बुद्ध ने उसी परंपरा को दोहराया जो हिंदू समाज में पहले से प्रचलित थी। वह परंपरा आज भी है। बुद्ध ने वैदिक अनुष्ठानों का पालन अवश्य छोड़ दिया, फिर भी सभी वैदिक मंत्रों को छोड़ा, ऐसा नहीं है।

ङोन-बुद्धिज्म में वैदिक मंत्रों की तरह ही हृदय-सूत्र का पाठ किया जाता है, जिसमें अंत में ‘सोवाका’ अर्थात ‘स्वाहा’ भी कहते हैं, लेकिन कर्म-कांड छोड़ना कोई नई चीज नहीं थी जो बुद्ध ने शुरू की। ज्ञान पाने के लिए बुद्ध ने कई तरह के प्रयत्न किए, यह उनकी जीवन-गाथा बताती है। उसमें ‘अनपानासति’ (श्वास-संचालन पर ध्यान देना) भी था, जो योग-पद्धति की सामान्य चर्या है। किसी चर्या, साधना को स्वीकार करना या छोड़ देना भारत में सदा से चली आ रही बात है। उससे कोई हिंदू नहीं रह जाता, ऐसा कभी नहीं समझा गया। यदि बुद्ध ने कोई नई साधना तकनीक भी विकसित की तो यह पहली घटना हरगिज न थी। ज्ञान पाना, बोध होना, ‘बुद्ध’ बनना यह पहले भी हुआ है, इसे गौतम बुद्ध ने भी कहा है।

बुद्ध ने जब ‘धर्म-चक्र प्रवर्तन’ किया तो इसका कोई संकेत नहीं दिया कि वह पहले की कोई परंपरा तोड़ रहे हैं। उलटे उन्होंने कहा-‘एसो धम्मो सनंतनो’। अर्थात यही सनातन धर्म है, जिसे वे पुनव्र्याख्यायित मात्र कर रहे हैं। बुद्ध के संबोधन अपनी वैदिक जड़ों से मजबूती से जुड़े दिखते हैं। ‘हे ब्राrाणों’, ‘हे भिक्षुओं’, ‘हे आर्य’, आदि कहकर ही बुद्ध अपनी बातें कहते रहे। आर्य अर्थात भद्र, सभ्य, सज्जन। धर्म के गिरते स्तर को संभालना, उसकी हानि रोकना यही बुद्ध ने किया जो स्थापित हिंदू चेतना है। जिस तरह पहले श्रीकृष्ण या बाद में कबीर या स्वामी दयानंद ने अपने उपदेशों से कोई नया धर्म नहीं चलाया उसी श्रेणी में गौतम बुद्ध का जीवन और कार्य है।

बुद्ध ने शिष्यों को सीख देते हुए साधना द्वारा उसी बुद्धत्व की स्वयं ज्ञान प्राप्ति होने या करने की प्रेरणा दी जो भाव उपनिषदों में कूट-कूट कर भरा हुआ है। जो लोग भारत में हिंदू धर्म-परंपरा की हर अच्छी चीज को बुद्ध धर्म से ‘उधार’ लिया या ‘नकल’ बताते हैं, उन्होंने स्वयं बौद्ध ग्रंथों का शायद ही अध्ययन किया है। ऐसे लोगों को अपनी भ्रांति का सुधार करना चाहिए। 

साभार : शंकर शरण, दैनिक जागरण, २१/०५/२०१६ 

(लेखक शंकर शरण राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)