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Thursday, July 26, 2012

वैदिक मंत्रों का मानव की बुद्धि पर असर



मानव के मस्तिष्क की रचना बहुत ही अद्भुत है| शरीर का यह हिस्सा शुद्ध माना गया है क्योंकि इस स्थान पर शिव और शक्ति का मिलन होता है| ज्ञात चक्र के भीतरी स्थान पर मन का निवास होता है| मस्तिष्क की बुद्धि के ऊपरी भाग में सहस्रदल चक्र अवस्थित है, जो अत्यंत प्रकाशमय, सुंदर और अति तीव्रगति वाला, अनंत शक्ति से संपन्न, अत्यंत रहस्यमय योगचक्र माना जाता है| इस स्थान पर प्राण तथा मन के स्थिर हो जाने पर सर्व-वृत्तियों के निरोध रूप असंप्रज्ञात समाधि की योग्यता प्राप्ति होती है| महर्षियों के अनुसार आज्ञा चक्र के ऊपर ‘मानस चक्र’ नाम का एक चक्र और भी अवस्थित है| यह चक्र विभिन्न प्रकार की संवेदनाओं का आधार है| मानस चक्र के ऊपर भी ‘सोम चक्र’ नामक चक्र की उपस्थिति मानी गई है| यह परार्थवादी भावों का निवास स्थान है| इस पर ध्यान केंद्रित करने से संकल्प का नियंत्रण प्राप्त होता है|

मानस चक्र के ऊपर सहस्रार चक्र स्थित है| इस पर ध्यान लगाने से योगी परम शिव से एक हो जाता है| उसके अज्ञान और मोह नष्ट हो जाते हैं| वह पाप और पुण्य से छूटजाता है| उसके संचित कर्म समाप्त हो जाते हैं और इस प्रकार वो दो देह-मुक्ति को प्राप्त कर लेता है| मृत्यु पश्‍चात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता|

उपरोक्त सहस्र चक्र चेतना के सूक्ष्म केंद्र हैं| वे अदृश्य हैं और इसलिए उन्हें भौतिक रूप से नहीं देखा जा सकता| किन्तु वे योगियों को दिखलाई पड़ते हैं| वे प्राण-शक्ति की अभिव्यक्तियां हैं| ये ही प्राण-शक्तियां समस्त विश्‍व में व्याप्त हैं| इस प्रकार भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार देह भौतिक विश्‍व के विभु में अणु समान है| जो कुछ भौतिक विश्‍व में है, वो ही सूक्ष्म रूप में, देह में विद्यमान है| भौतिक विश्‍व पंचभूत से बना है| देह भी पंचभूत से बनी है| भौतिक विश्‍व में जो प्राण-शक्तियां काम कर रही हैं, वे चक्रों के माध्यम से मानव देह में बनी हैं| इन पर अधिकार करके मनुष्य विश्‍व शक्तियों पर अधिकार करके मनुष्य विश्‍व शक्तियों पर भी अधिकार कर सकता है|

सहस्रार चक्र का स्थान, अधिपति, देवता, देवता की शक्ति, यंत्र, कमलदलों पर अक्षरों का न्यास आदि निम्नलिखित हैं-

यौगिक नाम - सहस्रार योग चक्र (नाना प्रकार के रंगों से युक्त चक्र ही सहस्रार चक्र हैं)
स्थान - मस्तिष्क
यंत्राकृति - शिव (परमशिव व उनकी शक्तियां)
यंत्र वर्ण - अनंत (परम तेजोमय, सुवर्णिम)
बीज मंत्र - विसर्ग
बीज वर्ण - तेजोमय
दलों के अक्षर - अं से क्षं तक
वाहन - बिंदु
चक्र गुण - प्रत्येक कार्य (समर्थ-सर्व सिद्ध)
तत्व - प्रत्येक तत्व
तत्वरूप - प्रत्येक रूप
गुण - चित्त
ज्ञानेन्द्रिय - मस्तिष्क
कर्मेन्द्रिय - समाधि ज्ञान
वायु - उदान
लोक - सत्य
ग्रह - शनि
देव - परब्रह्म
देव शक्ति - महाशक्ति
शक्ति के वर्ण - ह्रीं
कमलदल - सहस्र
दल वर्ण - श्‍वेत
मुद्रा - योनि
अनुभूति-स्वाद - अवर्णनीय
प्रहरी देवता - अर्द्धनारीश्‍वर
मंत्र - ह्रीं श्रीं हुं फट् (महामृत्युंजय)
मंत्र संख्या - एक हजार
मंत्र देवता - गायत्री-महामृत्युंजय
मंत्र संख्या - एक हजार
मंत्र देवता - गायत्री,-महामृत्युंजय (संबंधित उपासना मंत्र)
ध्यान की प्रवृत्तियां - योगिराज

मानव के मस्तिष्क की रचना बहुत ही अद्भुत है| शरीर का यह हिस्सा शुद्ध माना गया है क्योंकि इस स्थान पर शिव और शक्ति का मिलन होता है| ज्ञात चक्र के भीतरी स्थान पर मन का निवास होता है| मस्तिष्क की बुद्धि के ऊपरी भाग में सहस्रदल चक्र अवस्थित है, जो अत्यंत प्रकाशमय, सुंदर और अति तीव्रगति वाला, अनंत शक्ति से संपन्न, अत्यंत रहस्यमय योगचक्र माना जाता है| इस स्थान पर प्राण तथा मन के स्थिर हो जाने पर सर्व-वृत्तियों के निरोध रूप असंप्रज्ञात समाधि की योग्यता प्राप्ति होती है| महर्षियों के अनुसार आज्ञा चक्र के ऊपर ‘मानस चक्र’ नाम का एक चक्र और भी अवस्थित है| यह चक्र विभिन्न प्रकार की संवेदनाओं का आधार है| मानस चक्र के ऊपर भी ‘सोम चक्र’ नामक चक्र की उपस्थिति मानी गई है| यह परार्थवादी भावों का निवास स्थान है| इस पर ध्यान केंद्रित करने से संकल्प का नियंत्रण प्राप्त होता है|

मानस चक्र के ऊपर सहस्रार चक्र स्थित है| इस पर ध्यान लगाने से योगी परम शिव से एक हो जाता है| उसके अज्ञान और मोह नष्ट हो जाते हैं| वह पाप और पुण्य से छूटजाता है| उसके संचित कर्म समाप्त हो जाते हैं और इस प्रकार वो दो देह-मुक्ति को प्राप्त कर लेता है| मृत्यु पश्‍चात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता|

उपरोक्त सहस्र चक्र चेतना के सूक्ष्म केंद्र हैं| वे अदृश्य हैं और इसलिए उन्हें भौतिक रूप से नहीं देखा जा सकता| किन्तु वे योगियों को दिखलाई पड़ते हैं| वे प्राण-शक्ति की अभिव्यक्तियां हैं| ये ही प्राण-शक्तियां समस्त विश्‍व में व्याप्त हैं| इस प्रकार भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार देह भौतिक विश्‍व के विभु में अणु समान है| जो कुछ भौतिक विश्‍व में है, वो ही सूक्ष्म रूप में, देह में विद्यमान है| भौतिक विश्‍व पंचभूत से बना है| देह भी पंचभूत से बनी है| भौतिक विश्‍व में जो प्राण-शक्तियां काम कर रही हैं, वे चक्रों के माध्यम से मानव देह में बनी हैं| इन पर अधिकार करके मनुष्य विश्‍व शक्तियों पर अधिकार करके मनुष्य विश्‍व शक्तियों पर भी अधिकार कर सकता है|

सहस्रार चक्र का स्थान, अधिपति, देवता, देवता की शक्ति, यंत्र, कमलदलों पर अक्षरों का न्यास आदि निम्नलिखित हैं-

यौगिक नाम - सहस्रार योग चक्र (नाना प्रकार के रंगों से युक्त चक्र ही सहस्रार चक्र हैं)
स्थान - मस्तिष्क
यंत्राकृति - शिव (परमशिव व उनकी शक्तियां)
यंत्र वर्ण - अनंत (परम तेजोमय, सुवर्णिम)
बीज मंत्र - विसर्ग
बीज वर्ण - तेजोमय
दलों के अक्षर - अं से क्षं तक
वाहन - बिंदु
चक्र गुण - प्रत्येक कार्य (समर्थ-सर्व सिद्ध)
तत्व - प्रत्येक तत्व
तत्वरूप - प्रत्येक रूप
गुण - चित्त
ज्ञानेन्द्रिय - मस्तिष्क
कर्मेन्द्रिय - समाधि ज्ञान
वायु - उदान
लोक - सत्य
ग्रह - शनि
देव - परब्रह्म
देव शक्ति - महाशक्ति
शक्ति के वर्ण - ह्रीं
कमलदल - सहस्र
दल वर्ण - श्‍वेत
मुद्रा - योनि
अनुभूति-स्वाद - अवर्णनीय
प्रहरी देवता - अर्द्धनारीश्‍वर
मंत्र - ह्रीं श्रीं हुं फट् (महामृत्युंजय)
मंत्र संख्या - एक हजार
मंत्र देवता - गायत्री-महामृत्युंजय
मंत्र संख्या - एक हजार
मंत्र देवता - गायत्री,-महामृत्युंजय (संबंधित उपासना मंत्र)
ध्यान की प्रवृत्तियां - योगिराज

साभार : भारतीय संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ हैं, फेसबुक 

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